अस्ताचल की ओर - भाग 1 - गुरुदत्त Astachal Ki Or - Part 1 - Hindi book by - Gurudutt
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अस्ताचल की ओर - भाग 1

गुरुदत्त

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 1984
पृष्ठ :379
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5423
आईएसबीएन :000000

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हिमालय की तराईयों और पहाड़ियों मे बसे राज्य और प्राचीन जनजीवन पर आधारित

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Astachal Ki Or (1) a hindi book by Gurudutt - अस्ताचल की ओर (भाग-एक) (गुरुदत्त)

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रथम परिच्छेद
:1:

पण्डित शिवकुमार को त्रिविष्टप की राजधानी में रहते हुए छत्तीस वर्ष व्यतीत हो चुके थे। वह अभी तक भी राजगुरु के पद पर आसीन था। यद्यपि जिस राजा ने उसको इस पद पर प्रतिष्ठित किया था उस राजा संजीवायन लामा का देहान्त हो चुका था। उसका देहान्त तो शिवकुमार के आने के दस वर्ष उपरान्त ही हो गया था। उस समय जो युवराज पद पर था वह इस समय राजा के पद पर आसीन हो राज्य कर रहा था। उसको राज्य करते हुए छब्बीस वर्ष हो गये थे।
संजीवायन लामा ने तत्कालीन महामन्त्री त्रिभुवन थापा के पुत्र कीर्तिमान को युवराज पद पर प्रतिष्ठित किया था। वही इस समय त्रिविष्टप का राजा था। महामन्त्री त्रिभुवन का भी बहुत पहले देहान्त हो चुका था।

इस अवधि में राज्य और देश की स्थिति में भी पर्याप्त अन्तर आ चुका था। उस समय, जब शिवकुमार इस देश में आया था, इस देश की जनसंख्या बहुत कम थी। किन्तु अब इसके ग्रामों और नगरों की जनसंख्या लगभग द्विगुणित हो गई थी। तदपि राज्य-व्यवस्था इतनी सुव्यवस्थित थी कि न तो कोई व्यक्ति भूखा सोता था और न ही कोई निर्वस्त्र रहता था। जीवन अति सुलभ और सरल था। उस राज्य में अन्न, वस्त्र और रहने के लिए निवास योग्य भूमि आदि बड़ी ही सुगमता से उपलब्ध थे।
देश में व्यापार पनप रहा था। उद्योगधन्धे भी प्रगति कर रहे थे। देश-विदेश से व्यापार किया जाता था। उस देश का कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जिसे बेकार अथवा बेरोजगार कहा जा सके। परिवार में सुख और शान्ति थी। इस प्रकार यह देश सुख और आनन्द का धाम बना हुआ था।

राज्य के विद्वान मन्त्रियों के परामर्श पर जब देश के चिकित्सालय, आतुरालय और रुग्णालय आदि राज्य की ओर से चालू किये गये थे तो उस समय महाराज ने राजगुरु से प्रश्न किया था, ‘‘पण्डितजी ! इनकी स्थापना से देश में मृत्यु-संख्या पर नियंत्रण लग जायेगा, प्रजा स्वस्थ रहेगी, इससे जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि होगी और उसका परिणाम होगा बेकारी का बढ़ना और फिर उससे लोग भूखे मरने लग जायेंगे,000 प्रजा भोजन और वस्त्र आदि का अभाव अनुभव करने लगेगी ?’’
शिवकुमार का कहना था—‘‘महाराज ! वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि का जनसंख्या में वृद्धि से कोई सम्बन्ध नहीं है। अपितु इसका मुख्य कारण अयोग्य व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि। अन्नादि आवश्यक सामग्री यदि सस्ती भी हुई किन्तु जनता अयोग्य और अज्ञानी हुई तो वह भूखी और दुःखी ही रहेगी। जनसंख्या में वृद्धि से तो अन्न के उत्पादकों में ही वृद्धि होती है। हाँ, यदि मातायें सन्तान उत्पन्न करती जाएँ और पिता अपनी सन्तान को उचित शिक्षा न दें तो देश में धन-धान्य में वृद्धि होने पर भी भुखमरी का वातावरण बन जायेगा।

‘‘अयोग्य जन ही भूखे मरते हैं। जो योग्य होता है वह जितना भोग करता है उससे कहीं अधिक उत्पादन करता है। परमात्मा ने कहिये अथवा कि प्रकृति ने, खाने वाले प्रति एक मुख के साथ काम करने वाले दो हाथ दिये हैं। हाथों से काम लेने की योग्यता और विधि का ज्ञान होना परमावश्यक है। इसका ज्ञान शिक्षा प्राप्त करने से मिलता है।
‘‘ईश्वर की कृपा है कि आपको तो बहुत ही योग्य और विद्वान शिक्षक उपलब्ध हैं।’’
पण्डित शिवकुमार का कहना उपयुक्त ही था। आचार्य वृहस्पति के प्रयत्नों से विगत तीस वर्षों में देश का उत्पादन प्रजा की आवश्यकता से कहीं अधिक होता रहा था।

महाराज संजीवायन लामा तो पण्डित शिवकुमार और आचार्य वृहस्पति के प्रयास आरम्भ करने से कुछ ही वर्ष उपरान्त ही परलोक सिधार गये थे। उनके स्थान पर महामन्त्री त्रिभुवन थापा का पुत्र कीर्तिमान थापा राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ था। राजकुमार कीर्तिमान को पण्डित शिवकुमार ने शिक्षित किया था और वह न्यायशास्त्र का ज्ञाता था। यही कारण था कि वह अपने देश की गाड़ी को बड़ी सरलता और सहज ही सफलता की ओर लिये चला जा रहा था।
वृहस्पति की दो सन्तान थीं। एक पुत्र था और एक पुत्री। उसके पुत्र का नाम शान्तिदेव और पुत्री का नाम कमलिनी। पुत्री का यह नाम वृहस्पति की इच्छा पर रखा गया था।

वृहस्पति द्वारा अपनी कन्या का नाम कमलिनी रखने के कारण को पण्डित शिवकुमार भली-भाँति समझता था। ऐसा विश्वास था कि उस कन्या में भारत के दिवंगत सम्राट समुद्रगुप्त के महामात्य हरिषेण की धर्मपत्नी की आत्मा निवास करती है। वृहस्पति को इसका भान हो गया था। अतः नामकरण के अवसर पर जब वृहस्पति ने ‘कमलिनी’ नाम का प्रस्ताव किया तो एक बार पण्डित शिवकुमार ने जिज्ञासावश उसके मुख की ओर देखा था और फिर उसके भाव को समझकर उसने इस विषय पर कुछ न पूछना ही उचित समझा था।
महाराज कीर्तिमान की तीन संतान थीं। दो पुत्र और एक कन्या। पुत्रों के नाम थे अंशुमान और रविमान तथा कन्या का नाम था कृष्णा।

पण्डित शिवकुमार ने अपने निवास स्थान से चौथाई कोस के अन्तर पर आरम्भ में जिस विद्यालय की स्थापना की थी, आज उसका रूप बड़ा विशाल हो गया था। इस समय उसमें पाँच सौ से भी अधिक विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। उस विद्यालय में अधिकांशतया वे ही विद्यार्थी थे जो दिन-भर अपनी जीविका के अर्जन में संलग्न रहते थे और सांयकाल वे अपने ज्ञानवर्धन का कार्य करते थे।
देश के विभिन्न स्थानों पर इसी प्रकार के अन्य विद्यालय भी थे। देश के निवासी अपने दस वर्ष से अधिक आयु के बालकों को किसी व्यवसाय में नियुक्त कर रात्रि के समय इस प्रकार की शिक्षा दिलवाना अधिक उपयुक्त समझते थे।
पण्डित शिवकुमार का पूर्ण परिवार अभी भी उसी भवन में रहता था जो उसने आज से छत्तीस वर्ष पूर्व आकाशगंगा के किनारे बनवाया था। वह ल्हासा से एक कोस के अन्तर पर था।

उसी प्रकार पण्डित शिवकुमार की दिनचर्या में भी किसी प्रकार का अन्तर नहीं आया था। वह वही थी जैसी कि आज से चालीस वर्ष पूर्व थी। रात्रि का आधा प्रहर रहते वह शय्या त्याग देता और फिर अपने नित्यकर्म में प्रवृत्त हो जाता था।
इन्हीं दिनों एक दिन की बात है कि पण्डित शिवकुमार प्रातःकाल अपनी समाधि से उठा तो उसने देखा कि वृहस्पति उसके सम्मुख बैठा उसकी प्रतीक्षा कर रहा है।
‘‘क्यों, आज ध्यान, धारणा का अभ्यास नहीं किया ?’’ पण्डित शिवकुमार ने उससे प्रश्न किया।
वृहस्पति बोला, ‘‘पिताजी ! दिनचर्या तो नित्य की ही भाँति आरम्भ की थी किन्तु आकाश में कुछ हलचल होने से मेरी समाधि भंग हो गई। मुझे ऐसा दिखाई दिया कि कोई एक नक्षत्र पूर्व से पश्चिम की ओर जा रहा है। उसे देख मुझे ऐसा आभास हुआ कि यहाँ किसी प्रकार की हलचल होनेवाली है।’’
‘‘इसका क्या अभिप्राय समझे हो ?’’

‘‘है तो वह नक्षत्र ही; परन्तु उस पर एक आत्मा का वास है, जो इस भूतल पर उतरना चाह रहा है।’’
‘‘तो फिर ?’’
‘‘मुझे ईश्वरीय प्रेरणा मिल रही है कि मुझे उस आत्मा के पथ का प्रदर्शन करने के लिए यत्न करना चाहिये।’’
शिवकुमार ने यह सुना तो कुछ सोच में पड़ गया। उसने अपने पुत्र को समझाते हुए कहा, ‘‘सुनो, मैं तुम्हें अपने अनुभव की बात बताता हूं। वर्तमान समय में मानव-समाज में भावना का आवेश होने लगा है। किन्तु भावना प्रायः बुद्धि से अविचारित होती है।
‘‘इस भावना के कारण ही मत-मतान्तर के आधार पर जन-जन में भेदभाव उत्पन्न होने लगा है। भारत में यह विभेद महात्मा बुद्ध के काल से आरम्भ हुआ है।

‘‘यद्यपि महात्मा बुद्ध का यह आशय नहीं था। उन्होंने तो कर्म और व्यवहार में शुद्धता और सरलता ही लाने का यत्न किया था। परन्तु उस व्यवहार में सरलता का कोई दिग्दर्शन न रह पाने से शुद्धता और सरलता केवल नाम की ही रह गई और ‘बुद्धं शरणं गच्छामि, धर्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि’ का घोष प्रमुख हो गया है। उससे श्रद्धा में अपार वृद्धि हुई है किन्तु आचरण पतन की ओर प्रवृत्त हो गया है।
‘‘समाज में मानव पथ-प्रदर्शन तो सामयिक ही होता है, स्थायी पथ-प्रदर्शन धर्म-साहित्य होता है। जब तक महात्मा बुद्ध का जीवन रहा, तब तक किसी सीमा तक उनका जीवन उनके शिष्यों और भक्तों का पथ-प्रदर्शन करता रहा किन्तु उनकी मृत्यु के उपरान्त ऐसी कोई वस्तु नहीं रही जो उनका पथ-प्रदर्शन कर पाती। प्राचीन धर्मग्रन्थों पर से बुद्ध के जीवन काल में ही आस्था को समाप्त कर दिया गया था। स्वयं बुद्ध ने कुछ नवीन रचना की नहीं।

‘‘इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि बौद्ध समाज दिशाविहीन हो गया और उसके फलस्वरूप समस्त समाज ही दिशाविहीन हो गया। इसका यह भी दुष्परिणाम हुआ कि शताधिक मत-मतान्तरों की सृष्टि हो गई। बुद्ध से पूर्व प्रजा में एक आधार पर ही बंटवारा पाया जाता था। वह आधार था कर्म का। कर्म के आधार पर बंटवारा होता था। संसार में दो ही प्रकार के कर्म हैं। एक कर्म होता है दैवी और दूसरा होता है आसुरी। इसके आधार पर प्रजानन या तो दैवी स्वभाव के होते थे या फिर आसुरी स्वभाव के। परन्तु जब से भावनाओं का आवेश हुआ है तब से दलबन्दियां होने लगी हैं जो कि आधार रहित हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि लोग बुद्धियुक्त व्यवहार को छोड़कर दल-बन्दियों के पीछे चल पड़े हैं।
‘इसकी जड़ें बड़ी गहन पैठ गई हैं। अब इस समय समझाने से इसका कुछ भी प्रभाव नहीं होगा। बुद्धिरहित विचार करने से तो भावना अटल ही बनी रहती है और फिर सब अपनी-अपनी भावना के अनुसार व्यवहार करते हैं। किसी दूसरे की कोई सुनने को तैयार ही नहीं होता।

‘‘इस कारण मुझे सन्देह है कि तुम्हारा उसके पीछे जाना किसी प्रकार से भी लाभदायक सिद्ध हो। जो लोग बुद्धि से विचार कर अपना कार्य करते हैं उनको तो समझाया जा सकता है; किन्तु जो भावना के पीछे दौड़ा करते हैं, उनको समझाने का कोई साधन नहीं है।
‘‘इस पर भी मैं यह समझता हूँ कि अपनी अन्तरात्मा के अनुसार कार्य करने में किसी प्रकार की हानि नहीं है। अन्तरात्मा की प्रेरणा पर चलना ही चाहिये। इसमें सफलता अथवा असफलता का विचार छोड़कर निष्काम भाव से कर्म करना श्रेयस्कर होता है। यदि सफलता नहीं मिली अथवा असफल सिद्ध हुए तो उस अवस्था में निराश भी नहीं होना चाहिये।’’
अपने पिता का इस प्रकार का विश्लेषण सुनकर वृहस्पति ने कहा, ‘‘पिताजी ! हम ब्राह्मण हैं। हमारा यह कर्तव्य है कि जहाँ शिक्षा देने का अवसर उपलब्ध हो वहां निस्संकोच भाव से शिक्षा देने का यत्न करना चाहिये।

‘‘आपकी कृपा से मैं इतना दुर्बल हूँ नहीं कि जो असफलता मिलने पर निराश होकर दुःख का अनुभव करने लगूँगा।’’
‘‘किन्तु प्रश्न यह है कि जो तुमने देखा है, उसे तुम कहाँ पाओगे और फिर किस प्रकार उसका पथ-प्रदर्शन करोगे ?’’
‘‘मैं तो उसके जन्म-स्थान पर ही जाऊँगा और फिर वहीं से उसका पथ-प्रदर्शन आरम्भ कर उसे निरन्तर कल्याण के मार्ग पर लगाने का यत्न करूँगा।’’
‘‘तुम्हारा परिवार ?’’
‘‘पत्नी तो अपने बच्चों के पालन-पोषण में ही आनन्द का अनुभव करती है। पुत्र भी अपने जीवन-कार्य में लीन हो गया है। उसने भी अपना उद्देश्य इस देश की शिक्षा की गाड़ी को सही दिशा प्रदान करना निर्धारित कर लिया है।
‘‘इस प्रकार मैं एक प्रकार से स्वतन्त्र जीव हो गया हूँ और शीघ्र यहां से प्रस्थान करना चाहता हूँ। जिधर वह नक्षत्र जा रहा है, मैं उधर ही प्रस्थान करूँगा।’’

अपने पुत्र की बात सुनकर पण्डित शिवकुमार उसके मुख की ओर देखने लगा। फिर उसको विचार आया कि उसके पुत्र वृहस्पति की आत्मा उसकी अपनी आत्मा से बहुत उन्नत अवस्था में है। इसलिये उसने भी यही सोचा कि उसको अपने साथ बाँधकर रखना उचित नहीं होगा।
यह विचार कर पिता ने अपने पुत्र से कहा, ‘‘जहाँ तक ज्ञान का सम्बन्ध है, इसमें कोई सन्देह नहीं कि तुम मुझसे अधिक ज्ञानवान हो। अतः तुम स्वयं विचार कर सकते हो कि तुम्हारे लिये क्या करणीय है और तुम उसको किस प्रकार कर सकते हो।’’

अपने पिता से फिर इस प्रकार सहज ही अवकाश मिल जाने पर वृहस्पति प्रसन्न था। वहाँ से वह अपनी माता के समीप गया। उसकी माता चन्द्रमुखी अपनी पुत्रवधू सुन्दरी के समीप बैठी किसी पुस्तक का पाठ अपनी पुत्रवधु सुन्दरी से सुन रही थी।
वृहस्पति ने द्वार पर खड़े होकर पूछा, ‘‘माँ ! मैं भीतर आ सकता हँ ?’’
‘‘क्यों, कोई विशेष कार्य है ?’’
‘‘हाँ माँ !’’
‘‘ठीक है, आ जाओ। तुम्हारी पत्नी आज मुझे कालिदास सुनाकर समझा रही थी। बहुत रसमय है। फिर इसके समझाने का ढंग भी उतना ही रसमय है।’’
‘‘मुझे खेद है कि मेरे कारण आपके स्वाध्याय में विघ्न उपस्थित हो गया है; किन्तु मैं आप लोगों को एक अत्यावश्यक सूचना देने आया हूँ।’’
‘‘हाँ, बोलो।’’ माँ ने कहा।

तब तक वृहस्पति अपनी माता और पत्नी के मध्य रिक्त स्थान पर बैठ गया था। माँ के कहने पर उसने बताया, ‘‘माँ ! मैं शीघ्र ही विदेश यात्रा पर जाने का विचार कर रहा हूँ।’’
‘‘कहाँ ?’’
‘‘यह बता पाना सम्भव नहीं है। अन्तरिक्ष से संकेत मिला है कि मुझे विदेश जाने के लिए तैयार रहना चाहिये। अतः मैंने अपने जाने की तैयारी कर ली है।
‘‘उसी के आधार पर आप लोगों को यह सूचना देने चला आया हूँ।’’
इससे पूर्व भी वृहस्पति कभी-कभी अन्तरिक्ष के समाचार सुनाता रहता था। वह कहा करता था कि अग्नि और इन्द्र उसके लिये अन्तरिक्ष से सन्देश लाया करते हैं। ये उसके लिए बैकुण्ठ निवासियों के सन्देश लाते हैं। अतः आज जब वृहस्पति ने अपने जाने की बात कही तो उसका आशय उसकी माता और पत्नी दोनों ही समझ गयी थीं। जो सन्देश उसको प्राप्त होते थे वे प्रायः उसकी दिन-चर्या से ही सम्बधित होते थे।

आज भी जो बात वृहस्पति ने की वह उसी प्रकार कही थी जैसे कि वह पहले कहा करता था। उन प्राप्त होने वाले सन्देशों से उसकी दिनचर्या में किसी प्रकार का कोई अन्तर नहीं आता था। इसलिये उसकी माँ ने कहा, ‘‘हाँ, बोलो, हम सुन रहे हैं। तुम यह बताओ कि कहाँ जा रहे हो ?’’
‘‘यह तो अभी मुझे भी विदित नहीं है।’’
‘‘फिर किस दिशा की यात्रा करोगे ?’’
‘‘अभी तक तो यही सन्देश मिला है कि मुझे जाने की तैयारी करनी है। एक नक्षत्र है, जो रात्रि के तृतीय प्रहर के आसपास उदय होता है। वह मेरा पथ-प्रदर्शन करेगा।’’
यह सुनकर उसकी पत्नी ने पूछा, ‘‘तो क्या अभी तक उसने किसी पथ का निर्देश नहीं किया ?’’
‘‘नहीं।’’

‘तब तो मैं भी आपके साथ चलूँगी।’’
‘‘तुम्हारे जाने की आवश्यकता नहीं है।’’
‘‘मेरी आवश्यकता आपको नहीं है अथवा मेरे लिये यह आवश्यक नहीं है ?’’
‘‘आदेश देने वाले को तुम्हारी आवश्यकता नहीं है।’’
‘‘कौन है वह ?’’
‘‘अन्तरिक्ष की शक्तियाँ हैं। अनेक शक्तियाँ निर्देश करती हैं, इन्द्र हैं, अग्नि हैं, वायु हैं। इनमें से किसका निर्देश है, अभी तो यह भी विदित नहीं हो पाया है। हाँ, इतना मैं जानता हूँ कि अन्तरिक्ष की ये शक्तियाँ जड़ हैं। अतएव ये स्वतः कुछ भी नहीं जानतीं। इनके पीछे जो सन्देश देने वाली शक्ति है वह आदि शक्ति है। उसे परमात्मा कहते हैं।
वृहस्पति की पत्नी को इससे सन्तोष नहीं हुआ। उसे कुछ अस्वाभाविक सा लगा। उसने अपनी सास से कहा, ‘‘माताजी ! आपको इनके खाने-पीने का कुछ विशेष ध्यान रखना चाहिये। मुझे कुछ ऐसा अनुभव होने लगा है कि इस देश के दूध-घी में अब वह शक्ति नहीं रह गई है जो पहले होती थी।’’

यह सुनकर चन्द्रमुखी को हँसी आ गयी। उसने कहा, ‘‘वृहस्पति ! तुमने सुन्दरी के साथ विवाह किया है। विवाह के समय अग्नि को साक्षी कर तुम दोनों ने शपथ ली थी कि तुम दोनों एक-दूसरे के पूरक बनोगे। तुम्हारे मार्ग एक होंगे, तुम्हारा रहन-सहन एक होगा, तुम्हारा खान-पान एक होगा।
‘‘इसलिये मैं यही उचित समझती हूँ कि तुम दोनों को पृथक में बैठकर विचार-विमर्श कर लेना चाहिये। सुन्दरी सदा तुम्हारा साथ देने के लिये तत्पर रहती है। इस समय भी वह यही चाहती है कि वह तुम्हारे साथ एक होकर रहे। यही उसके कहने का आशय है।’’

‘‘हाँ माँ ! तुम ठीक कहती हो। हम दोनों एक प्राण दो शरीर हैं। कम से कम इस जीवन में तो यह है ही। इस जीवन में हमने साथ-साथ रहने का संकल्प लिया है, शपथ ली है। मैं तो आगामी जीवन में भी इसको ही अपनी जीवन-संगिनी के रूप में कामना करता हूँ। परन्तु वह मेरे अधीन नहीं है।’’
‘‘तो तुम्हारे अधीन क्या है ?’’
‘‘मेरे अधीन यही है कि मैं प्रायः नित्य घर से बाहर अपने कार्य पर जाता हूँ और सांयकाल कर लौट आता हूँ।
‘‘यही मैं अब करने का विचार कर रहा हूँ। यदि एक सांयकाल न लौटूँ तो दूसरी सायंकाल लौट आऊँगा। मैं अभी इस जीवन का भोग करने वाला हूँ और इसमें यह मेरी सह-धर्मिणी है।’’

वृहस्पति की बात सुनकर सुन्दरी आश्वस्त हुई। उसे सान्त्वना मिली कि उसका पति उसको छोड़कर जा नहीं रहा है। यह वह अनुभव करती थी कि अपने विवाहित जीवन में कभी एक क्षण के लिए भी वृहस्पति ने अपने कथन के विपरीत कुछ नहीं किया था। उसको अपने पति के प्रति और अधिक लगाव का अनुभव होने लगा। वह मन ही मन मुस्करा रही थी।
चन्द्रमुखी ने वृहस्पति के कथन को सुना और उस पर उसने जब सुन्दरी के मुख पर अनुकूल प्रतिक्रिया देखी तो उसको भी सन्तोष हुआ। उसने भी यही समझा कि बात बन गई है।
उसने यही उचित समझा कि पति-पत्नी परस्पर पृथक् में बातचीत कर लें। इसलिये उसने कहा, ‘‘तब तो ठीक है। तुम अनुमान से अपनी पत्नी को बता देना कि अपनी यात्रा से कब तक लौटने की आशा करते हो, जिससे की उसका मन निश्चिन्त हो जाए।’’ इतना कहकर चन्द्रमुखी वहाँ से उठ गई।

उस समय सुन्दरी और वृहस्पति में विशेष बात नहीं हुई। किन्तु रात्रि में दोनों दम्पति परस्पर विचार-विनिमय करने लगे। एक ओर वृहस्पति और सुन्दरी थे और दूसरी ओर पण्डित शिवकुमार और चन्द्रमुखी थे।
यह परिचर्चा रात को सोने से पूर्व हुई। चन्द्रमुखी ने अपने पति से कहा, ‘‘वृहस्पति कह रहा था कि वह कहीं विदेश जाने का विचार कर रहा है।’’
‘‘हाँ, मुझे भी उसने बताया था। मैं तो यह समझा हूँ कि वह किसी ईश्वरीय कार्य से जा रहा है।’’
‘‘किन्तु देव ! भविष्य के विषय में तो परमात्मा भी निश्चयपूर्वक कुछ कह नहीं सकता। जिस प्रकार हम अपने कार्यों से भविष्य की योजना बनाते हैं वैसे ही वह भी अपनी योजना बनाता है और फिर अपने ऋतों के अनुसार उसको चलाने लगता है।

शिवकुमार ने अपनी पत्नी का समाधान करते हुए कहा, ‘ऋत परमात्मा की शक्ति है, जिससे मनुष्य कार्य करता है। शक्ति तो परमात्मा की है परन्तु मनुष्य अपने कार्य की दिशा निर्धारित करने के लिए स्वतन्त्र होता है। वह ईश्वरीय शक्ति का प्रयोग तो करता है परन्तु यह वह अपनी रुचि और बुद्धि के अनुसार ही करता है।
‘‘वृहस्पति ने यह आभास दिया है कि कोई प्रबल इच्छा वाली आत्मा इस लोक में आ रही है। वह कुछ अनिच्छित कार्य न करने लग जाए, इस कारण ईश्वर वृहस्पति को प्रेरणा दे रहा है कि वह उस जीव का भली प्रकार मार्गदर्शन करे।

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