कहानी की तीसरी दुनिया - कमलेश्वर Kahani Ki Teesri Duniyan - Hindi book by - Kamleshwar
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कहानी की तीसरी दुनिया

कमलेश्वर

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :216
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5456
आईएसबीएन :81-7783-005-8

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अफ्रीकी, लातीनी, अमरीका और दक्षिण-पूर्व एशिया की कहानियाँ...

Kahani Ki Tisari Duniya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भारत दुनिया का पहला कथा-पीठ रहा है। यह अब सर्वमान्य तथ्य और सत्य के रूप में स्वीकृत है। यह धारणा एकदम गलत है कि कहानी कि विधा हमें पश्चिम से प्राप्त हुई है। प्रो. हरीश त्रिवेदी के शब्दों में कहूं तो—‘‘एक धारणा यह है कि अंग्रेजी में कहानी की विधा पूरब के प्रभाव से शुरू हुई...इस प्रकार उन्होंने (अंग्रेजी कथाकारों ने) अनुवाद के जरिए अपने लिए कहानी विधा का अविष्कार किया और अंग्रेजी में एक नई विधा शुरू हुई जिसे ‘ओरिएंटल टेल’ कहा जाता है।’’
कहानी विधा का जन्म भारत में हुआ। भारत से अपनी यात्रा शुरू करके अरबी-फारसी रोमन, स्पेनिश और अंग्रेजी भाषा के जरिए कहानी विधा का विस्तार विश्व की सभी भाषाओं में हुआ।

अपनी-अपनी भाषा में कहानी ने धर्म-चर्चा से अलग मनुष्य-चर्चा को ही अपना केन्द्र बनाया। इसका कितना बड़ा और विराट फलक तैयार हुआ, उसका गहन परिचय इस श्रमसाध्य संकलन—‘कहानी की तीसरी दुनिया’ में मौजूद है ! यह सारी कहानियां मनुष्य के प्रश्नों और उसकी नियति से जुड़ी हैं। यह ‘तीसरी दुनिया’ की कहानियां हैं, जो कहानी की तीसरी वैचारिक दुनिया तैयार करती हैं—उस दुनिया से अलग, जो भूमण्डलीकरण के तूफान में तीसरी दुनिया की आकांक्षाओं और सपनों को तहस-नहस कर देना चाहती है।

ऐसे कठिन समय में, जबकि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अमीरों और साधन-सम्पन्न वर्गों की यह उपनिवेशी भूमण्डलीय क्रांति शुरू हुई है, अपनी विचार सम्पदा को बचाए रखने और हस्तक्षेप की भूमिका को तैयार करने में तमाम विकासशील देशों की यह कहानियां एक वैचारिक आधार-भूमि का निर्माण करती हैं।
यह कहानियां हमें विश्व-मानव और विश्व-मानव का एहसास करा सकेगी, इसी उम्मीद के साथ

तीसरी दुनिया की कहानियाँ

राजनीतिक दृष्टि से तो ‘तीसरी दुनिया’ उन्हीं भौगोलिक इकाइयों का समूह है, जिन्होंने एक मंच पर आकर इस नाम को स्वीकार कर लिया है। लेकिन यदि हम उस दृष्टि से अलग हटकर देखने की कोशिश करें और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बसे जन-सामान्य के साथ अपने को जोड़ें तो हमें दिखाई देगा कि ‘तीसरी दुनिया’ का अधिकांश भाग अफ्रीका, लातीनी, अमरीका और दक्षिणी-पूर्व एशिया में बसा हुआ है। यानी इस धरती का दक्षिणी गोलार्ध ही एक तरह से ‘तीसरी दुनिया’ है। इस दुनिया का आदमी सदियों से अमानवीय स्थितियों का सामना करता आया है। गुलामी, अनाचार, शोषण, निर्धनता, अमानुषिक दमन उस पर थोपा जाता रहा है, तथा यही उसकी नियति भी मानी जाती रही है। सभ्य और सुसंस्कृत कही जाने वाली दुनिया ने उसे दुधारू गाय की तरह दुहने के अलावा कभी कुछ नहीं किया। सभ्यता का आलोक फैलाने के नाम पर इस दुनिया को कुछ दिया गया है तो केवल एक दोगली संस्कृति, जानलेवा अर्थव्यवस्था तथा गरदन रेतने वाली संस्कृतिक संस्थाएँ। लेकिन आज इस तीसरी दुनिया का आदमी अपनी गरदन पर पड़े हुए विभिन्न जुओं को उतार फेंक रहा है और अपनी नियति का फैसला करने का अधिकार अपने हाथों में ले चुका है।

इस संग्रह की कहानियाँ ‘तीसरी दुनिया’ के सामान्य जन की जिन्दगी—उसकी आकांक्षाओं, सपनों, त्रासदियों, यातनाओं, मुक्ति-प्रयासों तथा अहम निर्णयों की कहानियाँ हैं। इन कहानियों का आदमी अपने असंगत सन्दर्भों से जूझ रहा है। और इनके लेखन में तल्खी, व्यंग्य-विद्रूप और संघर्ष पूरी तरह शामिल है।

कमलेश्वर

पार्क
जेम्स मैथ्यू

वह आशा-भरी निगाहों से रेलिंग के उस पार पार्क में खेलते बच्चों को देखता रहा। बच्चे झूला झूल रहे थे। जैसे ही झूला ऊपर जाता, वे खुशी से किलकारियाँ भरते। वह उनकी प्रसन्नता-भरी किलकारी उसके अन्दर एक नई खुशी भर रही थी। प्रसन्नता और उत्तेजना से उसका सारा शरीर काँप रहा था। उसके पास ही, धुले और स्त्री किए कपड़े एक चादर में लिपटे पड़े थे। पाँच बच्चे दो बड़े बच्चों के पीछे भाग रहे थे। उसे देखकर रुक गए—‘‘ऐ काले बन्दर ! तुम क्या देख रहे हो ?’’ कहते हुए उसमें से एक ने एक छोटा-सा पत्थर उठा लिया। उसने उस लड़के को पहचान लिया। जिस दिन उसे पार्क से निकाला गया था, यह सफेद लड़का वहीं उपस्थित था। लड़के ने वह ईंट का टुकड़ा उसके समीप के खम्भे पर दे मारा। उसके छोटे-छोटे टुकड़े उस काले लड़के के चेहरे पर बिखर गए।

उसने अपने होंठों पर लगे ईंट के चूरे को थूक दिया, वह उन बच्चों को मारने के लिए कोई पत्थर ढूंढ़ने लग। कुछ और लड़के उस लड़के से आ मिले और अब वह उसकी बढ़ती हुई संख्या को देखकर घबरा गया।

बिना कुछ बोले उसने अपने कपड़ों का छोटा-सा गट्ठर उठाया, उसे झाड़कर सिर पर रख लिया और वहां से चला गया।
जैसे ही वह रवाना हुआ, उसे पिछली बार अपने पार्क में जाने की बात याद हो आई। बिना किसी झिझक के वह पार्क में घुस गया था और शीघ्र ही पास के चाँदी की चैन वाले झूले पर चढ़ गया था। अभी तक उसे वह पुलकमयी प्रसन्नता याद है, जबकि उसका झूला ऊपर, ऊपर और ऊपर चढ़ा जा रहा था, मानो आकाश को ही छू लेगा। फिर उसने पेंग भरना छोड़ दिया था, और झूला धीमा होता चला गया था। सामने वाले झूले पर एक सफेद लड़का झूल रहा था। तभी उसे अपने कन्धों पर किसी के हाथों का सख्त स्पर्श महसूस हुआ। उसने पीछे मुड़कर देखा तो पार्क का चौकीदार पीछे खड़ा था।
‘‘यहाँ से निकलो !’’ उसने क्रोधित स्वर में कहा।

‘‘मैं क्यों निकलूँ ? मैंने क्या किया है ?’’ उसने झूले की लोहे की चेन को और भी कसकर पकड़ लिया।
सफेद लड़का भी नीचे उतर आया और निर्लिप्त भाव से उसे देखता हुआ खड़ा हो गया।
‘‘तुम्हें बाहर निकलना ही पड़ेगा।’’ अब चौकीदार ने कुछ धीमे स्वर में कहा, ताकि पास में खड़े लोग न सुन पाएँ।
‘‘यहाँ के नियमानुसार हम काले लोग यह पार्क इस्तेमाल नहीं कर सकते जो सफेद लोग करते हैं, तुम उस पार्क में खेलो, जो तुम्हारे घर के पास है।’’

‘‘जहाँ मेरा घर है, वहाँ कोई पार्क नहीं है।’’ उसने दाईं ओर इशारा करते हुए कहा।
पार्क में अनेक सफेद औरतें छोटे-छोटे बच्चों को पालकी में घुमाती घूम रही थीं। बच्चे घास में लोट रहे थे। झूलों पर खिलखिलाते पेंगें भर रहे थे। उसने उदास दृष्टि से एक बार देखा फिर चौकीदार के साथ गेट तक चला आया।
‘‘तुम स्वयं ही यह बोर्ड पढ़ लो।’’ चौकीदार ने उसे आश्वस्त करने के लिए कहा, ‘‘सिर्फ सफेद व्यक्तियों के लिए’ बोर्ड पर लाल अक्षरों में लिखा था।
वह चुपचाप बाहर निकल आया। उसके पीछे झूले झूलते बच्चे किलकारियाँ मार-मार कर हँस रहे थे। ‘मैरी गो राउण्ड’ पूरी गति से दौड़ रहे थे।

उस घटना के पश्चात वह सदा पार्क के समीप से चुपचाप जाया करता था।
उसने कपड़ों के गट्ठर को ठीक से कन्धे पर रखा। कन्धे दर्द कर रहे थे। यदि मैं झूला झूल लेता तो क्या नुकसान हो जाता ! क्या झूला टूट जाता ! क्या वह रुक जाता ! गन्दा हो जाता !
सिर्फ एक बार बहुत पहले, उसके पिता उसे एक मेले में ले गए थे, जहाँ सफेद छोटे-छोटे घोड़े, झूले में बँधे ऊपर नीचे भाग रहे थे। वह मंत्रमुग्ध खड़ा रह गया था। वह सोच रहा था कि ‘काश ! ये क्षण कभी न बीतें !’ लेकिन शीघ्र ही वे क्षण बीत गए थे और वह अपने पिता का हाथ पकड़े अन्य झूलने वालों को ऊपर-नीचे झूलते, उन सफेद घोड़ों पर शान से बैठे देखता रहा।

उसने कपड़ों का बण्डल दूसरे कन्धे पर रख लिया और उस मकान में घुस गया, जहाँ उसकी माँ एक गरम पानी से भरे टब में कपड़े धोती थी। माँ का चेहरा पसीने की बूँदों से भर उठा था। उसकी आवाज भी पसीने की छोटी-छोटी बूँदों की तरह ही थी, उसने दरवाजे को धक्का दिया, वह खुल गया और एक बड़े-से कुत्ते ने सदा की भाँति उसका स्वागत किया। वह उसके पैर चाटने लगा और उसके घुटनों तक उछलने लगा।
एक गोल चेहरे वाली सफेद वरदी पहने अफ्रीकी लड़की ने उसके लिए रसोई का दरवाजा खोला और उसके हाथ से गट्ठर लेकर मेज पर रख दिया।

‘‘मैं मैडम को बुलाती हूँ। तुम सब कपड़े ले आए हो न ?’’ यही सवाल मैडम हर बार पूछती थी।
हाँ, मैडम !’’ उसने लिस्ट में मिलाते हुए हमेशा की तरह उत्तर दिया।
‘‘क्या तुमने कुछ खाया है ?’’
उसने सिर हिलाकर इन्कार किया।
‘‘मैं तुम्हें बिना खिलाए जाने नहीं दे सकती।’’
फिर अफ्रीकी लड़की की ओर देखकर बोली, ‘‘हमारे पास खाने को क्या है ?’’
अफ्रीकी लड़की ने फ्रिज खोला और उसमें से खाना निकाल कर, प्लेट में डालकर मेज पर रख दिया, फिर एक गिलास ठण्डा दूध भी रख गई।

जब वह कुर्सी पर बैठ गया, तो वह अंग्रेज स्त्री चली गई। वह अब बेझिझक खाने लगा। थोड़े-से मटर, आलू, टमाटर, गाजर...
वह सोचने लगा, ‘इस प्रकार खाने से इन लोगों का पेट किस प्रकार भरता होगा ? मेरी मामा कितना सारा खाना पकाती है,’
‘‘धन्यवाद, एनी !’’ उसने हाथ धोते हुए उस अफ्रीकी लड़की से कहा।
तभी मैडम अन्दर आई, ‘‘तुमने खा लिया है न ?’’ और फिर एक दस सिलिंग का नोट उसके हाथ में थमा दिया। जो उसकी माँ की पूरे हफ्ते की मेहनत की कमाई थी।

‘‘यह तुम्हारे लिए है।’’ छह पेंस का सफेद सिक्का उसके हाथ पर चमकने लगा।
‘‘धन्यवाद, मैडम !’’
‘‘अपनी माँ से कहना कि मैं एक माह के लिए बाहर जा रही हूँ। आने पर सूचना दूँगी।’’ कहकर वह ऊँची एड़ी की सैंडिल खटखटाती रसोई से बाहर निकल गई। एनी ने एक सेब उठाकर उसे दे दिया, और वह उसे खाते-खाते बाहर सड़क पर निकल गया।
उसने विचार किया, ‘मैं एक पेंस की मीठी गोलियाँ लूँगा, एक पेनी का टॉफी, एक पेनी की च्यूंगम।’ उसके मुँह में पानी भर आया।
पहली दुकान पर ही वह रुक गया। ट्रे में अत्यन्त महँगी चॉकलेट और दूसरी चीजें आदि रखीं थीं, जो उसने पहले कभी नहीं देखी थीं। वह चुपचाप बिना कुछ खरीदे ही बाहर निकल आया।

पार्क तक पहुँचते ही उसकी चलने की गति धीमी हो गई। वहाँ बच्चे बहुत कम जो गए थे, उनका स्थान पेट पकड़े कुछ बूढ़ों ने ले लिया था। एक गेंद उछलती हुई बूढ़े के पास गई। जिस लड़के ने गेंद फेंकी थी, वह बूढ़े की छड़ी को देखकर रुक गया। अन्य लड़कों ने उस लड़के से गेंद लाने को कहा, जैसे ही वह आगे बढ़ा बूढ़े ने छड़ी मारी, लेकिन वह बाल-बाल बच गया और गेंद लेकर भाग खड़ा हुआ। बच्चे खिलखिलाकर ताली बजाते हुए पुनः अपने खेल में संलग्न हो गए। रेलिंग के उस पार खड़ा वह बच्चों को देखता रहा। बच्चों का गेंद को जोर से मारना, उनका घास पर लोट-पोट हो जाना। सब बच्चे उस सहज आनन्द में निमग्न थे, जिसका उसके लिए निषेध था और जिसका हिस्सा होने के लिए उसका शरीर और मन विकल था।
‘‘सब भाड़ में जाएँ !’’ वह जोर से चीखा। यह पार्क, ये बच्चे, यह घास, यह झूला, सब कुछ भाड़ में जाए ! उसके छोटे-छोटे हाथ वहाँ लगी ऊँची रेलिंग को क्रोध में हिला रहे थे। तभी उसे याद आया कि अगले एक महीने तक वह उधर से अब नहीं निकलेगा और यह पार्क भी नहीं देखेगा।

कूड़ेदान में फलों के छिलकों का ढेर लगा हुआ था। उसने जोर से लात मारी, सब कूड़ा रेलिंग पर गिर गया। परिणाम देखने के लिए वह ठहरा नहीं, वहाँ से भाग निकला। थोड़ी दूर जाकर रुक गया। हृदय में व्याकुलता बढ़ गई थी। उस कार्य ने उसके क्रोध को समाप्त नहीं किया, बल्कि उसकी चाहना को और दुगुना कर दिया। अपने घर के पास की भारतीय दुकान को वह बिना देखे ही निकल गया। उसके छह पेन्स बिना खर्च किए ही जेब में पड़े रह गए।
कुछ लड़के वहां खेल रहे थे, उन्होंने उसे खेलने के लिए बुलाया, लेकिन वह अनसुना करके निकल गया।
उसकी माँ रसोई में खाना बना रही थी। उसने वे दस शिलिंग उसके हाथ में पकड़ा दिए।
‘‘क्या तुम्हें भूख लगी है ?’’ उसने सिर हिलाकर इन्कार किया।

उसने उसके लिए एक प्याले में सूप डाल दिया और साथ में डबलरोटी का स्लाइस दे दिया। तभी उसने बताया कि ‘‘अगले एक माह तक कपड़े धोने को नहीं मिलेंगे।’’
‘‘क्यों ?’’ क्या बात हुई ? मैंने क्या गलती की है ?’’
‘‘कुछ नहीं। मैडम ने कहा है कि वह एक महीने के लिए बाहर जा रही हैं।’’
‘‘उन्हेंने पहले क्यों नहीं बताया कि वे जा रही हैं। मैं किसी और मैडम को तलाश करती।’’ वह दुःख भरे स्वर में बोली, ‘‘ओह, यह बोझा कितना हल्का करने का प्रयत्न करती हूँ, बढ़ता ही जाता है वह रुपया जो उनसे मिलता है उससे किसी तरह गुज़ारा हो रहा था। अब मैं क्या करूँ ?’’

बच्चे अब भी बाहर टायर से खेल रहे थे। जल्दी-जल्दी खाना खाकर वह भी उनसे जा मिला। जैसे ही उसने टायर घुमाया, उसका मन पुनः पार्क में चला गया। वहाँ के झूले में अटक गया। टायर उसके पास से निकल गया, उसने उसे पकड़ने का कोई प्रयास नहीं किया।
‘‘अरे, टायर पकड़...! क्या सो गया ? क्या खेलेगा नहीं ?’’
वह उनकी बातों को अनसुना कर वहाँ से चला गया। अन्दर-ही-अन्दर क्रोध उबलने लगा...। उसे कानून से, जिसे वह नहीं समझता था। वह कानून, जिसने उसके लिए पार्क के दरवाजे बन्द कर रखे थे। वह फूट-फूट कर रो उठा। उसने हथेली से आँसू पोंछ लिए। सामने आते लड़के को देखकर उसने हाथ एकदम नीचे कर लिए—‘‘मेरी आँख में कुछ गिर गया है। मैं रो नहीं रहा हूँ।’’

‘‘मेरा ख्याल है कि तुम रो रहे हो।’’
वह चुपचाप निकल गया।
लड़के ने उसे चिढ़ाया, ‘‘रोने वाला गुड्डा !’’
वह पास की दुकान में घुस गया।
‘‘आओ, लड़के ! क्या चाहिए ?’’
उसने अपनी मनपसन्द दो पेन्स की मिठाई का चुनाव किया। मिठाई अपनी जेब में रख ली और बाहर आकर एक छोटी-सी दीवार पर बैठ गया। लोलीपॉप चूसते-चूसते एक क्षण के लिए वह पार्क को भूल गया।
उसने लड़की को समीप आते देखा। वह बोली, ‘‘मामा ने कहा है कि खाना खा लो।’’
जब वे टेबल पर बैठे, तो पिता टेबल पर बैठ चुके थे।
‘‘तुम्हें खाना खाने के लिए बुलाना पड़ता है।’’ उसकी माँ ने कहा।

वह जल्दी से हाथ धोने के लिए गया। जब खाना समाप्त हो रहा था, तभी अचानक उसके दिमाग में एक विचार आया, ‘‘जब अँधेरा हो जाय, तब पार्क में क्यों न जाया जाए। जब वह चौकीदार दरवाजा बन्द कर देगा। बच्चे, बूढ़े और प्रैम में बच्चों को घुमाती आया, सब चले जाएँगे, तो वह चुपचाप अन्दर घुस जाएगा। तब उसे रोकने वाला कौन होगा !’ वह उसके आगे नहीं सोच सका। उसके दिमाग का बोझ हल्का हो गया था। लेकिन वह शहर में कभी अकेला रात को नहीं गया था। उसके अन्दर भय की एक लहर दौड़ गई और खाना निगलना उसके लिए कठिन हो गया। फिर भी उसने तय किया, खाना खत्म करके मैं पार्क में जरूर जाऊँगा। उसने जल्दी-जल्दी खाना निगला। जैसे ही उसके पिता ने प्लेट सरकाई और सिगरेट सुलगाई, वह जल्दी-जल्दी मेज साफ करने लगा और प्लेटों को सफाई के लिए उठा ले गया। वह प्लेट साफ करता गया और अपनी बहन को देता गया, जो पोंछ-पोंछ कर रखती गई। फिर उसने रसोई साफ करके माँ से पूछा—
‘‘मामा क्या मैं खेलने जा सकता हूँ ?’

‘‘लेकिन तुम्हें बुलाने किसी के भेजना न पड़े ! और जाने के पहले गैलरी में लैंप जलाते जाओ।’’
उसने लैम्प में तेल डाल दिया और उसकी बत्ती नीची कर दी।
अपने घर की गली से बाहर निकल कर वह तेजी से भागा। जैसे ही वह पार्क के पास पहुँचा, उसकी चाल धीमी हो गई। उत्तेजना स्वतः ही कम हो गई। लोहे के गेट के उस पार उसके सामने पार्क था। ऊपर बड़ा-सा नोटिस बोर्ड था। वह अँधेरे में भी झूले को देख पा रहा था। झूले ने उसे पुनः एक उत्तेजना से भर दिया। जैसे ही वह रेलिंग पर चढ़ा, उसकी धड़कनें तेज हो गईं। सामने कोई न था, तभी दूसरे कोने से आती एक कार इधर मुड़ी, वह घबरा गया। लेकिन कार ने गति पकड़ ली और चली गई।
रेलिंग बहुत ठण्डी थी। वह धीरे धीरे उस पर चढ़ा फिर उस पार कूद गया। नीचे घास ओस की बूँदों से नम थी। वह घास पर दौड़ने लगा।

वे झूले से ‘मेरी गो राउण्ड’ तक भागा फिर फिसलने वाले झूले पर फिसलने लगा। वह स्वयं को उन्मुक्त पक्षी की तरह महसूस कर रहा था। वह बार-बार चढ़ता और फिसल कर घास पर गिर पड़ता। एक क्षण उसने चाँद को देखा, फिर फसलने लगा। जी चाह रहा था कि उस फिसलने का कोई अन्त ही न हो।

फिर वह ‘मेरी गोल्ड राउण्ड’ पर गया और उसने जोर से धक्का दिया। वह धीरे से घूमा। उसने उसे एक बार और धक्का दिया। उसने गति पकड़ ली। तब वह कूद कर ऊपर बैठ गया। फिर धीरे-धीरे उसकी स्पीड कम हो गई। स्पीड तेज करने के लिए फिर धक्का देने की जरूरत थी, लेकिन वह अपने आनन्द को भंग नहीं करना चाहता था, अतः कूद कर उतर गया और झूले की ओर बढ़ा। उसने उसकी चाँदी की चेन को कस कर पकड़ लिया और पेंग भरने लगा। झूले की गति तेज हो गई। वह ऊँचा होता गया और आकाश को छूने लगा। अब वह चाँद को छू सकता था। उसने एक तारे को तोड़ लिया। जमीन बहुत नीचे थी। कोई पक्षी उसकी तरह ऊँचा नहीं उड़ सकता था। वह ऊपर बढ़ता जा रहा था।

तभी पार्क के कोने में बनी एक झोंपड़ी में एक बत्ती जल उठी। दरवाजा खुला और उसने एक काली आकृति को अपनी ओर आते देखा। वह समझ गया कि वह चौकीदार होगा। उसके हाथ में एक टार्च थी। वह उसी तरह झूलता रहा।
चौकीदार उसके सामने आकर रुक गया और उसने टार्च की रोशनी उसके चेहरे पर फेंकी।
‘‘ओह गोड ! तो तुम हो ! मैंने तुम्हें कहा था न कि तुम इस झूले पर नहीं चढ़ सकते।’’
लेकिन वह झूलता रहा।
‘‘तुम फिर क्यों आए ?’’
‘‘इस झूले के कारण—मैं झूलना चाहता था।’’
चौकीदार के मन में आया कि वह उसे झूले का आनन्द ले लेने दे। इन गोरों को तो सबकुछ प्राप्त है। वह धीरे से बुदबुदाया। लेकिन उसे अपनी नौकरी जाने का भय था। यदि किसी ने देख लिया तो ?

‘‘नीचे उतरो ! अपने घर जाओ !’’ चौकीदार चीखा, ‘‘यदि तुम नीचे नहीं उतरोगे तो मैं पुलिस को बुलाऊँगा। तुम्हें मालूम है कि वे तुम्हारा क्या करेंगे।’’
लेकिन वह उसी प्रकार झूलता रहा। चौकीदार गेट की तरफ मुड़ा।
मामा...! मामा....! अब उसके होंठ काँपे और वह बार-बार अपनी माँ के समीप रसोई में सुरक्षित रूप से बैठने की कामना करने लगा। मामा ! मामा ! उसकी आवाज ऊँची होती जा रहा थी। ठीक उसी झूले की भाँति, जो आकाश को छू रहा था। आवाज और झूला। झूला और आवाज। ऊँची, ऊँची और ऊँची। फिर वे दोनों मिल कर एक हो गए।
गेट के दरवाजे पर नोटिस बोर्ड उसकी तरफ इशारा करता हुआ वैसे ही खड़ा था।
(अनुवाद : इन्दु रायज़ादा)

नाइजीरिया
लैगोस का अजनबी
सिप्रियन इक्वेंस


जब वह नृत्य कर रही थी तो उसने उसे अपनी ओर ध्यान से देखते पाया और वह तत्काल ही उस दृष्टि का अर्थ समझ गई। फिर एक अजनबी ही, ‘ऊमी ओवो’ नृत्य को इतने आश्चर्य से देख सकता है। सिर्फ वही व्यक्ति, जो प्यार में एकाएक गिरफ्तार हो गया हो, इतनी आलिप्त निगाहों से देख सकता है, फिर भी एक गर्म दोपहर में जब वह पड़ोस की स्त्रियों के पास बैठी मशीन से सिलाई कर रहा थी, तो सिर उठाकर ऊपर दृष्टि करते है उस अजनबी को किसी से प्रश्न करते देख वह बुरी तरह घबरा गई। वह जानती थी कि उसने उसे पहले ही देख लिया है।

वह समझ नहीं पा रही थी कि उसे क्या करना चाहिए। क्या वह उसकी सहायता के लिए जाए, जबकि उसकी माँ और उसके मँगेतर की माँ, दोनों ही वहाँ उपस्थित हैं। शायद वह अपनी कहानी सुना रहा था कि किस प्रकार वह नाइजर नदी पार करने के बाद रास्ता भूल गया था। उसने सोचा कि उसे अवश्य ही उठना चाहिए। तभी उसने उसके मुस्कान-रहित चेहरे पर एक गहरा भाव देखा। उसके चेहरे पर एक गहरी चाह से उपजी दर्द की छाया थी। एकाएक उसकी टाँगें इतनी भारी हो गईं कि उसे लगा, वे हिल भी नहीं पा रही हैं। इतनी दृष्टियों को झेलती वह उससे किस प्रकार बातचीत कर पाएगी ! इस ओनी शहर में तो दीवारों की भी आँखें हैं। इस अहाते में ही कितनी आँखें हैं।

लिलियन जन्म के बाद से यहीं रह रही है और वह सबकी नज़र बचा कर दिन में भी अपने प्रेमी के यहाँ रोज जाती है। उसकी माँ सोचती है कि वह बहक गई है। लेकिन यदि किसी ने उस लम्बे और खूबसूरत अजनबी से बातचीत करते देख लिया तो लोगों की आँखें चमकने लगेंगी और उसकी उतनी बदनामी होगी कि या तो उसे शहर छोड़ देना पड़ेगा या शीघ्र ही विवाह करना होगा।
जब पुनः लिलियन ने मशीन से दृष्टि हटाकर ऊपर की तो वह चला गया था। उसकी माँ बारामदे में वापस लौट रही थी।
‘‘वह क्या कह रहा था ?’’

‘‘क्या मालूम !’’ माँ ने कन्धे सिकोड़ कर, मुँह बनाते हुए कहा। ‘‘इन लैगोस के युवकों की भाषा कौन समझ सकता है।’’
‘‘क्या उसने अपना और अपने शहर का नाम बताया ?’’
‘‘उसने नाम बताया तो था, लेकिन मैं उसके परिवार को नहीं जानती।’’

लेकिन लिलियन अपनी माँ की भाँति परिवार से पूर्व-परिचित होने या न होने की परवाह नहीं करती, वह प्रत्येक युवक को अपनी अन्तःप्रेरणा के अनुसार ही परखती है। उसने सुन्दर प्रिन्ट वाले कपड़े को स्कर्ट का रूप दे दिया, जो उसने घुटनों तक बनाई थी उसकी माँ ने आक्रोश से उसकी तरफ देखा, उसे इतने तंग कपड़े पहनना बिल्कुल पसन्द नहीं था। बाजार में घूमते समय वह अपने नए वस्त्रों के प्रति काफी सजग थी। उसने अपनी केश-सज्जा भी हाल में ही की थी। कान में बड़े-बड़े झुमके लटक रहे थे। उसे लगा कि कोई उसके पीछे चला आ रहा है। उसने मुड़ कर देखा। वह अजनबी था। अनेक दृष्टियाँ उसी पर गड़ी थीं। होटलों में आंखें थीं, खिड़कियों पर आँखें थीं, किताबों की दुकानों, वर्कशॉप, सभी जगह आँखें ही आँखें चमक रही थीं। उन आँखों में अनेक प्रश्न थे, उसे सहसा लगा, मानों उन दोनों को सिनेमा के पर्दे पर दिखाया जा रहा है और वह रोमांचित हो उठी।

‘‘मैंने तुम्हें जिस अहाते में देखा था, क्या तुम वहीं रहती हो ?’’ युवक ने उससे पूछा।
‘‘हाँ। लेकिन मैं जल्दी में हूँ। तुम कौन हो ?’’
‘‘मैं लैगोस से आया एक अजनबी हूँ। यदि तुम्हारे पास समय हो तो तुम्हें बताना चाहूँ कि मेरा उद्देश्य क्या है।’’
‘‘अभी ?’’ लिलियन ने नाक सिकोड़ कर पूछा।
‘‘तुम्हें देखकर मैं ठहर गया। मैंने जब से तुम्हें तुम्हारे अहाते में देखा है, तभी से तुमसे मिलने को आतुर था।’’
‘‘किसलिए ?’’
उसने उत्तर नहीं दिया।
उसने फिर पूछा, ‘‘तुम लैगोस से आए हो ?’’
‘‘हाँ।’’

होटल, किताबों की दुकानों, वर्कशॉप सभी स्थानों पर आँखें नाच रही थीं। एक स्त्री पास से गुजरी और लिलियन का नाम लेकर उसने उसका अभिवादन किया। उसका पूरा ध्यान उस अजनबी की तरफ ही केन्द्रित था।
‘‘तुम्हारा बेबी कैसा है ?’’ किसी ने पूछा, ‘‘तुम्हारी माँ कैसी है ?’’
लिलियन ने धीरे से कुछ कहा, ‘‘तुम तो लैगोस से आए हो, लेकिन यहाँ ओनीशा में हम रास्ते में इस प्रकार रुक कर किसी से बातचीत नहीं करते। इससे बदनामी होती है, अच्छे घरों की लड़कियाँ इस प्रकार बात नहीं करतीं। इतनी सारी आँखें....शाम तक प्रतीक्षा करो।’’





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