श्रीराम विवाह - श्रीरामकिंकर जी महाराज Sriram Vivah - Hindi book by - Sriramkinkar Ji Maharaj
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आचार्य श्रीराम किंकर जी >> श्रीराम विवाह

श्रीराम विवाह

श्रीरामकिंकर जी महाराज

प्रकाशक : रामायणम् ट्रस्ट प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :193
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5515
आईएसबीएन :0000000

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विवाह का प्रमुख देवता काम है। पर आज काम राम का विरोधी न रहकर सहयोगी

Shri Ram Vivah

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

।। श्री राम: शरणं मम ।।

अनुवचन

विवाह प्रसंग तो श्रृंगार रस एवं माधुर्य का प्रसंग है। संसार के विवाह और श्रीराम के मंगलमय विवाह में अंतर क्या है ? यह विवाह केवल बहिरंग नहीं, इसकी विलक्षणता यही है कि वस्तुएँ जहाँ व्यक्ति को भीतर से बाहर की ओर ले जाती हैं, यह जो भगवद्-रस है, वह व्यक्ति को बाहर से भीतर की ओर ले जाता है। और बाहर से भीतर जाना जीवन में परम आवश्यक है। व्यवहार में भी आप देखते हैं, अनुभव करते हैं, जब तीव्र गर्मी पड़ने लगे, धूप हो तो आप क्या करते हैं ? बाहर से भीतर चले जाते हैं। वर्षा में भी आप बाहर से भीतर चले जाते हैं, अर्थात् बाहर चाहे वर्षा या धूप हो, घर में तो आप सुरक्षित हैं।

इसी प्रकार से जीवन में भी कभी वासना के बादल बरसने लगते हैं, क्रोध की धूप व्यक्ति को संतप्त करने लगती है, मनोनुकूल घटनाएँ नहीं घटती हैं, ऐसे समय में अगर हम अंतर्जगत् में, भाव राज्य में प्रविष्ट हो सकें तो एक दिव्य शीतलता, प्रेम और आनंद की अनुभूति होगी। भगवान् श्री सीतारामजी के विवाह को हम अन्तर्हृदय में देखें, ध्यान करें, लीला में स्वयं सम्मिलित हों, इस विवाह का उद्देश्य है। यहाँ घटनाएँ केवल मनोरंजन प्रधान नहीं, सांसारिक व्यवहार की अपेक्षा मनस्तत्त्व की प्रधानता है पर यहाँ मन, बुद्धि, चित्त के द्वारा हम परमात्मा का साक्षात्कार कर सकते हैं।
गोस्वामीजी ने वर्णन किया है कि विवाह को ज्ञानियों ने किस दृष्टि से देखा, योगियों ने क्या अर्थ लिया ? भक्तों ने इसमें कैसा परमानंद पाया ? और उन्होंने दो कथित विरोधी काम और राम में विलक्षण समन्वय तब बैठाया, जब विवाह मंडप में दोनों को एक साथ प्रस्तुत किया। विवाह का प्रमुख देवता ‘काम’ है। पर आज काम राम का विरोधी न रहकर सहयोगी बन गया।

मानस-मनीषी युगतुलसी का कथन है कि ‘‘श्रीराम विवाह’’ के द्वारा मन के तीनों विकारों काम, क्रोध एवं लोभ से उत्पन्न समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया गया है।
बहुत दिनों से यह ग्रन्थ अनुपलब्ध था, भक्त और रसिकों की निरन्तर माँग बनी हुई थी। सुनिश्चित ही श्रीसीतारामजी के विवाह का प्रसंग प्रेमियों के अंतर्जीवन में आनन्द और मंगल की सृष्टि करेगा।

सद्गुण सम्पन्न श्री गणात्रा दंपति बहुत अच्छे साधक हैं, उनके स्वभाव की तेजस्विता और सेवा में अधीरता प्रभु से जुड़कर उनके लिये भूषण बन गयी है। श्रीमती अंजुजी की श्रद्धा, समर्पणभाव जो मैंने अनुभव किया वह दुर्लभ है।
सत्साहित्य प्रकाशन में उनकी यह सेवा असंख्य भक्तों के लिये प्रेरणारूप रहेगी। उनके स्वर्गीय माता-पिता उनकी मातृ-पितृ एवं गुरुभक्ति देखकर अवश्य आश्वस्त एवं प्रसन्न होंगे। समर्पण गणात्रा परिवार के प्रति मंगलकामना करते हुए प्रभु से प्रार्थना ! उनके जीवन में शुचिता, सुमधुरता एवं सुमति बनाये रखें।
निष्ठा एवं समर्पण भाव से कार्यरत डॉ. चन्द्रशेखर तिवारी इस सत्संकल्प को साकार करने में मन-प्राण से लगे हुए हैं। उनकी श्रद्धा बलवती हो ! यही शुभाशीष।

रामायणम् ट्रस्ट के ट्रस्टीगण को मैं क्या धन्यवाद दूँ ! वे तो मेरे अपने हैं। उनका स्नेह सद्भाव सदैव बना रहे यही प्रभु के चरणों में निवेदन !
अन्य सभी सेवादार एवं नरेन्द्र शुक्ल जिन के अथक परिश्रम से यह ग्रन्थ आप सभी सुधी साधकों को समर्पित है।
प्रभु की सुगंध, प्रभु का सौरभ प्रभु का स्पन्दन सबके जीवन में हो, यही मंगलकामना है।

त्वदीयं वस्तु श्रीराम तुभ्यमेव समर्पये।

सादर,
परम पूज्य महाराजश्री रामकिंकर जी की ओर से

मन्दाकिनी श्रीरामकिंककरजी

।। श्री राम: शरणं मम ।।


गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः।
हृदय विराजत रामसिय और दास हनुमान।
ऐसे श्री गुरुदेव को बारम्बार प्रणाम।।


रामचरितमानस के प्रति प्रेम और आस्था के संस्कार हमारे परिवार में ऐसे दादा श्री विट्ठलदास बालजी गणात्रा से मिला। पर मानस को रक्त में मिलाकर जीवन को अमृतमय बनाने का कार्य मेरे परम पूज्य सद्गुरुदेव रामायण वाणी के पर्याय श्रीरामकिंकरजी महाराज ने किया।

परम पूज्य श्री रामकिंकर महाराज का एक ग्रन्थ पढ़ते ही मुझे लगा कि जो मेरे पास नहीं है वह मानो मिल गया, अन्धकार से प्रकाश हो गया, घुटन के बाद हवा मिल गयी और संसार से विष के बदले अमृत मिलने लगा। सबसे पहले मैंने उनको लंदन से मुम्बई आकर ‘‘बिरला मातुश्री सभागृह’’ में अपने बड़े भाई के साथ सुना। ऐसा सुदर्शन उनका दर्शन, ऐसा अमृतमय उनका वचन, ऐसी गम्भीर उनकी वाणी, अद्वितीय प्रस्तुतीकरण उस समय मुझे वे ही वे दिख रहे थे। हम जिस होटल में ठहरे थे, कृपापूर्वक हम लोगों के कहने पर वे वहाँ पर पधारे और हमने उन्हें हनुमानचालीसा, नवधा-भक्ति तथा श्रीमद्भगवद्गीता का बारहवाँ अध्याय ‘‘भक्ति योग्य’’ सुनाया।

कुछ वर्षों तक ऐसे ही भारत आना-जाना लगा रहा, मैं भारत केवल महाराजश्री को ही सुनने आता था। मेरे और मेरी पत्नी अंजू के विशेष आग्रह पर उन्होंने ऐसी कृपा की कि एक महीने के लिए लन्दन आये और चौदह या पन्द्रह प्रवचन किये। वहां जिज्ञासुओं ने उस अवसर पर पूरा लाभ उठाया। लन्दन के निवासियों के लिए वह स्मृति अविस्मरणीय हो गयी। महाराजश्री की पुस्तकों में व्यक्ति के जीवन, चिन्तन और दिशा बदलने की अभूतपूर्व सामर्थ्य है। भारत मूल का होने के नाते मुझे यहां की भूमि बहुत आकर्षित करती है, और उस आकर्षण का मूल कारण केवल यह है कि जहाँ प्रभु श्रीराम ने अवतार लिया, जहाँ पर गंगा और सरयू का तट और जिस भूमि पर एक ऐसे महापुरुष ने जन्म लिया जो मन, वचन और कर्म से राममय थे और राममय हो गये। उनकी कृपामूर्ति का दर्शन कर जैसे आज के समय में हम लोग गोस्वामी तुलसीदास महाराज की स्मृति करते हैं उसी तरह आज के हजारों वर्ष तक लोग परम पूज्य श्रीरामकिंकरजी महाराज के दर्शन और उनके अमृतमय साहित्य को पढ़कर अपने जीवन में मार्गदर्शन प्राप्त करते रहेंगे।

आज मनुष्य को जिस वस्तु की जरूरत है, वह है स्वस्थ चिन्तन और पवित्र दिशा। इसके अभाव में व्यक्ति कितना भी विकास क्यों न करे, उसको विकास नहीं माना जा सकता। रामायण ट्रस्ट को पूज्य महाराजश्री का यह वरदान प्राप्त है कि वह उनके चिन्तन को प्रसारित व प्रचारित करने के लिये अधिकृत है। मेरा यह मानना है कि जितनी भगवान् श्रीराम के नाम की महिमा है, उतनी ही महिमा परम पूज्य महाराजश्री के साहित्य की है क्योंकि दोनों ही भगवान के शब्दमय विग्रह हैं।
रामायणम् ट्रस्ट की अध्यक्ष श्रद्धेय मन्दाकिनी श्रीरामकिंकरजी एवं सभी ट्रस्टियों का मैं आभारी हूँ कि जिन्होंने मुझे इस सेवा का अवसर दिया और भविष्य में भी यही भावना है कि ऐसी सेवा मैं करता रहूं। आमतौर पर माना यह जाता है कि बड़े सत्कर्मों के परिणामस्वरूप सम्भव होता है जब गुरु कृपा होती है, पर मेरा मानना यह है कि मेरा तो कोई भी कर्म ऐसा नहीं है जिसके फलस्वरूप मुझे ऐसे अवतार पुरुष की कृपा प्राप्त होती, यह तो उनकी अहैतुकी कृपा ही थी कि वे बिना कारण ही मुझ पर कृपा करते थे और करते हैं।
अपनी पूज्य माताजी और पूज्य पिताजी की पुण्य स्मृति में यह सेवा करके मुझे जीवन में धन्यता का अनुभव हो रहा है।

श्री गुरुदेव का चरण सेवक,
अरुण गोर्धनदास गणात्रा और
अंजू अरुण गणात्रा, लन्दन

।। श्री राम: शरणं मम ।।


महाराजश्री : एक परिचय



प्रभु की कृपा और प्रभु की वाणी का यदि कोई सार्थक पर्यायवाची शब्द ढूँढ़ा जाय, तो वह हैं- प्रज्ञापुरुष, भक्तितत्त्व द्रष्टा, सन्त प्रवर, ‘परमपूज्य महाराजश्री रामकिंकर उपाध्याय’। अपनी अमृतमयी, धीर, गम्भीर-वाणी-माधुर्य द्वारा भक्ति-रसाभिलाषी-चातकों को, जनसाधारण एवं बुद्धिजीवियों को, नानापुराण- निगमागम, षट्शास्त्र, वेदों का दिव्य रसपान कराकर रससिक्त करते हुए, प्रतिपल निज व्यक्तित्व व चरित्र में रामचरित मानस के ब्रह्मराम की कृपामयी विभूति एवं दिव्यलीला का भावात्मक साक्षात्कार कराने वाले पूज्य महाराजश्री, आधुनिक युग के परम तेजस्वी मनीषी, मनस के अद्भुद शिल्पकार, रामकथा के अद्वितीय अधिकारी व्याख्याकार हैं।

भक्त-हृदय, रामानुरागी पूज्य महाराजश्री ने अपने अनवरत अध्यवसाय से श्रीरामचरितमानस की मर्मस्पर्शी भावभागीरथी बहाकर अखिल विश्व को अनुप्राणित कर दिया है। आपने शास्त्रदर्शन, मानस के अध्ययन के लिए जो नवीन दृष्टि और दिशा प्रदान की है वह इस युग की तरफ की एक दुर्लभ अद्वितीय उपलब्धि है-


धेनवः सन्तु पन्थानः दोग्धा हुलसिनन्दनः
दिव्यराम-कथा दुग्धं प्रस्तोता रामकिंकरः।।


जैसे पूज्य महाराजश्री का अनूठा भाव दर्शन है, वैसे ही उनका जीवन-दर्शन अपने आपमें एक सम्पूर्ण काव्य है। आपके नामकरण में ही श्रीहनुमानजी की प्रतिच्छाया दर्शित होती है। वैसे ही आपके जन्म की गाथा में ईश्वर कारण प्रकट होता है। आपका जन्म 1 नवम्बर सन् 1924 को जबलपुर (मध्यप्रदेश) में हुआ। आपके पूर्वज मिर्जापुर के बरैनी नामक गाँव के निवासी थे। आपकी माता परमभक्तिमयी श्रीधनेसरा देवी एवं पिता पूज्य श्री शिवनायक उपाध्यायजी रामायण के सुविज्ञ व्याख्याकार एवं हनुमानजी महाराज के परम भक्त थे। ऐसी मान्यता है कि श्री हनुमानजी के प्रति उनके सम्पूर्ण एवं अविचल भक्तिभाव के कारण उनकी बढ़ती अवस्था में श्री हनुमन्तयंती के ठीक सातवें दिन उन्हें एक विलक्षण प्रतिभायुक्त पुत्ररत्न की प्राप्ति दैवीकृपा से हुई। इसलिए उनका नाम ‘रामकिंकर’ अथवा राम सेवक रखा गया।

जन्म से होनहार व प्रखर बुद्धि के आप स्वामी रहे हैं। आपकी शिक्षा-दीक्षा जबलपुर व काशी में हुई। स्वभाव से ही अत्यन्त संकोची एवं शान्त प्रकृति के बालक रामकिंकर अपने उम्र के बच्चों की अपेक्षा अधिक गम्भीर थे। एकान्तप्रिय, चिन्तनरत, विलक्षण प्रतिभा वाले सरल बालक अपनी शाला में अध्यापकों के भी अत्यन्त प्रिय पात्र थे। बाल्यावस्था से ही आपकी मेधाशक्ति इतनी विकसित थी कि क्लिष्ट एवं गम्भीर लेखन, देश-विदेश का विशद साहित्य अल्पकालीन अध्ययन में ही आपके स्मृति पटल पर अमिट रूप से अंकित हो जाता था। प्रारम्भ से ही पृष्ठभूमि के रूप में माता-पिता के धार्मिक विचार एवं संस्कारों का प्रभाव आप पर पड़ा, परन्तु परम्परानुसार पिता के अनुगामी वक्ता बनने का न तो कोई संकल्प था, न कोई अभिरुचि।

पर कालान्तर में विद्यार्थी जीवन में पूज्य महाराजश्री के साथ एक ऐसी चामत्कारिक घटना हुई जिसके फलस्वरूप आपके जीवन ने एक नया मोड़ ले लिया। 18 वर्ष की अल्पआयु में जब पूज्य महाराजश्री अध्ययनरत थे, तब अपने कुल देवता श्री हनुमानजी महाराज का आपको अलौकिक स्वप्न दर्शन हुआ जिसमें उन्होंने आपको वट वृक्ष के नीचे शुभासीन करके दिव्य तिलक का आशीर्वाद देकर कथा सुनाने का आदेश दिया। स्थूल रुप में इस समय आप विलासपुर में अपने पूज्य पिता के साथ छुट्टियां मना रहे थे। जहाँ पिताश्री की कथा चल रही थी। ईश्वर संकल्पानुसार परिस्थिति भी अचानक कुछ ऐसी बन गयी कि अनायास ही पूज्य महाराजश्री के श्रीमुख से भी पिताजी के स्थान पर कथा कहने का प्रस्ताव एकाएक निकल गया।

आपके द्वारा श्रोता समाज के सम्मुख यह प्रथम भाव-प्रस्तुति थी, किन्तु कथन व शैली वैचारिक श्रृंखला कुछ ऐसी मनोहर बनी कि श्रोतासमाज विमुग्ध होकर, तन-मन व सुध-बुध खोकर उनमें अनायास ही बँध गया। आप तो रामरस की भावमाधुरी की बानगी बनाकर, वाणी का जादू करके मौन थे, किन्तु श्रोतासमाज आनन्दमयी होने पर भी अतृप्त था। इस प्रकार प्रथम प्रवचन से ही मानस प्रेमियों के अन्तर में गहरे पैठकर आपने अभिन्नता स्थापित कर ली।

ऐसा भी कहा जाता है कि बीस वर्ष की अल्पायु में आपने एक और स्वप्न देखा, जिसकी प्रेरणा से गोस्वामी तुलसीदास के ग्रन्थों के प्राचार एवं उनकी खोजपूर्ण व्याख्या में ही अपना समस्त जीवन समर्पित कर देने का दृढ़ संकल्प कर लिया। यह बात अकाट्य है कि प्रभु की प्रेरणा और संकल्प से जिस कार्य का शुभारम्भ होता है, वह मानवीय स्तर से कुछ अलग ही गति-प्रगति वाला होता है। शैली की नवीनता व चिन्तनप्रधान विचारधारा के फलस्वरूप आप शीघ्र ही विशिष्टतः आध्यात्मिक जगत् में अत्यधिक लोकप्रिय हो गये।

ज्ञान-विज्ञान के पथ में पूज्यपाद महाराजश्री की जितनी गहरी पैठ थी, उतना ही प्रबल पक्ष, भक्ति साधना का, उनके जीवन में दर्शित होता है। वैसे तो अपने संकोची स्वभाव के कारण उन्होंने अपने जीवन की दिव्य अनुभूतियों का रहस्योद्घाटन अपने श्रीमुख से बहुत आग्रह के बावजूद नहीं किया, पर कही-कहीं उनके जीवन के इस पक्ष की पुष्टि दूसरों के द्वारा जहाँ-तहाँ प्राप्त होती रही। उसी क्रम में उत्तराखण्ड की दिव्यभूमि ‘ऋषिकेश’ में श्रीहनुमाजी महाराज का प्रत्यक्ष साक्षात्कार, निष्काम भाव से किये गये एक छोटे से अनुष्ठान के फलस्वरूप हुआ !! वैसे ही श्री चित्रकूट धाम की दिव्यभूमि में अनेकानेक अलौकिक घटनाएँ परमपूज्य महाराजश्री के साथ घटित हुईं जिसका वर्णन महाराजश्री के निकटस्थ भक्तों के द्वारा सुनने को मिला !! परमपूज्य महाराजश्री अपने स्वभाव के अनुकूल ही इस विषय में सदैव मौन रहे।

प्रारम्भ में भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाभूमि वृन्दावन धाम के परमपूज्य महाराज, ब्रह्मलीन स्वामी श्रीअखण्डानन्दजी महाराज के आदेश पर आप कहाँ कथा सुनाने गए। वहाँ एक सप्ताह तक रहने का संकल्प था। पर यहाँ के भक्त एवं साधु-सन्त समाज में आप इतने लोकप्रिय हुए कि उस तीर्थधाम ने आपको ग्यारह माह तक रोक लिया। उन्हीं दिनों मैं आपको वहाँ के महान सन्त अवधूत श्री उड़िया बाबाजी महाराज भक्त शिरोमणि श्रीहरिबाबाजी महाराज, स्वामी श्रीअखण्डानन्दजी महाराज को भी कथा सुनाने का सौभाग्य मिला। कहा जाता है कि अवधूत पूज्य श्रीउड़िया बाबा, इस होनबार बालक के श्री मुख से निःसृत, विस्मित कर देने वाली वाणी से इतने अधिक प्रभावित थे कि यह मानते थे कि यह किसी पुरुषार्थ या प्रतिभा का परिणाम न होकर के शुद्ध भगत्वकृपा का प्रसाद है। उनके शब्दों में- ‘‘क्या तुम समझते हो, कि यह बालक बोल रहा है ? इसके माध्यम से तो साक्षात् ईश्वरीय वाणी का अवतरण हुआ है।’’

इसी बीच अवधूत श्रीउड़िया बाबा से संन्यास दीक्षा ग्रहण करने का संकल्प आपके हृदय में उदित और परमपूज्य बाबा के समाज के समक्ष अपनी इच्छा प्रकट करने पर बाबा के द्वारा लोक एवं समाज के कल्याण हेतु शुद्ध संन्यास वृत्ति से जनमानस सेवा की आज्ञा मिली।

सन्त आदेशानुसार एवं ईश्वरीय संकल्पानुसार मानस प्रचार-प्रसार की सेवा दिन-प्रतिदिन चारों दिशाओं में व्यापक होती गई। उसी बीच काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से आपका सम्पर्क हुआ। काशी में प्रवचन चल रहा था। उस गोष्ठी में एक दिन भारतीय पुरातत्त्व और साहित्य के प्रकाण्ड विद्वान एवं चिन्तन श्री वासुदेव शरण अग्रवाल आपकी कथा सुनने के लिए आए और आपकी विलक्षण एवं नवीन चिन्तन शैली से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने काशी हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति श्री वेणीशंकर झा एवं रजिस्ट्रार श्री शिवनन्दनजी दर से Prodigious (विलक्षण प्रतिभायुक्त) प्रवक्ता के प्रवचन का आयोजन विश्वविद्यालय प्रांगण में रखने का आग्रह किया। आपकी विद्वत्ता इन विद्वानों के मनोमस्तिष्क को ऐसे उद्वेलित कर गई कि आपको अगले वर्ष से ‘विजिटिंग प्रोफेसर’ के नाते काशी हिन्दू विश्वविद्यलय व्याख्यान देने के लिए निमंत्रित किया गया। इसी प्रकार काशी में आपका अनेक सुप्रसिद्ध साहित्यकार जैसे श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी, श्री महादेवी वर्मा से साक्षात्कार हुआ एवं शीर्षस्थ सन्तप्रवर का सन्निध्य प्राप्त हुआ।

अतः पूज्य महाराजश्री परम्परागत कथावाचक नहीं हैं, क्योंकि कथा उनका साध्य नहीं, साधना है। उनका उद्देश्य है भारतीय जीवन पद्धति की समग्र खोज अर्थात भारतीय मानस का साक्षात्कार। उन्होंने अपने विवेक प्रदीप्त खोज अर्थात भारतीय मानस का साक्षात्कार। उन्होंने अपने विवेक प्रदीप्त मस्तिष्क से, विशाल परिकल्पना से श्री रामचरितमानस के अन्तर्रहस्यों का उद्घाटन किया है। आपने जो अभूतपूर्व एवं अनूठी दिव्य दृष्टि प्रदान की है, जो भक्ति-ज्ञान का विश्लेषण तथा समन्वय, शब्द ब्रह्म के माध्यम से विश्व के सम्मुख रखा है, उस प्रकाश स्तम्भ के दिग्दर्शन में आज सारे इष्ट मार्ग आलोकित हो रहे हैं ! आपके अनुपम शास्त्रीय पाण्डित्य द्वारा, न केवल आस्तिकों का ही ज्ञानवर्धन होता है अपितु नयी पीढ़ी के शंकालु युवकों में भी धर्म और कर्म का भाव संचित हो जाता है। ‘कीरति भनिति भूति भलि सोई’.....के अनुरूप ही आपने ज्ञान की सुरसरि अपने उदार व्यक्तित्व से प्रबुद्ध और साधारण सभी प्रकार के लोगों में प्रवाहित करके ‘बुध विश्राम’ के साथ-साथ सकल जन रंजनी बनाने में आप यज्ञरत हैं। मानस सागर मैं बिखरे हुए विभिन्न रत्नों को सँजोकर आपने अनेक आभूषण रूपी ग्रन्थों की सृष्टि की है। मानस-मन्थन, मानस-चिन्तन, मानस-दर्पण, मानस-मुक्तावली, मानस-चरितावली जैसी आपकी अनेकानेक अमृतमयी अमर कृतियां हैं जो दिग्दिगन्तर तक प्रचलित रहेंगी। आज भी वह लाखों लोगों को रामकथा का अनुपम पीयूष वितरण कर रही हैं और भविष्य में भी अनुप्राणित एवं प्रेरित करती रहेंगी। तदुपरान्त अन्तर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलन नामक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था के भी आप अध्यक्ष रहे।

निष्कर्षतः आप अपने प्रवचन, लेखन और शिष्य परम्परा द्वारा जिस रामकथा पीयषू का मुक्तहस्त से वितरण कर रहे हैं, वह जन-जन के तप्त एवं शुष्क मानस में नवशक्ति का सिंचन कर रही है, शान्ति प्रदान कर समाज में आध्यात्मिक एवं दार्शनिक चेतना जाग्रत् कर रही है।

अतः परमपूज्य महाराजश्री का स्वर उसी वंशी में भगवान का स्वर ही गूंजता है। उसका कोई अपना स्वर नहीं होता। परमपूज्य महाराजश्री भी एक ऐसी वंशी हैं, जिसमें भगवान् के स्वर का स्पन्दन होता है। साथ-साथ उनकी वाणी के तरकश से निकले, वे तीक्ष्ण विवेक के बाण अज्ञान-मोह-जन्य पीड़ित जीवों की भ्रांतियों, दुर्वृत्तियों एवं दोषों का संहार करते हैं। यों आप श्रद्धा और भक्ति की निर्मल मन्दाकिनी प्रवाहित करते हुए महान् लोक-कल्याण कारी कार्य सम्पन्न कर रहे हैं।

रामायणम ट्रस्ट पूज्य महाराजश्री रामकिंकरजी द्वारा संस्थापित एक ऐसी संस्था है जो तुलसी साहित्य और उसके महत् उद्देश्यों को समर्पित है। मेरा मानना है कि परम पूज्य महाराजश्री की लेखनी से ही तुलसीदास जी को पढ़ा जा सकता है और उन्हीं की वाणी से उन्हें सुना भी जा सकता है। महाराजश्री के साहित्य और चिन्तन को समझे बिना तुलसीदास के हृदय को समझ पाना असम्भव है।

रामायणम् आश्रम अयोध्या जहाँ महाराजश्री ने 9 अगस्त सन् 2002 को समाधि ली वहाँ पर अनेकों मत-मतान्तरों वाले लोग साहित्य प्राप्त करने आते हैं, तो महाराजश्री के प्रति वे ऐसी भावनाएं उड़ेलती हैं मानों कि मन होता है कि महाराजश्री को इन्हीं की दृष्टि से देखना चाहिए। वे अपना सबकुछ न्यौछावर करना चाहते हैं उनके चिन्तन पर। महाराजश्री के चिन्तन ने रामचरित मानस के पूरे घटनाक्रम को और प्रत्येक पात्र की मानसिकता को जिस तरह से प्रस्तुत किया है उसको पढ़कर आपको ऐसा लगेगा कि आप उस युग के एक नागरिक हैं और घटनाएँ आपके जीवन का सत्य हैं। हम उन सभी श्रेष्ठ वक्ताओं के प्रति भी अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करते हैं तो महाराजश्री के चिन्तन को पढ़कर प्रवचन करते हैं और मंच से उनका नाम बोलकर उनकी भावनात्मक आरती उतारकर अपने बड़प्पन का परिचय देते हैं।

रामायणम, ट्रस्ट के सचिव श्री मैथिलीशरण शर्मा ‘भाईजी’ विगत 29 वर्षों से महाराजश्री की साहित्यिक सेवा का प्रमुख कार्य देख रहे हैं। इतने वर्षों से मैं यही देखती हूँ कि वे प्रतिदिन यही सोचते रहते हैं कि किस तरह महाराजश्री के विचार अधिक लोगों तक पहुँचें। साथ ही उनके सहयोगी डा. चन्द्रशेखर तिवारी इस महत्कार्य को पूर्ण करने में अपना योगदान देते हैं, उनको भी मैं हार्दिक मंगलकामनाएं एवं आशीर्वाद प्रदान करती हूँ। रामायणम् भी मैं हार्दिक मंगलकामनाएं एवं आशीर्वाद प्रदान करती हूं। रामायणम् ट्रस्ट से सभी ट्रस्टीगण इस भावना से ओत-प्रोत हैं कि ट्रस्ट की सबसे प्रमुख सेवा यही होनी चाहिए कि वह एक स्वस्थ चिन्तन के प्रचार प्रसार-प्रसार में जनता को दिशा एवं दृष्टि दे और ऐसा सन्तुलित चिन्तन पूज्य श्रीरामकिंकरजी महाराज में प्रकाशित होता और प्रकाशित करता दिखता है। पाठकों के प्रति मेरी हार्दिक मंगलकामनाएं !


प्रभु की शरण में
मन्दाकिनी श्रीरामकिंकरजी


।। श्री राम: शरणं मम ।।

प्रथम


जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा।
प्रभु प्रसाद धनु भंजेउ रामा।
मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाईं।
अब जो उचित सो कहिअ गोसाईं।।
कह मुनि सुनु नरनाथ प्रबीना।
रहा बिबाहु चाप आधीना।।
टूटतहीं धनु भयउ बिबाहू।
सुर नर नाग बिदित सब काहू।।
तदपि जाइ तुम्ह करहु अब जथा बंस व्यवहारु।
बूझि विप्र कुलबृद्ध गुर बिदित आचारु।। 1/286


अभी आपके सामने जो पंक्तियाँ पढ़ी गयी हैं, वे उस समय की हैं जब धनुर्भंग के पश्चात् परशुरामजी का आगमन होता है और अन्त में परशुरामजी भी अपना धनुष भगवान् श्रीराम को अर्पित कर देते हैं और विनम्रता से उनकी स्तुति करते चले जाते हैं तब उसके पश्चात् राजर्षि जनक महर्षि विश्वामित्र के चरणों में प्रणाम करते हैं और उनसे बड़े विनम्र स्वर में कहते हैं कि महर्षि आपकी कृपा से ही श्रीराम के द्वारा धनुर्भंग ने मुझे कृत्कृत्य कर दिया। मुझे आज अपने जीवन में समग्रता और पूर्णता का बोध हो रहा है। अब आपके चरणों में मैं यह प्रार्थना करने के लिए उपस्थित हुआ हूँ इसके बाद मेरे लिए क्या करना उचित है, वह कृपा करके मुझे निर्देश दें ! और तब महर्षि विश्वामित्र कहते हैं कि राजन् ! विवाह तो इस धनुष के टूटते ही पूरा हो गया, यह तो सारे संसार को ज्ञात ही है।

फिर भी, तुम अपने गुरुजनों तथा अपने परिवार के वृद्धजनों से आज्ञा लेकर तुम्हारे कुल की मर्यादा जैसी परम्परा के अनुकूल व्यवहार करो और वे अन्त में कहते हैं कि जहाँ तक मेरी सम्मति है, मैं तो यह सोचता हूँ कि तुम अयोध्या में दूत भेजो और वे जाकर महाराज दशरथ को बुलाकर ले आवें।

महर्षि विश्वामित्र के इस आदेश को राजर्षि जनक शिरोधार्य करते हैं और जनकपुर से अयोध्या की ओर दूत भेजे जाने की तैयारी आरम्भ हो जाती है। इस प्रसंग में राजर्षि जनक ने जिन शब्दों का प्रयोग किया है उन शब्दों के अर्थ पर यदि विचार करें तो ऐसा लगता है कि उन्होंने प्रारम्भ में जो शब्द कहे और अन्त में जिस तरह से वे महर्षि विश्वामित्र से आदेश माँगते हैं, उसमें एक विरोधाभास-जैसा है। महाराज जनक का वाक्यांश था- ‘‘मैं कृतकृत्य हो गया।’’ इस कृतकृत्य शब्द का अर्थ आप सभी लोग जानते ही होंगे। कृत्य कर्म को कहते हैं और कृत उसे कहते हैं जो कर्म कर चुका है। व्यक्ति के जीवन में कुछ-न-कुछ कर्त्तव्य-कर्म बने ही रहते हैं। लेकिन एक ऐसी स्थिति भी आती है जब व्यक्ति कर्त्तव्य-कर्म से छूट जाता है; जब व्यक्ति के जीवन में कोई अभिलषित वस्तु शेष नहीं रह जाती है और जीवन में समग्रता का बोध होता है। व्यक्ति को जब यह प्रतीत होता है कि अब जीवन में कुछ भी पाना शेष नहीं रह गया है, तब उसके लिए जिस शास्त्रीय शब्द का प्रयोग किया जाता है, वह शब्द है ‘कृतकृत्या’।

कृतकृत्या का तात्पर्य है कि अब मुझे करने के लिए कुछ भी शेष नहीं है, जितने कर्त्तव्य-कर्म थे, आज वे समाप्त हो गये। इसी प्रकार की कृतकृत्यता की स्वीकृति महाराज श्रीजनक इस समय दे रहे हैं। लेकिन इस शब्द का प्रयोग करने के बाद जब उनके अगले वाक्य पर दृष्टि डालते हैं, तब उसमें एक विचित्र प्रकार का विरोधाभास यह है कि महाराज श्रीजनक महर्षि विश्वामित्र से पूछते हैं कि अब मुझे क्या करना चाहिये ?
एक ओर तो वे कहते हैं कि मैं कृतकृत्य हो गया और दूसरी ओर कहते हैं कि आप आदेश दीजिये कि मैं क्या करूँ ? यदि आदेश का पालन करना अभी शेष है तो फिर कृतकृत्या में अपूर्णता है और यदि कृतकृत्या सच्चे अर्थों में पूर्ण हो चुकी है तो फिर आदेश-पालन या कर्त्तव्य-पालन का कोई प्रश्न ही शेष नहीं रह जाता है। आइए, इस पर थोड़ा विचार करें !

महाराज श्रीजनक की कृतकृत्या का स्वरूप क्या है और कृतकृत्या के बाद भी क्या कुछ कहना शेष रह जाता है, यह प्रश्न है। कृतकृत्या का बोध कब होता है ? जब ये चार घटनाएँ जीवन में पूर्ण हो जाती हैं, तब व्यक्ति के हृदय में कृतकृत्या का बोध होता है, और वे चार घटनाएँ हैं : ताड़का का वध, अहल्या-उद्धार, भगवान् शंकर के धनुष का भंग किया जाना और परशुराम जी के धनुष का भगवान् श्री राम की ओर खिंचकर चले जाना। पर सूत्र के रूप में मैं उसकी चर्चा पुन: कर दूँ कि इन घटनाओं का संबंध अन्त:करण चतुष्टय से है। जब समग्र अन्त:करण में परिपूर्णता का बोध होता है तभी वह ‘कृतकृत्या’ शब्द सार्थक होता है। उसका तात्त्विक तात्पर्य क्या है ?

सबसे पहले तो जो अभाव की अनुभूति का मूल कारण, गोस्वामीजी ताड़का को मानते हैं। विनयपत्रिका और रामचरितमानस में वे कहते हैं कि व्यक्ति के मन में विविध प्रकार की दुराशाएँ विद्यमान हैं, तब तक वह निरन्तर संत्रस्त रहेगा, कर्म करते हुए थका हुआ ही अनुभव करेगा, और मन में कृतकृत्या का बोध तभी होता है कि जब व्यक्ति के अन्तर्मन में रहने वाली जो ताड़का है, दुराशा है, वह पूरी तरह से विनष्ट हो जाती है। गोस्वामीजी से पूछा गया कि कौन व्यक्ति धन्य है ? तब उसका उत्तर देते हुए विनयपत्रिका में लोलुपता की वृत्ति है, आशा की वृत्ति है, वे तो संसार में सबके सेवक हैं क्योंकि वे सबसे कुछ-न-कुछ पाने के लिए व्यग्र रहते हैं।


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