मेरे मुहल्ले के फूल - नरेन्द्र कोहली Mere Muhalle Ke Phool - Hindi book by - Narendra Kohli
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मेरे मुहल्ले के फूल

नरेन्द्र कोहली

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :504
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 541
आईएसबीएन :81-263-1030-8

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प्रख्यात व्यंग्य रचनाकार नरेन्द्र कोहली की, स्वयं चुनी गयी, एक सौ प्रतिनिधि व्यंग्य रचनाओं का संचयन।

Mere Muhalley Ke Phool - A hindi Book by - Narendra Kohli मेरे मुहल्ले के फूल - नरेन्द्र कोहली

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

जब साहित्य में ही शुद्ध व्यंग्य को अपनी जगह बनाने में कठिनाई आती है, तो जीवन में तो स्थिति और भी विषम हो उठती है। वैसे तो सच्ची बात तो सब को अच्छी नहीं लगती,खास तौर पर जब वह बिना चाशनी के परोस दी गयी हो। यह नहीं कि नरेन्द्र कोहली मीठा बोलते नहीं, पर वे मानते है कि जहाँ कही भी अतिरिक्त मिठास है,वहाँ झूठ उतना ही अधिक है। बहुत अधिक मीठा बोलनेवाले समाज के तथाकथित अत्यन्त शिष्ट लोगों को झूठा और मक्कार मानने के कारण उनकी प्रवृत्ति सीधी और खरी बात कह देने में अधिक है। प्रतीकात्मकता,विधायकता,तटस्थता,समग्र प्रभाव और संयम नरेन्द्र कोहली के व्यंग्य के प्रभावक तत्त्व हैं. अपने व्यंग्य में उन्होंने हिन्दी व्यंग्य साहित्य की एकरसता को तोड़कर उसे एक नयी दिशा भी दी है। कहना असंगत नहीं होगा कि उनकी व्यंग्य रचनाएँ समकालीन जीवन में व्याप्त विसंगतियों पर जहाँ करारी चोट करती हैं,वहीं टूटते जीवन मूल्यों को रेशे-रेशे अलग करते हुए जीवन्त मानवीय मूल्यों को प्रतिष्ठित करने की कोशिश भी करती है। प्रख्यात व्यंग्य रचनाकार नरेन्द्र कोहली की,स्वंय उनके द्वारा चुनी गयी,एक सौ प्रतिनिध व्यंग्य रचनाओं का यह संचयन मेरे मुहल्ले के फूल उनकी इन्हीं प्रवृत्तियों और उपलब्धियों का साक्षी है। उनकी व्यंग्य रचनाओं के बारे में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का यह कहना सही है कि इतना सहज भाव और ऐसी भेदक दृष्टि क्वचित् कदाचित् ही देखने को मिलती है।

संस्कृति से बिछुड़ने का रोग


बच्चा रात-भर नहीं सोया। थोड़ी देर सोता भी तो फिर जागकर रोने लगता। रोता तो बहुत जो़र से रोता। वह इतना रोया कि मुझे शक हो गया कि उसके भीतर किसी बहुत ही सबल राष्ट्रीय आत्मा का निवास है। क्योंकि इतना अधिक तो देश की दुर्दशा पर रोने वाले भी बहुत मुश्किल से ही रोएँगे। मैं रात-भर सोचता रहा कि बच्चा यदि इस अभ्यास को बनाये रखेगा तो उसे पर-राष्ट्र मन्त्रालय में एक अच्छी-सी नौकरी मिल सकती है। वे लोग उसे संयुक्त राष्ट्र में अपने देश का पक्ष लेकर रोने की नौकरी दे सकते हैं। विदेशों में अपने देश के लिए चन्दा इकट्ठा करने के लिए रोने का काम सौंप सकते हैं, या फिर शत्रु-राष्ट्रों के दूतावासों के गेट पर बैठकर निरन्तर रोने की ड्यूटी लगायी जा सकती है। पर पता नहीं वह बड़ा होने तक इसी प्रकार रो भी सकेगा कि नहीं।

सुबह मैं बच्चों को अपने वैद्य जी के पास ले गया। सुबह-सुबह ही मेरे मन में यह सन्देह जागा था कि बच्चा अभ्यास से नहीं, किसी रोग की पीड़ा से रोता रहा है। अच्छा था कि वैद्यराज को दिखा ही लिया जाए।
वैद्यराज बड़ी देर तक उसकी नब्ज पकड़कर बैठे रहे और आँखें मिचमिचाते रहे और मैं डरता रहा कि कहीं वे भी न रो पड़ें। पर वे रोये नहीं। थोड़ी देर बाद करूण आवाज़ में बोले, ‘‘इस बालक को अपने देश की संस्कृति से बिछुड़ जाने का रोग है।’’
मैंने मन-ही-मन अपने घर में पड़ी हज़ारों रूपयों की मेडिकल बुक्स को तीली दिखायी और पूछा, ‘‘यह कौन-सा रोग है, महाराज ?’’

‘‘होता है, यह भी एक होता है।’’ वे अपने हाथ की अँगूठी को फिराते हुए बोले, ‘‘अभी बताता हूँ कि यह क्या होता है ।’’
फिर वे थोड़ी देर तक सोचते रहे कि वह क्या होता है और तब बोले, ‘‘हम अपने देश की संस्कृति से इतनी दूर चले आये हैं कि हमारे यहाँ पैदा होने वाले बच्चों की आत्माएँ भूखी रह जाती हैं। जिस प्रकार बच्चे का भूखा पेट रोता है, वैसे ही बच्चे की भूखी आत्मा भी रोती है।’’
‘‘इसका उपचार क्या है, महाराज ?’’ मैंने पूछा।
वे बोले, ‘‘उपचार भी करता हूँ।’’

वैद्यराज अपने स्थान से उठकर दुकान के पिछवाड़े में स्थित अपने घर में चले गये। मैं यह सोच कर बैठा रहा कि वैद्यराज का लंच-टाइम हो गया होगा। भोजन पा लेंगे तो आ जाएँगे। सोचा, मैं भी उनके कुछ चूर्ण और भस्म खाकर सो रहूँ। पर कैसे सोता, बच्चा मेरी गोद में लेटा, मुझे बिटर-बिटर देख रहा था। मैं यदि सोने का प्रयत्न करता तो वह रोने लगता।
वैद्यराज बहुत जल्दी लौटे। उनके हाथ में बहुत पुराना-सा एक ग्रामोफ़ोन था। यह शायद ग्रामोफ़ोन का सबसे पुराना मॉडल था। उन्होंने ग्रामोफ़ोन में धड़ाधड़ चाबी दी और ढूँढ़-ढाँढ़कर एक पुराना सड़ा-सा रिकार्ड उस पर लगा दिया।
रिकार्ड में से शास्त्रीय संगीत की रीं-रीं, टीं-टीं निकली तो बच्चे ने चौंककर गर्दन उठा दी।
वैद्यराज ने ताली बजायी, ‘‘देखो, संस्कृति का पान कर रहा है ।’’
और थोड़ी ही देर में बच्चा बोर होकर सो गया।

मैं भौचक होकर कभी वैद्यराज को देख रहा था और कभी बच्चे को। जो बच्चा रात-भर नहीं सोया था और चीखता रहा था, उसे शास्त्रीय संगीत ने कितनी जल्दी सुला दिया ! मुझे उसकी विदेश मन्त्रालय वाली नौकरी पर यह बड़ा भारी खतरा लगा। उसे जहाँ कहीं भी रोने वाली नौकरी पर भेजा जाएगा, वहाँ शत्रु शास्त्रीय संगीत से उसे सुला देंगे।
‘‘यह कैसे हुआ महाराज ?’ मैंने पूछा।
‘‘आत्मा तृप्त हो गयी।’ वैद्यराज बोले।

‘‘मैं शास्त्रीय संगीत की इस शक्ति से परिचित नहीं था, महाराज!’’ मैं बोला, ‘‘पर यदि यह इतनी बड़ी स्लीपिंग पिल है तो पुराने राजा-महाराजा लोग ज़रूर अनिद्रा रोग के रोगी होते होंगे, जो गायकों को अपने दरबारों में रखते थे।’’
‘‘नहीं, उसका कारण दूसरा था।’’ वैद्यराज ने प्रकाश डाला, ‘‘वे लोग अनिद्रा रोग के रोगी नहीं थे। वस्तुतः वे लोग अपने दरबार के इन गायकों के संगीत के माध्यम से दरबारियों को सुलाकर या उनींदा करके अपनी बात मनवा लिया करते थे। दरबार में सोने की परम्परा का शुभारम्भ उन्हीं दिनों हुआ था। तभी तो आज भी लोग संसद भवन में जाकर सो जाते हैं। एक उपयोग और भी था। जिस प्रकार राजा लोग विषकन्या पालते थे, पहलवान पालते थे, उसी प्रकार गायकों को भी पालते थे, ताकि अपने शत्रुओं को अपने गायकों के आलापों से सुला दें। और बाद में तो बाजी ही पलट गयी थी...’’
वे अपनी बात बीच में ही छोड़कर हँसने लगे। मैंने ग्रामोफ़ोन में और भी चाबी भर दी ताकि देश की संस्कृति चलती रहे और बच्चा सोया रहे, कहीं ऐसा न हो कि वैद्यराज की हँसी से वह जाग जाए और मेरा ज्ञान अधूरा ही रह जाए।
‘‘बाजी कैसे पलट गयी थी ?’’ मैंने पूछा।

‘‘हुआ यह कि गायकों को अपने संगीत का मूल्य ज्ञात हो गया और उन्होंने अपने ही राजा को सुलाने की धमकी दी। तानसेन ने अपना अभ्यास अकबर के सामने करना आरम्भ कर दिया और अकबर सदा ही उनींदा रहने लगा। उन्हीं दिनों उसके उनींदेपन से लाभ उठाकर शहजादा सलीम विद्रोह कर बैठा था। तब अकबर ने तानसेन को बहुत समझाया। उसे बहुत सारा धन दिया और उसे बीरबल के साथवाला कमरा दे दिया। उससे उसे दुहरा लाभ हुआ। एक तो फिर तानसेन ने उसे सुलाया नहीं और दूसरे, बीरबल बहुत ज्यादा सोने लगा और अकबर को राज-काज के लिए अधिक समय मिलने लगा, नहीं तो ‘आईने अकबरी’ में भी अकबर को चुटकुले ही लिखवाने पड़ते। औरंगज़ेब ज्यादा चालाक था, उसने अपने दरबार में ही नहीं अपने आस-पास कहीं भी कोई गायक नहीं रहने दिया था।’’
‘‘पर यह संस्कृति से बिछुड़ने का रोग कब से चला है ?’’ मैंने बात बदल दी।

‘‘औरंगज़ेब के समय से ही चला है। उसने सारे जीवन में एक बार भी संगीत नहीं सुना था। पर अब यह रोग जड़ से समाप्त हो जाएगा।’’ उनके नयनों में तेज उत्तर आया, ‘‘मैं इसे जड़ से उखाड़ दूँगा। मैंने संगीतमयी गोलियाँ बनायी हैं। एक गोली खा लो, आत्मा तृप्त हो कर सो जाती है। मैंने कालिदास के नाटकों का भस्म बनाया है, कथकली का चूर्ण बनाया है। कोई चीज नहीं छोड़ी। संस्कृति का प्रत्येक तत्त्व मैंने अपनी औषधियों में प्रस्तुत कर दिया है। अब कोई भी राष्ट्रीय आत्मा भूखी रह कर रात भर नहीं रोएगी। रोनेवाली आत्माएँ, स्वतन्त्रता से पहले-पहले ही मर गयीं अब सारी आत्माएँ मेरी औषधियाँ खाकर संस्कृति से भरपूर होकर सो जाती हैं। मैंने देश के हर बड़े नेता को, ज़िला लेबल तक शास्त्रीय संगीत की गोलियाँ खिलायी हैं और हमारा हर नेता सो रहा है। सोना हमारी संस्कृति है। है न चमत्कार। देखोगे ?’ उन्होंने मुझसे पूछा।
मैं बिना कुछ समझे, उनकी ओर देखता रहा और उन्होंने शीशी से एक गोली निकाली, अपने मुँह में डाली और कुर्सी पर ही सो गये।

डिग्रियाँ

वे विश्वविद्यालय के उपकुलपति बने तो मैं उनसे मिलने गया। बोला, ‘‘बधाई हो। मन्त्रीजी ने आपको उपकुलपति बना दिया।’’
वे नाराज़ हो गये। बोले, ‘‘मन्त्रीजी ने खामखाह बना दिया। रिश्तेदारी ने बनाया। मन्त्रीजी क्या चीज़ हैं ? मैं उनका रिश्तेदार न होता तो वे मुझे उपकुलपति बना सकते थे ?’’
‘‘नहीं।’’ मैं बोला।
‘‘इसलिए कहता हूँ,’’ उन्होंने मुझे समझाया, ‘‘संसार का नया ज्ञान सीखो। बोला, अक्ल बड़ी कि भैंस ?’’
‘‘अक्ल!’’ मैं बोला।
‘‘ग़लत,’’ उन्होंने मुँह बनाया, ‘‘भैंस बड़ी है। एक समय में छह-सात किलो दूध देती है। अक्ल साली क्या खाकर छह-सात किलो खालिस दूध देगी ?’’
‘‘ठीक है !’’ मैंने कहा।
‘‘और मन्त्री बड़ा कि रिश्तेदारी ?’’ उन्होंने पूछा।
‘‘रिश्तेदारी।’’ मैंने उत्तर दिया।

‘‘इस बार ठीक है।’’ वे प्रसन्न हुए, ‘‘तो तुम भी रिश्तेदारी का प्रसाद पाओ। एक प्रेस खोल लो।’’
‘‘प्रेस ! वह क्यों ?’’ मैंने भौचक होकर पूछा।
‘‘इसलिए, क्योंकि मैं कहता हूँ।’’ वे बोले, ‘‘मैं अर्थात् इस विश्वविद्यालय का नया उपकुलपति।’’
‘‘पर आप क्यों कहते हैं ?’’ मैंने ज़िद करके पूछा।
‘‘अबे, डिग्रियाँ छपवानी हैं।’’ वे बोले, ‘‘थोक के भाव !’’
‘थोक के भाव !’’ मैं और हैरान हुआ, ‘‘यह क्यों ?’’
‘‘ऐसा है’’ वे मेरी नादानी पर झुँझलाये, ‘‘कि उनकी ज़रूरत पड़ेगी। देखो, पहले तो यह होता था कि लड़के परीक्षाएँ पास करते थे और दीक्षान्त-समारोह पर अपनी डिग्रियाँ लेते थे। अब यह बात नहीं रही।’’
‘‘अब क्या हुआ है ?’’ मैंने पूछा।
‘‘अब लड़के परीक्षा में बैठने की जगह उपकुलपति के घर पत्थर मारकर डिग्री लेना ज्यादा सुविधाजनक मानने लगे हैं।’’ उन्होंने कहा।

‘‘तो आप क्या करेंगे ?’’ मुझे उनसे सहानुभूति हो आयी, कहाँ फँस गये बेचारे !
‘‘कई बातें सोच रहा हूँ।’’ उन्होंने अपनी टोपी सिर के पिछले भाग में खिसकाकर माथा खुजलाया और टोपी खुजलाये जा चुके भाग की ओर खिसकाकर सिर का पिछला भाग खुजलाने लगे।
‘‘क्या-क्या सोच रहे हैं ?’’ मैंने ठीक ढंग से रूआँसा होकर पूछा, जैसे किसी के जवान बेटे के मरने पर संवेदना प्रकट करते हुए कोई पूछता है, ‘‘उसे क्या हुआ था ?’’
‘‘इसीलिए तो कहता हूँ कि प्रेस खोल लो।’’ इस बार उन्होंने अपना चश्मा रूमाल से साफ करना आरम्भ किया, ‘‘उससे होगा यह कि मैं ढेर सारी डिग्रियाँ छपवाकर बोरों में भरवाकर अपने पास रखूँगा। जब कभी कोई लड़के प्रदर्शन करने आएँगे, मैं उन बोरों में से उनकी इच्छानुसार डिग्रियाँ निकालकर उनको दे दूँगा।’’
मैं कुछ गम्भीर हुआ और बात को वैयक्तिक धरातल से ऊपर खींचकर राष्ट्रीय धरातल पर ले गया, ‘‘इससे तो देश में पढ़ाई का स्तर बहुत गिर जाएगा ।’’
वे मुझसे अधिक गम्भीर हो गये। राजनीतिक मुद्रा बनाकर बोले, ‘‘गिरना बुरा है या टूटना ?’’

मैंने उनके प्रश्न पर विचार किया और बोला, ‘‘टूटना बुरा है। गिरकर हम उठ सकतें है, पर टूटकर जुड़ना मुश्किल है।’’
‘‘तो ठीक है,’’ उन्होंने प्रसन्न होकर कहा, ‘‘स्तर गिरेगा, शीशे तो नहीं टूटेंगे। यह देश का निर्माण है। देश का मतलब भवन। मैं नया भवन नहीं बनवाऊँगा, पर जो बना हुआ है उसे टूटने नहीं दूगाँ।’’
मैं उनकी दृढ़ता से बहुत प्रभावित हुआ। मुझे लगा, बात बहुत सही है। देश की स्वतन्त्रता की लड़ाई में जिनके सिर टूट गये, उनके बच्चे यतीमों के समान आलू-छोले बेचते हैं और जिनके सिर गिर गये यानी झुक गये, उनके बच्चे नोट बनाने की मशीनें लिये फिरते हैं। तुड़वाना मूर्खता है, झुकाना बुद्धिमत्ता है। हमारे ऋषि लोग ईश्वर की मूर्ति के सामने सिर झुकाते थे, सिर मूर्ति से मारकर तुड़वाते नहीं थे। ठीक है।
‘‘पर मैं तो सुन रहा हूँ,’’ मैंने एक और शंका की, ‘‘कि लड़के अगली बार बी.ए. की परीक्षा में बैठकर एम.ए. की डिग्रियों की माँग करने वाले हैं। यह तो बुरी बात होगी।’’
‘‘बड़े भोले हो।’’ वे बोले, ‘‘बुरी बात क्या है ! हम उनकी माँग से पहले ही उन्हें बी.ए. की परीक्षा के बाद एम.ए. की डिग्री पकड़ा देंगे और पी.एच.डी की डिग्री डाक से भेज देंगे और समाचारपत्रों में यह घोषणा छपवा देंगे कि बी.ए. एम.ए. और पी.एच.डी की डिग्रियों का मूल्य आज से बराबर-बराबर माना जाएगा। यह सोशलिस्ट स्टेट की ओर हमारा एक और क़दम है। कितनी बुरी बात है कि कुछ लोग स्वयं को जनता से केवल इसलिए ऊँचा मानते हैं, क्योंकि उसके पास कुछ ऊँची डिग्रियाँ हैं। दिस इज़ अगेंस्ट डिमॉक्रेसी।’’
‘‘आप ठीक कहते हैं।’’ मैंने हाथ जोड़ दिये।

‘‘और बर्खुरदार!’’ उन्होंने मुझे आँख मारी, ‘‘वैसे भी डिग्री तो क्लर्की-श्लर्की की नौकरी के लिए देखी जाती है। बड़ी नौकरियाँ तो यूँ ही मिलती हैं। अब मेरे पास कोई डिग्री है या इन्दिरा जी के पास है ? सब यूँ ही चलता है। तुम्हारे पढ़े-लिखे कवि तो मास्टर ही रह गये। टैगोर, निराला और प्रसाद तो बिना डिग्री के महान् हुए। फिर डिग्री क्या मूल्य है ?’’
‘‘ठीक है। ठीक है।’’ मैं बोला, ‘‘आप ढेर सारी डिग्रियाँ छपवाकर हवाई जहाज़ से लुटा दीजिए। जिसके हाथ में डिग्री पड़ जाय, उस पर वह अपना नाम लिख ले।’’
‘‘सोचा था, यह भी सोचा था।’’ वे बोले, ‘‘पर हिन्दुस्तानी जनता बड़ी मूर्ख है। उनके लिए हवाई जहाज़ से अन्न का बोरा फेंको तो उसी के नीचे दबकर मर जाते हैं। और फिर डिग्री की तो चोट बड़ी गहरी होती है। इसलिए डिग्रियाँ हवाई जहाज़ से नहीं फिकवा रहा । वह कर सकता तो इन सब मास्टरों-वास्टरों का वेतन बचा पाता तो अपना वेतन और भी बढ़वा सकता । पर हुआ नहीं। हाय !’’
‘‘हाय !’’ मैंने संवेदना प्रकट की।
‘‘अच्छा, जाओ अब !’’ वे सहसा हाथ झटककर बोले, ‘‘हाय-हाय मत करो, नहीं तो लोग समझ बैठेंगे कि तुम मेरी कोठी पर प्रदर्शन कर रहे हो। अभी तो प्रदर्शनकारियों को देने के लिए डिग्रियाँ ही नहीं छपीं। जाओ, जल्दी से प्रेस खोलो !’’
मैं उठकर चल पड़ा। नमस्ते भी नहीं की। डर गया, कहीं यह न समझ लें कि डिग्री के लिए हाथ जोड़ रहा हूँ।

कबूतर

टाउन हाल के सामने एक चबूतरा अब भी है, तो पहले भी रहा होगा। उस पर किसी समय ब्रितानी साम्राज्य की सम्राज्ञी विक्टोरिया की काले रंग के पत्थर की बड़ी-सी मूर्ति हुआ करती थी। अब वह कहाँ है, मुझे पता नहीं है। जब मन्दिरों से महापराक्रमी भगवान की मूर्तियाँ चोरी चली जाती हैं तो बीच चौराहे से एक नारी-मूर्ति का गायब हो जाना कौन-सी अचम्भे की बात है, चाहे वह कितने ही काले पत्थर से क्यों न बनी हो।

इण्डिया गेट के बाहर पाँचवें जार्ज की मूर्ति पर छत्र बनवाने वाले अँग्रेज़ पता नहीं कैसे चूक गये और उन्होंने रानी विक्टोरिया की मूर्ति के ऊपर छत्र नहीं बनवाया। उन्होंने शायद सोचा था कि पाँचवें जार्ज की सफ़ेद रंग के पत्थर की मूर्ति एक अँग्रेज़ की मूर्ति लगती है, इसलिए उस पर छत्र आवश्यक है, पर विक्टोरिया की काले रंग की मूर्ति हिन्दुस्तानियों में खप जाएगी, इसलिए उस पर छत्र आवश्यक नहीं है। पर नेटिवों को डराने के लिए उन्होंने मूर्ति के दोनों ओर तोपें रखवा दी थीं। वे तोपें गोले नहीं दागती थीं। मेरा अपना विचार है कि जनरल कौल वही तोपें उठवाकर चीनियों से लड़ने के लिए लद्दाख में ले गये थे। अब वे तोपें पीकिंग के अजायबघर में हैं।

विक्टोरिया काफ़ी आराम से बैठी थीं और मूर्ति का फैलाव काफ़ी था। कबूतरों के बैठने का काफ़ी आरामदेह स्थान था वह। हुआ यह कि उस मूर्ति पर और उसकी छत्रछाया में कबूतरों की आम सभाएँ होने लगीं। हिन्दुस्तानी कबूतर थे कमबख़्त ! अदब-क़ायदा कुछ जानते न थे, इसलिए हर कबूतर नियम से उस मूर्ति पर तीन बार बीट अवश्य करता था।
उस ज़माने में दिल्ली में सिवाय भारतीयों के और किसी भी राष्ट्र का नागरिक भंगी का काम नहीं करता था। और हिन्दुस्तानी भंगी में इतना साहस कहाँ से आता कि वह ब्रितानी साम्राज्य की महान् सम्राज्ञी की मूर्ति के पास फटकता। होते-होते हुआ यह कि विक्टोरिया की मूर्ति पर कबूतरों की बीट का ढेर लग गया। तोली नहीं गयी, इसलिए सही नहीं बता सकता, वैसे अन्दाज़ से कह सकता हूँ कि टन-दो-टन तो होगी ही।

उन्हीं दिनों इंग्लैण्ड के प्रधानमन्त्री श्री एटली भारत के दौर पर आये। उन्होंने जब सम्राज्ञी की दुर्दशा देखी तो घबरा गये। उनके आगे बात स्पष्ट थी कि जिस देश के कबूतर तक इतने राजद्रोही और साहसी हों, वहाँ कोई अन्य देश शासन नहीं कर सकता। परिणामस्वरूप, उन्होंने भारत को स्वतन्त्र कर दिया। मुफ्त में यश मिला महात्मा गाँधी, नेताजी सुभाष तथा द्वितीय महायुद्ध को। स्वतन्त्रता के इतिहास में उन महान् कबूतरों को एकदम भुलाकर भारतीयों ने अपनी परम्परागत कृतघ्नता का प्रमाण दिया है।

स्वतन्त्रता जब ऊपर से टपकी तो लोगों ने गाँधी टोपी फैलाकर उसे समेट लिया। महात्मा गाँधी चूँकि अपने नाम की टोपी नहीं पहनते थे, इसलिए उनके हिस्से में कुछ नहीं आया। हाँ, उनके राजनीतिक पुत्रों ने उनकी मूर्ति कम्पनी बाग़ में बनवा दी, ताकि वे बाग़ के फूलों और सैर करने वालों में ही भूले रहें और राजनीति की बात न सोचें।
महात्मा गाँधी मूर्ति में बसते थे और मूर्ति चल नहीं सकती थी, इसलिए गाँधी जी जड़ हो गये। गाँधीवाद चल निकला। वह चलता-चलता नगर निगम में घुसा, विधान सभाओं में घुसा और जाकर लोकसभा में भी बैठ गया।
इधर विक्टोरिया की मूर्ति चोरी चली गयी थी और देश को स्वतन्त्र कराने वाले क्रान्तिकारी देशभक्त कबूतर फिर से निराश्रित हो गये थे। उड़ते-उड़ते वे गाँधी की मूर्ति पर आ बैठे।

गाँधी ने उन्हें देखकर टोका, ‘‘देखो, मेरे ऊपर बीट मत करना।’’ और उन्होंने धमकी दी, ‘‘तुमने यदि मेरे ऊपर बीट की तो अँग्रेज़ों के समान मेरे शिष्य भी देश को छोड़ जाएँगे और देश का सत्यानाश हो जाएगा।’’
गाँधीजी ने सोचा था कि कबूतर इस बात को सुनकर पीछे हट जाएँगे, पर कबूतर मँडराते रहे, मँडराते रहे और आकर मूर्ति पर बैठकर हँसने लगे।

गाँधीजी ने कबूतरों को हँसते कभी नहीं देखा था। वे बड़े हैरान हुए। उन्होंने पूछा, ‘‘हँसते क्यों हो ?’’
‘‘मुझे पता नहीं है, कबूतर बोले, ‘‘कि अब सारा देश एकमत से यह चाहता है कि तुम्हारे शिष्य देश को छोड़ जाएँ। यदि हमारे कारण तुम्हारे शिष्य देश को छोड़ गये तो समझो कि हमने देश को दूसरी बार मुक्त किया।’’
‘‘यह बात है’’ गाँधीजी ने पूछा।
‘‘हाँ !’’ कबूतर बोले, ‘‘और यह मत सोचो कि तुम्हारे शिष्य देश को छोड़ जाएँगे। अँग्रे़ज़ों में लाज-शरम थी। तुम्हारे शिष्यों में कुछ नहीं है। वे तो देश को ऐसे चूस रहे हैं, जैसे कुत्ता हड्डी को चूसता है।’’
‘‘पर तुम कहीं और बीट क्यों नहीं करते ?’’ गाँधीजी ने झल्लाकर कहा।

‘‘कहाँ करें ?’’ कबूतरों ने ज़ोर से पंख फड़फड़ाये, ‘‘तुम्हारे पुत्रों ने सारे देश को इतना गन्दा कर रखा है कि उतनी गन्दी जगह पर बीट करते हमें शरम आती है।’’
‘‘ऐसा नहीं हो सकता।’’ गाँधीजी बोले, ‘‘तुम झूठ बोलते हो। मेरे तीन बन्दर कहाँ हैं ?’’
‘‘तीन बन्दर !’’ कबूतर फिर ज़ोर से हँसे, ‘‘तीनों बन्दर हर मन्त्री की आत्मा में समा गये हैं। देश में बन्दर-वृत्ति फैली हुई है। छीनो और खा जाओ। किसी दिन वे लोग तुम्हारे हाथ की यह लाठी भी छीनकर भाग जाएँगे।’’
‘‘और मेरे तीन बन्दरों के उपदेश ?’’ गाँधीजी ने पूछा।
‘‘वे उपदेश सब लोगों को जुबानी याद हैं। वे रोज़ सवेरे उनका जाप करते हैं और ऐसे सुन्दर नीति-वाक्यों के लिए तुम्हारी प्रशंसा करते हैं।’’
‘‘लोग उन पर अचारण नहीं करते ?’’ गाँधीजी ने हतप्रभ होकर फिर पूछा।

‘‘उन्हीं पर तो आचरण करते हैं !’’ कबूतर बोले, ‘‘वे लोग किसी काम में बुराई नहीं देखते, किसी की बुराई नहीं सुनते और किसी को बुरा नहीं कहते। सब अपने-अपने धन्धे में मस्त हैं। वे केवल बुराई करने में विश्वास रखते हैं; कहने, सुनने और देखने में नहीं।’’
‘‘हाय-हाय !’’ गाँधीजी की आँखों से आँसू टपके, ‘‘और मेरे पाँच शील ? क्या वे लोग पाँच शीलों को भी भूल गये हैं, उन पर अब कोई आचरण नहीं करता ?’’

‘‘नहीं-नहीं।’’ कबूतरों ने उन्हें आश्वासन दिया, ‘‘तुम रोओ मत। देश में पाँचों शील बहुत ही लोकप्रिय हैं। अधिक-से-अधिक लोग उन पर आचरण कर रहे हैं। उनका तो विदेशों में निर्यात भी हो रहा है। आज सवेरे ही पंचशील मन्त्री ने लोकसभा के सदस्यों को आश्वासन देते हुए कहा है कि पंचशील के बढ़ते हुए निर्यात से हमारे सामने एक बहुत बड़ा खतरा आ खड़ा हुआ है कि कहीं देश में पंचशील की कमी न हो जाय और उसकी मूल्य-वृद्धि न हो। इस ख़तरे को दृष्टि में रखते हुए हम इस बात के लिए प्रयत्नशील हैं कि शीघ्र-से-शीघ्र पंचशील को खुले बाजार से हटा लिया जाए और वह केवल राशन की अधिकृत दुकानों पर राशन-कार्ड पर मिला करे। हम केवल इसी से सन्तुष्ट नहीं हैं। देश के विभिन्न भागों में हम शीघ्र ही विदेशी सहायता से बड़े-बड़े कारखाने खोलने जा रहे हैं, जहाँ ‘निरोध’ के समान ही व्यापक स्तर पर पंचशील का निमार्ण भी होगा।’

’ ‘‘तो पंचशील बुहत लोकप्रिय है ?’’ ‘‘गाँधीजी पोपले मुँह से हँस पड़े।
‘‘बहुत अधिक !’’ कबूतरों ने कहा।
‘‘लोग सत्य का पालन करते हैं ?’’ गाँधीजी ने पूछा।
‘‘हाँ !’’ कबूतर बोले, ‘‘सरकार ने जीवन का सत्य खोज निकाला है। वह इस निष्कर्ष पर पहुँची है कि जीवन बिना बेईमानी और धोखेबाजी के नहीं चल सकता। छल-कपट और स्वार्थ ही जीवन का सत्य है। और इस सत्य का व्यवहार जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हो रहा है।’’
‘‘अहिंसा का भी पालन होता है क्या ?’’ गाँधीजी ने अपनी ऐनक को नाक पर ठीक से बैठाते हुए कहा, ‘‘फ्रेम अब काफ़ी पुराना हो गया है, कुछ ही दिनों में टूट जाएगा।’’
‘‘नया फ्रेम अब तुम्हें कोई नहीं लेकर देगा, कि कहीं तुम नयी दृष्टि से दुनिया को न देखने लगो।’’ कबूतर बोले, ‘‘अपने इस ऐनक को सँभालकर रखो ।’’
‘‘ऐनक को छोड़ो।’’ गाँधीजी बोले, ‘‘यह बताओ अहिंसा का पालन होता है ?’’

‘‘ख़ूब होता है।’’ कबूतरों ने आश्वस्त स्वर में कहा, ‘‘किसी अपराधी को दण्ड नहीं दिया जाता कि कहीं हिंसा न हो जाए। पुलिस की लाठियाँ भी पहले से काफ़ी छोटी कर दी गयी हैं कि हिंसा हो भी तो कम हो। अफ़सरों को खुली छूट है कि वे हिंसा से बचने के लिए किसी को दण्ड देने के स्थान पर उससे उपहार ले लें, जिससे प्रेम बढ़े और हिंसा कम हो। शत्रु देशों से मार खाकर भी हम सेना को उनसे भिड़ने की खुली छूट नहीं देते कि कहीं हमारी ओर से अधिक हिंसा न हो जाए।’’
‘‘ख़ूब! बहुत ख़ूब !!’’ गाँधीजी बहुत प्रसन्न हुए, ‘‘मेरा देश मेरे सिद्धान्तों को बहुत दूर तक विस्तार दे रहा है। इतना दूरदर्शी मैं नहीं था। अच्छा, ब्रह्मचर्य से लोग रुष्ट तो नहीं हैं ?’’

‘‘कतई नहीं।’’ कबूतरों ने कहा, ‘‘सब लोग ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। अपने ब्रह्म को कोई नहीं भूलता। वैसे आजकल धन और यौन नाम के दो ही ब्रह्म लोकप्रिय हैं। शेष ब्रह्म, पुराने क़िले के पास रहने लगे हैं।’’
‘‘ठीक है। ठीक है। क़िला ब्रह्म के लिए अच्छी जगह है। पुराना है तो क्या हुआ। पुरानी चीज़ें बुरी नहीं होतीं।’’ गाँधीजी भाव-विभोर होकर बोले, ‘‘अब मैं बुरा हो गया ?’’
‘‘नहीं-नहीं, तुम कैसे बुरे आदमी हो सकते हो !’’ कबूतरों ने गुटरगूँ की, ‘‘अँग्रेज़ कहते हैं, ‘ओल्ड इज गोल्ड’। हर पुरानी चीज सोना है। इसलिए तो हमारे देश ने सड़ी-से-सड़ी पुरानी चीज़ भी नहीं त्यागी। सुना है कि सरकार केन्द्रीय सचिवालय को पुराने सचिवालय में और लाल किले को पुराने क़िले में ले जाना चाहती है।’’

‘‘नये-पुराने की बात छोड़ो।’’ गाँधीजी मु्स्कराये, ‘‘यह बताओ, मेरे सिद्धान्त अपरिग्रह का भी कोई पालन करता है ? मैंने सारा जीवन कुछ भी जमा नहीं किया। एक लँगोटी में जीवन काट दिया। अब लोग अपरिग्रह को बुरा तो नहीं समझते ?’’
‘‘नहीं-नहीं, कतई नहीं !’’ कबूतरों ने कहा, ‘‘लोगों के पास है ही क्या कि वे जमा करें। कुछ मिलता ही नहीं है। दो-चार दुष्टों की बात जाने दो। जनता तो सारी भूखी-नंगी ही है। हाँ, सरकार अपरिग्रह में पूरा विश्वास रखती है।’’
‘‘कैसे ? कैसे ?’’ गाँधीजी ने प्रसन्न होकर पूछा।
‘‘सरकार अन्न जमा नहीं करती, इसलिए अकसर अकाल पड़ते रहते हैं।’’ कबूतर बोले, ‘‘सरकार ने कभी इतना धन जमा नहीं किया कि अपनी किसी योजना को पूरा किया जा सके। जितनी भी आय हो, वह सारा धन खर्च कर देती है। और, तो और, वह तो सेना के लिए हथियार जमा करने में भी विश्वास नहीं करती। लड़ाई छिड़ने पर हमारे मन्त्री विदेशों की सैर करने के लिए चल पड़ते हैं कि हथियार माँगकर लाएँ।’’
‘‘वे मेरे सच्चे सपूत हैं।’’ गाँधीजी का कण्ठ गद्गद हो आया, ‘‘और पाँचवाँ शील अस्तेय...?’’ वे अपना वाक्य भी पूरा नहीं कर पाये।

‘‘अस्तेय...चोरी नहीं करना।’’ कबूतर अधिक उत्साह से बोल पड़े, ‘‘ इस शील का आचरण इस देश में सबसे अधिक हो रहा है। यहाँ कभी चोरी नहीं होती। कोई चोरी नहीं करता। उसकी आवश्यकता ही नहीं है। अपराधी को दण्ड तो मिलता ही नहीं। फिर कोई काम चोरी-छिपे क्यों हो....यहाँ जब पड़ते हैं तो दिन-दहाड़े डाके ही पड़ते हैं। अस्तेय का व्रत कोई भंग नहीं करता।’’
‘‘बहुत अच्छा ! बहुत अच्छा ! सब लोग मेरी बात मानते हैं।’’ गाँधीजी बोले, ‘‘तुम भी मेरी बात मानो।’’

‘‘क्या ?’’ कबूतरों ने पूछा।
‘‘मुझ पर बीट मत करो।’’
‘‘तो कहाँ करें ? सारे देश में और कोई साफ जगह ही नहीं है।’’ कबूतरों ने कहा।
‘‘तुम्हारा अधिकार है कि तुम्हें बीट करने के लिए उपयुक्त स्थान मिले।’’ गाँधीजी अपने कोमल जोश में बोले, ‘‘तुम्हें यदि सरकार उपयुक्त स्थान नहीं देती तो तुम सत्याग्रह करो। मेरी आज्ञा से जाओ और केन्द्रीय सचिवालय पर बीट करो।’’
कबूतरों को सहसा जैसे पंख लग गये । वे फड़फड़ाते हुए उड़ गये और क्षण भर में आँखों से ओझल हो गये। गाँधीजी को कुछ राहत हुई। उन्होंने आकाश की ओर देखा। सूर्य निकल आया था। चारों ओर धूप फैल गयी थी और आसपास के मैदानों में बच्चे गुल्ली-डण्डा खेल रहे थे।

गाँधीजी ने सोचा, आज स्कूल में जरूर छुट्टी होगी, नहीं तो बच्चे पढ़ने गये होते, खेल नहीं रहे होते। उन्होंने सत्याग्रह करने के लिए स्कूल-कॉलेज छोड़ने को कहा था, गुल्ली-डण्डा खेलने के लिए नहीं।
वे मुसकराते हुए धूप सेंकने लगे।
तभी कबूतर उड़ते हुए फिर लौटे आये और आकर उनके चारों ओर बैठ गये।
‘‘तुम लोग लौट आये ?’’ गाँधीजी ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘इतनी जल्दी ?’’
‘‘ग्रह-मन्त्रालय ने हमें बीट नहीं करने दी।’’ कबूतर उदास स्वर में बोले।
‘‘क्यों ?’’
‘‘उनका कहना है कि इस समय देश में विदेशी अतिथि आये हुए हैं, इसलिए सचिवालय पर केवल विदेशी कबूतरों को ही बीट करने की अनुमति दी जा सकती है।’’ कबूतर बड़ी मुश्किल से अपनी बीट रोक रहे थे।
‘‘मैंने यह देश अपने देशवासियों के रहने के लिए स्वतन्त्र कराया था।’’ गाँधीजी बोले, ‘‘फिर भी सारी सुविधाएँ विदेशियों के लिए ही हैं ?’’

‘‘हाँ !’’ कबूतर बोले, ‘‘एक बार विजयलक्ष्मी पण्डित ने कहा था कि हिन्दी में लिखे हुए सड़कों के नाम मैं स्वयं नहीं पढ़ सकती, तो विदेशी लोग कैसे पढ़ेंगे, इसलिए सारे नाम अँग्रेज़ी में लिखे हुए होने चाहिए।’’
‘‘तो हिन्दुस्तानी लोग वे नाम कैसे पढ़ेंगे ?’’ गाँधीजी ने पूछा।
‘‘उन्हें पढ़ने की ज़रूरत नहीं।’’ कबूतरों ने बताया, ‘‘उन्हें या तो नाम ज़बानी याद होने चाहिए या उन्हें विदेशियों से प्रार्थना करनी चाहिए कि वे लोग उनके देश की सड़कों के नाम उन्हें पढ़कर बताएँ।’’
‘‘हुँ !’’
‘‘हम बीट कहाँ करें ?’’ सहसा एक कबूतर ने चीख़कर पूछा।
‘‘सचिवालय के गुम्बद पर तुम्हें बीट नहीं करने दी गयी तो तुमने सचिवालय के भीतर बीट क्यों नहीं की ?’’ गाँधीजी नाराज़ हो गये।

‘‘भीतर ?’’ कबूतर खिलखिलाकर हँस पड़े, ‘‘सचिवालय के भीतर तो पहले ही से विदेशी कबूतर बीट कर रहे हैं। हमारी क्या हस्ती है वहाँ !’’
‘‘अच्छा !’’ गाँधीजी सोच में पड़े गये।
‘‘हम बीट कहाँ करें ?’’ कहाँ करें ?’’ कबूतर फिर चीख़े।
‘ठहरो। मुझे सोचने का अवसर दो।’’ गाँधीजी मधुर कण्ठ से बोले।
‘‘ओह ! यह मामला पेण्डिंग में मत डालो ।’’ कबूतर चीख़े, ‘‘यह तुम्हारी पंचवर्षीय योजना नहीं है।’’
‘‘तो क्या करूँ ?’’
‘‘अच्छा चलो, अगली योजना में हमें कोई स्थान दिला दो।’’ कबूतरों ने समझौता करने के लिए हाथ बढ़ाया।
‘‘ठीक है।’’ गाँधीजी बोले, ‘‘मैं तो कहीं जा नहीं सकता। योजना-मन्त्री को मेरे पास भेज दो।’’
और कबूतर योजना-मन्त्री को बुलाने के लिए उड़ चले


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