छिनते पल छिन - शिवदयाल Chhinte Pal Chin - Hindi book by - Shivdayal
लोगों की राय

नारी विमर्श >> छिनते पल छिन

छिनते पल छिन

शिवदयाल

प्रकाशक : नेशनल पब्लिशिंग हाउस प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :107
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5452
आईएसबीएन :8121401615

Like this Hindi book 10 पाठकों को प्रिय

2 पाठक हैं

स्त्री-पुरुष के छिनते-जुड़ते क्षणों की समय गाथा...

Chilte Pal Chin

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अब लगता है जैसे सब सपना हो...अल्हड़ और अलमस्ती के दिन थे वे। तब वक्त को यत्नपूर्वक जीने की बात नहीं थी। जीने के लिए वक्त जैसे कम पड़ता था। तितलियों से रंग-बिरंगे दिन ! मन उनका पीछा करता रहता, फूलों की कितनी ही क्यारियां पार करते। कितने दिन बीत गये ! अब भी यों ही उठते-बैठते, कुछ सोचते-गुनते सहसा एक जानी-पहचानी सी गंध नासापुटों में समा जाती है और विभोर कर देती है। अंदर से जाने क्या उछल पड़ता है। शायद इसे ही स्मृति गंध कहते हैं !

पढ़ाई में सुख का अनुभव एम.ए. की पढ़ाई में ही होता है। पढ़ाई के प्रति जो एक आकुलता हुआ करती है वह इस सीढी़ तक आ कर प्रायः बहुत हद तक दरकिनार हो जाती है। रांची छोड़ते वक्त मन में आशंका थी कि पता नहीं यहां का माहौल कैसा होगा, सहपाठी-मित्र कैसे होंगे। लेकिन यहां जो कुछ मुझे मिला उससे न सिर्फ ये आशंकाएं निर्मूल हुईं बल्कि मुझे ऐसा लगा कि इससे अच्छा भी क्या हो सकता था। अच्छे सहपाठी, अच्छी और बहुत प्यारी रूम मेट, सदय, सहृदय और विद्वान शिक्षकगण, और उस पर से हर पल नजरों के सामने गंगा का विहंगम, विमुग्धकारी दृश्य ! दरभंगा हाउस के विशाल बरामदों में चहलकदमी करते या फिर हॉस्टल की छत से गंगा की लहरों पर थिरकती नावों को निहारते, मल्लाहों का जीवन संगीत सुनते एक अनिर्वचनीय सुख का अनुभव होता। सपने, अभिलाषाएं ही अभिलाषाएं !

सुबह सुबह क्लास करने, जाती तो क्लास खत्म होने के बाद दोस्तों-साथियों के साथ गपशप करने, लाइब्रेरी और कैंटीन के चक्कर लगाते पूरा दिन निकल जाता। लौटती तो सोमा के साथ बातचीत का एक और दौर चल पड़ता। फिर जाने कितनी रात गये हम दोनों सखियां बात करते करते सो जातीं।

देखते ही देखते परीक्षा का कार्यक्रम निकल आया और तब महसूस हुआ कि वास्तव में यहां एम.ए. करने के लिए ही आये हैं। फिर तो पूरी तरह पढ़ाई में जुट जाना पड़ा। जो ट्यूटोरियल क्लास हम सिर्फ हंसी-मजे के लिए छोड़ देते थे, अब वहीं हमारी सारी गतिविधियां सिमट आयीं। स्पेशल पेपर में महज पांच विद्यार्थी थे-तीन लड़के और दो लड़कियां। और तभी उससे परिचय बना था। वह बहुत कम बोलता था-चुप्पा सा लड़का। उठती हुई नाक, खुलता हुआ रंग, लंबा कद, ‘बोनी’ शरीर। कुछ भी ऐसे विशिष्टता उनमें न दिखती फिर भी बरबस ही उसकी ओर ध्यान चला जाता। मैं सोचती रहती और उसे देख कर आंकती रहती कि कौन सी चीज उसे औरों से कुछ अलग बना देती है। मैं क्लास में लेक्चर सुनती और हॉस्टल के कमरे में बंद हो कर नोट्स तैयार करती। पढ़ने को बहुत कुछ बाकी था। मैं अपनी ओर से खूब पढ़ती, एकाग्रचित हो कर।
ध्यान भंग हुआ था एक बार जब मां ने चिट्ठी में किसी रिश्ते के बारे में लिखा था। मेरा लक्ष्य था पहले अपने पैरों पर खड़ा होने का, कुछ कर दिखाने का और इसकी प्रेरणा स्वयं मेरे मां-पापा ही बने थे। अभी तो विवाह का प्रश्न ही नहीं था। वैसे कहीं न कहीं मेरे अंदर यह चाह जरूर थी कि जीवन साथी मैं खुद चुनूंगी।

मानसून की बौछारें पड़ रही थीं। हॉस्टल से डिपार्टमेंट आते आते कपड़े कुछ गीले हो गये थे। रूमाल से बांह और चेहरा पोंछती जो मैं ट्यूटोरियल रूम में प्रवेश कर रही थी कि ठिठक कर खड़ी हो गयी। कोई बरामदे के कोने में चुपचाप खड़ा सामने क्षितिज देख रहा था। काले काले घने बादल, बारिश, हवा और उसमें बलखाती गंगा की लहरें। मैंने पहचाना। यह वही चुप्पा लड़का था-अर्पण। मेरी उपस्थिति का उसे भान नहीं था। बरामदा खाली था, क्लासरूम खाली पड़े थे। कहीं कहीं से छात्रों की हंसी के ठहाके गूंज जाते थे।

मैंने कोई आहट नहीं की थी। एक हाथ में किताबें लिये, दूसरे हाथ से दरवाजा थामे, मैं उसे देखती रही। कॉफी रंग की पतलून, आसमानी रंग की कमीज, क्रॉस बनाते हुए पांव। फिर देखा, उसका दाहिना हाथ ऊपर उठ कर संभवतः आंखों की कोरों के बीच आ गया रुक गया, सिर कुछ झुक आया। जैसे दोनों आंखों पर अंगुलियां फिरीं, हाथ फिर पूर्वस्थिति में आ गया। जोर से खींच कर सांस छोड़ी गयी। वह पीछे की ओर मुड़ा। सामने मैं खड़ी थी और चकित रह गयी थी-उसकी आंखें लाल थीं और चेहरा भीगा भीगा।
‘‘क्लास नहीं होगी आज ?’’ मेरे मुख से निकला।

‘‘नहीं, शायद नहीं’’ उसने जवाब दिया और तेजी से गैलरी की ओर निकल गया। मैं क्लासरूम में आ कर डेस्क पर ही बैठ गयी। अजीब और सर्वथा अपूर्व अनुभव था यह मेरे लिए। वह रो ही रहा था, पर क्यों, यह समझ नहीं सकी, सकती भी नहीं थी। सामने उसकी नोटबुक पड़ी थी। इसका मतलब था कि वह लौटेगा। मैंने यूं ही पन्ने पलटने शुरू किये, यह भी जानने के लिए कि पिछली दिनों क्या पढ़ाई हुई क्योंकि पिछले दो-तीन दिनों से मैं क्लास अटेंड नहीं कर सकी थी।
पहला पृष्ठ जो मैंने पलटा तो सामने किसी अमेरिकी कवि की कविता उद्धृत की गयी थी :
‘मैं सीटी की आवज पर दौड़ता हूँ,
मैं साटी की आवाज पर रुकता हूँ,
मैं धरती पर बजरी बिछाता हूँ,
जब सीटी चीखती है
मुझे प्रशिक्षित किया गया है कि
तर्क मत करो,
संशय मत करो,
सवाल मत करो।’

मेरे गले में कुछ अटक गया। मैं इस कविता और क्षण का संबंध ढ़ूंढ़ने लगी, जो अभी थोड़ी देर पहले बीता था। तभी वह लौट आया। चेहरा अब ताजा और खिला हुआ था। औपचारिकतावश ही मेरे सामने कुर्सी पर बैठ गया। पहली बार मेरे साथ वह अकेले में था और पहली बार मैंने उसे गौर से देखा। पतली पतली आंखें, संकोची आंखें जो किसी से ज्यादा देर तक नजरें नहीं मिला सकतीं। उठी हुई नाक, पर दोनों नथुनों के बीच ऊपर वाला हिस्सा कुछ झुका हुआ, पतले पतले होंठ मुरझाए से, पपड़ियों वाले; ठुड्डी के बीच हलकी सी गर्तिका, मूंछें घनी और नीचे की ओर झुकीं झुकीं। नजरें चेहरे के ऊपरी हिस्से पर गयीं- लहरदार बालों, मध्यम ललाट से होती हुई भवों के पास आ कर ठहर गयी। उसके चेहरे का सबसे आकर्षण हिस्सा था- उसकी भवों का संधि-स्थल।

हम दोनों चुप थे। बातचीत के लिए कोई बहाना नहीं मिल रहा था। वह रह रह कर नोटबुक के पन्ने पलटने लगता, कभी उसकी नजरें खिड़की के बाहर की ओर चली जातीं।
‘‘क्लास में चुप चुप क्यों रहते हो ?’’ मेरे मुंह से यही निकला।

‘‘ऐसा कोई विशेष कारण नहीं।’’ उसका यह टालने वाला जवाब सुन कर मैं हतोत्साहित जरूर हुई पर आज मन इतने ही से मानने वाला न था। उसकी भरी भरी लाल आंखें देखने के बाद से मुझे लगा कि कुछ ऐसी बातें होनी चाहिये कि मूड जरा हलका हो। लेकिन उसकी मेरे समक्ष उपस्थिति के बावजूद निर्लिप्तता मुझे बड़ी भारी मालूम पड़ने लगी थी। मैंने तब प्रसंग बदल दिया। बात पढ़ाई-लिखाई की ओर कर ली। क्लास, नोट्स लेने-देने का वायदा भी हुआ। मैंने उसका पता पूछा, उसने मेरा, फिर उम्मीद की गयी की आज का परिचय आगे और गहरायेगा।

क्लासरूम व विश्वविद्यालय में अकसर वह दीख जाता था। कभी कभी अप्रत्यक्ष ढंग से हलकी-फुलकी बातचीत भी हुई थी। पर उससे मेरा परिचय, मेरी पहली सीधी भेंट यही थी जो कुछ भिन्न सा स्वाद लिये हुए थी, ऐसे कि मानो यह लंबे समय तक याद रहेगी।
उसके मुकाबले मेरा दायरा बड़ा था। मेरे अनेक दोस्त-मित्र थे, जिसमें श्याम बिहारी जैसा पान का शैकीन, अमित जैसा सिगरेटबाज, कमाल जैसा शायर और सोमी जैसी आवाज की लड़की भी थी। हम सब जहां इकट्ठे हो जाते वहां मजाल नहीं था कि कोई बोर हो जाये। अर्पण का मैंने सबसे परिचय करा दिया, इस तरह अर्पण भी मंडली में शामिल हो गया और उसे अब पहले की तरह चुप नहीं रहना पड़ता।

वह एक लॉज में रहता था जो विश्वविद्यालय से कुछ ही दूरी पर था। अशोक राजपथ के उस पार जो एक साफ-सुथरी लेन अंदर अंदर चली जाती है, उसमें। एक दिन हम सभी को वहां ले भी गया था। और वैसे भी कभी कभी हम उसके साथ यों ही फुरसत के समय चले जाते। एक दिन हमने तय किया कि परीक्षा की तैयारी साथ ही होनी चाहिए क्योंकि वक्त अब बहुत कम बच गया था और अब भी कई प्रश्न छूटे हुए थे। मुझे उसका साथ अच्छा लगता बावजूद इसके कि उसके साथ की एक सीमा थी। सीमा तो हर रिश्ते में होती है पर यह ज्यादा कसी थी, विस्तार कम था। सब तरह की बातें हम न कर पाते। मैंने तो अकसर उससे अपने बारे में कहा, पर खुद उससे कभी कुछ पूछने का साहस न कर पाती।

एक दिन लाइब्रेरी में हम दोनों बैठे थे। लिख कर सुस्ता रहे थे। बहुत कम लोग थे हॉल में, अर्पण मेज पर सिर टिकाये आंखें मूंदे पड़ा था। मुझे उससे पहली मुलाकात याद हो आयी और सहसा मैं पूछ बैठी, ‘‘अर्पण, आज एक बात बता ही दो। याद है हमारी पहली मुलाकात ? आखिर उस दिन ऐसा क्या हुआ था, बताओ न।’’

उसने सुना सिर उठाया। कलम उसके हाथ में आ गयी और उसे उलटते-पलटते बिना मेरी ओर देखे उसने कहा, ‘‘वह मेरा निजी क्षण था। यह और बात है कि उस क्षण तुम संयोगवश वहीं थी। मैं चाहता हूं कि मेरे एकांतिक अनुभवों के बारे में मुझसे कुछ न पूछा करो और....’’कहते कहते वह रुक गया। मेरी ओर देखने लगा पर पलकें जल्द ही झुक गयीं। अंदर ही अंदर बहुत उदास हुई, कुछ-कुछ तिक्त भी। एक इस अर्पण को खोलने के प्रयास में तब पहली बार मुझे जबरदस्त ढंग से अकेलेपन का बोध हुआ, न कुछ का बोध। कुछ कुछ अपमान जैसा भी लगा था। मेरी तेज प्रवृत्ति को अचानक जाने क्या हो गया था। उसे सिर्फ देखती रह गयी थी।

बाद में मुझे गुस्सा आया था। यह भी कोई आदमी हुआ। साथ साथ रहा करो, घूमा-फिरा करो और जब भूले से हम उसके बहुत नजदीक आ जाना चाहें, आ जायें तो हाथ झटक अंगुली का इशारा कर दे कि देखो देखो, तुम्हारी पहुंच बस यहीं तक है। मैंने कुछ दिनों तक मिलना-जुलना बंद कर दिया और पढ़ाई में और जुट गयी। पर एक खाली पन सा लगता। कभी पढ़ते पढ़ते लगता कि अर्पण आ रहा है, आयेगा तो उससे यह सवाल पूछ लूंगी, सेकेंड पेपर का नोट भी दे दूंगी, और क्या क्या ! फिर सोचती, ‘अर्पण आये न आये मुझे इससे क्या ! जाये जहन्नुम में अर्पण !’’

पर तसल्ली मुझे तभी मिली जब वह एक दिन भागा भागा आया। सेकेंड पेपर का वह संभावित सवाल मेरे पास ही रह गया था। मैंने दे दिया कुछ कहा नहीं। उसके बोलने का इंतजार करती रही। थोड़ी देर बाद उसने खुद कहा, ‘‘तुम तो अजीब लड़की हो। मैं तब से सोच रहा था कि अब आयोगी, और तुम हो कि एकदम से गायब। तुम्हें आना था, तुमने खुद कहा था। मैंने सोचा कहीं बीमार न हो, चला आया।’’ मैं चुपचाप सुनती रही, किताब पलटती रही, अब और कुछ कहो।
‘‘ओह, लगता है तुम उस दिन का बुरा मान गयी। इसमें बुरा मानने की क्या बात है ? वह सब कुछ जानना क्यों जरूरी होना चाहिए ? तुम अपनी जगह पर हो, मैं अपनी जगह पर, वे बातें अपनी जगह पर हैं। उनको बीच में लाने से क्या फायदा ? और क्या उतना जान भर लेने से संतोष हो जायेगा ? अजीब  हाल है ! उसके बगैर भी तो एक-दूसरे को जाना-समझा जा सकता है। अगर तुम इतनी सी बात को अन्यथा ले सकती हो तो लो।’’ अंत में वह मुस्कराया। मैंने देखा। उसकी मुस्कराहट बहुत भली और अपनी लगी। सच तो यह था कि मैं अब तक अंदर से एकदम सामान्य हो गयी थी। इतना कुछ काफी था मेरे मान जाने के लिए।

अर्पण मेरे लिए एक पहेली बनाता जा रहा था, जिसमें लगातार उलझती जा रही थी मैं। इससे उबरने की कोशिश तो दूर, खुद यह उलझाव मुझे रुचने लगा था। मेरे लिए तब यह संबंधों का एक नया आयाम ही था कि बने हुए परिचयों से उत्पन्न आत्मीयता के आधार पर बगैर एक-दूसरे की सीमाओं में दखलंदाजी किये भी सुखपूर्वक रहा जा सकता है। क्योंकि अकसर लोग अपनी भीतरी परतों को एक दूसरे के समक्ष खोलने जाने में कहीं ज्यादा सुख का अनुभव करते हैं। और यह बात मेरे-अर्पण के बीच नहीं थी। चाहे जाने का कोई अतिरिक्त कारण नहीं था।

अर्पण एक दोस्त था। अच्छा, मददगार दोस्त जिस पर फख्र कर सकती। उसके सान्निध्य का सुख और सुखों से भिन्न था, विशिष्ट था। यही कारण था कि अन्य सुख मेरे लिए धीरे धीरे बेमानी होते गये और... कुछ पता नहीं चला कब अर्पण से मुझे प्यार हो गया। मैंने इस अहसास को बहुत सहज और ईमानदार हो कर ग्रहण कर लिया जिसकी छाया दिन बीतने के साथ-साथ लगातार बड़ी हो कर मुझे घेरने लगी। इतना प्राकृत रूप से यह हुआ कि कुछ पता न चला, और शायद इसीलिए प्रकृतिस्थ हो कर मैं नीले आकाश को निहारती, लहरों को गिनने का प्रयास करती और निरंतर एक सौंदर्य-बोध में आकंठ डूबी होती।

अंतिम पत्र की परीक्षा दे कर उससे मिलने गयी थी लॉज में। किवाड़ बंद थे मैंने खटखटाया। अंदर से आवाज आयी-‘‘खुला हुआ है।’’ मैं अंदर गयी। लेटे लेटे अर्पण कोई पत्र लिख रहा था। पत्र लिखना बंद हुआ।
‘‘कहो, परीक्षा कैसी हुई ?’’
‘‘साधारण ही गयी, बहुत अच्छी नहीं।’’
‘‘सब प्रश्न लिख तो दिए हैं न ?’’
‘‘हां, पर अंतिम प्रश्न में एक उदाहरण देना भूल गयी।’’
‘‘अच्छा जाने दो। यह बताओ कि क्या इरादा है अब ?’’
‘‘क्या इरादा हो सकता है ?’’

‘‘अजी, मैं पूछ रहा हूं कि घर कब जा रही हो ?’’ उसने भवें ऊंची कर पूछा मैंने अब तक सोचा ही नहीं था। ओह ! घर जाना है। मैं चुप होकर उसे देखने लगी-सीधे उसकी आंखों में। ऐसे की ‘‘बताओ तुम क्या कहते हो। चली जाऊं ? चली ही जाऊं ?’’ मैंने देखा उसकी आंखें कितनी संकोची हो गयीं। देखती रही, उसकी नजर मुझ पर से हट कर सामने दीवार पर लगे कैलेंडर पर गयी, फिर हट कर हथेली पर उस समय उसकी आंखों के व्यवहार ने कहीं न कहीं उपेक्षा भाव जगा दिया मुझमें। किसी को बेइंतहा चाहे जाने के बाद उसकी अपेक्षा सहना कैसा अनुभव होता है ? मेरे हाथ में तब एक पत्रिका थी। जिस शब्द पर मेरी नजर टिकी थी, वह याद नहीं। बस याद है कि वह धीरे धीरे धुंधलाता गया था और उसकी जगह एक बूंद सागर सी लहरा गयी थी। ‘टप्’ की आवाज हुई, मैं चौंकी। देखा तो पत्रिका के पन्ने पर एक भीगा गोल धब्बा हो गया था। हम दोनों की नजरें मिलीं पर पलके मेरी झुकीं, उसकी आंखों का भाव पढ़ सकने के भी पहले। और मेरे लिए वहां बैठे रह पाना असंभव हो गया।

उस दिन पहली बार मेरे दिल में जाने कहां से यह खयाल आया था-जिंदगी में चाहे जहां कहीं भी रहूं, एक दहकता अंगारा मैं बार बार छूती रहूंगी, जला करूंगी चुपके चुपके अर्पण मुझे मिले न मिले।

मैं वहां से तब सीधा रिजर्वेशन कराने चली गयी थी। व्यस्त रहना चाहा था, पर कभी कभी मन बहुत सूना और उदास हो जाता। एकाकीपन घेर लेता, कुछ करने की इच्छा न होती। मैं दोस्तों के साथ गप्पें लड़ाती, सिनेमा देखती, हॉस्टल की छत पर बैठे घंटों उपन्यासों के पृष्ठ पलटा करती और गंगा में मंथर गति से चलती नावों को देखती, पर नहीं, मन कहीं नहीं रमता। बस एक खालीपन मुझे घेरे रहता। बहुत चाह कर भी इससे छुटकारा नहीं था। आसमान में पक्षियों के झुण्डों को उड़ते देख, पेडों को हवा के जोर से डोलते देख घुटने का अहसास और तीखा हो जाता। मैं सोचती कि यह क्या हो गया है मुझे ? सोचती कि इस तरह से खुद को बंधने देना आगे कुछ नहीं करने देगा। तबाह हो जायेगी जिंदगी। और बंधना भी उस व्यक्ति से जो दूर भागता है, उपेक्षा दिखाता है, जिसकी अपनी मर्यादा है। मैंने कहीं पसंदगी को ही तो प्यार नहीं मान लिया है ?

सब कुछ होता पर उदासी नहीं जाती, कटाव सा महसूस होता। तभी मैंने जाना कि आंतरिक रिक्तता क्या चीज होती है। जिसका अनुभव नितांत एकांतिक होता है पर जो दूसरे की दी हुई होती है।
मेरी इस मनः स्थिति के पीछे कोई और था, पर इसे झेलना पड़ता मेरे दोस्तों को साथियों को, जो उस वक्त मेरे अपने थे। सोमी मुझसे निराश होती थी, क्योंकि अकसर उसकी बातों को टाल जाती। कमाल हैरान होता था जब उसकी शायरी मैं सुनी-अनसुनी कर देती। आनंद मुझ पर खीजता कि मैं हंसी में उसका साथ न दे पाती।
‘‘पगली तुम जा रही हो ? पता नहीं है कि वाइवा का डेट निकल गया है ?’’

मैंने घूम कर देखा तो अर्पण मुस्कराता आ कर खड़ा हो गया था। सहसा कुछ बोल नहीं पाई। ‘‘यह मैं क्या सुन रहा हूं ? कल तुम जाने वाली हो अट्ठाइस को और उधर वाइवा एक्जाम पांच तारीख को है। क्यों नहीं रूक जाती ?’’
‘‘तुम्हें इससे क्या, मैं रूकूं न रूकूं। मुझे जाना है और मैं जाऊंगी। आना होगा आ जाऊंगी। तुम क्यों चिंता करने लगे ?’’ उस वक्त जाने क्या हो गया था मुझे। बहुत रूक्षतापूर्वक मैंने यह कहा और कह चुकने के बाद आश्चर्य भी हुआ और पश्चाताप भी। लेकिन जो अचानक घट गया था उसने मन में कहीं जुगुप्सा भर दी थी-देखूं क्या असर होता है। उसकी ओर देखा। उसकी मुस्कराहट खो गयी थी और आहत दृष्टि से वह मुझे देख रहा था।
‘‘अर्पण ?’’ उसे पुकारा। उसकी चाल धीमी हो गयी। मैं समीप पहुंच गयी।

‘‘नहीं ल्योना, तुम्हारी कोई गलती नहीं है। मैं बुरा नहीं मान गया हूं। तुमने ठीक ही तो कहा। आखिर तुम क्या कहो।’’
‘‘अर्पण !’’
‘‘तुमने अच्छा किया ल्योना। मैंने कहा न, बुरा नहीं माना हूं। मुझे संतोष है कि तुम ऐसा भी कह सकती हो।’’
‘‘अच्छा चलो, रिजर्वेशन कैंसिल करा आयें।’’
हमने रिक्शा कर लिया। रास्ते भर वह कहीं खोया रहा, मैं भी कहीं भूली रही। रिजर्वेशन कैंसिल हो गया। मूड हम दोनों का ऑफ था। हम फ्रेजर रोड पर थे कि तय हुआ कि चलें कॉफी हाउस। एक केबिन में जा कर बैठे।
‘‘तुम्हारी यह साड़ी फबती है तुम पर। इस छींट में जो नीला रंग है न, उससे और खूबसूरती खिल जाती है इसकी।’’ मैं आंचल का छोर पकड़ कर देखने लगी।

‘‘ल्योना, उस दिन...खैर जाने दो ’’
‘‘क्यों क्या हुआ, बात पूरी करो।’’
‘‘उस दिन कुछ कहना चाहती थी तुम शायद, लेकिन मैं...’’
‘‘अर्पण, एक बात आज जान लो। तुमने पूछा भी है। मैं तुम्हारी उपेक्षा नहीं बरदाश्त कर सकती। ऐसा पता नहीं क्यों है कि तुम्हारा टालना, नदरअंदाजी, मैं नहीं सह सकती। इसी कारण तुमसे मिलना भी बंद कर दिया था मैंने।’’
मैंने कॉफी का घूंट भरा और उसे देखा, वह सीधा कॉफी से उड़ती भाप देख रहा था। मैंने मन में निश्चय कर लिया कि कह ही दूं। यह मेरे स्वयं के लिए आवश्यक भी था, फिर अवसर भी था।
‘‘और...और तुम्हें प्यार करने लगी हूं...शायद...! मेरी पलकें भारी हो आयीं, चेहरा तपने लगा और देह शिथिल पड़ गयी।
‘‘हूं ? ल्योना ?’’
‘‘मैं चाहती तो तुम्हें और तुम्हारा व्यवहार देख कर इस बात को छुपा भी सकती थी, पर तुम मेरी प्रवृत्ति जानते हो जो मैंने कह दिया, अब तुम जानो। ’’

मैं जान रही थी, कि वह एकटक विस्मय से मुझे देख रहा होगा। मैं दृष्टि उठा न सकी, पर इतना ही कह कर अभी संतोष न था।
‘‘मैंने बहुत सोचा, इस बात को टाला भी, पर खुद से छल नहीं कर सकी। मैंने यह भी देखा है, झेला है कि तुम हमेशा मुझसे भागते रहे हो। मैं तुम पर कोई दबाव डालना नहीं चाहती, तुम चाहो तो मुझसे न मिलो क्योंकि अपने ऊपर दया करने का अधिकार मैं तुम्हें नहीं दूंगी। उसकी बजाये तुम्हारी उपेक्षा ही सुखकर होगी।’’
भावातिरेक से रोका कंठ अवरुद्ध हो गया। आंखों में पानी भर आया जिसे मैंने बहने से रोका। अर्पण को देखा तो कुहनियों के बल दोनों हाथों में चेहरा लिये निश्चल बैठा था, ऐसे कि उसकी आंखें मैं नहीं देख पा रही थी। मैं अपनी पलकों को मसलने लगी।

‘‘कितना दुख मोल ले लिया है तुमने। ल्योना, तुम मेरे बारे में कुछ नहीं जानती। मेरा संकुचित व्यवहार, मेरी सीमाबद्धता मेरी बनायी हुई नहीं है। तुम कुछ नहीं जानती मेरे बारे में। इतनी बड़ी चीज के लायक मैं नहीं हूं नहीं, ल्योना। मैं तुम्हें सिर्फ जला सकता हूं। बस !’’
मैं जान गयी कि अब वह कुछ नहीं कह सकेगा। थोड़ा सा उठ कर मैंने उसके हाथ चेहरे पर से हटा दिये। मेरे सामने उसका वही रूप था, प्रथम परिचय वाला।
चलना भी था। आंखों को ठीक तरह से हम दोनों ने पोंछा फिर कॉफी हाउस के बाहर हो गये।

आ कर बिस्तर पर निढाल हो गयी। फिर सिसक सिसक कर रोने लगी। जेहन में वही बात गूंज रही थी-जिंदगी में चाहे जहां भी रहूं, दहकता अंगारा मैं बार बार छूती रहूंगी, जला करूंगी चुपके चुपके, अर्पण मुझे मिले न मिले।
वाइवा एक्जाम पांच तारीख को था। छह को मैं घर लौट जाने वाली थी। अर्पण मिला था परीक्षा के दिन, पर सिर्फ मुस्कराहटों का आदान-प्रदान हो सका था फिर भी छह की सुबह हॉस्टल के गेट पर अर्पण था। बेतरतीब केश, दोनों हाथ पैंट की जेब में, पैंट के ऊपर खादी का कुरता। दस कदम जाता फिर लौट आता। लाइब्रेरी की किताबें जमा करनी थीं, मैं तैयार होकर बाहर निकली। उसके साथ लाइब्रेरी गयी। काम होने के बाद देर हो गयी। बाहर जब हम निकले तो अर्पण ने घड़ी देख कर कहा कि आनंद उसकी प्रतीक्षा कर रहा होगा। अब तक हमारी बातचीत भी न हो पायी थी। मैं यह सुन कर और कुढ़ गयी, पर कर ही क्या सकती थी।

‘‘तुम आज जा रही हो ?’’
‘‘हां।’’
‘‘तुम कब जा रहे हो ?’’
‘‘मुझे कहीं नहीं जाना, मैं कहां जाऊंगा !’’
यह मेरे लिए एक नयी बात थी, गौर करने लायक, पर उसकी जड़ तक मैं नहीं पहुंच पाई।
‘‘अच्छा अब तुम जाओ। आनंद गाली दे रहा होगा मुझे। मुझे क्या पता था कि इतनी देर हो जाएगी। और हां, अपना पता देती जाओ।’’ मैंने झट से कागज पर अपना पता लिख कर उसे दे दिया।

‘‘लिखना जरूर कम से कम इतना तो कर सकोगे ?’’
‘‘अच्छा अब जाओ। ठीक से जाना स्टेशन नहीं आ सकूंगा।’’
अर्पण मुझसे पता मांगने ही आया था। यह सुख मेरे लिए कम नहीं था मन हल्का था। मैं लगातार उसके  बारे में सोचती हुई पता नहीं कब बर्थ पर सो गयी।
घर पर सिर्फ मां-पापा थे। बब्बू कॉलेज टूर में दक्षिण की ओर गया हुआ था। इस बार घर में एक नयी समस्या का सामना करना पड़ा। पता चला कि मां-पापा को अब मेरे विवाह को ले कर चिंता हो रही थी और उन्होंने ने मेरे लिए वर तलाशने का काम शुरू कर दिया था। मैंने तब मां को बताया कि इसके लिए अभी परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि कुछ हासिल करने के पश्चात ही मेरा विवाह करने का इरादा है। देखा कि मां गंभीर हो आई है।


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book