कृष्णं वंदे जगद्गुरुम् - दिनकर जोशी Krishnam Vande Jagadgurum - Hindi book by - Dinkar Joshi
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कृष्णं वंदे जगद्गुरुम्

दिनकर जोशी

प्रकाशक : ग्रंथ अकादमी प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :130
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5534
आईएसबीएन :81-85826-60-9

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प्रस्तुत पुस्तक में श्रीकृष्ण के चरित्र को बौद्धिक स्तर से समझने का प्रयास किया गया है...

Krisnam Bande Jagatgurum-

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कृष्ण विचलित नहीं हुए। अपने खुद के वचन की यथार्थता मानो सहज भाव से प्रकट होती है। नाश तो सहज कर्म है। यादव तो अति समर्थ हैं; फिर कृष्ण-बलराम जैसे प्रचंड व्यक्तियों से रक्षित हैं- उनका नाश किस प्रकार हो ? उनका नाश कोई बाह्य शक्ति तो कर ही नहीं सकती। कृष्ण इस सत्य को समझते हैं और इसीलिए माता गांधारी के शाप के समय केवल कृष्ण हँसते हैं। हँसकर कहते हैं-‘माता ! आपका शाप आशीर्वाद मानकर स्वीकार करता हूँ; कारण, यादवों का सामर्थ्य उनका अपना नाश करे, यही योग्य है। उनको कोई दूसरा परास्त नहीं कर सकता।’ कृष्ण का यह दर्शन यादव परिवार के नाश की घटना के समय देखने योग्य है। अति सामर्थ्य विवेक का त्याग कर देता है और विवेकहीन मनुष्य को जो कालभाव सहज रीति से प्राप्त न हो, तो जो परिणाम आए वही तो खरी दुर्गति है। कृष्ण इस शाप को आशीर्वाद मानकर स्वीकार करते हैं। इसमें ही रहस्य समाया हुआ है

इसी पुस्तक से

न केवल भारतीय साहित्य में अपितु समग्र विश्व साहित्य में श्रीकृष्ण जैसा अनूठा व्यक्तित्व कहीं पर उपलब्ध नहीं है। संसार में लोकोत्तर प्रतिभाएँ अगण्य हैं; परंतु पूर्व पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण के अलावा कोई नहीं है। श्रीकृष्ण के किसी निश्चित रूप का दर्शन करना असंभव है। बाल कृष्ण से लेकर योगेश्वर कृष्ण तक इनके विभिन्न स्वरूप हैं। प्रस्तुत पुस्तक में श्रीकृष्ण के चरित्र को बौद्धिक स्तर से समझने का प्रयास किया गया है।
विश्वास है, पाठकों को यह प्रयास पसंद आएगा।


अदृश्य का दर्शन



गांधीजी ने एक बार कहीं कहा कि प्रत्येक हिंदू को ‘रामायण’ और ‘महाभारत’–ये दो धर्मग्रंथ अवश्य पढ़ने चाहिए। यह तो स्पष्ट ही है कि गांधीजी का यह कथन धार्मिक भावना से प्रेरित है; किन्तु जिस अर्थ में ‘बाइबल’, ‘कुरान’ अथवा अन्य धर्मग्रंथों को धार्मिक कहा जाता है, उस अर्थ में‘रामायण’ और ‘महाभारत’ को धर्मग्रंथ नहीं कहा जा सकता। किसी खास धर्म का संस्थापक अपने धर्म के उपदेश के लिए उसके अनुयायियों के सामने धर्म संबंधी मान्यताओं को स्पष्ट करता है, और कालांतर में उन्हें लिपिबद्ध करने से जिस प्रकार अन्य धर्मग्रंथ बने हैं, उस प्रकार ‘रामायण’ एवं ‘महाभारत’ धर्मग्रंथ नहीं बने हैं।

ये दोनों ग्रंथ तत्कालीन व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूह के आसपास रचित होने पर भी व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहे हैं। उनका समाज, उनके प्रश्न, उनके पात्र, उनका घटना-चक्र-यह सब एक विशेष समाज अथवा समष्टि की बात एक निश्चित भूगोल के दायरे में रहकर भले ही करते हों, वास्तव में वे किसी भी समय, किसी भी समाज में और किसी भी भू-प्रदेश के लिए उतने ही सत्य हैं। अत: गांधीजी के उक्त कथन को थोड़े से विशाल परिप्रेक्ष्य में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है कि ‘मनुष्य’ नाम की वस्तु को समझने में जिस किसी की रुचि हो, ऐसे प्रत्येक समझदार मनुष्य को इन दो ग्रंथों को अवश्य पढ़ना चाहिए।

इन दोनों ग्रंथों का ताना-बाना ऐसा है कि इन दोनों के इतने अधिक पाठांतर हैं कि इस बारे में ढेर सारे मत-मतांतर हैं। यह कह पाना कठिन है कि इनमें असली अंश कौन-सा है और प्रक्षिप्त रूप में बाद में जोड़ा हुआ अंश कितना है। महाभारत के तीन स्तर हैं, इस बारे में लगभग सर्व सहमति है; किंतु इन तीनों स्तरों में कितनी ही बातें एक स्तर में से दूसरे स्तर में तथा दूसरे स्तर में से तीसरे स्तर में और वहाँ से फिर पहले स्तर में आगे-पीछे होती रहती हैं। इन तीनों बातों में असलियत को अलग खोज निकालने की दृष्टि से पुणे के ‘भांडारकर पौर्वात्य संस्थान’ ने चालीस वर्षों तक सतत परिश्रम करके महाभारत का प्रामाणिक पाठ तैयार किया है और इसी प्रकार बड़ौदा के ‘महाराजा सयाजी राव विश्वविद्यालय’ ने चौबीस वर्षों के श्रमपूर्ण संशोधन और अध्ययन के बाद रामायण का प्रामाणिक पाठ तैयार किया है।

किंतु इससे यह नहीं हुआ कि इन पाठों को आखिरी मानकर सबने स्वीकार कर लिया हो और उनके अलावा समस्त उपलब्ध पाठ सदा के लिए विस्मृति के गर्त में चले गए हों। विद्वानों, बौद्धिकों तथा अति बौद्धिकों में इन दोनों ग्रंथों के असंख्य पात्रों और प्रसंगों के बारे में अविरल विवाद चलता ही रहता है। चलता ही रहेगा। इन दोनों ग्रंथों में जो कुछ लिखा गया है, वह शत-प्रतिशत सत्य है और जो बातें सामान्य बुद्धि को सहज रीति से मान्य नहीं हो सकतीं, उनको भी पूर्ण श्रद्धा से स्वीकार करनेवाले भक्त मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, कृष्ण की सोलह हजार एक सौ आठ पत्नियां और नौ लाख अस्सी हजार पुत्र होने के तथ्य को प्रत्यक्ष रूप में इन महाग्रंथों के अक्षरों में कोरी आँख से देखना संभव नहीं है और बाइनाक्यूलर की सहायता से पढ़नेवाले कितने ही विद्वान इन कथनों के असामान्य अर्थ भी निकालते हैं। उदाहरण के लिए, एक विदुषी महिला ने लिखा है कि युधिष्ठिर कुंती और विदुर के समागम से उत्पन्न हुए थे। इस बात के समर्थन में वह लिखती हैं-‘कुंती अधिकतर समय हस्तिनापुर में विदुर के घर में ही रहती थीं और व्यास ने एक बार कहा है कि मेरे से जो धर्म विदुर में उत्पन्न हुआ, उस धर्म का विदुर ने युधिष्ठिर में विस्तार किया। ‘रामायण के बारे में भी ऐसा ही हुआ है। वाल्मीकि ने लिखा है कि ‘हनुमान का आवास स्त्रियों से शोभायमान था, हनुमान ब्रह्मचारी नहीं थे।’ एक विद्वान ने लिखा है कि ‘यहाँ तक का अर्थ-घटन अधूरा है। बंबई में वडाला के हनुमानजी का पूजन गर्भवती स्त्रियाँ पुत्र-प्राप्ति के लिए करती हैं, यह इसका सूचक है।’

जो बात पात्रों और प्रसंगों के बारे में है, वही भूगोल के बारे में भी है। कल तक सिलोन अथवा श्रीलंका को रावण की राजधानी मानने के बाद आज मध्य प्रदेश के एकाध गाँव को रामायण की लंका के रूप में सिद्ध करने का संशोधन हुआ ही है। आखिर में उड़ीसा के किसी गाँव को ही रावण की राजधानी होने की बात भी पढ़ी है। कृष्ण की मूल द्वारका कौन-सी है। इस बारे में विवादों का कोई अंत नहीं आया है और कुरुक्षेत्र के मैदान में जहाँ कृष्ण ने अर्जुन को ‘गीता’ का उपदेश दिया, उस खास स्थान को ढूँढ़ निकालने के लिए हरियाणा सरकार ने जिस पुरस्कार की घोषणा की थी, उसे आज तक किसी ने प्राप्त नहीं किया है।
महाभारत जैसा कुछ घटित ही नहीं हुआ और यह एक तुच्छ कलह की कोरी कवि कल्पना है, यह माननेवाले पश्चिम के विद्वान ‘वेखर’ और ‘लोसन’ मुख्य हैं। महाभारत को वे महाकाव्य के रूप में अवश्य स्वीकार करते हैं; किंतु उसकी ऐतिहासिकता को अस्वीकार करते हैं। महाभारत और रामायण को पश्चिम की प्रजा के सामने प्रस्तुत करने के लिए होमर के ‘इलियड’ और ‘ओडीसी’ का उदाहरण पेश किया जाता है। यह कोई गलत नहीं है। किंतु यह गिरनार के सामने अँगुली दिखाकर हिमालय के बारे में ज्ञान कराने जैसा दुष्कर कार्य है। होमर का अथवा उसकी रचना का महत्त्व कम करने की यह चेष्टा नहीं है; किंतु हिमालय की दिव्यता और उसके सौंदर्य की झाँकी कराने का प्रयास है। गिरनार की अपनी गूढ़ता है तो हिमालय की अपनी भव्यता है। विश्व साहित्य में रामायण और महाभारत का जो स्थान है, उनकी तुलना किसी अन्य ग्रंथ से नहीं हो सकती। रामायण और महाभारत के बारे में इतनी प्रस्तावित चर्चा के बाद अब हम अपनी अभिप्रेत मूल बात पर आते हैं। यहाँ मैंने जो लिखने की बात सोची है, वह सब श्रीकृष्ण के संबंध में ही है। स्वाभाविक रूप में इसके कारण महाभारत केंद्र स्थान में रहेगी; हालाँकि वेदव्यास ने महाभारत कोई कृष्ण की कथा कहने के लिए नहीं लिखी है।

 कृष्ण तो इस महाग्रंथ के एक पात्र मात्र हैं और द्रौपदी स्वयंवर के पहले वह कहीं दिखाई भी नहीं देते। कृष्ण के बारे में आज तक सैकड़ों लेखकों ने सैकड़ों ग्रंथ लिखे हैं: किन्तु कोई नहीं कह सकता कि उनके बारे में सबकुछ लिखा जा चुका है। अभी सैकड़ों वर्षों तक लिखते रहें तो भी यह पूरा होने वाला नहीं है। थोड़े वर्षों पहले हिमालय यात्रा में बारह हजार फीट की ऊँचाई पर एक साधु ने हिमालय की पहचान कराते हुए एक सुंदर बात कही थी-‘हिमालय मानव के गर्व का खंडन करता है। पाँच हजार फीट की ऊँचाई पर बड़ी मुश्किल से पहुँचते हैं और वहीं उससे भी ऊँचा शिखर आपकी प्रतीक्षा में खड़ा नजर आता है। इस शिखर पर भी आप चढ़ जाएँ और आपको प्रतीत हो कि आपने दस हजार फीट ऊंचे शिखर पर विजय प्राप्त कर ली है, तब आपको एक अन्य दस हजार फीट ऊँचा शिखर यह प्रतीति कराता है कि आप अभी तलहटी में ही खड़े हैं।’ जो बात साधु ने हिमालय के बारे में कही थी, वही महाभारत पर अक्षरश: लागू होती है, कृष्ण के विषय में तो विशेष रूप से।

आभार है नानाभाई भट्ट का, जिन्होंने लगभग चार दशाब्दी पहले पहली बार कृष्ण का परिचय कराया था। चार दशाब्दी पूर्व का यह परिचय तीन वर्ष पहले लिखी एक नकल कथा की पूर्व तैयारी के समय इतना प्रगाढ़ हो गया कि उसके बाद मैंने कृष्ण के बारे में, जो भी साहित्य उपलब्ध था उसे, पढ़ना शुरू कर दिया। जैसे-जैसे देखता गया, विचार करता गया, उन सबको प्रकट विचारण के रूप में यहाँ लिपिबद्ध किया है। इसे कोई संशोधन न कहें, मौलिक अर्थ-गहन अथवा विद्वता जैसे भारी-भरकम शब्दों से भी न पहचानें-यह तो एक दर्शन है, मात्र कृष्ण दर्शन। मैंने यह दर्शन किया है, इसमें सहभागी होने का सहृदयों को एक निमंत्रण है।

ऋग्वेद संहिता में कृष्ण के नाम का उल्लेख जरूर मिलता है; किंतु यह नाम तो उसमें एक असुर राजा का है।  बौद्ध और जैन धर्मग्रंथ तो कृष्ण को बिलकुल अलग रीति से पहचानते हैं। जिस कृष्ण का हमें यहाँ दर्शन करना है, वह कृष्ण तो मुख्य रूप से महाभारत के हैं। हरिवंशपुराण के हैं, श्रीमद्भागवत के हैं और विष्णुपुराण एवं ब्रह्मवैवर्तपुराण के मुख्य रूप से, तथा पद्मपुराण अथवा वायुपुराण जैसे किसी पुराण के अंश रूप हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि यह दर्शन भी संपूर्ण है। लेखक की दृष्टि आंशिक हो सकती है कहीं रुचि-भेद से प्रेरित दृष्टि भी हो सकती है और कहीं इस दृष्टि की साहसिक मर्यादा भी हो सकती है।
‘श्रीकृष्ण-डार्लिंग ऑफ ह्युमेनिटी’ नामक एक ग्रंथ में उसके लेखक ए.एस.पी.अय्यर ने एक सरस कथा लिखी है। एक अति बुद्धिशाली व्यक्ति को कृष्ण के अस्तित्व के बारे में शंका थी। उन्होंने एक संत के सामने अपनी शंका प्रस्तुत की-
‘मुझे प्रतीत होता है कि कृष्ण कोरी कल्पना का पात्र है। वास्तव में ऐसा कोई पुरुष हुआ ही नहीं।’ उन्होंने कहा।
‘यह बात है ? क्या आपका वास्तव में अस्तित्व है ?’ संत ने जवाबी प्रश्न किया।
‘अवश्य।’ उस विद्वान ने विश्वासपूर्वक कहा।
‘आपको कितने मनुष्य पहचानते हैं ?’
‘कम-से-कम पाँच हजार तो अवश्य। मैं प्रोफेसर हूँ, विद्वान हूँ, लेखक हूँ, आदि।’
‘अच्छा-अच्छा ! अब यह कहिए कि कृष्ण को कितने मनुष्य पहचानते हैं ?’
‘करोड़ों, कदाचित् अरबों भी हो सकते हैं।’ विद्वान ने सिर खुजलाया।
‘और यह कितने वर्षों से ?’

‘कम-से-कम इस काम को तीन हजार वर्ष तो हुए ही हैं।’
‘अब मुझे यह कहिए कि चालीस वर्ष की आपकी आयु में जो पाँच हजार मनुष्य आपको पहचानते हैं, उनमें से कितने आपको पूजते हैं ?’
‘पूजा ? पूजा किसकी ? मुझे तो कोई पूजता नहीं ?’
‘और कृष्ण को तीन हजार वर्षों बाद भी करोड़ों मनुष्य अभी भी पूजते हैं। अब आप ही निर्णय करें कि वास्तव में आपका अस्तित्व है अथवा कृष्ण का।’
जिनके स्मरण मात्र से अस्तित्व का अहंकार भी मिट जाता है, ऐसे कृष्ण के दर्शन की बात आगे करेंगे।

राज्यविहीन यादव

कृष्ण जन्म के समय के तत्कालीन आर्यावर्त्त पर एक विहंगम दृष्टि डालें। सप्त सिंधु से लगाकर गंगा-यमुना के विशाल, फलद्रुम मैदानों में आर्य फैल चुके थे। यह सही है कि रामायण काल महाभारत के काल के पहले का है; किंतु रामायणकालीन आर्य विंध्य को पार करके दक्षिण में गए थे, ऐसी व्यापक मान्यता है। इसके विपरीत, महाभारत काल रामायण काल के पीछे का काल होने पर भी इस समय के पात्र कहीं भी दक्षिण में गए हों, इसका विश्वसनीय उल्लेख नहीं मिलता। सिंधु नदी के पश्चिम में फैला हुआ सिंध का आर्यावर्त्त के तत्कालीन इतिहास में थोड़ा भी उल्लेखनीय भाग नहीं है। रामायण में दक्षिण का जो उल्लेख है, वह विश्वसनीय नहीं और लंका आज का सिलोन नहीं, प्रत्युत मध्य प्रदेश का एक गाँव है। इस मान्यता के मूल में, यह बात है कि रामायण के पीछे कितने ही लंबे समय बाद हुए महाभारत के पात्र दक्षिण से अपरिचित हैं। इसमें निहित तर्क को स्वीकार किए बिना चल नहीं सकता। पांडवों के वनवास की अवधि में अर्जुन तीर्थाटन करते हुए, कृष्ण अपनी अपूर्व भूमिका में कभी भी दक्षिण के किसी स्थान में गए नहीं, अत: आर्यावर्त्त था विंध्य के उत्तर का भूखंड, पश्चिम में द्वारका, पूर्व में प्राग्ज्योतिषपुर अर्थात् आज का असम और उत्तर में सिंधु नदी के आसपास का क्षेत्र-इसमें हिमालय का समावेश अवश्य हो जाता है। गांधार अर्थात् आज का अफगानिस्तान विदेश है और सिंध का राज्य आर्यावर्त्त तथा गांधार के बीच आज की भाषा में एक ‘बफर स्टेट’ होगी, ऐसी संभावना है।

इस आर्यावर्त्त में फैल चुके आर्य दल अपने-अपने भूखंडों की सीमाएँ निर्धारित कर चुके थे और अपनी सामर्थ्य एवं शक्ति से इन भूखंडों के राजा सिंहासनारूढ़ हो चुके थे। गणतंत्रों और आर्य दलों के बड़ों की सलाह से चलने वाले शासन तेजी से गत काल की घटना बन चुके थे। हस्तिनापुर, मगध, चेदि, प्राग्ज्योतिषपुर, कलिंग आदि अनेक राज्य अस्तित्व में आ चुके थे। उस समय अनेक राज्य अवश्य थे; किंतु इनमें कोई साम्राज्यवादी कल्पना अभी दृढ़ नहीं हुई थी। समर्थ राजा पड़ोसी राज्य को परास्त करने में गौरव अवश्य अनुभव करते; किंतु यह तो मात्र आधिपत्य को स्वीकार कराने के अहं को संतोष देने तक ही सीमित था। किसी राज्य को खालसा करके उस भूमि को पचा लेने का कार्य पराक्रम नहीं प्रत्युत्त निंद्य गिना जाता था। यह अधर्म था, अक्षम्य था, तिरस्कृत था। साम्राज्यवादी मानस का उदय मानव सहज था; कारण स्वयं जिसे सामर्थ्य से प्राप्त किया हो, उसका उपभोग न करके तत्कालीन नीति की मर्यादाओं के अंतर्गत उसका त्याग कर देना समर्थ मनुष्य को पसंद आनेवाली बात न थी और इसीलिए कहा जा सकता है कि ये साम्राज्यवादी परिबल अपने उदय काल में थे। मगध का जरासंध इसका विशेष उदाहरण था।
इस संदर्भ में कुरुक्षेत्र के महायुद्ध के अंत में महर्षि वेदव्यास विजेता राजा युधिष्ठिर को कहते हैं-‘हे युधिष्ठिर ! जो-जो राजा इस युद्ध में मारे गए हैं, उनकी रानियों को सांत्वना देने के लिए दूत भेजो, उनके पुत्रों का राज्याभिषेक करो। यदि पुत्र न हो और रानी सगर्भा हो तो राज्य के संचालन का काम सँभालने के लिए योग्य मनुष्यों को नियुक्त करो। (महाभारत, शांतिपर्व, 34/31-33)

इस तरह एक ओर स्थिर हो चुके राज्यों की विभावना, दूसरी ओर उदयमान हो रही साम्राज्यवादी विभावना और उनके बीच आर्यों के आगमन के साथ गणतंत्र की जो उज्जवल विभावना थी, उसको चरितार्थ करनेवाले अथवा चरितार्थ करने का संघर्ष करनेवाले यादव थे और इन यादवों का राज्य मथुरा था। यादव मथुरा के साथ और इस मथुरा का इतिहास इक्ष्वाकुवंश के राजा रामचंद्र के लघु भ्राता शत्रुघ्न के साथ जुड़ा हुआ है। यह उल्लेख मिलता है कि शत्रुघ्न ने मथुरा को जीता था और इक्ष्वाकुवंशियों को यहाँ बसाया था।
यादवों का गणतंत्र गणतंत्रों के इस इतिहास का अंतिम अवशेष प्रतीत होता है। कारण, कृष्ण के बिदा होने के पश्चात् राजाओं की परंपरा ही चली है। यादव राज्यविहीन थे, इस विषय में शिशुपाल ने राजसूय यज्ञ के समय कृष्ण की पूजा का विरोध करते हुए कहा था-‘यादवों में कोई राजा नहीं है तो फिर कृष्ण को किस प्रकार कहा जा सकता है ? कृष्ण राजा नहीं हैं, अत: राजा के रूप में उसे अर्घ्य नहीं दिया जा सकता।’

यादव राज्यविहीन थे, इस विषय में एक कथा भी है। शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी एवं असुर कन्या राजकुमारी शर्मिष्ठा-इन दो स्त्रियों के साथ संसार का भोग करते हुए राजा ययाति को गुरु शुक्राचार्य के शाप से असमय में ही वृद्धत्व प्राप्त हुआ। ययाति की देह वृद्ध हुई, किंतु मन अभी वृद्ध नहीं हुआ था। कृपा करके शुक्राचार्य ने शाप का निवारण का मार्ग सूचित किया-‘यदि तेरा वृद्धत्व तेरा कोई पुत्र ले तो उसके बदले में उसका यौवन तुझे मिल जाएगा।’
‘कामातुराणां न भयं लज्जा’ इस न्याय से विषयों के उपभोग के लिए लज्जा का त्याग करके ययाति ने अपने पुत्र यदु से कहा-‘पुत्र, मेरे वृद्धत्व के बदले में तुम अपना यौवन मुझे दे दो।’ यदु ने पिता की यह अनोखी माँग स्वीकार नहीं की। इससे रोष से भरे पिता ने पुत्र को शाप दिया-‘अराज्या ते प्रजामूढ़ा।’ (तेरे वारिस राज्यविहीन रहेंगे।) इस यदु के पुत्र ही यादव हुए और इसलिए ये यादव राज्यविहीन थे।
किंतु गणतंत्र कोई पूर्ण राज्य-पद्धति तो नहीं है। गणतंत्र की भी अपनी मर्यादाएँ हैं। ये मर्यादाएँ ही स्वेच्छाचारी राजाशाही और उसमें से विकसित होने वाले साम्राज्यवाद की जननी हैं। यह स्मरण रखना चाहिए कि जर्मनी में, आधुनिक काल में, हिटलर का विकास गणतांत्रिक पद्धति से ही हुआ था। यह तथ्य भी स्मरण रखने योग्य है कि हजारों वर्ष पहले तत्कालीन इतिहास में मथुरा के गणतंत्र में से कंस का विकास हुआ था।

यादव वंश के विविध कुलों-वृष्णि, भोजक, अंधक आदि–में पूजनीय माने जानेवाले वयोवृद्ध उग्रसेन, वसुदेव एवं अक्रूर-सब निर्वीर्य होकर इस तरह स्तब्ध हो गए कि उग्रसेन के पुत्र कंस ने मथुरा के गणतंत्र का नाश कर डाला; स्वयं अपने पिता उग्रसेन को कारागार में डाल दिया और वसुदेव को जेल में पहुँचा दिया। अक्रूर समय का अनुसरण करके कंस के अनुकूल हो गए। आज भी गणतंत्र जब किसी पाली हुई गाय के समान हो जाते हैं तो गणतंत्र के अनेक मुखिया उस तानाशाह की गाड़ी में बैठकर लाभ उठाते हुए दिखाई दे जाते हैं। अक्रूर उनके पूर्वज ही कहे जा सकते है। किंतु कंस ने ऐसा किस प्रकार किया ?
पिता उग्रसेन और यादव परिवारों के प्रति उग्र प्रकोप किसलिए ? स्वयं गणतंत्र निर्वीर्य किस प्रकार हो गया ? लाख रुपये के इस प्रश्न का जो उत्तर मिलता है, उसका मूल्य वर्तमान संदर्भ में भी कम नहीं है।



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