जीवन संघर्ष - गुणमाला सोमाणी Jivan Sangharsh - Hindi book by - Gunmala Somani
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जीवन संघर्ष

गुणमाला सोमाणी

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :99
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5399
आईएसबीएन :81-88388-43-2

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क्रान्तिकारियों की गौरव गाथा...

Jivan Sangharsh

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

समर्पण

शहीद मंगल पांडे,  बहादुरशाह जफर,  श्रीमंत नाना साहेब,  तात्या टोपे,  वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई तथा १८५७ के समस्त क्रांतिवीरों की पावन स्मृति में समर्पित।

भूमिका

श्रीमती गुणमाला सोमाणी को मैं गत पाँच वर्षों से जानता हूँ। मैंने उन्हें एक शांत, गंभीर व आदर्शवादी महिला के रूप में जाना है। और बाद में उनके लेखन से परिचित होने पर मैंने उनके साहित्य में भी उनके उस रूप का अंतर्भाव पाया है। गुणमाला सोमाणी का साहित्य पाठकों के मनोरंजन के ध्येय से अधिक अहम सामाजिक सरोकारों को अपने केन्द्र में रखे हुए हैं। सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों का आदर/अनादर उनका मौलिक सरोकार है। बीसवीं सदी से निकल कर इक्कीसवीं सदी में पहुंचे अभी हमे पाँच बरस भी तो नहीं हुए, लेकिन इन पाँच वर्षों में विदेश से प्रभावित सार्वजनिक प्रचार माध्यमों की मार भारतीय जनमानस के नैतिक मनस्तंत्र में एक भीषण परिवर्तन ले आयी है। जहां भारतीय भाषाओं के स्थान पर अंग्रेजी अपने सर्वव्यापक होने के प्रयत्नों में सफलता के कगार पर है, वहीं पश्चिमी संस्कृति ने तथा कैमरा-फोन (फोन), इंटरनेट जैसी तकऩॉलोजियों ने.....पोर्नोग्राफी.... को आम आदमी के घर तक पहुंचा दिया है। भारतीय संस्कृति कभी भी पहले ऐसी नहीं रही, लेकिन पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव ने आज भारत में ‘सेन्सुएलिटी’ तथा ‘सेक्सुएलिटी’ में अंतर मिटा दिया है। इस कठिन समय में गुणमाला सोमाणी का साहित्य उम्मीदें जगाता है, क्योंकि इनके नैतिक मूल्य भारतीय जीवन मूल्यों से अविभूर्त है। वामपंथी तथा भारतीय संस्कृति विरोधी अन्य कुछ समूहों ने जहां इन वर्षों में सांस्कृतिक विकृति के प्रसार में भारतीय जनमानस को बहकाने के प्रयत्न किये हैं, वहीं गुणमाला सोमाणी का साहित्य एक स्वागत—योग्य उपक्रम है।

         गुणमाला के लिए आदर्श पुरुष स्वामी विवेकानंद, छत्रपति शिवाजी महाराज, वीर सावरकर तथा सुभाषचंद्र बोस हैं। इसलिए इनका साहित्य राष्ट्र को एक नयी दिशा प्रदान करता है।

         इस पुस्तक में गुणमाला सोमाणी लेख, कहानी, कविता तथा नाटक की विधाओं से हट कर एक नयी विधा में लिख रही हैं, वह है ऐतिहासिक संघर्षमय जीवनचरित। यह जीवन चरित उनके आराध्य महापुरुषों में से एक वीर सावरकर तथा भारत के एक अन्य क्रांतिवीर, जिन्हें भारत में बहुत कम लोग जानते हैं, वासुदेव बलवंत फड़के के हैं। हृदय में टीस इस कारण उठती है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात देश के उन कर्णधारों द्वारा हमारे उन स्वतंत्रता-सेनानियों की उपेक्षा की गयी है, जिन्होंने देश के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया था। यहां तक की राजनैतिक स्वार्थ-सिद्धि हेतु समय-समय पर सावरकर तथा शिवाजी जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों पर कीचड़ उछाला जाता रहा है। अपनी भूमिका में लेखिका ने सटीक टिप्पणी दी है कि जो लोग भारत में ब्रिटिश सरकार की चाटुकारिता में लिप्त रहे और इस चाटुकारिता की बदौलत जिन लोगों ने देश का पट्टा अपने नाम लिखवा लिया, उन्हीं लोगों ने देश के करोड़ों लोगों को गुमराह करने हेतु इतिहास को इस तरह से तोड़-मरोड़ कर लिखवाया है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की तीसरी पीढ़ी इन देशभक्तों के बलिदानों से अनभिज्ञ रह गयी है।

         ऐसे समय में स्वतंत्रता-संग्राम के वास्तविक नायकों पर शोध करके यह पुस्तक लिखना नेताओं की नयी पुश्त से त्रस्त भारतीय जनमानस को इन दो आदर्श नेताओं के जीवन चरित के माध्यम से एक नयी प्रेरणा देना है कि वे आदर्श भारतीय मूल्यों को पुनः ग्रहण करें।

अमृत मेहता

आत्म-कथन


हमारे देश को स्वतंत्र हुए लगभग सत्तावन वर्ष हो रहे हैं, किंतु हमारे देशवासियों को विशेषतः युवा पीढ़ी को यह पता नहीं है कि हमें आजादी मिली कैसे ? कौन-कौन थे उसके सूत्रधार ? कितने लोगों ने क्या-क्या यातनाएँ सहीं ? कितने त्याग किये ? कितने लोगों ने स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन-सर्वस्व अर्पित किया ? इस पर सोचना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जिन्होंने स्वतंत्र भारत की सत्ता संभाली, उन्होनें आजादी की यथार्थ कहानी को अतीत के गर्त में दफना दिया और उस कहानी को नया रूप देकर देश में प्रचारित किया।

         जिन्होंने ब्रिटिश सरकार की चापलूसी कर-करके ऊँचे पद प्राप्त कर जिनकी कृपा से सत्ता का भोग किया था, उनके कर्ता-धर्ता लार्ड माउण्टबेटन ने, उनके कान में मंत्र फूँका था कि क्रांतकारियों को सत्ता से दूर रखा जाए और यह सावधानी रखें कि उन त्यागी बलिदानियों का देश में यशगान न होने पाए। इसीलिए तो क्रांति के अग्रगण्य सूत्रधार वीर सावरकर का नाम तक, पूरे देश के लोग आजादी के दो-तीन दशक तक जानते नहीं थे। नेता जी सुभाषचंद बोस, जिन्होंने अपना ऐशो आराम, जीवन सर्वस्व मातृभूमि पर न्यौछावर किया, जिन्होंने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए देश-विदेश की खाक छानी और देश की स्वतंत्रता का स्वप्न आँखों में लेकर, विदेश में अपने प्राण त्याग दिये, ऐसे देशभक्त, त्यागी बलिदानी को अंग्रेजों ने तो ब्रिटिश साम्राज्य का घोर शत्रु माना ही किंतु गांधी-नेहरू ने भी उन्हें देशभक्त नहीं माना था। नेहरू ने तो यहाँ तक कहा था कि सुभाष बोस राह से भटके हुए मुसाफिर हैं। यदि वह जापानी फौज लेकर देश में प्रवेश करेंगे तो उनसे युद्ध करने में भी उन्हें संकोच नहीं होगा।

         आजाद हिन्द सेना के लौटे हुए सेनानियों में अधिकांश की आयु तीस-बत्तीस की थी। इन सेनानियों का गाँव-गाँव में बाजे-गाजे के साथ स्वागत किया गया, उनका सम्मान किया गया, किंतु भारत सरकार ने उन देशभक्त सैनिकों को, जिन्होंने नेताजी के साथ अभावग्रस्त स्थिति में, भूखे-प्यासे रहकर, सर्दी-गर्मी सहते हुए, जान हथेली पर लेकर, देश की आजादी की लड़ाई लड़ी, उन्हें भारतीय सेना में पुनः प्रवेश का अवसर नहीं दिया। स्वतंत्र भारत की सेना में उन्हीं सैनिकों की भर्ती की गयी, जिन्होंने अंग्रेज सरकार की ओर से युद्ध में जाकर, जापानी छावनियों में पड़े-पड़े चार वर्ष सुख चैन से बिताए थे। उन्हीं में से बहुतों को बड़े-बड़े पदों पर नियुक्त किया गया। और नेताजी के सहयोगी देशभक्त सैनिक, स्वतंत्र भारत में, नेताजी के बाद अनाथ हो गये।

         सुभाषचंद्र बोस के साथ भले ही भारत सरकार ने सौतेला व्यवहार किया हो, किंतु देश-विदेश के कोने-कोने से उनकी अमर कीर्ति भारत के जन-जन तक पहुंच चुकी है। आज सुभाष, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी की तरह भारत के घर-घर में पूजे जाते हैं।

         सबसे अधिक अन्याय तो वीर सावरकर के साथ हुआ है, क्योंकि उन्हें स्वदेशी सरकार ने ही अधिक छला है। ब्रिटिश तो उन्हें अपना कट्टर शत्रु मानते ही थे, किंतु स्वतंत्र भारत की सरकार ने भी सदैव उनसे द्वेष किया और उन्हें सत्ता से कोसों दूर रखा। देश में कहीं भी कोई क्रांतिकारी अपना क्रोध व्यक्त करता तो, सर्वप्रथम सावरकर का नाम लिया जाता था। गांधी-नेहरू सावरकर से पता नहीं क्यों इतना भयभीत रहते थे। अंग्रेजों का उनसे भयभीत रहना समझ में आता है किंतु इन नेताओं का भय ? शायद यही था कि उनके ऊपर कृपा रखने वाली अंग्रेज सरकार कहीं उनसे रूष्ट न हो जाए ? जब सावरकर रत्नागिरि में नजरबंद थे, तब देश के कुछ नेताओं ने तथा उनके प्रशंसकों ने उनकी पूर्ण स्वतंत्रता की मांग के लिए आवेदन पत्र पर असंख्य लोगों के हस्ताक्षर लेकर, वह आवेदन पत्र गांधी जी के सामने रखा, तो गाँधी जी ने पूछा था- ‘‘कौन सावरकर ? मैं नहीं जानता यह कौन है ?’’ एक विश्व विख्यात व्यक्ति के लिए कही गयी यह बात, क्या गाँधी जी को शोभा देती थी ? उन्होंने केवल इतना ही नहीं कहा, बल्कि आगे और कहा--‘‘सावरकर की मुक्ति देश के हित में नहीं है।’’ ये थे सत्यवादी, अहिंसावादी गाँधी। खैर ! प्रस्तुत पुस्तक में मैं आजादी की संक्षिप्त कहानी बताते हुए, सन् १८५७ के बाद के क्रांतिवीर वासुदेव बलवंत फड़के तथा स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर का चरित्र-चित्रण प्रस्तुत कर रही हूँ, ताकि देश की युवा पीढी १९ तथा २0वीं सदी का कुछ इतिहास जान सके। अंग्रेजों ने तो देश के इतिहास को तोड़-मरोड़ कर लिखकर, उसे पाठ्यक्रम में रखकर, पहले ही हमारी युवा पीढ़ी को, हमारी सभ्यता और संस्कृति से अपरिचित रखा है। स्वतंत्रता के बाद हमारे अंग्रेजी सभ्यता के भक्त शासकों ने, अपने गुरू मंत्र को कार्यान्वित करके, हमारे देश की युवा पीढी को स्वतंत्रता के इतिहास से भी अनभिज्ञ रखने का प्रयास किया गया है।

         वर्तमान राजनीतिक स्थिति को देखते हुए मुझे इस बात की आवश्यकता महसूस हुयी। मुझे यह आशा है कि युवा पीढी स्वतंत्रतापूर्व के इन त्यागी—बलिदानी राजनेताओं के चरित्र को पढकर, शायद अपने कर्तव्य के प्रति सजग हो जायेगी। इसी आशा के साथ मैं यह पुस्तक पाठकों के हाथों में सौप रही हूँ।

         मैं डॉ. अमृत मेहताजी की अत्यंत आभारी हूँ, जिन्होंने अपना अमूल्य समय देकर, इस पुस्तक की भूमिका लिखने का कष्ट किया। आप जैसे सहयोगी तथा शुभचिन्तकों के प्रोत्साहन से मुझे साहित्य सृजन की प्रेरणा मिलती है।
         मैं श्री तेजपाल सिंह धामा की भी आभारी हूँ, जिन्होंने इस पुस्तक के सम्पादन का दायित्व संभाल कर मेरा भार (परिश्रम का) कम कर दिया है।

गुणमाला सोमाणी

मेरा धर्म-मेरा कर्म


‘‘हाँ मैंने स्वयं को झंझटों में डाला है, क्योंकि मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए लड़ना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ, अपना धर्म मानता हूँ और राष्ट्र के मार्गदर्शन के लिए विपरीत परिस्थितियों में भी साहित्य रचना करना भारतीयों का जन्मसिद्ध अधिकार मानता हूँ।

वीर सावरकर

हे भगवन मेरे भारत में
देख आज ये क्या हो गया;
सुख शांति संपत्ति व वैभव
लगता है कहीं सब खो गया।
भाग्य को भी ढूँढा मैंने
उसका चला नहीं पता कहीं;
ब्रह्मा-विष्णु ने साफ कहा
इसमें हमारी खता नहीं
महेश की भंग हुई समाधि
उग्र रूप धर वे बोले—
देशभक्तों को क्यों भुलाया
अब कुछ ना कर सकते भोले।

सम्पादक

आजादी की कहानी


अपने राष्ट्र पर गर्व तथा अपनी संस्कृति पर अटूट आस्था होने के कारण मैं अतीत के प्रसंगों को पढ़ती रही हूँ। जैसे-जैसे अतीत की परतें खुलती गयीं, मेरी उत्सुकता बढ़ती गयी और मैंने आवश्यक ऐतिहासिक पुस्तकों को प्राप्त कर उन्हें पढ़ा। पढ़ने के बाद पता चला कि देश की स्वतंत्रता के लिए निःस्वार्थ भाव से अपना जीवन सर्वस्व अर्पण करने वाले त्यागी और बलिदानी महापुरूषों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को, कांग्रेस शासनकाल में अतीत के गर्त में दबाने का प्रयास किया गया है। वीर सावरकर जैसे देशभक्त, दूरदर्शी, कुशल राजनीतिज्ञ एवं प्रखर क्रांतिकारी का तो नाम भी शायद देश की युवा पीढ़ी को मालूम नहीं होगा। ब्रिटिश सरकार तो उनसे द्वेष करती ही थी, किंतु लगता है कांग्रेस सरकार भी उनसे द्वेष करती थी। शायद इसीलिए सावरकर का नाम किसी की जबान पर नहीं आता था। जब जबान पर ही नहीं आता था तो उनके विषय में लिखने का साहस भला कौन कर सकता था ? नेताजी सुभाषचंद्र बोस जिन्होंने कांग्रेस के साथ मिलकर अनेक वर्षों तक आजादी की लड़ाई में भाग लिया और जो दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर भी रह चुके थे, किंतु कांग्रेस के साथ विशेषतः गांधी जी के साथ मतभेद के कारण, जिन्हें अपना देश छोड़ना पड़ा। जिन्होंने अपनी मातृभूमि की आजादी के लिए शत्रु के शिविर में प्रवेश करने का साहस कर, स्वयं को मृत्यु के मुख में झोंक दिया। जिन्होंने आई.सी.एस. के सोने से भरे थाल को ठोकर मारकर देश सेवा के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया और जो मातृभूमि को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करने के लिए जीवन के अंत तक लड़ते रहे। किंतु यह उनका और हमारे देश का दुर्भाग्य था कि उन्हें मातृभूमि की स्वतंत्रता की प्यास के लिए, विदेश की धरती पर प्राण त्यागने पड़े और हम देशवासी ऐसे महान् देवदूत समान वीर सेनानी, देश भक्त और मानवता के पुजारी के अंतिम दर्शन भी नहीं कर सके।

         क्रांतिकारियों का मत था कि गांधीजी ने अफ्रीका में जो लड़ाई जीती, वह विदेश की धरती पर थी। उसके लिए अहिंसात्मक लड़ाई शायद ठीक होगी। वह लड़ाई अन्याय और अत्याचार के विरूद्ध थी किंतु हमारे देश की लड़ाई आजादी की लड़ाई थी। यहाँ चोर हमारे घर में घुस कर अपना अधिकार जमा बैठे थे, न केवल अधिकार जमा बैठे थे, बल्कि हमारे साथ पशुओं सा व्यवहार कर रहे थे, हमारी संपदा लूट रहे थे, हमारी सभ्यता, संस्कृति और भाषा के अस्तित्व को, हमारे स्वाभिमान को कुचलकर नष्ट कर रहे थे। ऐसे लोगों को, जो जबर्दस्ती हमारे मालिक बन बैठे थे, क्या हम अपना मालिक मानकर, उनके सामने अपने अधिकार, अपनी स्वतंत्रता मांगने के लिए गिड़गिड़ा सकते थे ? क्या हम भारतवासियों का क्षात्र तेज इतना क्षीण हो चुका था कि हम बिना लड़े ही उनकी शरण में जाकर, उनसे दया की भीख मांगते ? अन्याय का विरोध करने के लिए शत्रु पर वार करना हिंसा नहीं है, वह धर्मयुद्ध होता है और धर्मयुद्ध करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। घर में घुसे हुए चोरों को जबर्दस्ती से मारपीट के ही घर से बाहर निकाला जा सकता है और अंग्रेजों जैसे हत्यारे, लुटेरों, को अहिंसा की भाषा कभी समझ में आ ही नहीं सकती। यदि आती तो अंग्रेज इतने लम्बे समय तक भारत में नहीं रहते। इसीलिए क्रांतिकारियों का विचार था कि देश के प्रतिनिधि, अंग्रेज सरकार से सीधे यहाँ से चले जाने की मांग करें और यदि वे न जाएं तो उन्हें उन्हीं के तरीके से यहाँ से खदेड़ दिया जाए। इसीलिए देश की युवा पीढ़ी ने क्रांति का आह्वान किया। वासुदेव बलवंत फड़के ने १८५७ के बाद फिर से सशस्त्र क्रांति का बिगुल बजाया था। चापेकर बंधु और मदनलाल धींग्रा ने अन्यायी, अत्याचारी, ब्रिटिश अफसरों की हत्या करके ब्रिटिश सरकार को दहला दिया था। चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह आदि के संगठन ने, अत्याचारी आततायी ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए क्रांतिकारी तेवर अपना लिये थे। वीर सावरकर ने ब्रिटिश साम्राज्य के गढ़ में अर्थात लंदन में निवास कर वहां से क्रांतिकारी गतिविधियों को गति प्रदान की थी।

         लोकमान्य तिलक प्रथम विश्वयुद्ध के समय भारत में एकमात्र लोकप्रिय नेता थे। प्रथम विश्वयुद्ध के समय, १९१४ में वे जेल से मुक्त होकर आये थे। उसके बाद १९१६ में प्रसिद्ध लखनऊ अधिवेशन में गांधीजी के साथ लोकमान्य तिलक का मतभेद हो गया।

         दूरदर्शी तिलक अंग्रेजों की धूर्तता तथा छल-कपट को जानते थे। उन्होंने बिना शर्त अंग्रेजों को उस युद्ध में सहयोग न देने का प्रस्ताव रखा, किंतु गांधीजी संकटग्रस्त अंग्रेजों को बिना शर्त मदद देने के पक्ष में थे। तिलक सच्चे देशभक्त तथा स्वाभिमानी भारतीय नागरिक थे। उनका कहना था कि ‘‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्धि अधिकार है’’ उसे पाने के लिए हमें किसी अन्यायी, अत्याचारी सरकार के सामने नाक रगड़ने की आवश्यकता नहीं है। आपने १८८८ से जन जागृति का कार्य आरंभ किया था।

         भारत को अंग्रेजों के दासत्व से मुक्त कराने के लिए डॉ. हेडगेवार ने १९२५ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। डॉ. का भी मत था कि हम हिन्दू भारत के स्वामी हैं, यहाँ सब कुछ हमारा अपना है, इसलिए हमें अंग्रेजों से अपने अधिकारों की शिक्षा मांगने की आवश्यकता नहीं है। और हमारे घर में घुसे विदेशी साम्राज्यवादियों को, दंड देने का कोई अधिकार नहीं है। उधर सुभाषचंद्र बोस का भी यही मत था कि सभ्यता और मानवता की डींगें मारने वाले चर्चिल सहित सभी ब्रिटिश धुरंधरों को क्या अधिकार है कि वे जबर्दस्ती भारत के करोड़ों लोगों को गुलाम बनाकर रखे। हमें हमारी आजादी के लिए लड़ना होगा। इसलिए द्वितीय विश्वयुद्ध में फंसे ब्रिटिश सरकार की कमजोरी का लाभ उठाकर, हमें भी राजनीति का दांव चलाकर, देश की आजादी के लिए पूरा जोश लगाना चाहिए। अपने मन में यह दृढ निश्चय कर, वे जर्मनी, इटली होते हुए जापान पहुंचे। वहाँ राजा महेन्द्र प्रताप, रासबिहारी बोस तथा जापानी सरकार के सहयोग से उन्होंने आजाद हिन्द सेना का गठन किया। और जापानी सेना का सहयोग लेकर सिंगापुर, मलेशिया, बर्मा पर विजय पाते हुए इंफाल की ओर अग्रसर होने लगे। वहाँ से वे दिल्ली की ओर कूच करने वाले थे। नेताजी बीच-बीच में रेडियो पर देशवासियों को सूचना देते जाते थे और उन्हें आजादी के लिए लड़ते रहने की प्रेरणा देते थे। नेताजी के ऐसे अद्भुत पराक्रम की सराहना करने के स्थान पर गांधी और नेहरू उन्हें भटके हुए मुसाफिर कहते थे। नेहरू ने तो समाचार-पत्र में अपने विचारों को व्यक्त करते हुए कहा कि ‘‘सुभाष के देश प्रेम तथा ध्येय की शुद्धता पर मुझे कोई शंका नहीं है, किंतु उन्होंने जो मार्ग अपनाया है, उसे मैं कतई स्वीकार नहीं कर सकता।  


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