काशी कभी न छोड़िए - श्यामला कांत वर्मा Kashi Kabhi Na Chhodiye - Hindi book by - Shyamla Kant Verma
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काशी कभी न छोड़िए

श्यामला कांत वर्मा

प्रकाशक : ग्रंथ अकादमी प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :164
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5501
आईएसबीएन :81-88267-56-2

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काशी के वर्तमान सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य को उजागर करता एक सामाजिक उपन्यास...

Kashi Kabhi Na Chhodiye

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अब न तो नौटंकियों के प्रति उत्साह रह गया है, न कठपुलती नाटकों के प्रति। मनोरंजन के नए साधनों ने लोक-गीत और लोक-नृत्य की समृद्ध परंपरा को आहत किया है। स्वतंत्रता पूर्व के कई प्रचलित सिक्कों से वर्तमान पीढ़ी अपरिचित हो चुकी है। नये खेलों में पुराने खेलों का स्थान ले लिया है। धर्म और संस्कृति के प्रति भी लोग उदासीन दिखाई पड़ते हैं। न धर्म स्थलों को जानने-पहचानने में रुचि है, न कुंडों और कूपों को—और तो और, धार्मिक एवं सांस्कृतिक नगरी काशी की जनता भी काशी के इन महत्त्वपूर्ण स्थानों से अपरिचित होती जा रही है। देश की विभिन्न समस्याओं को उजागर करने तथा काशी की महिमा का बोध कराने के उद्देश्य से लिखा गया उपन्यास ‘काशी कभी न छोड़िए’ एक महत्त्वपूर्ण कृति है।
साहित्याकार डॉ. श्यामला कांत वर्मा ने व्यक्तिपरक इस सामाजिक उपन्यास में काशी के गौरव को चिन्हित करने  में सफलता अर्जित की है। निश्चत ही वाराणसी  अपने आप में एक लघु हिंदुस्तान है। काशी की गंगा-जमुनी संस्कृति अनुकरणीय है। निश्चय ही इसे पढ़कर पाठकगण काशी के वर्तमान सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य की रोचक व ज्ञानपरक जानकारी प्राप्त कर पाएँगे।

अपनी बात


अब न तो नौटंकियों के प्रति उत्साह दिखाई पड़ता है, न कठपुतली-नृत्य के प्रति। मांगलिक अवसरों और लोकरंजक समारोहों में न तो गवनहारिनें आती हैं, न भाँड़ मंडलियाँ बुलाई जाती हैं। मनोरंजन के नये साधनों ने लोक गीत और लोक-नृत्य की समृद्ध परंपरा को आहत किया है। वर्तमान पीढ़ी को पुराने मनोरंजक कार्यक्रमों से परिचित कराने की कामना मन में जागी। इस कार्य के लिए उपन्यास विधा को स्वीकार किया गया।
प्राचीन सांस्कृतिक नगरी काशी में स्थित मंदिरों, घाटों, कुंडों और वापियों के महत्त्व से भी जन-समुदाय अपरिचित-सा हो गया है। कुंडों के नाम पर बसे मुहल्लों के निवासी भी मुहल्ले की नामकरण की प्रक्रिया से अनभिज्ञ हैं। कुंडों-वापियों के जल का औषधीय-गुण भी अज्ञात-सा हो गया है। इन सबका बोध कराने के लिए एक माध्यम चाहिए था। इस उपन्यास के प्रमुख पात्र सुकांत ने इस दायित्व को बखूबी निभाया है।

आधुनिकता ने अतीत की अनेक वस्तुओं का लोप कर दिया है। सिक्कों को ही ले लीजिए। रुपया और अठन्नी तो प्रचलन में हैं, पर न दमड़ी रह गई, न टुकड़ा; न अधेला, न पैसा और न टका ही। आज की पीढ़ी तो दमड़ी और टुकड़ा का नाम तक नहीं जानती। उसकी क्रय-शक्ति की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है। खेल-कूद और उनके उपकरणों की भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। गुल्ली-डंडा, गोली, पचीसी आदि खेलों से आज का बालक अपरिचित-सा हो गया है। मनोरंजन के साधन के रूप में न तो मेढ़ों की लड़ाई उसने देखी है, न बटेरों की; परंतु सुकांत इन सबसे सुपरिचित है। वह बड़े ही सहज और स्वाभाविक रूप में इन सबकी जानकारी अपने पाठकों को दे रहा है। इस दृष्टि से उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण है।
सुकांत का बचपन अंधविश्वासियों से घिरे लोगों की मनोभावना को उजागर करता है और टोना-टोटका जैसे कुसंस्कारों से मुक्ति दिलाने की प्रेरणा देता है। पूर्वजों के वैभव की कथा और उनकी जीवन-शैली तत्कालीन जमींदारी प्रथा, खान-पान, आचार-विचार, धार्मिक विश्वास आदि का बोध तो कराती ही है, तत्कालीन सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर भी भरपूर प्रकाश डालती है। व्यक्तिपरक उपन्यास यह इसीलिए एक सामाजिक उपन्यास है, जिसका केंद्रीय पात्र है ‘सुकांत’। सुकांत अर्थात् मैं स्वयं।

गृह-संन्यास लेने पर सुकांत ही ‘सुकांत स्वामी’ बन जाता है। उसने अपनी यात्राओं का विशद वर्णन किया है, पर उसका मन काशी में ही रमता है। एक विचारक के रूप में सुकांत स्वामी वर्तमान की सामाजिक बुराइयों—दहेज-प्रथा, बेरोजगारी, लूटपाट, ठगी, अपहरण, बलात्कार अदि—पर चिंतन करते हैं और अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। काशी-प्रेम के कारण ही वे कहते हैं—‘काशी कभी न छोड़िए।’’

अन्य पुरुषात्मक शैली में लिखा गया यह आत्मव्यंजक उपन्यास मेरी अपनी कहानी ही नहीं, हर व्यक्ति की अपनी-अपनी कहानी है। इसे पढ़कर काशी के संबंध में अनेकशः जानकारी प्राप्त की जा सकेगी, ऐसा मेरा विश्वास है।
अब धन्यावद के दो शब्द ! आभारी हूँ उन महानुभवों के प्रति, जिन्होंने मुझे इस उपन्यास को लिखने की प्रेरणा दी। कुल-पुरोहित आचार्य भोलानाथ उपाध्यायजी के प्रति मैं अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। उन्होंने धर्म-स्थलों के संबंध में उठी मेरी सभी जिज्ञासाओं का समाधान किया। श्रेष्ठ विद्वान और भाषाविद् श्री निरंजन कुमार सिंह के प्रति मैं नत-मस्तक हूँ। उन्होंने पांडुलिपि को आद्योपांत देखा और अपने सत्परामर्शों से उसे सँवारा भी। प्रसिद्ध कोशकार और वैयाकरण डॉ. बदरीनाथ कपूर मेरे परम हितैषी हैं। इस कृति के प्रकाशन में अनन्य सहयोग देकर उन्होंने मेरी राह सरल कर दी। उनके सहयोगी भाव के लिए मैं उनका ऋणी हूँ। आत्मज मनोज कुमार वर्मा तथा पौत्र-पौत्री—कुमार मोहित, मनजीत, मयंक, मनीषा और मुक्ता—ने पांडुलिपि की प्रेस-प्रति तैयार करने में विशेष रुचि ली, ततः मैं स्नेहिल आशीर्वाद देकर इन सबके श्रम और समर्पण-भाव की सराहना करता हूँ।
श्यामला कांत वर्मा


एक


एक गंजी खोपड़ी, चौड़ा मस्तक, ऊँची नाक, आँखों पर चश्मा, सामान्य कद-काठी, श्याम वर्ण सुकांत स्वामी ने अपने जीवन के सतहत्तर वर्ष पूरे कर लिये हैं। अब उन्होंने गृह-संन्यास ले लिया है। गृह-संन्यास का अर्थ यह नहीं कि वे घर से बाहर जाते ही नहीं; जाते हैं और आवश्यक कार्य भी करते हैं। उनके अनुसार गृह-संन्यास का अर्थ है—घर में रहते हुए भी संन्यासी जैसा जीवन। न तो सभा-समाज में जाना, न किसी के प्रति द्वेष-भाव।
कुछ लोग कहा करते हैं—

‘‘सुकांत स्वामी अभिमानग्रस्त हैं। वे हम लोगों के बीच बैठना ही नहीं चाहते हैं।’’
उनकी बात का वे बुरा नहीं मानते। चर्चा चलने पर बस इतना ही कहते—‘‘गहि न जात रसना काहू की, कहइ जाहि जो सूझै।’’—हृदय रोग से ग्रस्त व्यक्ति यदि सभा-समाज में जाना बंद कर दे तो यह उसकी विवशता है, न कि अभिमान।
रचनाधर्मी सुकांत स्वामी साहित्य के क्षेत्र में आई गिरावट पर दुःखी दिखाई पड़ते हैं। पचास वर्ष पूर्व की स्थिति का आकलन करते हुए वे कहा करते हैं—
‘‘अब साहित्यकारों में बंधुत्व-भाव का अभाव है। अवसर मिलते ही वे एक-दूसरे की टाँग खींचने लगते हैं। गोष्ठियों में स्तरीय रचनाएँ नहीं पढ़ी जातीं। अखबार में नाम छपवाने और उपाधि तथा अलंकरण के एक-दूसरे को विभूषित करने की ओछी प्रवृत्ति ने साहित्य का स्तर गिरा दिया है। पहले ऐसा नहीं था।’’

सुकांत स्वामी का अधिकतर समय अध्ययन और लेखन में ही व्यतीत हो जाता है। विश्राम की स्थिति में उनका अतीत स्मृति में कौंध उठता है। चलचित्र की तरह अतीत के चित्र आँखों के सामने आते रहते हैं। पूर्वजों से सुनी और स्वयं भोगी गई स्थितियों की खट्टी-मीठी अनुभूतियाँ सुखदायक लगने लगती हैं। प्राचीन सांस्कृतिक नगर वाराणसी में अलमस्त, फक्कड़ भक्त-कवि कबीर दास के नाम पर बसी एक बस्ती है। यहीं पर महादेव बाबू का अपना निवास है।

महादेव बाबू के कोई संतान न थी। उन्होंने अपनी पत्नी दुलारी कुँवर से इस संबंध में बात की। निश्चय हुआ कि महादेव बाबू अपनी बहन सुग्गन देवी को सपरिवार यहीं बुला लें तो सूने घर में रौनक लौट आएगी। ऐसा ही हुआ। सुग्गन देवी का परिवार यहीं आकर बस गया। पारिवारिक सद्भाव का यह एक अद्भुत उदाहरण था। सुग्गन देवी के पति देवीशंकर लाल एक बड़े जमींदार थे। जौनपुर स्थित केराकत में उनका बड़ा दबदबा था। तहसीलदार के पद से वे सेवानिवृत्त हुए थे। महादेव बाबू के सुख के लिए वे केराकत छोड़कर वाराणसी आ गए। संबंधों को मान्यता देने के लिए त्याग आवश्यक होता है। त्याग में ही सुख है। महादेव बाबू और देवाशंकर लाल दोनों ही सुखी थे। महादेव बाबू के भागनेय कालिका प्रसाद पेशे से अध्वक्ता थे। उनकी पत्नी श्यामा देवी ने सुकांत को जन्म दिया। पुत्र-जन्म पर सर्वाधिक प्रसन्न थे—महादेव बाबू और उनकी धर्मपत्नी दुलारी कुँवर। उनके इस घर में लंबे समय के बाद शिशु का प्रथम रुदन-स्वर गूँजा है, अब उसकी किलकारियाँ भी गूँजा करेंगी—वे आह्लादित थे। मंगल गीत गाए गए, मिठाइयाँ बाटी गईं। लगातार बारह दिनों तक गीत-गवनई चलती रही। प्रसन्नता का पारावार न रहा।

बारहवाँ दिन आ पहुँचा। बारहवीं का उत्सव था। शिशु और माँ ने बरही का स्नान किया। पितामह देवीशंकर लाला और पितामही सुग्गन देवी ने प्रजा-जनों को नेग-उपाहर दिए। अतिथिगण उल्लसित थे। ऐसे मांगलिक अवसरों पर गवनहारिनों को बुलाने की प्रथा थी। सुमंगल गीत गाने वाली गवनहारिनों का समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान था। अब गवनहारिनों का लोप हो गया है। वर्तमान भौतिकवादी सभ्यता ने एक अच्छी परंपरा का लोप कर दिया। उस समय वाराणसी में दो गवनहारिनों का वर्चस्व था। अंडा और श्यामा। दोनों को विशेष ख्याति प्राप्त थी। इनका दल जहाँ भी पहुँच जाता था, महफिल जम जाती। श्यामा का सलोना रूप और उसकी स्वर-माधुरी-सभी उसकी ओर आकृष्ट हो उठते। ‘आँसू’ काव्य में कविवर जयशंकर प्रसाद ने ‘श्यामा-ध्वनि सरस रसीली’ का कथन किया है। यह श्यामा-ध्वनि इसी श्यामा गवनहारिन की रही होगी, जो रसीली होने के कारण बड़ी सहजता से सबको मोह लिया करती थी। महादेव बाबू ने श्यामा गवनहारिन को आमंत्रित किया था। अपनी मंडली के साथ वह आई और महफिल जम गई। ढोलक की थाप पर सोहर के बोल गूँज उठे—


‘‘हथवा में लीन्हीं तिल चउरा, डलैया-बेल पातर हो,
बिरना मोहें देहु कँगना, सोहर हम गाउब हो।’’


सोहर, सोहर की लाचारी, देवी-गीत से सारा वातारण गीतमय हो उठा था।
गीत-गवनई के बीच स्वाँग रचने का भी चलन था। मंडली की एक गवनहारिन ने माँ का अभिनय किया तो दूसरी ने बेटी का। बेटी ने रुँधे स्वर में पुकारा—
‘माई रे !’
उत्तर मिला—‘का रे !’
बेटी—‘बिच्छी मरलेस।’
माँ—‘कहँवा ?’

बेटी—‘इहँवा, इहँवा।’—जंघा और पांव पर हाथ रखती है। गाँव का वैद्य बुलाया जाता है। एक युवक आता है। वैद्यक की पढ़ाई पढ़कर अभी हाल ही में उसने वैद्यिकी आरंभ की है। वह उस बेटी का प्रेमी भी है। एकांत में बिच्छू डंक से ग्रस्त प्रेमिका का वह उपचार करता है। बिच्छू ने डंक तो मारा नहीं था—वह तो प्रेमी से मिलने का एक बहाना मात्र था। कराहना बंद हो गया। वैद्य लौट गया और बेटी प्रसन्न मुद्रा में माँ के पास आकर बैठ गई। एक अन्य गवनहारिन ने गाँव की पड़ोसिन की भूमिका का निर्वाह किया। उसने वैद्य के उपचार से संबंधित रहस्य का खुलासा कर दिया। फिर तो सभी स्त्रियाँ ठठाकर हँस पड़ीं। माँ श्यामा देवी द्वारा सुनाए गए इस प्रसंग को याद कर सुकांत स्वामी विचारमग्न हो जाया करते हैं। श्रृंगार-साहित्य में ऐसी अनेक रचनाएँ मिलती हैं जिनमें प्रेमी-प्रेमिका के मिलने के अवसरों की चर्चा की गई है। दूत-दूती प्रसंग, सहेट-स्थल निर्देश तथा अलंकार (हाव) वर्णन पर उनका ध्यान चला जाता है। कभी आर्या-सप्तशती की पंक्तियाँ सामने आ जाती हैं, तो कभी श्रृंगार-शतक की।

मनोरंजन का यह कार्यक्रम समाप्त हुआ। मेहमानों ने गवनहारिनों की प्रशंसा की। सुग्गन देवी और दुलारी कुँवर ने उन्हें विदा दी। पुरुष-वर्ग रात्रि के उल्लासपूर्ण कार्यक्रमों को सफल बनाने में जुट गया। घर के सामने खुला मैदान था मैदान के एक भाग में हलवाई पकवान बनाने में जुटे थे। इसी भाग में रात्रिभोज की व्यवस्था थी। दूसरे भाग में विशाल मंडप सजाया गया था। मंडप के पूर्वी भाग में मंच बनाया गया था। मंच पर प्रसिद्ध भाँड़ मुकुंदीलाल को अपना कार्यक्रम प्रस्तुत करना था। मंडप में बैठे लोगों को भाँड़-मंडली के आगमन की प्रतीक्षा थी। मंडली आ पहुँची। मंच पर उपस्थित होकर भाँड़ों ने अपनी साज-सज्जा ठीक की। मुकुंदी भाँड़ ने घोड़ा छोड़ा—‘‘घोड़े हैं, बछड़े हैं...’’
घोड़े पर सवार व्यक्ति की भाँति उछलते हुए उन्होंने मंच की परिक्रमा की। प्रारंभ होनेवाले प्रहसन की भूमिका उपस्थित की गई और प्रहसन प्रारंभ हुआ। दर्शक-वर्ग हँसी से लोट-पोट हो उठा। सभी आगंतुक आनंदमग्न थे।

भाँड़ नृत्य की इस परंपरा का भी अब लोप हो चुका है। मनोरंजन के नए साधन पारंपरिक लोकरंजक समारोहों में आधिपत्य जमाते चले जा रहे हैं। इससे लोक-गीत और लोक-नृत्य की समृद्ध-परंपरा आहत हुई है। अब न तो नौटंकी के प्रति उत्साह रहा, न कठपुतली नृत्य के प्रति आकर्षण। कभी-कभी किसी रईस के घर आयोजित कार्यक्रमों में नर्तकियों के नृत्य देखने को मिल जाते हैं और तब वृद्धजन कह उठते हैं, ‘‘चलो, कुछ तो बचा हुआ है, वरना आरकेस्ट्रा और डी.जे. की धमा-कड़ी ने तो सबके ऊपर परदा डाल दिया है।’’

अतिथियों ने छककर भोजन किया। टहलुआ-वर्ग ने नेग-न्योछावर के लिए महादेव बाबू और देवीशंकर लाल का घेराव किया। प्रसन्न भाव से इन लोगों ने नेग-उपहार दिए। बरही का यह उत्सव उल्लासपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ।
अगला दिन हिसाब चुकता करने का था। एक-एक कर लोग आते गए। महादेव बाबू ने सबका प्राप्तव्य अदा किया। दुलारी कुँवर ने नास्ते की मेज पर तली मछली और कलेजी रख दी। महादेव बाबू सामिष भोजन और मदिरा में रुचि रखते थे। वे माँ काली के उपासक थे। काली माँ को वे नित्य मदिरा अर्पित करते और फिर स्वयं उसे प्रसाद रूप में ग्रहण कर लेते। उस दिन भी उन्होंने प्रसाद ग्रहण किया तत्पश्चात् दुलारी कुँवर ने नवजात शिशु को उनकी गोद में डाल दिया। अति क्षीणकाय यह श्यामवर्ण शिशु स्वस्थ चूहे जैसा दिखाई पड़ रहा था। महादेव बाबू के मुख से स्वभावतः निकल पड़ा—
‘‘माँ काली, इसकी रक्षा करें। इतना दुर्बल बच्चा !’’ उन्होंने उसका मुख चूम लिया।

माँ काली का मंदिर घर के पार्श्व में ही है। महादेव बाबू और देवीशंकर लाल का परिवार तो माँ का भक्त है ही, मुहल्ले को लोगों की भी देवी में गहरी आस्था है। मंदिर का निर्माण महादेव बाबू के पिता बिशुन प्रसाद ने कराया था। मंदिर के एक भाग में माँ काली की खड़ी प्रतिमा और कालभैरव की मूर्ति है तथा दूसरे भाग के मध्य में शिवलिंग है। शिवलिंग के चातुर्दिक अन्य-देवी-देवता—पार्वती, गणेश, नंदी, सूर्य, हनुमान, लक्ष्मी-नारायण की युगल मूर्ति-स्थापित हैं। दोनों भाग के बीच में एक पीपल का वृक्ष है।

माँ काली के प्रति दृढ़ आस्था का ही परिणाम था कि देवीशंकर लाल के दो बेटों का नाम कालिका प्रसाद और विंध्यावासिनी प्रसाद रखा गया। प्यार से लोग उन्हें लाल बाबू और कुँवर बाबू कहा करते थे।
मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए पुजारी नियुक्त थे। सवेरे-सवेरे ही वे आते थे और विधिवत् पूजा तथा आरती होती। आरती के समय परिवार के सभी लोग उपस्थित रहते। चुँदरी पहनाई गई। हलुआ, रोट, नारियल, दही, चना और बतासे का भोग अर्पित किया गया। जातक के स्वास्थ एवं दीर्घायु होने की कामना की गई। देवी का गीत गाया गया—‘अंबे गरज रहीं पर्वत पर, माला लिये खड़ा माली।’ अपने पिता और मामा के साथ कालिका प्रसाद वहाँ आए। दुलारी कुँवर भी वहाँ उपस्थित थीं। शिशु के नाम पर विचार हुआ। महादेव बाबू ने कहा श्यामला’ नाम कैसा रहेगा ? राशि का नाम तो सुकांत ही है। सभी ने सहमति व्यक्ति की। जातक को नाम मिल गया।

दुर्बल शिशु को स्वस्थ शिशु के रूप में देखने की लालसा बनी हुई थी। माँ का दूध भरपूर मिलता रहे, इसका पूरा ध्यान रखा जाता था। माँ श्यामा देवी उसे आँचल में छिपाकर दूध पिलातीं। परिवार के सभी सदस्यों का प्यार-दुलार सुकांत को प्राप्त था। पितामही सुग्गन देवी चुटकी बजा-बजाकर उसे गीत सुनातीं। दुलारी कुँवर का तो वह पालित पुत्र था ही। बड़े भाई कमलाकांत स्वयं ही तीन वर्ष के थे। तीन वर्ष का यह बालक शिशु को बार-बार चुमकारता-पुचकारता और उसे गोद में उठाने के लिए ललकता। महादेव बाबू उसे गोद में चिपकाए हुए बाहर ले जाते। कभी बालक रो उठता तो कभी मुस्काने लगता। ऐसे ही स्नेहपूर्ण वातावरण में वह पलता-बढ़ता रहा।

छह माह का समय बीत चला। अन्नप्राशन संस्कार संपन्न हुआ। चांदी की कटोरी में चाँदी के चम्मच से दूध-भात खिलाया अर्थात् चटाया गया। छह माह का बालक खा तो पाता नहीं, चाट अवश्य लेता है। इसी आधार पर अन्नप्रशन को ‘चटावन’ भी कहते हैं। महादेव बाबू को इसी दिन की प्रतीक्षा थी। नाश्ता और भोजन के समय उनका लाडला सुकांत उसके पास ही आ जाता। दुलारी कुँवर उसे गोद में बैठाए रहतीं। महादेव बाबू कभी कलेजी में लगा मसाला चटा देते तो कभी मदिरा का एक बूँद। सुकांत मुँह बिचका देता और तब महादेव बाबू खिलखिलाकर हँसने लगते। उन्हें प्यार भरी झिड़की सुनने को मिलती और फिर दुलारी कुँवर बच्चे से पूँछतीं—
‘बाबा बुरे हैं न !’
बच्चा कहता—‘हूँ।’
दो
मनोरंजन के अनेक साधनों में एक साधन है—‘बतकही’। पचहत्तर वर्ष पूर्व अर्थात् 1930 से 40 के दशक में न तो रेडियो और टी.वी. का प्रचनल था, न सी.डी., कैसेट आदि का। किसी-किसी घर में ग्रामोफोन के तवे पर गीत सुने जाते थे। कला के प्रति प्रेम था। हारमोनियम और तबला बजाकर लोग अपना मनोरंजन करते और कला की उपासना भी। वृद्धजन हुक्का गुड़गुड़ाते और समवयस्कों के साथ ‘बतकही’ में रमे रहते। युवा-वर्ग ताश, शतरंज या अन्य खेलों से मन बहलाता। महिलाएं गीत गवनई करतीं, पचीसी खेलतीं या फिर बतरस का आनंद लेती रहतीं। चारों ओर खुशहाली थी मनोरंजन के साधनों का अभाव खलता नहीं था।
‘बतकही’ दो प्रकार की होती है। एक प्रकार की ‘बतकही’ में बात करने वाले लोग होते हैं और तर्क-वितर्क के रूप में बातचीत चलती रहती है। दूसरे प्रकार की ‘बतकही’ एक प्रमुख वार्ताकार होता है। अन्य लोग श्रोता के रूप में उसके द्वारा कही गई बातों को सुनते हैं। वार्त्ताकार किसी तथ्य या घटना की जानकारी रोचक शैली में देता है। श्रोता अपनी जिज्ञासा के अनुरूप प्रश्न करता है। ऐसी ‘बतकही’ में रोचकता अधिक रहती है और कई लोगों की भागीदारी भी हो जाती है। रोचकता की दृष्टि से इस प्रकार की ‘बतकही’ कहानी की भाँति ही व्यक्ति का मनोरंजन करती है।
सुकांत स्वामी ने दादी दुलारी कुँवर से कहा, ‘‘दादी, मेरे बचपन की कुछ रोचक घटनाएँ सुनाइए।’’
सुकांत का प्रस्ताव सुनकर दादी ने ‘बतकही’ आरंभ की—
‘‘तुम दो वर्ष की अवस्था में चल लेते थे, पर तुम्हारे ललाट पर चमक न थी। बाल-सुलभ चपलता का भी अभाव था। शरीर के कुछ अंगों पर सिलवटें पड़ी हुई थीं। घर के सभी लोग चिंतित थे।’’
सुकांत—‘‘चिंतित क्यों थे, दादी ?’’
दादी—‘‘नाइन तेल-मालिश के लिए आती थी। उसने अपने अनुभव के आधार पर सूचित किया, बच्चा सूखा रोग से ग्रस्त है। सूखा रोग की बात सुनते ही सबको काठ मार गया। मुहल्ले-टोले के लोगों की सलाह ली गई। टोना-टोटका में विश्वास रखनेवालों ने राय दी—तराजू के एक पलड़े पर बच्चे को बैठा दो और दूसरे पलड़े पर गोबर रखकर उसे तौल दो। जब दोनों पलड़े समतल स्थिति में आ जाएँ तब गोबर और बच्चे को उतार लो। इस गोबर को गड्ढे में डालकर उसे मिट्टी से ढंक दो। लगातार तीन मंगलवार को ऐसा करने से रोग दूर हो जाएगा। उनकी बात मान ली गई और ऐसा ही किया गया।’’
सुकांत—‘‘तो क्या ऐसा करने से रोग दूर हो गया ?’’
दादी—‘‘‘नहीं रे ! रोग-दोष कुछ भी दूर नहीं हुआ। न खाया देह लगता था, न तेल-उबटन।’’
सुकांत—‘‘फिर क्या हुआ दादी ?’’



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