एक कतरा खून - इस्मत चुगताई Ek Qatra Khoon - Hindi book by - Ismat Chugtai
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उपन्यास >> एक कतरा खून

एक कतरा खून

इस्मत चुगताई

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :304
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5532
आईएसबीएन :81-7016-793-0

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प्रस्तुत है उपन्यास एक क़तरा ख़ून

Ek Qatra Khoon

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्राक्कथन

यह उन बहत्तर इंसानों की कहानी है, जिन्होंने इंसानी
हक़ों के लिए साम्राज्यवाद से टक्कर ली।
यह चौदह सौ साल पुरानी कहानी आज की कहानी
है कि आज भी इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन इंसान कहलाता है।
आज इंसानियत का अलमर्दार इंसान है।
आज भी जब दुनिया के किसी कोने में कोई वज़ीद सर उठाता है तो हुसैन बढ़कर उसकी कलाई मरोड़ देते हैं।
आज भी उजाला अँधेरे से लड़ाई कर रहा है।

 

एक क़तरा ख़ून

 

 

फ़िज़ा में आसमानी नग़्मे गूँज रहे थे। हवाओं में फ़रिश्तों के पैरों की सरसराहट थी। दुनिया एक अज़ीबोग़रीब जादू करने वाले आसमानी नूर में नहाई जगमगा रही थी।
सूरज आने वाले पाक बच्चे के एहतराम में सर झुकाए हुए था। चाँद और तारे नई चमक-दमक से झिलमिला रहे थे। शहर की रोशनियाँ निराली आब-ओ-ताब से जगमगा रही थीं। दीयों की लवें ख़ुद-ब-ख़ुद ऊँची हो गई थीं।
ख़ुदा-ए-ज़ुलजलाल-वाला करम1 बड़े इनहिमाक2 से ज़मीन की जानिब देख रहा था। आज ख़ुदा का हसीन-तरीन शाहकार3 पैदा होने वाला होता है।

बिंते-रसूल4 अली इब्ने तालिब की चहीती बीवी फ़ातिमा ज़ोहरा दर्देजेह6 में मुब्तला बेचैन-ओ-बेक़रार थीं। उनका फूल-सा कमसिन चेहरा पसीने की शबनम में डूबा हुआ था। भीगी-भीगी आँखों में वह कर्ब6 था जो हर माँ का इनाम है।
अली इब्ने अबी तालिब बड़े बेटे हसन को कंधे से लगाए बेचैन होकर टहल रहे होते थे। जान से प्यारी बीवी के कर्ब का एहसास बेचैन-ओ-बेक़रार कर रहा था। ऐसे नाज़ुक वक़्त में औरत को माँ के प्यार की ज़रूरत होती है। अली के लब दुआ के लिए बेचैनी से हिल रहे थे—‘‘ए रहीमो-करीम, दुनिया के पालनहार, इस बिन माँ की बच्ची पर रहम फर्मा।’’
सरवरे-कायनात7, रसूले-ख़ुदा बेटी की तकलीफ से दुखी ड्योढ़ी पर टहल रहे थे। माँ का दुःख सिर्फ माँ का हिस्सा है, कोई उस दर्द को बाँट नहीं सकता।

पैग़ंबरे-इस्लाम ने अपनी बेटी फ़ातिमा ज़ोहरा को बड़े लाड़-प्यार से पाला था। यह वह ज़माना था जब अरब वहशी अपनी बेटियों को ज़िंदा दफ़्न कर दिया करते थे। लड़की ज़ात को मनहूस और ज़लील8 समझा जाता था। ज़मानः-ए-जहालत9 की और दूसरी लानतों के साथ रसूले-ख़ुदा ने इस बेहुदा रस्म के ख़िलाफ भी आवाज़ बुलन्द की। अपने क़ौल को फ़ेल10 से साबित करने के लिए उन्होंने अपनी बेटी को सारे हुक़ूक11 दिए जो एक इंसान को मुहज़्ज़ब दुनिया में मिलना चाहिए। वह उनसे बेहद मुहब्बत करते थे। उन्हें बड़े शौक़ और लगन से इल्म की दौलत से मालामाल
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1.    प्रताप वाला और सम्माननीय 2. तल्लीनता 3. सुंदरतम कृति 4. मुहम्मद साहब की बेटी 5. प्रसव-पीड़ा, 6. पीड़ा 7. सृष्टि के नायक 8. तिरस्कृत 9. अज्ञानता का युग, इस्लाम-पूर्व युग 10. अमल, व्यवहार, 11. अधिकार।

किया। उनकी बड़ी इज़्ज़त किया करते थे। बेटी को आता देखकर हमेशा ताज़ीम1 से खड़े हो जाया करते थे। जिनके क़दमों में शंहशाहों के सर झुकते थे उन्हें अपनी बेटी की इस तरह इज़्ज़त करते देखकर लोग अपनी बेटियों की इज़्ज़त करने लगे थे। बेटी का बाप होना गोली नहीं, एक क़ाबिले-फ़ख्र2 बात समझा जाने लगा।
फ़ातिमा ज़ोहरा जब बालिग हुईं तो उनके लिए बड़े-बडे़ शाहज़ादों और बादशाहों के पैग़ाम आने लगे। मगर रसूलल्लाह ने सबको टाल दिया। लोग बड़े चक्कर में थे कि रसूले-ख़ुदा को बेटी के लिए वर की तलाश है ? इरादा क्या है ? जवान बेटी को कब तक बिठाए रखेंगे ?
बेटी बाप के सीने का बोझ न थी, जिसे हटाने के लिए उसे किसी के सुपुर्द कर दिया जाए। वह उनकी बेटी थी, जिगर का टुकड़ा थी। वह उसके लिए ऐसा शौहर चाहते थे जो हर तरह एक मुकम्मल इंसान हो, जिसे वह अपनी बेटी की तरह अज़ीज़ रखते हों।

पैग़ंबरे-ख़ुदा को ख़ुदा का पैग़ाम इंसानों कर पहुँचाने के लिए एक मुईन और मुबीन3 की ज़रूरत थी। एक ऐसा शरीकेकार जो उनका बोझ बाँट सके। जिस पर वह भरोसा कर सकें। उस वक़्त सात शख़्स इस्लाम के दायरे में आए थे। उनकी जान-ओ-माल की ख़ैरियत न थी. वह छिपकर इबादत करते थे। रसूलुल्लाह ने एक जलसे में अपनी इस ख़्वाहिश का इज़हार फ़र्माया और पुकारकर कहा, ‘‘कौन है तुममें से, जो मेरा मुईन-ओ-मददगार बनने को तैयार है ?’’
बनी हाशिम के ही सब ही मुअज़्ज़िज़4 लोग जलसे में शरीक थे। मगर किसी ने लब्बैक5 न कहा। लोग खुलकर इज़हारे-ख़याल करते झिझकते थे। मुख़ालिफ़ीन6 के ख़ौफ़ से हिचकिचाते थे। रसूले-ख़ुदा उम्मीद-भरी नज़रों से सबका मुँह तक रहे थे, मगर सब ख़ामोश थे, आँखें चुरा रहे थे।
उस वक़्त अचानक एक लड़का, जिसकी उम्र मुश्किल से दस-बारह की होगी, मजमे में से उठा और निहायत दिलेराना अंदाज़ में बोला—‘‘या रसूलुल्लाह ! मैं आपका मुईन-ओ-मददगार बनने को तैयार हूँ।’’

लोग खिलखिलाकर हँस पड़े। भला एक कमसिन लड़का इतना अज़ीम बोझ क्योंकर उठा सकेगा ? मगर पैग़ंबर का चेहरा मसर्रत से खिल उठा। फ़िक्र-ओ-तरद्दुद के आसार यक्सर ग़ायब हो गए। उन्होंने आगे बढ़कर उस बच्चे के शाने पर हाथ रख दिया।
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1.    आदर 2. गर्व करने योग्य 3. सहायक 4. सम्माननीय 5. ‘मैं उपस्थित हूँ—मालिक के पुकारने पर दास द्वारा दिया जाने वाला उत्तर 6. विरोधी।

वह कमसिन बच्चा उनका चचाज़ाद भाई अली बिन अबी तालिब था। उसकी दिलेरी और साफ़गोई से वह बेहद मुतस्सिर1 हुए।
‘‘बड़प्पन उम्र से नहीं, अक़्ल और ज़ुर्रत से होता है।’’ उन्होंने फ़र्माया।
‘‘या रसूलुल्लाह ! मेरी आँखों में हमेशा तकलीफ रहती है। मेरा जिस्म भी तनोमद2 नहीं। मगर मेरा दिल आपका मुतीअ3 है।’’ अली बिन अभी तालिब ने मासूमियत से कहा और रसूलुल्लाह मुस्करा पड़े। उस दिन उन्होंने अपना अजी़ज-तरीन दोस्त, होनहार शागिर्द और बहादुर-ओ-तरीं हम रकाब4 पा लिया। बड़ी तवज्जो से उन्होंने इस बच्चे की तालीम-ओ-तरबियत5 पर वक़्त सर्फ़ किया। दोनों हरदम साथ रहने लगे। एक दराज़क़द6 नौजवान मर्द और एख कम-उम्र लड़का ! जब अली जवान हुए तब भी साये की तरह साथ रहे। बड़े-बड़े मार्कों में दामन न छोड़ा। अली रसूलुल्लाह को बेइंतहा अज़ीज थे। और जब भी कोई इंतहाई ख़तरे का मौका आता तो वह बेझिझक अली को सामने कर देते। उन्हें अली पर एतमाद था और अली बेउज़्र7 उनका हर हुक्म बजा लाते।

अली की बहादुरी ज़र्बउलमस्ल8 थी। फ़तह उनकी ज़रख़रीद लौंजी थी। वह जिस मुहिम को सर करने का तहैया करते, फ़तह यक़ीन बन जाती। अली बयक वक़्त दो तलवारों से लड़ते थे। ढाल  के बजाय दूसरे हाथ में तलवार होती थी। उनकी दो तलवारे हीं ढाल का भी काम करती थीं। लोग उन्हें सैफ़ुल्लाह यानी ख़ुदा की तलवार कहा करते थे।
चंद दोस्तों ने अली बिन अबी तालिब से कहा, ‘‘आप क़िस्मत आज़माई क्यों नहीं करते ? रसूलुल्लाह आपको बहुत पसंद करते हैं। अपनी बेटी के लिए वह आपका पैग़ाम ज़रूर मंज़ूर कर लेंगे।’’
अली ने कहा, ‘‘मैं यह ज़ुर्रत कैसे कर सकता हूँ ? जहाँ सा शाहों को जवाब मिल गया, वहाँ मेरी क्या गिनती होगी ? मैं ग़रीब आदमी हूँ।’’

‘‘आप ग़रीब सही मगर रसूलुल्लाह आपको चाहते हैं।’’ दोस्तों ने कहा, ‘‘हमारे ख़याल में तो वह आपको ही पसंद कर चुके हैं। ख़ुद अपने मुँह से कहते तकल्लुफ़ हो रहा है। आपका फ़र्ज़ है कि पैग़ाम दें, चाहे वह मंजू़र करें या न करें।’’
अली इब्ने अबी तालिब ने सर झुका लिया और सोच में पड़ गए। रसूलुल्लाह अली तो पसंद फ़र्माते थे तो यह कोई ताज्जुब की बात न थी। अली की बहादुरी का डंका दूर-दूर तक बज रहा था। वह ख़ुद अपने सिफ़ात9 से बेख़बर थे। अपने बारे में कोई मुग़ालता1 न
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1.    प्रभावित 2. स्वस्थ, हृष्ट-पुष्ट 3. आज्ञाकारी 4. साथ चलने वाला 5. सिक्षा-दीक्षा 6. लंबा कद, 7. निस्संकोच 8. कहावत 9. गुण, विशेषता।

था। वह ग़रीब थे। उन्होंने मुल्क जो फ़तह किए थे, वह अपनी ज़ात के लिए नहीं, इस्लाम के लिए थे। उनके पास रहने के लिए महल-दोमहल न थे। न ज़र और जवाहरात और न लौंडी और न ग़ुलाम। मज़दूरी करके गुज़र-बसर करते थे। उन्हें बाग़ात लगाने का बहुत शौक़ था। जब मुहिमात से फुर्सत मिलती, बंजर और खुश्क ज़मीन की काश्त करके खजूर के बाग़ लगाते। जॉफ़िशानी2 से उनकी सिंचाई करते। जब वह तैयार हो जाते तो किसी को बतौर तोहफ़ा दे देते।
इस वक़्त भी वह आबपाशी3 में मसरूफ़ थे। जब दोस्तों ने बहुत इसरार किया कि फ़ातिमा ज़ोहरा के लिए पैग़ाम देना आपका हक़ भी है और फ़र्ज़ भी तो राज़ी हो गए।
पानी का डोल एक तरफ़ रखा। घर जाकर नहाए। अपने हाथ का धुला पैबंद लगा लिबास पहना और रवाना हो गए। अभी अली दरवाज़े तक पहुँचे भी न थे कि रसूले-ख़ुदा ने उम्मे-सलमा से फ़र्माया, ‘‘दरवाज़ा खोल दो। हमारा बहुत ही प्यारा मेहमान आ रहा है।’’

उन्होंने दरवाज़ा खोला तो देखा, अली कुछ शर्माए, झेंपे, सुर झुकाए खड़े हैं। अली की उम्र उस वक़्त इक्कीस साल थी।
‘‘आओ-आओ, अली, अंदर आ जाओ। बाहर क्यों खड़े हो ?’’
अली अंदर आए। उनका क़द इतना लंबा था कि हर दरवाज़ा छोटा मालूम होता था। निहायत घबराए हुए थे, पसीने छूट रहे थे। एक हाथ की उँगलियों से दूसरे हाथ को मज़बूती से पकड़े हुए थे। मौक़ा बड़ा नाज़ुक था।
रसूलुल्लाह उन्हें देख रहे थे और मुस्करा रहे थे। उनके तौर-तरीके से भाँप गए कि अली क्या कहने आए हैं, उन्हें भी अली के मुँह से बात सुननी थी। मुस्कराहट रोककर पूछा, ‘‘कुछ परेशान मालूम होते हो, अली ! क्या क़िस्सा है ?’’
अली थोड़ा-सा कसमकसाए, पेशानी से पसीना पोंछा। जी कड़ा करके कह दिया, ‘‘या रसूलुल्लाह, मैं आपकी बेटी फ़ातिमा ज़ोहरा के लिए दरख़्वास्त करने आया हूँ।’’
‘‘हूँ, मेहर में देने को कुछ है ?’’ मुस्कराकर पूछा।

‘‘कुछ भी नहीं। बस, ये तन के कपड़े हैं। एक घोड़ा है, तलवार हैं और ज़िरह-बकसर। बस, यही कुल पूँजी है।’’
‘‘तलवार तो एक सिपाही के लिए निहायत जरूरी है। घोड़े के बग़ैर भी काम नहीं चलेगा। मगर जिरह-बकतर की तुम्हें क्या ज़रूरत है ? ख़ुदा तुम्हारा मुहाफ़िज़ है। तुम्हें और किसी हिफ़ाज़त की हाजत नहीं।’’
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1.    धोखा, ग़लतफ़हमी 2. कठिन परिश्रम 3. सिंचाई।

अली बिन अबी तालिब ने अपनी जिरह-बकतर बतौर मेहर पेश कर दी। तब रसूलुल्लाह ने अपनी बेटी को बुलाया।
‘‘फ़ातिमा ! अली तुम्हारे सामने खड़े हैं। यह तुम्हारे ख़्वास्तगार हैं। बोलो, तुम्हारी क्या मर्ज़ी है ?’’
फ़ातिमा ज़ोहरा की पलकें झुकी रहीं। वह कुछ भी बोल न सकीं।
तीन बार बाप ने बेटी से यही सवाल किया। ज़ब वह ख़ामोश रहीं तो कहा, ‘‘इसका मतलब है कि अली तुम्हें पसन्द हैं। तुम्हें यह रिश्ता मंजूर है। शर्म की वज़ह से ख़ामोश हो।’’
फ़ातिमा ज़ोहरा फिर ख़ामोश रहीं।

रसूलुल्लाह ने अपने चंद दोस्तों को बुलाकर मशविरा किया। जिरह बक्तर जो अली ने बतौर मेहर पेश की थी उसे फ़रोख़्त करके फ़ातिमा का ज़हेदज़ खरीदा गया। दो चक्कियाँ, दो घड़े, एक चर्खा, एक चादर और चंद प्याले और रकाबियाँ।
रसूलुल्लाह ही अली के बुजुर्ग थे। बाकी जो रुपया बचे उनसे वलीमे1 की दावत का इंतज़ाम हुआ। आपने अली से फ़र्माया, ‘‘जाओ अली ! अहले-मदीना2 को अपने वलीमे की दावत दे आओ।’’
अली घबरा गए। इतना थोड़-सा खाना और मदीने के हर ख़ास-ओ-आम की दावत ! मगर दमबख़ुद थे, बोलने की गुंजाइश न थी। सोचा, अगर वाक़ई अहले-मदीना बुलावा पाकर आ गए तो ग़ज़ब हो जाएगा। बड़ी शर्मिन्दगी उठानी पड़ेगी। लिहाज़ा एक टीले पर खड़े होकर बड़ी धीमी आवाज़ में पुकारा, ‘‘ए अहले-मदीना ! अली इब्ने अबी तालिब के वलीमे की दावत है। शिरकत फ़र्माकर इज़्ज़तअफ़ज़ाई कीजिए।’’

अली समझते थे कि यूँ हौले से पुकारेंगे तो जो सुनेंगे, आ जाएँगे ; जो न सुन पाएँगे, नही आएँगे। अच्छा ही है कि कम मेहमान आएँ। खाना बहुत कम मिक़दार में है।
मगर हवा को जो शरारत सूझी तो अली की आवाज को ले उड़ी और गली-गली, कूची-कूचा ख़बर पहुँच गई।
जब बुलावा लेकर वापस लौटे तो यह देखकर पैरों-तले से जमीन खीसक गई कि एक भीड़ लगी है। लोग जौक़-दर-जौक़ पैदल और नाक़ों पर सवार चले आ रहे हैं। रसूले-ख़ुदा की प्यारी बेटी की शादी और अली के वलीमे की दावत कौन अहमक़ था, जो छोड़ देता ! पूरी मदीना की ख़ल्कत टूट पड़ी।
‘‘या रसूलुल्लाह, खाना कैसे पूरा पड़ेगा ? जरा देखिए तो मेहमानों की रेलपेल।’’
अली ने परेशान होकर कहा।

‘‘फ़िक्र न करो इंशा अल्लाह खाना पूरा हो जाएगा।’’
और ऐसा ही हुआ। लोगों ने खाना खाया और बचाया। कोई हौके का मारा पेट का तंदूर भरने नहीं आया था। सब बरकत का निवाला खाकर सेर हो गए।
रसूलुल्लाह ने अपनी प्यारी बेटी फ़ातिमा ज़ोहरा का हाथ अपने सबसे प्यारे रफ़ीक और शरीकेकार और लायक़तरीन शागिर्द के हाथ में देकर ख़ुदा का शुक्र अदा किया।

यकायक फ़ातिमा ज़ोहरा का हुजरा नूर से जगमगा उठा। दरो-दीवा चमक उठे। अम्मा हड़बड़ाई हुई हुजरे से बाहर निकलीं, ‘‘अली ! अली !! बेटा, मुबारक हो, बख़ुदा बिलकुल चाँद का टुकड़ा है।’’
अली ने इत्मिनान की साँस ली और आँखों से आँसू बहने लगे। रसूले-ख़ुदा के कान आवाज़ पर लगे हुए थे। बड़ी तेज़ी से अंदर दाखिल हुए, लाओ अम्मा, कहाँ है हमारा बेटा, हमें दिखाओ।’’
‘‘ज़रा सब्र कीजिए, नहला-धुलाकर अभी लाती हूँ।’’
‘‘उसे नहलाने की कोई ज़रूरत नहीं। वह तो पाक है। अल्लाहताला ने उसे आसमान से ही पाक करके भेजा है। तुम हमें ऐसे ही दे दो।’’
अस्मा ने बच्चे को एक ज़र्द कपड़े में लपेटा और बाहर ले आईं। नाना ने बच्चे को सीने से लगा लिया और बेइख़्तियार चूमने लगे।

‘‘अली, अली, वल्लाह ज़रा बेटे को देखो, ख़ुशनसीब हो तुम और फ़ातिमा कि ख़ुदा ने तुम्हें यह बेटा दिया। यह बड़े नसीबवाला है। एक दिन यह दुनिया का हादी1 और रहनुमा् बनेगा। लोग रहती दुनिया तक इसके कारनामे याद करेंगे। अली, तुम्हें यह बेमिसाल बेटा मुबारक हो।’’
अली बेइख़्तियार मुस्करा दिए।
‘‘यह आपका है। मुझसे ज़्यादा इस पर आपका हक़ है। जो फ़जीलत2 इसे नसीब होगी वह आपकी बदौलत होगी। आपकी गोद में पलेगा। ख़ुदा इसके सर पर आपका साया कायम रखे।’’
ख़ुदा से दुआ है कि तुम और फ़ातिमा ख़ुश रहो, फूलो-फलो।’’
रसूले-ख़ुदा ने बच्चे को घुटने पर लिया लिया। अली ख़ामोश हैरतज़दा उन्हें देख रहे थे। उन्होंने कभी रसूलुल्लाह को यूँ बच्चों की तरह खु़शी से हँसते नहीं देखा था।

उन्होंने बच्चे के कान में अज़ान कही, फिर दूसरे कान में इक़ामत3 और उसके नन्हे-नन्हे रेशमी हाथ चूमने लगे।
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1.    पथ-प्रदर्शक 2. श्रेष्ठता, बुजुर्गी 3. नमाज़ के लिए पढ़ी जाने वाली तकबीर।

 

बचपन

 

 

हसन और हुसैन ऊपर-तले के भाई थे। दोनों की पैदाइश एक साल के अन्दर हुई थी। मुश्किल से दोनों में साल-भर का फ़र्क़ था। रसूलुल्लाह अपने नवासों को बहुत प्यार करते थे। उनका अपना कोई बेटा ज़िंदा न रहा, इसलिए नवासों को बेटों की तरह पाला। इन बच्चों को देखकर वह बस अपने नवासों के नाना बन जाते थे। वह सादगी ही उनकी अज़्मत की निशानी थी। उनकी मुहब्बत में ऐसी शिद्दत थी कि बच्चों को देखे बग़ैर चैन न पड़ता। सुबह अपने घर से निकलकर सीधे बेटी के घर जाते। बच्चों की ख़ैरियत पूछते, ‘‘रात को रोए तो नहीं, आराम से सोए ?’’
‘‘जी हाँ, सब ख़ैरियत रही, बाबा, आप ख़्वाहमख़्वाह इन बच्चों के लिए फ़िक्रमंद रहते हैं।’’ बेटी हँसकर जवाब देतीं।
तब उन्हें इत्मिनान हो जाता और वह मस्ज़िद तशरीफ ले जाते। वापसी में फिर बच्चों को देखने आते। थोड़ी देर उनके साथ खेलते, फिर घर आते। कहीं सफ़र को जाते तो सबसे आख़ीर में बच्चों से रुख़सत होते और लौटकर सीधे बच्चों के पास आ जाते।

जब बच्चे ज़रा बड़े हो गए तो उन्हें अपने साथ मस्जिद ले जाते। वहाँ बच्चे खेला करते। नमाज़ पढ़ते वक़्त कंधों पर चढ़ जाते। एक दिन रसूलुल्लाह मिम्बर1 पर बैठे ख़ुत्बा2 फ़र्मा रहे थे कि हुसैन भागते हुए आए तो ठोकर खाकर गिर पड़े। ख़ुत्बा छोड़कर नाना ने लपककर उठया और सीने से लगा लिया। उन्हें बहलाया। जब चुप हो गए तो फिर ख़ुत्बा जारी किया।
रसूलुल्लाह को ही सब बच्चों से प्यार था। वह किसी बच्चे की रोने की आवाज़ सुनते ते बेचैन हो जाते। बच्चे, जो दुनिया का मुस्तक़्विल हैं। हसन और हुसैन को नाना और वाल्दैन की मुहब्बत बराबर मिलती रहती थी। फिर भी बच्चों में कभी ज़िद हो जाती और बहस चल निकलती।
एक दिन दोनों ने तख़्तियाँ लिखीं और नाना से पूछा कि बताइए, किसकी लिख़ाई ज़्यादा ख़ूबसूरत है ? उन्होंने कह दिया, ‘‘जाओ, अपने बाप से पूछो। वह तो बहुत ख़ुशख़त हैं।’’

बच्चे बाप के पास गए।
‘‘भई, अपनी अम्मा से पूछो, वह बताएँगी।’’ बाप ने कह दिया।
जब मुकद्दमा माँ के सामने पेश हुआ तो वह तज़बज़ुब3 में पड़ गईं।
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1.    मस्जिद में बना वह ऊँचा स्थान जहाँ इमाम धर्मोपदेश देता है, 2. धर्मोपदेश, भाषण 3. असमंजस।

‘‘दोनों की लिखाई ठीक है।’’
‘‘नहीं, यह बताइए कि ज़्यादा किसकी अच्छी है ?’’ बच्चे ज़िद करने लगे। ‘‘यह फ़ैसला ज़रा मुश्किल है। मगर ठहरो, एक काम करो।’’ फ़ातिमा ज़ोहरा ने गले में पड़ा हुआ मोतियों का हार तोड़कर ज़मीन पर बिखेर दिया।
‘‘बस, तुममें से जो सबसे ज़्यादा मोती चुन ले उसी की लिखाई सबसे अच्छी मानी जाएगी।
बच्चे जल्दी-जल्दी मोती चुनने लगे। एक मोती गिरने से दो टुकड़े हो गए। दोनों ने आधा-आधा बीन लिया। जब मोती गिने गए तो दोनों के पास बराबर मोती निकले। एक का आधा-आधा टुकड़ा।
‘‘इसका यह मतलब है कि तुम दोनों की लिखाई एक जैसी है।’’ बच्चे क़ायल हो गए।
‘‘मगर इसका यह मतलब नहीं कि और मश्क़ की ज़रूरत नहीं।’’

रसूलुल्लाह फ़ुर्सत का वक़्त आम तौर पर बेटी के यहाँ गुज़ारा करते थे। एक दिन चादर ओढ़े बैठे थे कि इतने में फ़ातिमा ज़ोहरा उधर किसी काम से आईं। बाप की गोद अब सिर्फ़ नवासों के लिए वक्फ़1 होकर रह गई थी। बाप पर प्यार आने लगा, बोलीं, ‘‘बाबा, हमें सर्दी लग रही है।’’
‘‘आओ, हमारी चादर में आ जाओ।’’ उन्होंने बेटी को चादर में समेट लिया। वह बाप के कंधे पर सर रखकर बैछ गईं।
अली ने देखा तो मुस्कराकर बोले, ‘‘या रसूलुल्लाह, सर्दी तो हमें भी लग रही है।’’
‘‘आओ, तुम्हें किसने मना किया, हमारी चादर बड़ी लम्बी-चौड़ी है।’’ अली भी चादर में आ गए। बच्चों ने जब अपनी हक़तलफ़ी2 होते देखी तो दौड़कर वह भी घुस गए।

रसूलुल्लाह ने मुहब्बत से सराशर होकर सबको अपने करीब समेट लिया और मुस्कराकर बोले, ‘‘हम सब एक ही तो हैं। हमारे रास्ते एक हैं। हमारी मुश्किलात एक हैं। रास्ता बहुत दुश्वार है। सऊबतें3 ज़्यादा हैं। तुम लोग मेरे हो। मेरे बाद मेरे पैग़ाम के वारिस हो। तुम उसे लेकर दुनिया के दिलों को छू लोगे। मुझे तुम पर यक़ीन है। तुमसे कोई कोताही सरज़ न होगी।’’ उन्होंने आँखें बन्द कर लीं और चारों ओर आने वाली ज़िम्मेदारियों के बारे में सोचने लगे।


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