हिन्दी साहित्य का इतिहास - विजयेन्द्र स्नातक Hindi Sahitya ka Itihas - Hindi book by - Vijayendra Snatak
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हिन्दी साहित्य का इतिहास

विजयेन्द्र स्नातक

प्रकाशक : साहित्य एकेडमी प्रकाशित वर्ष : 2015
पृष्ठ :463
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 544
आईएसबीएन :9788126024254

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साहित्य अकादमी संस्था द्वारा प्रकाशित हिन्दी साहित्य का इतिहास...

Hindi Sahitya ka Itihas - A hindi Book by - Vijayendra Snatak हिन्दी साहित्य का इतिहास - विजयेन्द्र स्नातक

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हिन्दी साहित्य का इतिहास के प्रकाशन की तैयारी साहित्य अकादेमी ने एक चुनौती के रूप में शुरू की थी। लगभग इस स्वीकार्य तथ्य के साथ कि कम-से-कम हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखना और लिखवाना किसी एक व्यक्ति या साहित्य संस्था के बूते की बात नहीं। विशेषकर साहित्य अकादमी जैसी संस्था के लिए, जो सारी सामग्री को पूरी तटस्थता एवं प्रामाणिकता से रखना चाहती थी। कहना न होगा, इस परिकल्पना को हाथ में लेने के बाद, इसकी रूपरेखा, काल-विभाजन और इसकी सामग्री को लेकर कई बार विद्वानों के मध्य विचार-विमर्श भी हुआ और असहमतियों के बावजूद इस दिशा में प्रगति होती रही। विशेषकर प्रगतिवाद वाले खंड मे, जहाँ संबद्ध कृती रचनाकारों की कृतियों पर अधिक विस्तार से लिखा जा सकता था।

लेकिन प्रस्तुत इतिहास के कलेवर को अनावश्यक विस्तार से बचाते हुए और सीमित रखने की चेष्टा के कारण ऐसा करना संभव न हो सका। हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन की परंपरा तो विधिवत् मिश्रबंधु विनोद (चार भाग) से प्रारंभ हुई थी, किन्तु उसे साहित्य के इतिहास का रूप आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा लिखित हिन्दी साहित्य का इतिहास से ही प्राप्त हुआ। इतिवृत्त और आलोचना का समवेत रूप होने से वह इतिहास आज भी प्रकाश-स्तंभ की भाँति पथ-प्रदर्शक बना हुआ है। यद्यपि उस इतिहास में सन् 1940 तक की ही सूचनाएँ उपलब्ध हैं।

स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य में जो नवीन विचारधाराएँ, नूतन साहित्यिक प्रवृत्तियाँ, नव्य-चिन्तन, अभिनववाद, नानाविध स्थितियों के प्रभाव, परिवर्तन आदि आए, उनका उल्लेख उसमें नहीं है। आधुनिक युग के अद्यतन अनुसंधान द्वारा प्राप्त सामग्री का उसमें समावेश न होने से बीसवीं शती के उत्तरार्द्ध पर प्रकाश नहीं पड़ सका। साहित्य एकादेमी द्वारा प्रकाशित प्रस्तुत हिन्दी साहित्य का इतिहास में इस रिक्तांश को पूरा करने का प्रयास किया गया है एवं विभिन्न वादों पर भी प्रकाश डालकर इसे पठनीय एवं उपयोगी बनाया गया है। अंततः यह भी हिन्दी साहित्य का एक इतिहास है, एकमात्र इतिहास-ग्रंथ नहीं।

 

आरम्भिक

 

साहित्य अकादेमी ने अपनी स्थापना के तत्काल बाद विभिन्न भाषाओं (संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त एवं अकादमी द्वारा स्वीकृत) में इतिहास प्रकाशन की योजना बनाई थी। इनमें सह भाषाओं के इतिहास का प्रकाशन कार्य सम्पन्न हो चुका है। अकादेमी के अनथक प्रयासों के बावजूद जिन भाषाओं का इतिहास अब तक प्रकाशित नहीं हो पाया है उनमें हैं कश्मीरी, कोंकणी, मणिपुरी एवं संस्कृत।

हिन्दी साहित्य का इतिहास के प्रकाशन की तैयारी साहित्य अकादेमी ने एक चुनौती के रूप में शुरू की थी। लगभग इस स्वीकार्य तथ्य के साथ ही कम से कम हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखना किसी एक व्यक्ति या प्रकाशन संस्था के बूते की बात नहीं। विशेषकर साहित्य अकादेमी जैसी संस्था के लिये, जो सारी सामग्री को पूरी तटस्थता एवं प्रामाणिकता से रखना चाहती थी। कहना न होगा, इस परिकल्पना को हाथ में लेने के बाद, इसकी रूपरेखा, काल विभाजन और इसकी सामग्री को लेकर कई बार विद्वानों के मध्य विचार विमर्श भी हुआ और असहमतियों के बादजूद इस दिशा में प्रगति होती रही। विशेषकर प्रगतिवाद वाले खण्ड में जहाँ ऐसे कृती रचनाकारों की कृतियों पर विस्तार से लिखा जा सकता था।
लेकिन प्रस्तुत इतिहास के कलेवर को अनावश्यक विस्तार से बचाते हुए और सीमित रखने की चेष्टा के कारण ऐसा करना सम्भव नहीं हो सका। यह हिन्दी साहित्य का एक इतिहास है, एक मात्र इतिहास नहीं। समकालीन एवं विद्यमान साहित्यकारों के बारे में हिन्दी साहित्य का इतिहास आगामी वर्षों में फिर नये स्तर और तेवर के साथ लिखा जायेगा।

किसी भी भाषा के इतिहास लेखन को जब कुछ पन्नों में समेटा जाता है तो इसके लेखक को अपनी काल सीमा के प्रति जागरूक रहना पड़ता है और इसे कहीं न कहीं समाप्त करने के लिए बाध्य होना पड़ता है। साथ ही यह भी जरूरी है कि उसका इतिहास केवल अतीत के आकलन के प्रति चाक चौकस ही न रहे बल्कि अपने मूल्यांकन में भविष्य के प्रति आशान्वित भी हो सके।

साहित्य अकादेमी द्वारा हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने का एक प्रस्ताव 1957 में इस रूप में रखा गया था कि डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी और श्री स.ही वात्स्यान अज्ञेय इसे हिन्दी और अंग्रेजी में लिखेंगे। बाद में इस बात की संस्तुति की गई कि डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी इसे हिन्दी में लिखेंगे जिसका अंग्रेजी अनुवाद श्री बालकृष्ण राव करेंगे। परवर्ती पत्राचार के आलोक में और संक्षेप में, मात्र इतना ही निवेदन करना यथेष्ट होगा कि डॉ. द्विवेदी ने इसका केवल परिचायक अध्याय ही लिखा था और जिसका अंग्रेजी अनुवाद डॉ. प्रभाकर माचवे ने कर दिया था। यहाँ इस बात का उल्लेख अनावश्यक नहीं होगा कि बाद में डॉ. द्विवेदी ने हिन्दी साहित्य का उद्भव और विकास नाम से हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास किसी दूसरे प्रकाशक के लिए तैयार किया था। मार्च 1975 में नये सिरे से हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने का प्रस्ताव रखा गया और श्री अमृतरायजी को इस बात के लिए राजी भी कर लिया गया। श्री राय इसे अंग्रेजी में लिखना चाहते थे लेकिन लगभग दो साल बाद उन्होंने असमर्थता व्यक्त कर दी। अप्रैल 1977 में इसके लेखन का प्रस्ताव डॉ. भगवतशरण उपाध्याय को भेजे जाने पर सहमति हो गयी थी लेकिन यह काम भी आगे नहीं बढ़ पाया।

मई 1984 में श्री अज्ञेय डॉ. विद्यानिवास मिश्र और मैंने इस कार्य को पूरा करने का दायित्व हाथ में लिया। इस दिशा में कुछ प्रगति भी हुई लेकिन इसी बीच अज्ञेयजी का निधन हो गया। हिन्दी भाषा सलाहकार मण्डल ने इस स्थिति में यह निर्णय लिया कि कुछ अन्य विद्वान भी इस कार्य को पूरा करने में अपना सहयोग दें। विद्यानिवास मिश्र की सहायता के लिए अन्य सहयोगियों की सेवाएँ प्राप्त की गई लेकिन इतिहास से सम्बन्धित सामग्री तैयार करने के लिए बारे में उनसे भी कोई सहयोग नहीं मिल पाया। डॉ. कुमार द्वारा लिखे गये कुछ अंशों को समिति ने उसी रूप में प्रकाशित करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की।

वर्ष 1993 में हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन से सम्बन्धित समिति की बैठक में अन्तिम रूप से यह निर्णय लिया गया कि लेखकों द्वारा 18 फरवरी 1993 तक प्राप्त सामग्री को डॉ. विजयेन्द्र स्नातक प्रस्तावित इतिहास के अन्तर्गत संशोधन के बाद सम्मिलित कर सकते हैं, और इसके बाद प्राप्त होने वाली सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकेगा और इसे वे स्वतन्त्र रूप से लिखेंगे। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही था कि अन्य सदस्यों से किसी भी प्रकार की लिखित सामग्री प्राप्त नहीं हुई। अन्ततोगत्वा साहित्य अकादेमी ने मुझे स्वतन्त्र रूप से हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने के लिए अनुबन्धित किया। परिस्थिति को देखकर मैंने इस कार्य को पूरा करने का वचन साहित्य अकादेमी को दिया और इसे निर्धारित समयावधि में लिखकर तैयार कर दिया।

साहित्य अकादेमी की हिन्दी सलाहकार समिति के वर्तमान संयोजक श्री भीष्म साहनी तथा सामान्य परिषद् के सदस्य डॉ. केदारनाथ सिंह ने मेरे द्वारा लिखित हिन्दी साहित्य का इतिहास की पाण्डुलिपि को यथासम्भव तथ्य परक, प्रामाणिक एवं इतिहास- दृष्टि की सम्यक् जाँच-परख के लिए हिन्दी के वरिष्ठ विद्वानों एवं प्रतिष्ठित आलोचकों को भिजवाया ताकि इसमें किसी तरह की कोर-कसर न रहे। इस कार्य के लिए डॉ. प्रेमशंकर, और डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल की सेवाएँ ली गईं और उनकी सलाह के अनुरूप सामग्री में यथोचित परिवर्तन-परिवर्धन भी किये गये। कहना न होगा, इस कार्य को पूरी औपचारिकता के साथ सम्पन्न करने में जहाँ आवश्यकता से अधिक विलम्ब हुआ वहाँ अकादेमी को कदम कदम पर असुविधाओं का सामना भी करना पड़ा। ऐसा नहीं है कि साहित्य अकादेमी या किसी अन्य व्यक्ति या संस्थान द्वारा प्रकाशित हिन्दी साहित्य के किसी भी इतिहास ग्रन्थ में सारी सूचनाएँ एकदम सही और संकलित साहित्यकारों (कवियों, लेखकों, नाटककारों, निबन्धकारों आदि) के बारे में किया गया आकलन एवं मूल्यांकन निर्विवाद और प्रश्नातीत होगा तथापि मेरा विश्वास है कि जहाँ तक सम्भव हो पाया है मैंने अन्य अधिकारी लेखकों की सहायता, सम्मति और संस्तुति के अनुरूप इसे तैयार किया है और अब इसे प्रकाशित किया जा रहा है।

वस्तुतः हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन की परम्परा तो विधिवत् मिश्रबन्धु विनोद (चार भाग) से प्रारम्भ हुई थी, किन्तु उसे साहित्य के इतिहास का रूप आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के इतिहास से ही प्राप्त हुआ। इतिवृत्त और आलोचना का समवेत रूप होने से वह इतिहास आज भी प्रकाश स्तम्भ की भाँति पथ प्रदर्शक बना हुआ है। उस इतिहास में सन् 1940 तक की ही सूचनाएँ उपलब्ध हैं। स्वातन्त्र्योत्तर हिन्दी साहित्य में जो नवीन विचारधाराएँ नूतन साहित्यिक प्रवृत्तियाँ, नव्य, चिन्तन, अभिनव वाद, नानाविध स्थितियों के प्रभाव, परिवर्तन आदि आये उनका उल्लेख शुक्लजी के इतिहास में नहीं है। आधुनिक युग के अद्यतन अनुसन्धान द्वारा प्राप्त सामग्री का भी उसमें समावेश न होने से बीसवीं शती के उत्तरार्द्ध पर भी प्रकाश नहीं पड़ सका। प्रस्तुत हिन्दी साहित्य के इतिहास में इस रिक्तांश को पूरा करने का प्रयास किया गया है एवं विविध वादों पर भी प्रकाश डालकर इसे पठनीय बनाया गया है।

साहित्य के इतिहास में उच्च स्तरीय रचना और स्थापित रचनाकार का संक्षिप्त परिचय तो अनिवार्य रूप से रहता है। साहित्य की विविध धाराओं, प्रमुख, प्रवृत्तियों लोकमान्य साहित्यकारों की वैचारिक चिन्तन भूमि से उत्पन्न वादों का वर्णन भी रहता ही है। गम्भीर सोदाहरण समीक्षा की अनिवार्यता अपेक्षित नहीं होती। नाना प्रकार के राजनीतिक तथा सामाजिक आन्दोलनों की उथल-पुथल को भी संकेत ग्रह से स्थान मिलता है। विस्तृत वर्णन आवश्यक नहीं होता। हिन्दी साहित्य के प्रस्तुत इतिहास में नामकरण की प्रचलित परम्परा से कुछ हटकर आदिकाल, पूर्व मध्यकाल, उत्तर मध्यकाल, आधुनिक काल, भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग, छायावाद युग, छायावादोत्तर युग तथा स्वातन्त्र्योत्तर युग में प्रयोगवाद, प्रगतिवाद नई कविता, नई कहानी, नव्य निबन्ध, नयी समीक्षा आदि उपशीर्षकों से विषय को प्रस्तुत किया गया है। छोटे-मोटे क्षण-भंग वादी शीर्षकों की चर्चा नहीं की गयी है। इसे साहित्य अकादेमी की योजना के अनुरूप ही लिखा गया है।

मैंने हिन्दी भाषा के स्वरूप विकास का भी विस्तार से इस इतिहास में वर्णन नहीं किया है। अपभ्रंश, प्राकृत, पुरानी हिन्दी, शौरसेनी, मागधी आदि भाषा रूपों का भी इसमें उल्लेख नहीं है। हिन्दी भाषा के विकसित रूप के साथ हिन्दी साहित्य के इतिहास को ध्यान में रखकर ही रचनाओं और रचनाकारों, की, संक्षेप में, चर्चा की है।
भाव और विचार के स्तर पर साहित्य में परिवर्तन होते रहते हैं, वे परिवर्तन साहित्य की प्रवृत्ति के परिचायक होते हैं। राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक आन्दोलनों के कारणों से भी साहित्य प्रभावित होता है। ऐसे प्रभाव विविध वादों को जन्म देते हैं। साहित्य परम्परागत लीक से हटकर नवोन्मेष से प्रकाश ग्रहण करता है। राजनीतिक उथल-पुथल तो होती रहती है। सामाजिक तथा आर्थिक विसगंतियाँ भी साहित्य में स्थान पाती हैं। साहित्य के इतिहास में इस प्रकार की विद्रूपताओं, विषमताओं को कभी वादात्मक प्रवृत्ति और कभी व्यक्ति चेतना के नाम से पुकारा जाता है।

ग्रन्थ के सीमित आकार में ‘सबकुछ’ समेटना सम्भव न होने से हमें लब्धप्रतिष्ठ रचनाकारों, स्थापित कृतियों स्वीकृत प्रवृत्तियों तथा वादों तक ही अपना क्षेत्र मर्यादित करना पड़ा है। मैं इस दुष्कर कार्य में अपने परामर्शदाता विद्वानों के प्रति आभार प्रदर्शन करना अपने कर्त्तव्य समझता हूँ-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, स. ही वात्स्यायन अज्ञेय श्री विष्णु प्रभाकर डॉ. कुमार विमल और श्री भीष्म साहनी ने समय समय पर जो संशोधन आदि के सुझाव दिये, मैंने उनसे पूरा लाभ उठाया है। साहित्य अकादेमी के सचिव प्रो. इन्द्रनाथ चौधरी ने जिस तन्मयता और निष्ठा से इस इतिहास के लेखन, मुद्रण और प्रकाशन में मेरी सहायता की है वह मेरे लिए सदैव स्मरणीय रहेगी।

 

दिल्ली
1996

 

विजयेन्द्र स्नातक

 

पीठिका

हिन्दी भाषा : उद्भव और विकास

 

हिन्दी भाषा के उद्भव और विकास के सम्बन्ध में प्रचलित धारणाओं पर विचार करते समय हमारे सामने हिन्दी भाषा की उत्पत्ति का प्रश्न दसवीं शताब्दी के आसपास की प्राकृताभास भाषा तथा अप्रभंश भाषाओं की ओर जाता है। अपभ्रंश शब्द की व्युत्पत्ति और जैन रचनाकारों की अपभ्रंश कृतियों का हिन्दी से सम्बन्ध स्थापित करने के लिए जो तर्क और प्रमाण हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रन्थों में प्रस्तुत किये गये हैं उन पर विचार करना भी आवश्यक है। सामान्यतः प्राकृत की अन्तिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिन्दी साहित्य का आविर्भाव स्वीकार किया जाता है। उस समय अपभ्रंश के कई रूप थे और उनमें सातवीं-आठवीं शताब्दी से ही पद्म रचना प्रारम्भ हो गयी थी।

साहित्य की दृष्टि से पद्यबद्ध जो रचनाएँ मिलती हैं वे दोहा रूप में ही हैं और उनके विषय, धर्म, नीति, उपदेश आदि प्रमुख हैं। राजश्रित कवि और चारण नीति, श्रृंगार शौर्य, पराक्रम आदि के वर्णन से अपनी साहित्य-रुचि का परिचय दिया करते थे। यह रचना-परम्परा आगे चलकर शैरसेनी अपभ्रंश या प्राकृताभास हिन्दी में कई वर्षों तक चलती रही। पुरानी अपभ्रंश भाषा और बोलचाल की देशी भाषा का प्रयोग निरन्तर बढ़ता गया। इस भाषा को विद्यापति ने देसी भाषा कहा है, किन्तु यह निर्णय करना सरल नहीं है कि हिन्दी शब्द का प्रयोग इस भाषा के लिए कब और किस देश में प्रारम्भ हुआ। हाँ, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि प्रारम्भ में हिन्दी शब्द का प्रयोग विदेशी मुसलमानों ने किया था। इस शब्द से उनका तात्पर्य भारतीय भाषा का था।




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