द्वंद्व - सुधा मूर्ति Dwandwa - Hindi book by - Sudha Murti
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द्वंद्व

सुधा मूर्ति

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5468
आईएसबीएन: 81-7315-408-2

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सुप्रसिद्ध कन्नड़ लेखिका श्रीमती सुधा मूर्ति के दो पठनीय सामाजिक उपन्यास...

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प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मुकेश का सगा भाई जिंदा है क्या ? अगर है तो कहाँ है ? उसे ढूँढ़ना चाहिए। अपने जीवन की गाथा उसे सुनानी है। इस विशाल संसार में सिर्फ वे ही दोनों एक-दूसरे से रक्त से जुड़े हैं।

जीवन की घटनाएँ विचित्र रूप ले रही थीं। तीन दिन पहले वह रूपिंदर-सुरिंदर का पंजाबी मुंडा था। बीस दिन पहले वह त्रिवेदीजी-सुमन का इकलौता बेटा था। लक्ष्मीपुत्र था। भारतीय था। आज वह भारत का भी नहीं है। इस भूमि का, इस देश का, इस संस्कृति का नहीं है। अब वह अमेरिकी है !

‘द्वंद्व’ से

‘‘मुझे आपसे कुछ पूछना है। अच्छा, पहले यह बताइए कि शंकर मेरा कुछ नहीं लगता, फिर हम दोनों हमशक्ल कैसे हैं ?...
‘‘माँजी, एक सवाल पूछूँ ? बुरा तो नहीं मानेंगी ? शंकर के पिता का देहांत हुआ कैसे ? उनके मरण में बहुत राज छिपे हैं। जहाँ तक मेरी समझ है, मेरे पिताजी का कोई रिश्तेदार इस इलाके में नहीं रहा। न पहले थे, न अब हैं। हम लोग शुरू से ही दिल्ली में रहे।...

‘तर्पण’ से

सुप्रसिद्ध कन्नड़ लेखिका श्रीमती सुधा मूर्ति के ये दोनों पठनीय सामाजिक उपन्यास पाठकों की संवेदनशीलता और मर्म को भीतर तक छू जाएँगे।
अपने बच्चों को अपने प्राणों से भी अधिक चाहनेवाली, उनके लिए अनगिनत कष्टों को चुपचाप सहनेवाली, ममता के सागर जैसा हृदय रखनेवाली समस्त भारतीय माताओं को, उनमें भी विशेषकर अपनी माँ श्रीमती विमला कुलकर्णी
के चरण-कमलों में सादर समर्पित।

अनुवादक की ओर से

सुप्रसिद्ध कंप्यूटर विशेषज्ञा तथा लेखिका श्रीमती सुधा मूर्ति द्वारा रचित ‘तुमुल’ नामक कन्नड़ उपन्यास का हिंदी भाषांतरण इस पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करने का यथासंभव प्रयत्न किया गया है। इस अनुवाद कार्य के लिए मुझे प्रोत्साहित तथा प्रेरित करने-हेतु श्रीमती सुधा मूर्ति को मेरा शत-शत प्रणाम।
कथा एवं कथावस्तु के दायरे की मर्यादा को कायम रखते हुए, भाषामात्र के बंधन को तोड़ते हुए, आंचलिकता को समेटते हुए इस कृति को वास्तविकता के साँचे में ढालने का प्रयास किया गया है। पाठकगणों के सुझाव, टिप्पणी, विचार आदि पाकर मैं अपने आपको धन्य समझूँगी।

सहनशीलता तथा धैर्य से जीवन के विकट पथों से गुजरी, लगन और निष्ठा में विश्वास रखनेवाली, अनुराग तथा क्षमा की मूर्ति मेरी पूज्य माताश्री श्रीमती गिरिजा कुलकर्णी के चरण-कमलों में यह कृति समर्पित है।
सतत सहयोग एवं प्रेरणा के लिए मैं अपने पति श्री राघवेन्द्र तथा सुपुत्रीद्वय कु. दीपिका और कु. चंद्रिका के प्रति हृदय से कृतज्ञ हूँ।

शोभा आर. कावेरी

द्वंद्व

आमतौर पर फरवरी के अंत या मार्च की शुरुआत तक कड़ाके की सर्दी खत्म हो जाती है और हिमपात भी थम जाता है। अतः इस समय तक स्केटिंग का मौसम खत्म हो जाता है।
लेकिन इस साल ऐसा नहीं था, आधा मार्च बीत गया, फिर भी स्केटिंग चल रहा था।
मुकेश आसमान को देखकर मुसकरा रहा था। आसमान का नीला रंग उसे बेहद पसंद था। इसीलिए वह सोनिया के लिए प्रायः नीले रंग के ही कपड़े लाता है। कई बार सोनिया चिढ़कर बोलती, ‘क्या मैं आपको स्कूल में पढ़नेवाली बच्ची दिखती हूँ ? अकसर नीला कपड़ा ही उठा लाते हैं। देखिए, कितने नीले ड्रेस हैं मेरे पास !’

मुकेश ने विदेश में ही अपनी महाविद्यालयीय पढ़ाई पूरी की। इंग्लैंड या स्विट्जरलैंड उसके लिए कोई अपरिचित जगह नहीं है। वह कई बार वहाँ जा चुका है। पिछले चार वर्षों से कह रहा है, पर अभी तक स्केटिंग नहीं सीखी। सच पूछो तो उसने सीखने की कोशिश ही नहीं की। उसे इस खेल में खास दिलचस्पी नहीं है।
उसके पिताजी-राम चरण त्रिवेदी-आम लोगों के बीच ‘त्रिवेदीजी’ के नाम से जाने जाते थे। उसे वे अपना दोस्त समझते थे। उसपर कभी हुक्म नहीं चलाते।
लेकिन सोनिया के घर का माहौल ऐसा नहीं था। कानपुर में पलकर बड़ी हुई। शादी के बाद पहली बार कानपुर से बाहर आई। उसके परिवार का परिवेश धार्मिक था। उसके यहाँ पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन प्रायः चलता ही रहता। वह कूपमंडूक की तरह संकीर्ण वातावरण में बड़ी हुई।

पहली बार इंग्लैंड को देखकर वह दंग रह गई। साथ ही नई स्वतंत्रता पाकर वह हर क्षण आनंद महसूस कर रही थी। जैसे बच्चा नए खिलौने को घूर-घूरकर देखता है, उसी तरह सोनया भी बिना पलक झपकाए हर चीज को देख रही थी।
स्केटिंग के लिए स्विट्जरलैंड प्रख्यात है। स्केटिंग मैदान के सामने बेंच लगे हुए हैं। जिन लोगों को खेलने में रुचि नहीं होती, वे ही अकसर यहाँ आकर बैठते हैं। इसी झुंड में मुकेश भी बैठा था।

चारों ओर हिम की गोलाबारी हो रही थी। बच्चे रंग-बिरंगी टोपियाँ, जैकेट पहने ‘स्नोमैन’ बना रहे थे, बर्फ की गेंद बनाकर एक दूसरे पर उछाल रहे थे। उनकी किलकारियाँ दूर तक सुनाई पड़ रही थीं।
पहाड़ियों पर गिरे हिम को देखकर लग रहा था जैसे चाँदी की परत बिछी हो। सूरज की किरणों से आँखें चौंधिया रही थीं। दूर एक चित्ती जैसी दिखाई देनेवाली वस्तु ने पास आने पर सोनिया का रूप ले लिया। काला, स्वेटर, टोपी तथा जींस पहने सोनिया तेजी से नीचे उतर रही थी। मुकेश उसे गर्व से देख रहा था। कितना अच्छा खेल लेती है ! मुकेश के दिमाग में पिछली बातें याद आईं। शादी के पहले कैसी थी, अब कैसी हो गई है ! जमीन-आसमान का फर्क है।

सोनिया को देखने के लिए मुकेश अपने घरवालों के साथ लखनऊ गया था। सभी लोग बड़े हॉल में बैठे थे। थोड़ी देर बाद सोनिया मेहमानों के लिए चाय लेकर नपे-तुले पैर रखती हुई आई। नाग की तरह उसकी चोटी घुटनों के नीचे तक लटक रही थी। चोटी में जामुनी रंग का पराँदा पहना था। जामुनी रंग की ही सिल्क की साड़ी-ब्लाउज। उसी की मैचिंग की कान की बालियाँ पहन रखी थीं। वह किसी फिल्म अभिनेत्री से कम नहीं लग रही थी।
त्रिवेदीजी, उनकी धर्मपत्नी सुमन और बेटी नीलम-सभी मंत्रमुग्ध होकर सोनिया को देखने लगे। एक ही नजर में सभी ने उसे पसंद कर लिया।

लड़की देखने के उस कार्यक्रम का अंदरूनी संबंध एक पिछली घटना से है। एक बार मुकेश किसी चित्रकला प्रतियोगिता का निर्णायक बनकर लखनऊ गया था। वहाँ सोनिया से इसकी भेंट हुई। पहली नजर में ही मुकेश उसे अपना दिल दे बैठा। सोनिया एक अच्छी कलाकार थी। उसके जैसे चित्र और कोई नहीं बना पाया था। अपने कॉलेज में वही दक्ष थी। चित्र प्रतियोगिता के दिन उसने पुरस्कार तो जीता ही, मुकेश का दिल भी जीत लिया। प्रतियोगिता खत्म होने के पहले ही मुकेश ने सोनिया के बारे में पूरी जानकारी हासिल कर ली थी-इतनी जानकारी कि एक किताब लिखी जा सकती थी।
वह बम्मन गली में रहती है। उसके पिता पुरोहित का काम करते हैं। उनका नाम विद्याचरण शर्मा है। उनकी चार बेटियाँ हैं। यही सबसे छोटी है। अभी शादी नहीं हुई है। बी.ए. पास है। खाना अच्छा बना लेती है, साथ में संगीत का भी ज्ञान है। कत्थक भी जानती है। इतने गुण क्या काफी नहीं हैं ? कानपुर लौटने पर मुकेश ने सबसे पहले अपनी बहन नीलम को बताया कि एक लड़की उसे बेहद पसंद है।
त्रिवेदीजी तक बात पहुँची तो उन्होंने कहा, ‘मेरा बेटा राजी हो गया तो बस, हमें और कुछ नहीं चाहिए।’ इस तरह वधू परीक्षा खत्म हुई।

पंडितजी ने जब जन्मपत्री के बारे में पूछा तो त्रिवेदीजी ने कहा, ‘‘पंडितजी मुझे जन्मपत्री वगैरह में विश्वास नहीं है। मैंने किसी की भी जन्मपत्री नहीं मिलवाई। अपनी बेटी की शादी में भी मैंने जन्मपत्री नहीं देखी। यदि आपको मेरा बेटा योग्य लगे अपनी बेटी दीजिए और यदि आपको कोई शंका हो तो हरगिज मत दीजिए।’

किसी भी कोण से देखने पर मुकेश सुयोग्य ही लग रहा था। लंदन में बी.बी.सी. में काम करता है। त्रिवेदीजी कानपुर के जाने-माने उद्योगपति हैं। ‘मुकेश गारमेंट्स’ का व्यापार विदेश तक फैला हुआ है। इकलौता बेटा है; इकलौती बेटी नीलम की शादी हो चुकी है। सबकुछ तय होने के बाद लखनऊ में बड़े धूमधाम से शादी हुई। तीन दिनों तक समारोह होते रहे।
मुकेश की माँ को तो जवानी-सा जोश चढ़ गया था। इतना उत्साह कि देखनेवाले देखते ही रह गए।
वही सोनिया अब कितनी बदल गई है। दिल से नहीं, केवल वेशभूषा से। उसकी लंबी नागवेणी कटकर अब बॉब का रूप ले चुकी है। छह गज की साड़ियाँ छोड़कर अब वह जींस पहनती है। शुरू-शुरू में थोड़ा संकोच करती थी, पर मुकेश के निरंतर प्रोत्साहन से वह स्केटिंग, ड्राइविंग, स्वीमिंग- सब सीख गई है। वह कुशाग्र बुद्धिवाली है। यह उसका केवल तीसरा स्केटिंग सीजन है। बड़ी निपुणता से स्केट कर रही है। मॉर्डन बन जाने के बाद भी उसने कुछ पुरानी परंपराओं को छोड़ा नहीं है। हर मंगलवार और शुक्रवार को वहाँ मिलने वाले लिली के फूलों से ही वह देवी की पूजा करती है। घर में भगवान् का अलग कक्ष बनाया है।

‘क्यों जी, किस मोहिनी के सपने देख रहे हैं ?’ सोनिया की आवाज सुनकर मुकेश बर्फ की दुनिया में लौट आया। ‘तुम्हारे ही बारे में सोच रहा था।’
स्केटिंग का समय खत्म हो रहा था। लोग नीचे आ रहे थे।
‘मैं कैसे जानूँ कि आप सच बोल रहे हैं ?’
‘दिल के अंदर झाँककर देखो।’
‘ख्वाबों की दुनिया से निकलकर जरा बाहर की दुनिया देखिए, कितनी सुंदर है।’
स्केटिंग रिंग के पास लोग जमा हो रहे थे।
‘होटल जाकर सामान बाँध लें। लंदन में तुम्हारे छोटे से अपार्टमेंट तक पहुँचने में आधा दिन तो लग ही जाएगा।’ कहते हुए मुकेश उठ खड़ा हुआ।
‘प्लीज, एक बार और स्केट कर लूँ !’ अभी नहीं कर पाई तो एक साल तक नहीं कर पाऊंगी।’ सोनिया ने अनुनय भरे स्वर में कहा।

मुकेश अन्य मर्दों जैसा नहीं था। वह खुले दिमागवाला और दिलदार आदमी था। उसे खुश देखकर वह भी खुश होता। उसे खुद स्केटिंग में कोई रुचि नहीं थी, पर पत्नी से उसने ‘हाँ’ कह दिया।
सोनिया हवा के झोंके-सी निकल गई।
इस बार लंबा वीकेंड मिला है-अर्थात् तीन दिनों की छुट्टियाँ। क्रीड़ा-प्रेमी दूर दूर से यहाँ आते हैं। उसी तरह मुकेश और सोनिया भी आए हैं। जब सोनिया स्केट कर रही होती है तो मुकेश नीले आसमान को, घरों की लाल छतों को, सफेद पहाड़ियों को देखता रहता है; प्रकृति के सौंदर्य रस का आस्वादन करता रहता है। कभी-कभी चित्र बनाता है या कुछ लिखता रहता है। बोर होने पर यहाँ-वहाँ घूमने निकल जाता है।

मुकेश बी.बी.सी. में भारतीय संस्कृति और कला विभाग का प्रधान है। यह कोई बड़ा ओहदा तो नहीं है और न ही इस काम में मोटा वेतन मिलता है, पर यह काम मुकेश को बहुत पसंद है। सच तो यह है कि उसे काम करने की जरूरत ही नहीं। उसके पिताजी ने काफी कमा रखा है। फिर भी इस क्षेत्र में उसकी रुचि है और उसे संतोष मिलता है।
त्रिवेदीजी के कारोबार में मुकेश की कोई दिलचस्पी नहीं है। इसके विपरीत उसके बहनोई (नीलम के पति) सतीश को इस कारोबार से बेहद लगाव है। मुकेश की तरह वह विदेश में नहीं बसा है। भारत में ही रहकर अपनी वकालत की प्रैक्टिस करता है और त्रिवेदीजी का हाथ भी बँटाता है।
स्कूली पढ़ाई खत्म होने के बाद मुकेश ने कहा, ‘पिताजी मैं मुंबई के जे.जे. कॉलेज में पढ़ना चाहता हूँ।’
त्रिवेदीजी तुरंत बोले, ‘बेटे, तुम जितना चाहो, जहाँ चाहो, पढ़ो।’
सुमन बीच में बोली, ‘मुन्ना, तुम इतनी दूर मुंबई में ही क्यों पढ़ना चाहते हो ? यहाँ आस-पास कोई अच्छा कॉलेज नहीं है क्या ? यहीं पढ़ाई करोगे तो पिताजी का हाथ बँटा सकोगे।’’

त्रिवेदीजी बोले, ‘‘रहने भी दो, सुमन, उसे मत टोको। स्वच्छंद पंछी की तरह उड़ने दो। कूपमंडूक बने रहना अच्छा नहीं होता। बाहर की दुनिया देखना भी जरूरी है।’
सुमन आगे कुछ नहीं बोली।
मुकेश ने सोचा-लाखों करोड़ों में भी मेरे पिताजी जैसा इनसान नहीं मिल सकता। कितने समझदार और व्यावहारिक हैं।
मुंबई में सुमन ने मुकेश के लिए एक अपार्टमेंट, एक रसोइया, एक कार और एक ड्राइवर का इंतजाम करवा दिया। यह सब देखकर मुकेश बोला, ‘‘माँ, मैं कोई लड़की नहीं हूँ और न ही ससुराल जा रहा हूँ।’
सुमन मुसकराकर रह गई। उसका प्रेम ही वैसा था। निश्छल और निस्स्वार्थ। त्रिवेदीजी तो प्रायः मजाक में कहते रहते कि सुमन की जान तो मुकेश में ही बसी हुई है।
पुरानी यादों को समेटते हुए मुकेश उठ खड़ा हुआ। सोचने लगा, जल्दी घर पहुँचकर पिताजी को फोन करना है। उनसे बातें किए चार-पाँच दिन बीत गए हैं। सोनिया कभी-कभी खिंचाई करते हुए पूछती, ‘माँ-पिताजी से रोज बातें करना जरूरी है क्या ?’

तभी सोनिया ढलान से नीचे उतरती दिखाई दी। मुकेश ने गौर किया कि सोनिया ने अपना संतुलन खो दिया है। उसकी रफ्तार तेज थी। उसे लगा कि सोनिया गिरेगी। अगल-बगल का खयाल किए बिना वह जोर से चिल्लाया, ‘सोनिया, केयरफुल ! गिर जाओगी।’
नरम और धीमी आवाज में बोलनेवाले गोरे लोग उसकी तरफ देखकर तिरस्कार भरी मुसकराहट बिखेरने लगे। मुकेश ने उस ओर ध्यान दिया।
मुकेश ने जैसा अनुमान लगाया था वैसा ही हुआ। सोनिया सीधे पाइक पेड़ से जा टकराई और धड़ाम से गिर गई। दर्द के मारे वह चीखने लगी।
लाठियों की मदद से उसे नीचे लाया गया। दर्द के मारे उसका बुरा हाल हो रहा था। उसके आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।

‘फिलहाल तो हमने प्रथम चिकित्सा कर दी है। आप इन्हें तुरंत अस्पताल ले जाइए।’ वहाँ के मैनेजर ने मुकेश से कहा।
मुकेश ने कार का दरवाजा खोला और सोनिया को अंदर बिठाया।
कार चलाते हुए मुकेश सोच रहा था-हो सकता है कि पेशियाँ खिंच गई हों या पैर में मोच आ गई हो। कार धीमी चलाने पर भी सोनिया कराह रही थी।
कुछ बातचीत करने से दर्द कम हो जाएगा-यह सोचकर मुकेश ने कहा, ‘अब एक हफ्ते तक तुम्हारी क्लास की छुट्टी।’
सोनिया भारतीय कम्यूनिटी हॉल में बच्चों को संगीत खासकर कत्थक सिखाती थी।
‘हाँ। मेरी इस हालत के बारे में कानपुर में अपनी माँजी को फोन मत कर देना, नहीं तो यह कहकर कि मेरे बेटे को खाने की तकलीफ होगी-वो यहीं चली आएँगी।’

सुमन का स्वभाव वह अच्छी तरह जानती थी। सोनिया शादी करके जब घर में पहली बार आई थी तो अपने पति को ‘मुन्ना’ नाम से बुलाया जाना उसे बड़ा अटपटा लगता था। पूछने पर ससुरजी ने बताया, ‘बच्चे जब छोटे थे तब हम लोग दिल्ली में रहते थे। वहाँ सभी इसे ‘मुन्ना’ बोलते थे। वही आदत पड़ गई है।’
सोनिया इस जवाब से संतुष्ट नहीं थी, उसका प्रश्न था कि मुकेश तो ‘मुन्ना’ बना, पर नीलम ‘नीलू’ बनी, ‘मुन्नी’ नहीं। ऐसा क्यों ?
सोनिया को अपने ससुरजी की याद आई। वे बहुत कम बोलते हैं। किसी बात से घबराते नहीं हैं। बहुत शांत स्वभाव के हैं।
अस्पताल में बताया गया कि ‘पेशेंट को पैर में चोट आई है कम से कम एक हफ्ते तक यही रहना पड़ेगा। पेशेंट बाहर कहीं नहीं जा सकता।’
मुकशे ने कहा, ‘सोनिया, तुम्हें आराम की सख्त जरूरत है। पूरी तरह ठीक होने तक यहीं रहो। मैं तुम्हारे क्लासवालों को बता दूँगा।’

मुकेश जब घर पहुँचा तो रात हो गई थी। वह थककर चूर हो गया था। एक हफ्ता घर में अकेले रहना उसको भारी लग रहा था। इस विदेशी दुनिया में यह अकेलापन और भी खलता है।
टेबल पर रखी आंसरिंग मशीन ‘बीप’ दिखा रही थी। रोज की तरह ‘बीप’ बंद करके और आंसरिंग मशीन ‘ऑन’ करके कपड़े बदलने लगा। यह उसका रोज का कार्यक्रम है।
पहला संदेश उसके बॉस डेविड का था। वह बोल रहे थे, ‘म्याक, तुम्हारे लिए दो असाइन्मेंट हैं। उनके बारे में बातें करनी हैं। दो दिनों के बाद फाइनल होगा।’
ऑफिस में मुकेश को ‘म्याक’ नाम से बुलाते थे।

फिलहाल तो अच्छा ही हुआ, मुकेश ने सोचा।
दूसरा संदेश उसकी दीदी का था। रोते हुए उसने कहा था, ‘मुन्ना पिताजी को हार्ट अटैक हुआ है। जल्दी चले आओ।’
नीलू की आवाज वह पहचान गया था। मुकेश के दिल की धड़कन एक क्षण के लिए मानो रुक गई।
तीसरा संदेश, ‘मुन्ना, तुम कहाँ चले गए थे ? जल्दी आओ। पिताजी की तबीयत ठीक नहीं है।’
मुकेश ने अपनी घड़ी देखी। रात के आठ बजे हैं। आज रविवार है। इसका मतलब यह है कि ये संदेश शनिवार को ही आए हैं। पता नहीं पिताजी कैसे होंगे ? उसने तुरंत ट्रैवेल एजेंट को फोन किया, ‘भारत के लिए एक फर्स्ट क्लास टिकट और फिर आगे कानपुर तक।’
मानसिक थकान से मुकेश टूट चुका था। सोनिया अस्पताल में है। बॉस चाहता है कि एक महीने के अंदर-अंदर काम शुरू हो जाना चाहिए, उधर पिताजी की तबीयत सीरियस है।




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