द्वितीय विश्वयुद्ध - गुरुदत्त Dwiteeya Vishwa yuddh - Hindi book by - Gurudutt
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द्वितीय विश्वयुद्ध

गुरुदत्त

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :72
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5415
आईएसबीएन :0000

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हिटलर की कहानी...

Dviteey Vishva Yuddh

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रथम परिच्छेद 

:1:

द्वितीय विश्व युद्ध की कहानी वास्तव में एडोल्फ हिटलर की कहानी ही कहनी चाहिए। एडोल्फ हिटलर की मानसिक अवस्था की जन्मदाता जर्मन जाति की मानसिक अवस्था है।
इस मानसिक अवस्था के निर्माता जर्मनी के तीन महापुरुष कहे जाते हैं। एक फ्रैडरिक महान् के नाम से विख्यात है। यह जर्मनी के एक स्वतन्त्र प्रान्त प्रशिया का शासक था। वह अपनी योग्यता से सम्पूर्ण जर्मनी का मुकुटधारी राजा बन गया था। इसकी ताजपोशी को 1701 में स्वीकार कर लिया गया। यह उस परिवार का पूर्वज था, जिसमें कैसर राजा पैदा हुए। इन कैसरों के राज्य में सारा जर्मनी संगठित हुआ और यह बहुत ही अल्पकाल में उद्योग-धन्धों में भूमण्डल का नेता बन गया।

जर्मनी का दूसरा निर्माता औटो फौन बिस्मार्क था। यह प्रशिया प्रान्त का रहने वाला एक ज़मीदार (Junker) था यह अपनी राजनीतिक प्रतिभा और रक्त तथा तलवार की मीमांसा से जर्मनी को एकराज्य बनाने में सफल हुआ। यह उसने सन् 1866-77 के भीतर कर दिखाया।
इसने जर्मनी के पुरातन शत्रु फ्रांस को युद्ध में हराया।
बिस्मार्क ने पोलैंड को भी पराजित कर इसके बहुत से भू-भाग को जर्मनी में मिला लिया। एक बात इसने और की। इससे पूर्व, जर्मनी लगभग 300 छोटे-छोटे स्वतन्त्र राज्यों में बँटा हुआ था। जर्मनी की राजनीति में आस्ट्रेलिया तथा हंगरी के सम्राट का हस्तक्षेप चलता था। बिस्मार्क ने आस्ट्रिया हंगरी को भी पराजित कर, इसके सम्राट को केवल एक मित्र की पदवी पर ला बैठाया।

जर्मनी का तीसरा निर्माता हिटलर बना। यह भी पूर्व के दो जर्मन महापुरुषों की भाँति सैनिक-शक्ति और रक्त बहाने में विश्वास रखता था।
इस प्रकार जर्मनी तैयार किया गया, जिससे प्रथम जर्मन युद्ध हुआ और फिर द्वितीय जर्मन युद्ध हुआ।
इन दोनों युद्धों में जर्मनी की पराजय हुई। अन्तर यह रहा कि प्रथम जर्मन-युद्ध में अमरीका की भूल से जर्मनी के साथ सन्धि उसकी पूर्ण पराजय से पहले ही कर ली गई थी। जर्मन सेना सन्धि से असन्तुष्ट, परन्तु सब प्रकार से पूर्ण शक्ति सहित जर्मनी वापस लौट गई।
फ्रांस और इंग्लैंड तो प्रथम जर्मन युद्ध से तबाह हो गये थे। परन्तु जर्मनी की वास्तविक शक्ति क्षीण नहीं हुई थी। सबसे बड़ी बात यह हुई कि जर्मनी के प्रथम युद्ध ने एडोल्फ हिटलर को नेता बन जर्मनी में कैसर की भाँति तानाशाह बनने की प्रेरणा दी।

जर्मनी के प्रथम युद्ध में युद्ध-विराम सन्धि के समय हिटलर एक सैनिक था। वह घायल हो एक हस्पताल में पड़ा हुआ था, जब सन्धि का समाचार प्रसारित हुआ। इससे उसे बहुत दुःख अनुभव हुआ। उसको यह समझ आया कि जर्मनी पराजित नहीं हुआ। इसके अधिकारियों ने ही छलना खेलकर इसे पराजित कराया है। उसके मन में यह उत्कंठा बन गई थी कि इन देश-द्रोहियों से जर्मनी को मुक्त करना प्रथम कार्य है।

:2:


हिटलर का जन्म 1889 में हुआ था। इसका पिता आस्ट्रिया सरकार का एक साधारण चुंगी का क्लर्क था यह कहा जाता है कि उस काल में भी हिटलर अधिकतर स्वप्नलोक में ही रहता था।
हिटलर का प्रारम्भिक जीवन एक निर्धनता का जीवन था। वह एक बहुत ही साधारण दर्जे का चित्रकार था और उसके बनाये हुए चित्र बहुत ही मामूली मूल्य पर दुकानदार लोग खरीद कर मेजों और कमरों को सजाते थे।
अपने जीवन से असन्तुष्ट, वह सन् 1913 में जर्मनी के प्रान्त बवेरिया में चला आया। प्रथम जर्मन युद्ध के आरम्भ होने पर वह सेना में भरती हो गया। सेना में हिटलर का जीवन कुछ अधिक सुखमय था। यह काम उसके मन पसन्द का था। यों भी वह, आस्ट्रिया का नागरिक होने पर भी, स्वभाव और विचार से स्वयं को जर्मन मानता था। उसके मन में जर्मन जातीय अभिमान की मात्रा बहुत से जर्मनों से भी अधिक थी।

1918 में अंग्रेज सेना ने जर्मन सेना पर मस्टर्ड गैस से यैप्रस पर आक्रमण किया था। इस गैस से हिटलर अस्थायी रूप में दृष्टिविहीन हो गया और उसे पासवान के हस्पताल में भेज दिया गया। इस समय वार्सेल्ज़ में युद्ध-विराम सन्धि हो गई। इस सन्धि के समाचार से हिटलर के दिल को बहुत धक्का लगा। वह समझता था कि वास्तविक रूप में जर्मनी पराजित नहीं हुआ। कुछ स्वार्थी अधिकारियों ने षड्यन्त्र करके जर्मनी की पराजय कराई है। इन षड्यन्त्रकारियों में वह यहूदियों को मुख्य समझता था।

युद्ध से वापस म्युनिख में पहुँच वह जर्मनी के राज्यधिकारियों के विरुद्ध आन्दोलन करने लगा। वह उनको देशद्रोही मानता था। उस समय बर्लिन में जनतन्त्र राज्य स्थापित हो चुका था। इस जनतन्त्र राज्य ने वार्सेल्ज़ की सन्धि स्वीकार कर ली थी। वार्सेल्ज़ की सन्धि जर्मनी के लिये अति कठोर थी। इससे हिटलर को बर्लिन के जनतन्त्र राज्य के विरुद्ध प्रचार करने का बहाना मिल गया।

1919 में म्युनिख की बीयर शराब के गोदाम में वह मजदूरों की एक सभा में गया। वहाँ उसने वही बातें होती सुनीं जो वह अपने मन में विचार किया करता था। अतः वह इस दल में सम्मिलित हो गया।
एक दल की एक सभा में, जो फरवरी 1920 को म्युनिख में हुई थी, हिटलर ने प्रथम बार जनता में भाषण दिया और जहाँ उसके दल वालों को उसकी बोलने की योग्यता पर अचम्भा हुआ, वहाँ हिटलर को स्वयं भी अपनी इस योग्यता पर विस्मय हुआ। इसके उपरान्त उसके मन में एक नेता, एक तानाशाह बनने की लालसा जाग पड़ी। वह एक राजनीतिक कार्यकर्त्ता बन गया।

हिटलर स्वभाव से एक सैनिक था। वह बहुत अच्छा व्याख्यान दाता था। वह सैनिक-दृष्टि से संगठन करने की योग्यता रखता था। उसके चारों ओर विनियोजित सैनिक (disbanded soldiers) एकत्रित हो गये और सन् 1923 नवम्बर में बवेरिया में सैनिक-क्रान्ति उत्पन्न करने पर उतारू हो गये। हिटलर के साथियों में हैस्स, गोयरिंग, रोज़नबर्ग, रोहम इत्यादि नेता थे। इनके साथ जनरल लुडिण्डौर्फ भी था। ये सब अपने दो सहस्र के लगभग साथियों के साथ एक राज्य समारोह में जा धमके। वह समारोह बीयर हाल में हो रहा था। जब लोग जगों में बीयर लिये पी रहे थे, हिटलर मंच पर  चढ़ आया और छत की ओर पिस्तौल चला कर सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर बोला, ‘‘राष्ट्रीय क्रान्ति आरम्भ हो रही है।’’
इस उत्सव में बवेरिया के तीन उच्चाधिकारी काहर लोसौ और सीसर उपस्थित थे। इन तीनों को हिटलर पिस्तौल दिखाकर पिछले कमरे में ले गया। इनको धमका-डरा कर इनसे त्याग पत्र पर उसने हस्ताक्षर करा लिये। हिटलर ने इस समारोह में घोषणा कर दी, ‘‘आज से पाँच वर्ष पूर्व जब मैं गैस से अन्धा हो रहा था, मैंने यह प्रण किया था कि नवम्बर की सन्धि करने वाले अपराधियों को पदच्युत कर उनको दण्ड दिये बिना शान्ति से नहीं बैठूँगा। वह प्रण पूरा करने के लिये मैंने आज यह सब कृत्य किये हैं।’’

बीयर हाल में तो हिटलर की विजय हो गई, परन्तु पुलिस और सेना उसकी ओर नहीं हुई। अगले दिन हिटलर, गोयरिंग, हैस्म इत्यादि लोग अपने लगभग तीन सहस्र साथियों के साथ म्युनिसिपल हाल की ओर जाने लगे तो लगभग एक सौ पुलिस बन्दूकचियों ने उनका मार्ग रोक लिया। हिटलर के साथियों ने पुलिस वालों को बरगलाने का यत्न किया, परन्तु पुलिस टस से मस नहीं हुई। हिटलर ने उनको डराने के लिये अपना पिस्तौल चलाया तो पुलिस ने भी गोली चलाई। पुलिस के गोली चलाने से उपद्रवी भाग खड़े हुए। हिटलर ने भूमि पर लेटकर जान बचाई। गोयरिंग घायल हो गया। हैस्म भाग गया। हिटलर को कठिनाई से वहाँ से दूर ले जाया गया। विद्रोहियों में केवल जैनरल लुडिण्डौर्फ अपने स्थान पर खड़ा रहा। वह डरा नहीं और अकेला ही पुलिस की ओर बढ़ता गया। वह सैनिक वर्दी पहने हुए था। इस कारण पुलिस ने उसको निकल जाने के लिये रास्ता दे दिया। लुडिण्डौर्फ ने जब स्वयं को अकेला देखा और अपने अन्य साथियों को पहले ही मोर्चे से भागते देखा तो सीधा अपने घर जाकर आराम करने लगा। हिटलर बाद में पकड़ लिया गया। गोयरिंग भाग कर स्वीडन चला गया। हैस्स भी आस्ट्रिया को भाग गया था, परन्तु बाद में पकड़ लिया गया।

यह असफल क्रान्ति ‘बीयर-हाल-पुश’ के नाम से विख्यात है। इससे हिटलर पर मुकदमा हुआ और उसमें इसने साहसपूर्ण बयान देते हुए कह दिया, ‘‘मैं वर्तमान शासन को बदलना चाहता हूँ।’’ इससे हिटलर की ख्याति बढ़ गई। इस मुकदमे में उसको चार वर्ष का दण्ड मिला। परन्तु अठारह मास की कैद के उपरान्त उसको कुछ शर्तों पर छोड़ दिया गया।


:3:


हिटलर की विचारधारा उसकी अपनी एक पुस्तक ‘मीन काफ’ में भली-भाँति वर्णन की गई है। मीन काफ एक जर्मन भाषा का शब्द है। इसका अर्थ है ‘मेरा संघर्ष’ इस पुस्तक में हिटलर ने अपने विचार अति विस्तार से वर्णन किये हैं। यहाँ उन सबका संक्षेप में वर्णन भी सम्भव नहीं। हम केवल कुछ सिद्धांतों का ही उल्लेख करेंगे।
मीन काफ की बात बहुत ही सरल परन्तु भयंकर है। उसमें लिखा है, ‘‘मनुष्य एक लड़ाकू प्राणी है और जाति मनुष्यों का एक समूह होने से एक लड़ाकुओं का गुट मानना चाहिये। जैसे, जब कोई प्राणी संघर्ष करना छोड़ दे तो वह मर जाता है, वैसी ही अवस्था जातियों की होती है।
‘‘जाति जन्म से होती है। किसी जाति में उसकी संघर्ष शक्ति उसकी शुद्धता पर निर्भर करती है। शुद्धता से अभिप्राय रक्त की शुद्धता है।

‘‘जर्मन जाति आर्य जाति ही है। सृष्टि के आदि काल से सब प्रकार का ज्ञान, विज्ञान, कौशल और शौर्य आर्य जाति ने ही निर्माण किया है। आर्य जाति का ह्रास इसमें घटिया रक्त मिश्रण से हुआ है।
‘‘जर्मन जाति को अपनी शुद्धता स्थिर रखने के लिये अपने को यहूदियों से बचाना चाहिये। यहूदी आर्य जाति से नहीं है।
‘‘शान्तिप्रियता (pacifism)  और अन्तर्राष्यट्रीयता (internationalism)  जर्मन जाति के लिये घातक हैं। इससे जाति को याहूदियों और कम्युनिस्टों से बचना चाहिये। ये दोनों अतर्राष्ट्रीय (internationalist) संगठन है।
‘शान्तिप्रियता एक घातक पाप है। अन्तर्राष्ट्रीयता मूर्खता है। अतः जाति के घटकों का राष्ट्रीयकरण होना चाहिये। अर्थात् जाति के सब व्यक्तियों को संस्कारों और निष्ठा से राष्ट्रीय होना चाहिये। इस विषय में बुद्धि का प्रयोग गौण है। निष्ठा और निश्चय ही मुख्य बातें हैं।

‘‘व्यक्ति जो राज्य करने की योग्यता रखते हैं, वे जन्म लेते हैं, बनाये नहीं जा सकते। साधारण जनता को उनकी आज्ञा माननी चाहिये। ये नेता कहते हैं। ये लोग बहुत महत्ता रखते है।
‘‘किसी जाति के जीवन की गारन्टी उसमें पाशविक शक्ति से निश्चय होती है। जातियों को लड़ना सीखना चाहिये। जो जातियाँ लड़ना भूल जाती हैं, वे नाश को प्राप्त होती हैं। इसी कारण सेना की महत्ता सर्वाधिक है।
‘‘जर्मन लोग तो प्राचीन आर्य जाति के उत्तराधिकारी हैं। वे यदि समय पर संगठित होते तो अब तक भूमण्डल पर राज्य स्थापित कर चुके होते।
‘‘जर्मनों को पुनः भूमण्डल का राज्य प्राप्त करना चाहिये। उसके लिये, इसकी सेना को और इसके घटकों को यह समझ लेना चाहिये। कि वे अजेय हैं।

‘‘किसी जाति की विदेश-नीति निर्लज्ज होनी चाहिये। राजनीतिज्ञों का यह कर्त्तव्य नहीं है कि वे पराजय को शौर्य का नाम दें। जाति की समृद्धता और अजेयता ही विदेश-नीति की सफलता है।
‘‘शान्तिप्रियता कायरता का दूसरा नाम है। कायरों के साथ कोई मित्रता एवं सन्धि नहीं करता।
‘‘लीग ऑफ नेशन्ज़’ के सामने हाथ पसारने से अथवा भगवान का आशीर्वाद माँगने से कुछ नहीं मिलेगा। बलशाली का सब मान करते हैं।

हिटलर की पुस्तक काफ में कुछ बातें थीं, जो महान् होते हुए भी मूर्खतापूर्ण थीं। जैसा कि हम जानते हैं ये आर्य जाति के सिद्धान्त नहीं हैं। आर्य जाति में सर्वोपरि ब्राह्मणों (विद्वानों) को माना है, क्षत्रियों को नहीं। कर्म को प्रधान माना है, परन्तु ज्ञानयुक्त कर्म को।
हिटलर के इन सिद्धातों की प्रतिष्ठा जर्मनों ने की।
ये सिद्धान्त मिथ्या थे और इनके कारण जर्मन जाति की यह दुर्दशा हुई जो द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् देखी गयी।

:4:


1923 ‘बीयर-हाल-पुश’ से हिटलर को अपनी नीति में दोष समझ आ गया। उसने अपने दल की एक प्राइवेट सेना बनाई हुई थी। उसका नाम ‘स्टौर्म ट्रु पर’ था। यह सेना राष्ट्रीय सेना से लड़ने के लिये तैयार की गयी थी। हिटलर समझ गया कि यह कभी भी सम्भव नहीं। इस कारण गृह-युद्ध की तैयारी के स्थान इसने ‘रीख’ से अपने दल को बहुमत बनाने के लिये इस दल का प्रयोग आरम्भ कर दिया। इसकी सहायता से अपने दल की सभाओं की रक्षा करने, दूसरे दल की सभाओं को भंग करने, मतदाताओं से मत लेने और उद्योगपतियों से धन प्राप्त करने का प्रबन्ध होने लगा।
1928 के निर्वाचनों में हिटलर के दल को 491 स्थानों में केवल 12 स्थान मिले। 1930 में 107 स्थान मिले और 1932 में 230 स्थान प्राप्त हो गये। इस उन्नति में स्टौर्म ट्रु पर का मुख्य हाथ था। बहुमत तो इस समय भी नहीं था। हाँ, कई दलों में यह सबसे बड़ा दल था।
इस प्रकार जर्मनी का प्रधान फील्ड मार्शल हिण्डनबर्ग था। किसी ने सुझाव दिया कि सबसे बड़े दल के नेता हिटलर को रीख का चान्सलर (प्रधान मन्त्री) बना दिया जाय।

हिण्डनबर्ग ने अभिमान में कहा, ‘‘चांसलर तो नहीं, हाँ इसको डाकघर में मेरे नाम की मुहरें लगाने के लिये चपरासी रखा जा सकता है।
भाग्य की विडम्बना ! प्रधान (हिण्डनबर्ग) का कार्य काल समाप्त हुआ तो हिटलर इस पद के लिये प्रत्याशी बन गया। हिटलर का मुकाबला करने के लिये उससे बढ़ कर ख्याति प्राप्त कोई था नहीं। विवश उसके विरोध में खड़ा होना पड़ा। उस समय के जर्मनी के संविधान के अनुसार प्रधान बनने के लिये आधे से अधिक मत प्राप्त करने आवश्यक थे।

हिण्डनबर्ग को इतने मत प्राप्त करने के लिये दो बार निर्वाचन लड़ना पड़ा। पहली बार हिण्डनबर्ग को 49.6 प्रतिशत मत मिले और हिटलर को 30.1 प्रतिशत। दूसरी बार हिण्डनबर्ग को 53.0 प्रतिशत और हिटलर को 36.8 प्रतिशत मिले। टक्कर ज़बरजस्त थी। इस पर भी हिटलर प्रधान नहीं बन सका। चान्सलर (प्रधान मन्त्री) वह बन नहीं सकता था। ‘रीख’ से उसका बहुमत नहीं था। अतः जोड़-तोड़ होने लगे।
हिटलर चान्सलर तो बना परन्तु सेना के राष्ट्रीय दल के सहयोग से। चांसलर बनकर उसने कम्युनिस्टों को दबाना आरम्भ कर दिया।
27 जनवरी, 1933 को रीख की इमारत को आग लग गयी। अब यह सिद्ध हो चुका है कि रीख को आग नाजी दल ने लगाई थी, परन्तु उस समय इसका दोष कम्युनिस्टों पर लगाया गया और उस दल को अवैध घोषित कर सब कम्युनिस्टों को पकड़ लिया गया।

इस समय बर्लिन की सड़कों पर खुले आम कम्युनिस्टों से झगड़े होते थे। सरकार नाजी दल की सहायक थी। रीख को आग लगने के पहले एक मास में 461 ऐसी घटनाएँ हुई थीं।
रीख की इमारत को आग लगने के उपरान्त हिटलर ने कम्युनिस्ट दल को अवैध घोषित किया और संकट-स्थिति की घोषणा कराकर स्वयं पूर्णाधिकार सम्पन्न आपत्-कालीन तानाशाह बन गया।
यह प्रस्ताव रीख में 94 मतों के मुकाबले में 441 मतों से पारित हो गया।
इसके उपरान्त तो हिटलर ने उन सदस्यों और दलों को भी अँगूठा दिखा दिया, जिनके बल से उक्त प्रस्ताव पारित हुआ था।
प्रथम युद्ध में जर्मनी की पराजय हुई थी। जर्मनी में प्रजातंत्र स्थापित हुआ था। वह प्रजातंत्र सफल नहीं हो सका। 1933 में पुनः उसी विचार के लोग राज्यारूढ़ हो गये, जिनको पराजित करने के लिये वह युद्ध लड़ा गया था।

हिटलर ने अपनी पुस्तक में लिखा है-‘जर्मन लोग ईश्वर के प्रिय पुत्र हैं। आज से छः सौ वर्ष पूर्व हम स्लाव जाति को धकेलते हुए फैल रहे थे। परन्तु घर की फूट के कारण और यहूदियों के विरोध के कारण यह कार्य रुक गया। अब हम को पुनः वही कार्य करना है।
‘हमारी विदेश नीति की सफलता का मापदंड यह होगा कि सौ वर्ष में जर्मन जाति आठ करोड़ से पच्चीस करोड़ हो जायेगी। साथ ही इतने जर्मनों के रहने को स्थान प्राप्त होगा।
हिटलर ने पूर्ण अधिकार सम्पन्न होते ही, ऐसे कानून बनाने आरम्भ किये कि जिनसे कम्युनिस्टों को जर्मनी में निःशेष कर दिया गया। इसके साथ ही यहूदियों के बीज नाश करने का प्रयास आरम्भ हो गया। इस काम में हिटलर का सबसे बड़ा सहायक डाक्टर गोयबल था। यह महा धूर्त, चरित्रहीन एवं अति क्रूर व्यक्ति था।
   



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