कर्ण-सुवर्ण - रमाकान्त पाण्डेय Karn-Suwarn - Hindi book by - Ramakant Pandey
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कर्ण-सुवर्ण

रमाकान्त पाण्डेय

प्रकाशक : साहित्य चन्द्रिका प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :220
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5463
आईएसबीएन :8179320588

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एक ऐतिहासिक उपन्यास...

Karan-Sukaran

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कर्ण-सुवर्ण’ की कथावस्तु ऐतिहासिक अप्रतिम एवं रोमांचक है, जो सुदूर अतीत के गर्भ में विलुप्तप्रायः है, किंतु उपलब्ध सामग्री के गवाक्ष, वातायन एवं चतुर्दिक द्वारों से विस्मृति की धुन्ध में विलीन अतीत का विश्वसनीयता के अत्यधिक निकट एक प्रमाणिक चित्र यहाँ इस कृति में चित्ताकर्षक, रोचक एवं मनोरंजक ढ़ंग से प्रस्तुत किया है—रमाकान्त पाण्डेय ‘अकेले’ ने।
भारत के इतिहास में ‘गुप्तकाल’ को ‘स्वर्णयुग’ कहा जाता है ज्ञान के सभी क्षेत्रों में अनिर्वचनीय प्रगति हुई। सम्राट समुद्रगुप्त ने भारत के अधिकांश भू-भाग पर अपना अधिकार कर लिया था जिसे उसके पुत्र सम्राट चन्द्रगुप्त ने और अधिक विस्तार दे दिया। ऐसी भी मान्यता है कि उन्हें विक्रमादित्य की उपाधि से विभूषित किया गया था और उन्ही के नाम पर विक्रम संवत् का समारम्भ हुआ। हाँ ! गुप्तवंश का अपना वंशगत संवत् अवश्य रहा है किंतु गुप्त सम्राटों ने अपने लेखों, अभिलेखों, शिलालेखों, स्तम्भलेखों, स्मारकों, ध्वंसावशेषों, प्राचीन सिक्कों, गुफ़ाचित्रों, में विक्रम संवत् का प्रयोग नहीं किया। जन मानस में कृत संवत् या मालव संवत् को सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय के विक्रमादित्य, विक्रम, विक्रमार्क, शकारि आदि जो मालव संवत् की अभिधा पा चुके थे कालान्तर में विक्रम संवत् में रूपान्तरित हो गये। चूँकि जब गुप्त वंश में ही किसी सम्राट ने अपने उत्कर्षकाल में विक्रम संवत का उपयोग नहीं किया तो पराभवकाल में विक्रम संवत् द्वारा गुप्त सम्राटों को गौरवान्वित करने का तर्क पूर्णतः भ्रान्तिमूलक है और इतिहासकारों द्वारा तत्कालीन साहित्य का अवगाहन न करने से ही यह भ्रान्ति हुई।
रमाकान्त पाण्डेय ‘अकेले’ की भाषा पर गहरी पकड़ होने से यह कृति ज्ञानवर्द्धक, रोचक और मनोरंजक तथा पठनीय तथा उपादेय बन गई है।

श्रीकृष्ण शर्मा

अभिमत


प्रख्यात साहित्यकार श्री रमाकान्त पाण्डेय ‘अकेले’ कृत ‘कर्ण-सुवर्ण’ अप्रकाशित ऐतिहासिक को पढ़ने और देखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ। प्रख्यात कथाकार श्री रमाकान्त पाण्डेय ने अपने ‘कर्ण-सुवर्ण’ शीर्षक वाले ऐतिहासिक उपन्यास में, विषयवस्तु के प्रतिपादन में जो कलात्मक उत्कर्ष उद्घाटित किया है, वह निश्चित रूप से उनकी कारयित्री एवं भावयित्री प्रतिभा को प्रौढ़ एवं पुष्कल आयाम प्रदान करता है। श्री रमाकान्त पाण्डेय के अनेक उपन्यास एवं कई कहानियाँ प्रकाशित हैं। हिन्दी की उपन्यास-परम्परा में श्री पाण्डेय ने ‘कर्ण-सुवर्ण’ उपन्यास के माध्यम से हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है, वह निश्चित रूप से प्रशंसनीय है।

यह ऐतिहासिक उपन्यास वास्तव में हिन्दी के ऐतिहासिक उपन्यासों की परम्परा में अपना विशिष्ट महत्त्व रखता है। इस उपन्यास की कथावस्तु भारतीय इतिहास के स्वर्णिम हिन्दू युग से सम्बन्धित है। उपन्यास के पात्र उनकी चरित्र-निरूपण कला को नूतन उत्कर्ष प्रदान करते हैं। उपन्यास की भाषा प्रौढ़, प्रांजल और परिषकृत है। विवरणात्मक शैली में लिखा गया यह उपन्यास निश्चित रूप से हिन्दी के ऐतिहासिक उपन्यासों की परम्परा में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। श्री रमाकान्त पाण्डेय ‘अकेले’ का ‘कर्ण-सुवर्ण’ ऐतिहासिक उपन्यास सर्वथा प्रकाशन योग्य है। इस उपन्यास के प्रकाशन के उपरान्त हिन्दी की ऐतिहासिक उपन्यास परम्परा अवश्य समृद्ध होगी, ऐसा मुझे पूर्ण विश्वास है। मैं इनके साहित्यिक अवदान की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए इनकी दीर्घायु की मंगलकामना करता हूँ।

( डॉ. राम अँजोर सिंह)

द्रष्टव्य

अक्षर या साक्षात् वर्तमान जब अहर्निश के चक्रमति चक्र की नाभि पर आरूढ़ हो अतीत के घनीभूत अन्धकार में प्रवेश करता है, तभी युगान्तर स्वतः ही सम्भाव्य हो उठता है और यही युगान्तर नव-नवीनतम समाज को जन्म देकर नित्य ही अन्याय नीति-रीतियों का सृजन करने में तन्मय हो जाता है। फिर वही वर्तमान, इतिहास में परिणत हो पुरातत्ववेत्ताओं के अन्वेषण का विषय बन उठता है।

प्रत्येक युग किसी न किसी युग-पुरुष के पौरुष और पराक्रम की गतिविधि का अनुसरण कर अपनी मान्यताएँ सीमित और मर्यादित करता है और वह युग-पुरुष अपनी अभीप्साओं तथा महत्वाकाक्षाओं की पूर्ति हेतु शत और सहस्रों स्वर्ण, रौप्य, रत्नजटित, राज-मुकुटों को रौंदकर, उनके यश, कीर्ति और पराक्रम को ध्वस्त कर अपने चरण-चिन्ह अंकित करने में तन्मय रहता है, उसके अश्व की खोगीर और वल्गा तथा कार्मुक और असि बनने में, युग की मीमांसि अभीप्सा स्वमं ही संज्ञाशून्य सी होकर अपने को गौरवान्वित समझने लग जाती है। शत-शत नारियों की कुक्षि और उनके सिन्दूर एक साथ ही रक्त में स्नात होकर उस युगसृष्टा के गुणानुवाद गाने में प्रवृत्त हो उठते हैं, नगर और ग्राम निर्जन हो वनों में और वन, उपवनों में परिणत सुरभि बिखेर चलते हैं।

और फिर नव-नवीन ग्राम और नगरों की सृष्टि होती है, जीवन और मरण तथा मरण और जीवन की पुनरावृत्ति होने लग जाती है, तभी तो लोगों को प्राचीन खण्डहरों को देखते ही इतिहास का स्मरण स्वतः ही हो उठता है और वे प्राचीनता के लेखे–जोखे को अपनी कल्पना के पटल पर अंकित कर समीचीनता की मीमांसा करने लग जाते हैं।
शेष में अपने इष्ट को इतिहास की पृष्ठभूमि पर रोपकर नव-युग जिस अनिर्वचनीय सुख और शान्ति का अनुभव करता है, वही इतिहास की स्वर्णिम श्रृखंला बनती है।

आज से प्रायः सोलह सौ वर्ष पूर्व, तत्सामयिक शक सम्राट तथा उनके अमात्यों, भृत्यों और राजकर्मचारियों की अनाचरपूर्ण लिप्सा-अभीप्साओं के दलन-शील चक्र-पाटों में पिसती, कराहती हुई प्रजा के करुणालापों से अभिभूत हो, उन्हीं के एक क्षुद्र राज सेवक का मानद दोलायमान हो उठा, फलतः गौ-ब्राह्मण के अश्रु अपने उत्तरीय से पोंछकर वह विद्रोही हो उठा। पीड़ित प्रजा उसके साथ थी, सम्राट और उनका सिंहासन डगमगा उठा। गाँव के गाँव, नगर के नगर उसकी छत्र-छाया में सुरक्षित होने लगे। महाराज शकराज के देखते-देखते पुरुषपुर से सुदूर पूर्व की ओर मगध के दिव्यप्रांगण में एक नवीन राज्य की सृष्टि हो गई। कर्ण-सुवर्ण के सुव्यवस्थित, सुदृढ़ और आतंकपूरित राजप्रसाद के शक शासक धराशायी हो गंगा के प्रखर प्रवाह में विलीन हो गये। नगर उजड़ कर सघन वन में परिणत हो गया।

कर्ण-सुवर्ण का भव्य राजप्रसाद कब और किसके द्वारा निर्मित हुआ, कहा नहीं जा सकता। अधिक संभव है इसे महाराज शकराज कनिष्क ने भारत के पूर्ववर्ती साम्राज्य की सुरक्षा हेतु निर्मित करवाया होगा, क्योंकि इस कथाकृति के नायक सम्राट शशांक देव के पाटलिपुत्र छोड़ते ही इतनी शीघ्रता से नगर तथा प्रकाशवृत्त सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण हो ही नहीं सकता है। लगता है कि उनकी आज्ञा पाते ही पाटलिपुत्र के महामात्यों ने प्राचीन दुर्ग की यथेष्ट मरम्मत करवाई होगी। अस्तु-इस नवीन राज्य के प्रतिष्ठापक का नाम ‘गुप्त’ था जो जाति के क्षत्रिय थे, इनके उपास्य देव शिव थे, इनकी गौ और ब्राह्मण में पूर्ण आस्था थी। यह परमवीर और महान् पौरुषी व्यक्ति थे। विद्या इनको व्यसन के रूप में मिलि थी। कर्ण-सुवर्ण शकराज्याधिकारी के यह प्रमुख राजकर्मी थे।

‘गुप्त के पुत्र का नाम घटोत्कच था जो अपने पिता के समान वीर और पराक्रमी था। ‘मधुमती’ नाम्री क्षत्रिय कन्या से इसका पाणिग्रहण हुआ।
घटोत्कच से जो पुत्र उत्पन्न हुआ, उसका नाम चन्द्रगुप्त रखा गया। पिता की मृत्यु के पश्चात् चन्द्रगुप्त शासक बने। उस समय वैशाली में लिच्छवि वंशीय क्षत्री राज्य करते थे।
लिच्छवि वंश की कन्या कुमारदेवी से चन्द्रगुप्त का विवाह सन् 321 ई. में होते ही गुप्त वंश इतिहास का प्रबल विषय बन गया।
लिच्छवि राजवंश उस समय का एक ऐसा प्रबल कीर्तिवान वंश था जो स्वयं भीतर से अशक्त किन्तु बाहर से सशक्त और यशपूर्ण था। चन्द्रगुप्त के शौर्य और पराक्रम से प्रभावित हो उन्होंने अपनी कन्या के साथ ही मगध का सिंहासन भी उन्हें भेंट किया। अब चन्द्रगुप्त सम्राट थे, इन्होंने गुप्त साम्राज्य में वर्धन में कोर-कसर न रखी। 29-30 वर्ष राज्य करके चन्द्रगुप्त दिवंगत हुये।

सन् 350 ई. में सम्राट चन्द्रगुप्त के पुत्र समुद्रगुप्त सिंहासनारूढ़ हुये लगभग 50 वर्ष राज्य करके समुद्रगुप्त सुरलोक पधारे। इन्होंने अपने पिता के राज्य को बढ़ाकर समुद्र से समुद्र तक विस्तृत किया तथा स्वर्णकाल की स्थापना की।
समुद्रगुप्त से चन्द्रगुप्त द्वितीय, इनके पुत्र कुमार गुप्त हुये जिन्होंने ई.415-455 तक राज्य किया।
कुमार गुप्त से दो रानियों से स्कन्दगुप्त तथा पुरुगुप्त नामक दो पुत्र हुए।
स्कन्द गुप्त ने 455 से 467 ई. तक राज्य किया। ‘अरुणा देवी’ जैसे नाम वाली किसी सगोत्रीय राजकन्या से इनका स्नेह-सम्बन्ध था, किन्तु विवाह न हो सका और यह हूण-युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुये।
इनके पश्चात् इनकी विमाता से उत्पन्न पुरुगुप्त सम्राट बने।

यद्यपि गुप्त राजवंश का वंश-क्रम से लिखना असम्भव है, ढेर सारे मतभेद हैं, इतिहासज्ञों में खींचातानी भी है, कोई कुछ कहता है कोई कुछ, किन्तु फिर भी मुझे अन्यान्य वंशवृक्षों के अवलोकन से लगता है कि,
पुरुगुप्त से नरसिंह गुप्त, नरसिंह गुप्त से कुमारगुप्त द्वितीय तथा कुमारगुप्त से बुधगुप्त, जिन्होंने सन् 477 से 486 तक राज्य किया। शिलालेखों तथा ताम्रपत्रों से पता चलता है कि बुधगुप्त के राज्यकाल में पुण्कंवर्द्धन भुक्ति (उत्तर-पूर्व बंगाल) काशी, अरिकिण आदि प्रदेशों में उनका शासन था। बुधगुप्त से तथागत गुप्त हुए जिनके पुत्र बालादित्य हुये। हूणों के राजा तोरमाण अथवा तुरमान शाह उस समय मध्यप्रदेश के शासक थे।
सम्राट बालादित्य के पुत्र वज्रगुप्त हुये। सन् 533 ई. में जनेन्द्र यशोधर्मन ने तोरमाण को परास्त कर काश्मीर की ओर भगा दिया।

इसी समय एक बार गुप्त साम्राज्य डगमगाया किन्तु इस डगमगाते सिंहासन को दंत्तवंशीय क्षत्रियों ने स्थिर कर दिया। यह दत्त वंश मंडला दुर्ग में रहकर मंडला, चरणाद्रि (चुनार) आदि प्रदेशों का शासक था, किन्तु यह शासक पूर्णरूपेण गुप्तवंश के राजकर्मचारी थे, उक्त वंश सम्राट का आज्ञानुवर्ती था।
दत्तवंश ने पुन: गुप्तवंश के कृष्णगुप्त को पाटलिपुत्र के सिंहासन पर अभिषेक किया और तभी से इस वंश की कन्याएँ ही मगध की पट्टमहादेवी होने लग गईं।
कुमारगुप्त तृतीय के पुत्र का नाम दामोदर था। दामोदर गुप्त के एक पुत्री तथा एक पुत्र था।
पुत्री का नाम महासेना गुप्ता तथा पुत्र का नाम महासेन गुप्त था।
पुत्री महासेना गुप्ता, श्रीकण्ठ (थानेश्वर) के ‘भूतिवंशीय’ नर पुंगव राजा-आदित्यवर्धन को ब्याही गई जिनसे प्रभाकरवर्धन से दो पुत्र राज्यवर्धन तथा हर्षवर्धन और एक पुत्री उत्पन्न हुई जिसका नाम राज्यश्री था। राज्यश्री कन्नौज के मौखरिवंशीय राजा अनन्त वर्मा के पुत्र गृह वर्मा को ब्याही गई।

महासेन गुप्त के दो रानियाँ थीं। एक से देव गुप्त तथा पट्टमहादेवी से नरेन्द्र गुप्त शशांक तथा माधवगुप्त नामक दो पुत्र हुये।
देवगुप्त मालव के राजा हुये और नरेन्द्रगुप्त शशांक सम्राट बने। माधवगुप्त सम्राट शशांक से विद्रोह कर श्रीहर्षदेव के पूजक बने।
देवगुप्त राज्य श्री पर प्राण छिड़कते थे किन्तु वह उन्हें प्राप्त न हो सकी, देवगुप्त ने ही उसे विधवा बनाया तथा स्वयं श्रीहर्षदेव की रोषाग्नि में जल कर भस्म हो गये।
माधवगुप्त सिंहासन के लोभी थे। वे होने वाली पट्टमहादेवी चम्पा या चित्रा देवी जो दत्त वंश की राजकन्या थी उसी से विवाह कर सम्राट बनना चाहते थे किन्तु सम्भव न हो सका और वे स्थाण्वीश्वर श्रीहर्षदेव के क्रीतदास बनकर रह गये। उनके पुत्र आदित्य सेन से श्रीहर्षदेव की कन्या का विवाह हुआ और आदित्य सेन ही गुप्त कुल के अन्तिम सम्राट हुये।
दत्तवंशीय राजकन्या चित्रा शशांक की परम प्रिय बाल सखी और हृदयाराध्या प्रेयसी थी। शंकरनद के युद्ध से लौटने के प्रथम ही उसका विवाह माधवगुप्त से सम्पन्न हो गया, किन्तु शशांक के लौटते ही वह क्षत्रिय कन्या शोण के प्रवाह में कूद मरी। शशांक सम्राट बने किन्तु चित्रा की छवि उनके मानस से हट न सकी। वे विरक्त हो गये।

राज्यवर्धन की उनके द्वारा हत्या उनके जीवन की प्रमुख घटना है।
श्रीहर्षदेव को कई बार पराजित करके भी वे एक बार उन्हीं से मारे गये। उन्हें पुनर्जीवन मिला किन्तु भीतिवंशीय क्षत्रिय कुमारी मलय से।
यद्यपि सम्राट शशांक ने उससे शास्त्रोक्त विवाह नहीं किया किन्तु उससे विमुख न रह सके।
विवाह, त्याग और अनुराग के मार्मिक सन्धिस्थल से ही इस कृति का सूत्रपात्र हुआ।
कृति की सफलता को पाठकों की रुचि पर आधारित कर मैं एक युवा मन की पीड़ा के उद्देग को पन्नों पर उद्धृत करने को बद्धपरिकर हुआ हूँ।
निश्छल अनुराग और वह भी प्राणदात्री का, फिर भी यदि मन नियमों के अभेद्य प्राकार से प्राकारित रहा तो वह स्नेह कैसा? कौन विश्वास करेगा।

रमाकांत पाण्डेय

भग्न प्राचीर दुर्ग

‘‘ॐ नम: शिवाय, ॐ नम: शिवाय, ॐ नम: शिवाय’’ की मधुर ध्वनि उसके अधरों पर नृत्य कर, वायु के शीतल, मन्द प्रवाह में विलीन हो-हो जाती और पद्यपुष्पों के कलित-ललित गुच्छ उसकी लम्बी–लम्बी अँगुलियों का स्पर्श ग्रहण कर स्वत: उस भीगी बालुका-कणों से निर्मित शिवमूर्ति पर चढ़ जाते। अक्षत, बिल्व पत्र अर्पित करते न करते ध्यानस्थ हो गई वह। पूर्ण समाधिस्थ सी। अधर-नेत्र निमीलत-से-हो गये उसके। सिर पर बंधी हुई प्रलम्ब केश-राशि के गुम्फित जूरे पर टिकी हुई झीनी सी कुसुम्बी ओढ़नी वायु के स्पर्श से एक ओर सिमट कर, उस संगमरमरीय आलिन्द को बुहार-बुहार आती, जूरे से रिसते हुये जल की शीर्ण सी रेखाओं ने उसकी कंचुकी को भिगोना आरम्भ कर दिया। उटँगे-से स्वर्ण, रौप्य सूत्रों से स्यूतित अधोवस्त्र के हरित, पीत, रजत मणि-मुक्ताओं की ज्योति-रश्मियाँ ज्योतित हो उठी, भानु की स्वर्णिम भानुओं के स्पर्श से।
कण्ठ की मणि-माल लोल हुई और उसकी कमनीय देहयुष्टि पुष्पित लता की भाँति झुककर शिव-प्रतिमा से लिपट गई, अधर स्फुरित हुये, कह उठी वह, ‘‘देवाधिदेव ! उनकी रक्षा करना।’’

अश्व हिनहिनाये, मानो वे चलने को तैयार हों। उसकी ध्यान तन्द्रा विश्रृंखलित हुई, नेत्र खुल गये, उठकर सीधी बैठ गई वह। ओढ़नी समेट कर संयत हो ही रही प्रवाह में ‘छप्प’ की ध्वनि हुई। क्षणार्द्ध में संयम हो वह उधर ही देखने लग गयी। एक काषाय वस्त्रधारी वृद्ध भिक्षु उत्तुंग गंगा के प्रवाह में उच्छलित ऊर्मियों से खेल रहा था। चिल्ला पड़ी वह, किन्तु वहाँ सुनता कौन था ? ‘भिक्षु ? गंगा प्रवाह में आया कहाँ से ?’ सोच रही थी वह, तभी उसे दिखा मानो भिक्षु उन उत्तुंग तरंगों से क्रीड़ा करता हुआ उसकी ओर तट पर आ रहा है। लगता था मानो तरंगावालियाँ उसे वक्ष में समेट उसका स्नेह करके दूसरी को देती जा रही हों और वह सोपानिका सी चढ़ता-उतरता हुआ आगे बढ़ रहा हो। उसने अपनी चतुर्दिक दृष्टि दौड़ाई, उसे कोई दिखा नहीं, हताश-सी होकर उसने झपट कर पार्श्व के वृक्ष की शाखा पर टँगे हुए अपने वस्त्र और अस्त्र उतार लिये। क्षणार्द्ध में वर्मावृत्त हो उसने हेममयी शिरस्त्राण को धारण कर लिया, प्रलम्ब शूल तान कर तट की अन्तिम सोपानिका पर आ खड़ी हुई।

वृद्ध भिक्षु भीगे वस्त्रों में जल से निकलकर सोपानिका के मध्य स्थित संगमरमरीय ऊँची चौकी पर आ बैठा। वह उसे निर्मेष देखे जा रही थी। एक क्षण में स्वस्थ हो वृद्ध कह उठा, बेटी चित्रा। शूल एक ओर रख मेरे समीप आ बैठो, तुम्हें मैं जन्म से ही पहचानता हूं, तुम्हारे पिता तक्षदत्त तुम्हें मेरी अंक में हठात् देकर प्रसन्न हो उठते थे, मण्डला में मैं वर्षों ठहरा हूँ, नरसिंह दत्त को मैंने वर्षों शास्त्राभ्यास करवाया है। तुम मुझे नहीं पहचानती चित्रा ! तुम्हें भूलना तो नहीं चाहिय़े, मैं तुम्हारा हितेच्छु हूँ। सम्राट महासेन गुप्त अब नहीं है किन्तु पट्टमहादेवी है, चलो, वे तुम्हें पहचानने में भूल न करेंगी। और चित्रा ! और शशांक...।
सम्राट शशांक तो तुम्हारे बिना जीवन-जगत से उकता उठे हैं। उनके जीवन के लिये, साम्राज्य और सिंहासन के लिए लौट चलो चित्रा ! माधव से विवाह हुआ था को क्या हुआ, सम्राट तुम्हारे हैं, तुम्हारे रहेंगे...।’’

‘‘ठहरें ! थोड़ा रुकें तो, अन्तत: आप यह सब क्यों कह रहे हैं ? मैं चित्रा को तो जानती भी नहीं। आप हैं कौन ? उसी योद्धीय वस्त्रधारिणी युवती ने वृद्ध को टोकते हुए कहा।
‘‘संसार तुम्हें भूल सकता है चित्रा ! किन्तु यह वृद्ध शक्रसेन तुम्हें भूल जाये, ऐसा असम्भव है।’’
‘‘शक्रसेन ! क्षमा करें आचार्यपाद्, किन्तु आप भ्रम में हैं, अन्यथा मुझे आप चित्रा कहते ही क्यों ?’’

‘‘अच्छा थोड़ा ठहरो ! मैं देखता हूं’’ कहते हुए वृद्ध ने अपने वस्त्र से कोयले की एक डली निकाली और समक्ष ही प्रस्तर पर कुछ रेखाएँ खींचने लगा।
क्षण पीछे रेखाएं खींचते-खींचते हंस पड़ा वह, युवती दो पग और पीछे हट गई। उसके सुदीर्घ नेत्र वृद्ध की क्रिया देखे जा रहे थे।
‘‘क्षमा करें बेटी मलय ! अवश्य ही मुझसे भूल हुई है, और उसमें मेरा अपराध भी नहीं। जिस चित्रा की बात मैं कर रहा था उसकी आकृति-प्रकृति ठीक तुम जैसी ही थी, तभी वृद्ध के नेत्र धोखा खा गये, चलो कोई हानि नहीं, बेटी ! तुम्हें देखकर चित्रा के बन्धुश्री नरसिंह दत्त तथा स्वयं सम्राट भी भ्रम में पड़ जायेंगे। सैन्यभीति कहां गये हैं।’’
युवती को मानो काठ मार गया हो, वह निश्चल खड़ी की खड़ी ही रह गई, वृद्ध शक्रसेन की बात सुन।




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