लोभ, दान व दया - श्रीरामकिंकर जी महाराज Lobh, Dan va Daya - Hindi book by - Sriramkinkar Ji Maharaj
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लोभ, दान व दया

श्रीरामकिंकर जी महाराज

प्रकाशक : रामायणम् ट्रस्ट प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :47
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5519
आईएसबीएन :000000

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प्रस्तुत ग्रन्थ में मोह से उत्पन्न लोभ के शूल की सूत्रात्मक व्याख्या है...

Lobh Dan Va Daya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘‘युग तुलसी’’ परमपूज्य श्री रामकिंकर जी महाराज भक्त समुदाय में, विद्वत वृन्द में समान रूप से परम वन्दनीय माने जाते हैं। आज महाराजश्री के भाष्य को परम आधार के रूप में स्वीकार करके गोस्वामी तुलसी का दावा ‘श्रीरामचरितमानस छहों शास्त्र सब ग्रन्थन को रस’’ अर्थात् षड् शास्त्र, वेद, पुराण का निचोड़ श्रीरामचरित मानस है, यह ‘युगतुलसी’’ के भाष्य द्वारा प्रमाणित एवं सिद्ध हो गया है। महाराजश्री का भाष्य इसीलिए ‘‘सर्वजनसुखाय’’ है, कि उनकी व्यख्याओं में भेद बुद्धि का सर्वथा अभाव है।

चाहे शैव या वैष्णव हों, शाक्त हों या गणेश जी के आराधक हों, सबको महाराजश्री की मीमान्सा में आनन्दानुभूति होती है। गोस्वामी तुलसी जी के वास्तविक ग्रन्थ का निरूपण करते हुए परम पूज्य महाराजश्री सबको अपने ईष्टदेव की भक्ति का अमृतपान कराते हुए हमें आकण्ठ संतृप्त कर देते हैं। फलतः एक बड़ी धार्मिक विसंगति से उत्पन्न संघर्ष का समाधान भी होता है जिसके कारण साम्प्रदायिक विरोधों का निर्मूलन भी हो जाता है। आप आलोचना या प्रत्यालोचना के प्रपंच से पूर्णतः मुक्त हैं। पूज्य महाराजश्री परम्परागत कथावाचक नहीं हैं, क्योंकि कथा उनका साध्य नहीं हैं,। श्रीरामचरित मानस, श्रीमद्भागवद्गीता एवं विनय-पत्रिका पर आधारित अब तक आपके 90 से अधिक ग्रन्थों का प्रकाशन हो चुका है।
जिस प्रकार से निर्गुण, ब्रह्म और सगुण ईश्वर में एक तारतम्य है उसी प्रकार गोस्वामी तुलसीदास जी और परमपूज्य महाराजश्री में एकसूत्रता है।

मन्दाकिनी श्रीरामकिंकरजी

अनुवचन


श्री रामचरितमानस में राम-रावण संघर्ष सर्वथा भिन्न परिवेश में प्रस्तुत किया गया है। विश्व के रंगमंच पर ईश्वर ने एक ऐसे नाटक को प्रदर्शित करने का निर्णय किया जिनके द्वारा मनुष्य के अन्तर्जीव की समस्याएँ बाह्य रूप में प्रस्तुत की जाएँ। अतएव भगवान् के ही पार्षद जय एवं विजय इस नाटक में रावण एवं कुम्भकरण के रूपों में अवतरित होते हैं। इस प्रकार नाटक समाप्त होने के उपरान्त ये दोनों अभिनेता पुनः प्रभु के पवित्र धाम में प्रविष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार मोह एवं अहंकार का उदय हमारे अंतःकरण को किन-किन समस्याओं द्वारा आक्रान्त कर देता है, रावण एवं कुम्भकर्ण के माध्यम से यही परिचय प्रस्तुत किया गया है।  

प्रत्येक व्यक्ति स्वयं अपने आपमें ही संघर्षरत है एक ओर यह दशेन्द्रियों में भोगासक्त होकर निरंतर विषयों का सुखानुभव कर रहा है। यही भोगासक्ति मूल रूप से परोत्पीड़न वृत्ति की जन्मदात्री है। दूसरी ओर जीव सच्चिदानंद ईश्वर का अंश होने के कारण स्वयं आनन्दमय है। अतएव अपने आत्मस्वरूप को पहचानकर वह स्वयं में रमण करने वाला आत्माराम बन जाता है। देहवाद एवं भोगासक्ति द्वारा जिस छलनावृत्ति का जन्म होता है उसी के द्वारा वह दूसरों के स्थान पर स्वयं को छल रहा है। इसे वह नहीं जान पाता। रावण भी शांतिस्वरूपा श्रीसीताजी का अपरहण करते हुए इसी भ्रान्ति का आखेट हुआ। वह यही नहीं जान सका कि इस अपरहण में वह स्वयं का विनाश आमन्त्रित कर रहा है। श्रीसीताजी तो जगन्माता हैं। व्यक्ति को उनकी आराधना पुत्ररूप में करनी चाहिये। किन्तु दशेन्द्रियवादी भोगासक्त होने के कारण जगज्जननी के प्रति भी वही दृष्टि रखता है। वह यह नहीं जान पाता कि वास्तविक शांति भोगों के परित्याग में है, न कि उनके ग्रहण में।

आज भी मोह संसार में समाज का सबसे प्रबल शत्रु है। अतः गोस्वामीजी दरिद्रता को भी मोह का वंशज ही मानते हैं-

मोह दरिद्र निकट नहिं आवा।
लोभ बात नहिं ताहि बुझावा।।

वास्तव में व्यक्ति अथवा समाज तब तक सुखी एवं संतुष्ट नहीं हो सकता जब तक उसकी अन्तर और बाह्य दोनों प्रकार की दीनता, दरिद्रता का पूर्ण विनाश नहीं हो जाता। अतएव हमारा सारा प्रयास उसी दिशा में केन्द्रित होना चाहिये।
प्रस्तुत ग्रन्थ में मोह से उत्पन्न लोभ के शूल की सूत्रात्मक व्याख्या है। वर्तमान युग में लोभ का दनुजेश जिस प्रकार से प्रत्येक व्यक्ति के अंतर्जीवन को उत्पीड़ित कर रहा है, इसमें श्री अशोक गुप्ताजी के द्वारा इस ग्रन्थ के प्रकाशन के लिये श्रद्धायुक्त अर्थ-सेवा, अर्थ दान उसी दनुजेश के शमन का एक सत् प्रयास है। पूर्व में भी श्री गुप्ताजी के द्वारा अनेक सेवाएं होती हैं। उनकी और उनके समस्त परिवार के प्रति मेरा हार्दिक आशीर्वाद–प्रभु उन्हें सुमति, शांति, भक्ति, प्रीति प्रदान करें!
डॉ. चन्द्रशेखर तिवारी एक ऐसे भक्त पुरुष है जिनका समर्पण अनुकरणीय है, जिस लगन से वे यह श्रमसाध्य कार्य संपन्न करते हैं, वह स्तुत्य है। रामायण ट्रस्ट के सभी सभी ट्रस्टीगण पर जो उत्तरदायित्व है वे बड़ी जिम्मेदारी से उसका निर्वहन कर रहे हैं, उन्हें भी मेरा आशीर्वाद ! मंगलकामना !! श्री नरेन्द्र शुक्ल मेरी सेवा निष्ठा पूर्वक करते रहे, मेरे अपने हैं।
अंत में उस महद शक्ति, विराट् पुरुष के प्रति मेरा नमन ! जिसके प्रकाश से सम्पूर्ण संसार आलोकित है

त्वदीयं वस्तु श्रीराम तुभ्यमेव समर्पये।

मन्दाकिनी श्रीरीमकिंकरजी

श्री गुरु चरणों में समर्पित


परम पूज्य श्री सद्गुरुदेव भगवान् के जब मुझे प्रथम बार दर्शन हुआ उनके देदीप्यमान मुखमंडल का दर्शन करके मेरा हृदय सहज ही उनकी ओर आकर्षित हुआ, तो उनकी विलक्षण वाणी सुनकर अंतःकरण झंकृत हो गया और उनका स्वभाव अनुभव करके जीवन को एक दिशा, एक दर्शन स्तम्भ मिल गया।

परम पूज्य महाराजश्री के प्रति मेरी और मेरे परिवार की ऐसी प्रीति लगी कि मैं प्रत्येक वर्ष गुरुपर्व पर रामायणम् आश्रम श्रीधाम अयोध्या जाकर उनका दर्शन, उनका आशीर्वाद प्राप्त कर एक नयी आत्मिक शांति एवं शक्ति प्राप्त कर धन्यता का अनुभव करता रहा हूँ और यह क्रम अंत तक चला, जब श्री सदगुरुदेव भगवान समाधिस्थ हुए, उन दिनों भी मैं श्रीधाम अयोध्या आश्रम में ही था। उनके समाधिस्थ होने के पश्चात् आज भी श्रीगुरुधाम में उनकी कृपामूर्ति का जब-जब दर्शन करता हूँ तो यही अनुभूति होती है कि महाराजश्री यहीं पर साक्षात् रूप में बिराजमान् हैं, हमें छोड़कर कदापि नहीं गये।

परम पूज्य महाराजश्री का चिन्तन तो अमर है ही। वे उन अमर महापुरुषों में हैं जो अपने शिष्यों भक्तों के हृदय के संशय-संदेह को अपने लीलादर्शन के द्वारा समूल नष्ट कर देते हैं, क्योंकि जीव में अखण्ड विश्वास हो ही नहीं सकता। केवल गुरु-कृपा के द्वारा ही सही दृष्टि मिल सकती है।

परम पूज्य महाराजश्री की कृपा दृष्टि हमें मिली हमारा सम्पूर्ण परिवार पूर्णतः उनके प्रति समर्पित है। आशा है जहाँ भी यह पुस्तक जायेगी लोगों के जीवन को समुन्नत करेगी। मैं परम पूज्य महाराजश्री की आध्यात्मिक उत्तराधिकारी एवं रामायणम् ट्रस्ट की अध्यक्षा परम पूज्य दीदी माँ मन्दाकिनी के प्रति कृतज्ञ हूँ जिन्होंने हमसे यह सेवा लेकर यह गौरव प्रदान किया, उनका स्नेह, वात्सल्य हमें निरंतर प्राप्त होता रहे। यही परम पूज्य गुरूदेव के चरणों में प्रार्थना है।
श्री सद्गुरुदेव भगवान के चरणों में कोटिश प्रणाम।

श्री अनिल एवं श्री अशोक गुप्ता
रायपुर

लोभ


यह मानव-जीवन जो है वह कभी समस्याओं से मुक्त नहीं होता है। नित्य जीवन में हम देखते हैं कि भूख लगना एक स्वाभाविक क्रिया है और भूख न लगाना एक रोग माना जाता है। भूख लगने पर व्यक्ति के सामने भोजन की समस्या आयेगी, भोजन मिल जाय तो उसके साथ स्वाद की समस्या, तृप्ति की समस्या और वह भोजन रोग पैदा न करके स्वास्थ्य प्रदान करे आदि अनेक समस्याएँ भोजन के साथ हुई हैं। यह बड़ी विचित्र सी बात है-भूख न लगे यह भी रोग है, भूख लगे पर स्वाद न हो तो भोजन अच्छा नहीं लगेगा। स्वादिष्ट भोजन हो और अधिक भोजन कर लिया जाय तब रोग हो जाएगा। इसका अर्थ यही है कि संसार की कोई वस्तु ऐसी नहीं है जिसमें समस्या हो ही नहीं। जब समस्या होती है तो फिर व्यक्ति उस समस्या का समाधान खोजने का यत्न करता है।

मानव जीवन की जो अनेकानेक वृत्तियाँ हैं गोस्वामी जी ने उनका बड़ा सुन्दर विश्लेषण किया है, यह विश्वेषण बड़ा मनोवैज्ञानिक है बड़ा उपादेय है। इसके लिये उन्होंने आयुर्वेद की पद्धति का आश्रम लिया है। आयुर्वेद शास्त्र की पद्धति पुरानी है पर आजकल फिर से उसके प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ रहा है। इस पद्धति की मान्यता है कि व्यक्ति के शरीर का संचालन जिन त्रिधातु अथवा त्रिदोष के द्वारा होता है, वे हैं वात, पित्त और कफ। वैद्य नाड़ी देखकर पता लगाते हैं कि अस्वस्थ व्यक्ति कि इन तीनों में से कौन सी नाड़ी प्रबल है। इस निदान के बाद वैद्य दवा बताते हैं तथा पथ्य बताते हैं जिससे व्यक्ति के रोग का उपशमन हो जाता है। यद्यपि यह तो कहा नहीं जा सकता कि वह रोग फिर कभी नहीं होगा पर उस समय उस विकार के संतुलन होने से रोग शान्त हो जाता है।

गोस्वामीजी ने कहा कि जैसे बात, पित्त और कफ के द्वारा शरीर संचालित होता होता है, उसी प्रकार काम, क्रोध और लोभ इन तीनों के द्वारा हमारा मन भी संचालित होता है, और उन तीनों के संतुलन से जिस प्रकार शरीर रोगी होता है ठीक उसी प्रकार इन तीनों के असंतुलन से व्यक्ति का मन भी रोगी हो जाता है। गोस्वामी कहते हैं कि-

काम बात कफ लोभ अपारा।
क्रोध पित्त नित छाती जारा।। 7/121/30

काम बात है, कफ लोभ है और क्रोध ही पित्त है। वैद्य यह चेष्ठा तो नहीं करेगा कि इन्ही तीनों से रोग उत्पन्न होता है, अतः उनको ही मिटा दिया जाए क्योंकि वह जानता है कि इससे रोग क्या स्वयं रोगी ही नष्ट हो जाएगा। इसका अर्थ यह हुआ कि काम, क्रोध और लोभ के बिना समाज चल ही नहीं सकता। इन तीनों के संतुलन में जीवन है, संतुलन में रोग है और अतिशय असंतुलन में मृत्यु है। यह बात मन और शरीर दोनों के सन्दर्भ में समान रूप से सत्य दिखाई देती है।
हम यदि विचार करके यह देखें कि व्यक्ति के जीवन में जो कर्म हो रहा है, उनका संचालन कौन कर रहा है ? तो हम कह सकते हैं इसके मूल में कामना है, जो काम का ही रूप है। संसार के सृजन मूल में भी कामना है। जो काम का ही रूप है। संसार के सृजन के मूल में भी काम ही है। इसी प्रकार से पित्त ही भोजन को पचाता है पर जब उसका अतिरेक हो जाता है तब जलन होने लगती है। इसीलिए क्रोध की तुलना पित्त से की गयी है। जीवन में, समाज में हम देखते हैं कि निमार्ण और संहार की ही आवश्यकता है। नये के निर्माण के लिये ध्वंस भी अपेक्षित है। पुराने जीर्ण-शीर्ण मकान को गिराकर नये मकान का निर्माण किया जाता है।

समाचार पत्रों में आता है कि मुम्बई में पुराने मकानों में लोग रह रहे हैं, मुम्बई में आवाज की समस्या बड़ी जटिल है। उन पुराने मकानों के विषय में यह भय लगा रहता है कि वे किसी भी समय गिर सकते हैं। लोगों से उन्हें छोड़ने का, खाली कर देने का आग्रह भी किया जाता है पर समस्या के रहते वे सोचते हैं कि कहाँ जायँ और इसलिए चेतावनी को वे दृष्टिगत  नहीं रख पाते।

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