खण्डहर बोल रहे हैं - भाग 2 - गुरुदत्त Khandahar Bol Rahe Hai 2 - Hindi book by - Gurudutt
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खण्डहर बोल रहे हैं - भाग 2

गुरुदत्त

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :356
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5544
आईएसबीएन :000000

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प्रस्तुत है एक रोचक उपन्यास

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Khandahar Bol Rahe Hai -2

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रथम परिच्छेद

विश्वनाथ पंत, औरंगज़ेब के आगरा पर आक्रमण के समय, उसके परिवार की रक्षा के लिए औरंगाबाद में लगभग एक वर्ष तक रहा था। यद्यपि वह अपने समाचार पूना भेजता रहा, इस पर भी वह स्वयं पूना आ नहीं सका था।

वहां ठहरने में अपनी नीति का वर्णन भी उसने अपने एक पत्र में शिवाजी को किया था। यह पत्र उसने ‘धरमत’ के युद्ध से पहले भेजा था। इस पत्र में उसने लिखा था, ‘‘महाराज मैं अपने विचार से, पूना के हिन्दू राज्य की नीति के संचालन में ही यहाँ ठहरा हुआ हूँ। औरंगजेब अपने पिता को जीवित पकड़कर बंदी बनाने के लिए आगरा जा रहा है। अपने पिता को बन्दी बनाकर वह स्वयं शहंशाह बनने का विचार कर रहा है। परन्तु उसके मार्ग में कठिनाइयाँ बहुत हैं। यद्यपि लोमड़ी की भाँति मक्कार होने से, वह अपने उद्देश्य में सफल होने की आशा करता है, परन्तु वह जानता है और मैं भी जानता हूँ कि

कठिनाइयाँ हिमालय के समान बड़ी-बड़ी हैं। अतः उसने मुझे और आपको अपनी पराजय के समय सम्भावित ‘पनाह’ का स्थान स्वीकार कर ही मुझे अपनी बेगमों और बच्चों का संरक्षक बनाया है। मैं भी इसी आशा में यदि भारत में पुनः हिन्दू-साम्राज्य स्थापित होना है तो यह अवसर सहायक हो सकता है, यहाँ ठहरा हूँ।

‘‘औरंगजेब ने जाने से पूर्व मुझे यह कहा था, ‘खुदा न खास्ता अगर शिकस्त का मुँह देखना पड़ा तो मेरी बेगमों और उनके बच्चों को पूना ले जाना और मैं वहाँ पहुँच जाऊँगा। तब मैं आपके राज्य से, अपनी सल्तनत वापस लेने में मदद मागूँगा।
अतः महाराज, मैं यहाँ ठहरा हूँ और अवसर की प्रतीक्षा में हूँ।’’

यह अवसर नहीं आया। धरमत की लड़ाई का वृत्तान्त सुन विश्वनाथ और पूना का मंत्री-मण्डल इस परिणाम पर पहुँच गया कि औरंगजेब और हिन्दुस्तान में गैर-इस्लामी ताकतें अभी दुर्बल हैं। दारा का युद्ध इस्लामी और गैर-इस्लामी ताकतों का युद्ध बन गया है। अतः पूना से विश्वनाथ को पत्र लिखा गया कि औरंगजेब की विजय निश्चित है, इसलिए उसकी योजना को अवसर नहीं मिल सकेगा। उसे अब शीघ्रातिशीघ्र लौट आना चाहिए।

इस पर भी विश्वनाथ को वहाँ से विदा होने में समय लग गया। बेगमों के साथ जाने वाला कोई मिल नहीं रहा था। साथ ही औरंगजेब की एक बेगम गर्भवती थी और उसके बच्चा होने वाला था। प्रतीक्षा के दिनों में सोमूगढ़ का युद्ध भी जीता गया और आगरा पर औरंगजेब का अधिकार हो गया। मुराद बख्श कैद कर ग्वालियर भेज दिया गया। उस समय तक विश्वनाथ बेगमों को अपनी सेवाओं से प्रसन्न कर चुका था। हिदायतुल्ला पर भी वह ऐसा प्रभाव उत्पन्न कर चुका था कि वह अपनी भलाई विश्वनाथ के साथ रहने में ही मानने लगा था।
एक दिन तो बात बहुत ही स्पष्ट हो गई थी। हिदायतुल्ला ने पूछा था—
‘‘मामाजी ! आप हमारे साथ दिल्ली चलेंगे न ?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘अगर मैं वहाँ गया तो मुझे कैद कर लिया जायेगा। ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारी माँ को कैद किया हुआ है।’’
‘‘उसे क्यों कैद किया हुआ है ?’’
‘‘इसलिए कि जब तुम्हारे ये अब्बाजान अपने बाप को मार कर शहंशाह बन जायेंगे, तब तुम्हारी माँ से शादी कर सकें।’’
‘‘और माँ वहाँ कैद क्यों हैं ? वह भाग क्यों नहीं जाती ?’’
‘‘इसलिए कि वह भाग सकती नहीं। उस पर बहुत कड़ा पहरा रहता है।’’
‘‘यह तो जुल्म है।’’
‘‘और तुमको भी उसने यहाँ अपने पास रखा हुआ है’, यह इसलिए कि अगर तुम्हारी माँ उससे शादी करना मंजूर न करे तो तुमको उसके सामने मारा-पीटा जाये और मार डालने की धमकी दी जाये जिससे वह तुम्हारे मोह में उससे शादी करने पर मजबूर हो जाए।’’
‘‘तो अब्बाजान बहुत बुरे आदमी हैं क्या ?’’
‘‘जो अपने बाप को मारने चल पड़ा है, वह तुमसे क्यों रियायत करेगा ? तुम तो उसके कुछ नहीं लगते।’’
‘‘मगर उसका बाप तो काफिर है और काफिर को मारना सवाब है।’’
‘‘देखो हिदायत ! शहंशाह काफिर है या नहीं, मैं नहीं जानता। मगर मैं एक काफिर का लड़का हूँ और इस्लाम को गलत मजहब समझता हूँ। इस पर भी तुम्हारे अब्बा मुझको मारना तो दूर, अपनी बेगमों और बच्चों को मेरी देखरेख में रख गए हैं।’’
‘‘मैं समझ नहीं सका कि ऐसा क्यों है ?’’
‘‘तुम्हारे अब्बाजान शहंशाह के खिलाफ इसलिए नहीं कि वह एक काफिर है। काफिर तो मैं भी हूँ। वह उसके खिलाफ इसलिए है कि उसका बाप उसकी नफसानी ख्वाहिशाह के रास्ते में रुकावट बन रहा है।’’
‘‘नफसानी ख्वाहिशाह क्या होती है ?’’
‘‘जिस्मानी सुख-आराम वगैरा की ज़रूरतें।’’
‘‘शहंशाह उसकी कौन-सी जिस्मानी ख्वाहिश में रुकावट डाल रहे थे ?’’
‘‘मसलन तुम्हारी माँ से शादी करने में रुकावट डाल रहे हैं।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘इसलिए कि तुम्हारी माँ इस शादी को पसन्द नहीं करती। वह एक हिन्दू की बेटी है और मुसलमान से शादी नहीं करना चाहती।’’
उस दिन बात इससे ज्यादा तो न हो सकी। मगर विश्वनाथ हर रोज़ सुबह हिदायतुल्ला को साथ ले दौलताबाद की तरफ घूमने चला जाया करता था। वह कभी-कभी उसको लेकर अपने गाँव ‘जाँव’ में भी जाया करता था और वहाँ अपने परिचितों से मिला करता था।
उक्त वार्तालाप ने हिदायत के मन में एक भय उत्पन्न कर दिया था। वह अपने मामा की बातें सुन, उसमें अपनी बुद्धि से जोड़-तोड़ लगाने लगा था। इस पर भी इस सब जोड़-तोड़ में उसका मन किसी ठोस परिणाम पर नहीं पहुँच सका था। अतः इसके कुछ दिन उपरान्त वह विश्वनाथ के साथ ‘जाँव’ की ओर जाते हुए पूछने लगा, ‘‘मामा ! शाही खानदान की लड़कियाँ शादी नहीं करती क्या ?’’
‘‘अपनी अम्मी से पूछना था। मैं तो समझता हूँ कि वे शादी तो करती हैं मगर अपने शौहर के घर नहीं जा सकतीं।’’
विश्वनाथ इस नौ वर्ष के लड़के के मन में इस बात के पूछने का कारण जानना चाहता था। वह प्रश्न-भरी दृष्टि से उसके मुख पर देखने लगा। कुछ देर तक विचार कर हिदायत ने पूछ लिया, ‘‘आप बदरुन्निसा को जानते हैं ?’’
‘‘नहीं; वह कौन है ?’’
‘‘अब्बाजान की एक लड़की है।’’
‘‘कितनी बड़ी है ?’’
‘‘कद में मेरे बराबर लगती है। मगर अम्मी कहती हैं कि मुझसे उमर में बड़ी है।’’
‘‘वह कभी बाहर तो आई नहीं। मैं उसे कैसे जान सकता हूँ ?’’
‘‘वह आपको जानती है।’’
‘‘कैसे जानती है।’’
‘‘ज़रूर चिक के पीछे से देखती होगी, जब आप अम्मी से बात करने आते हैं।’’
‘‘तो क्या कहती है ?’’
‘‘कहती थी कि वह मुझसे मुहब्बत करती है।’’
‘‘तुम्हारी बहन जो है।’’
‘‘नहीं मामा ! वह कहती है कि वह मेरी बीबी बनेगी।’’
‘‘कैसे बनेगी ?’’
‘‘कहती थी कि वह कुछ और बड़ी होगी और मैं भी बड़ा हो जाऊँगा तो वह मेरी बीवी बन सकेगी।’’
‘‘तब तो ठीक है। मगर जब तुम विवाह करने के लायक होगे, वह बूढ़ी हो जायेगी।’’
इस पर हिदायत हँस पड़ा। हँसकर बोला, ‘‘वह कहती है कि बूढ़ी औरतें भी शादी करती हैं। पर मैंने अम्मी को कहते सुना है कि शाही खानदान की लड़कियाँ शादी नहीं करतीं।’’
‘‘शादी तो कर सकती हैं, परन्तु शादी करने के बाद दामाद मार डाले जाते हैं। मगर क्या तुम उससे शादी करना चाहते हो ?’’
‘‘पर मैं तो सोच रहा हूँ कि मैं दिल्ली जाऊँ ही नहीं। वहाँ मैं मार डाला जाऊँगा।’’
विश्वनाथ विस्मय में हिदायत का मुँह देखने लगा। हिदायत भूमि की ओर देख रहा था। विश्वनाथ ने पूछ लिया, ‘‘तो मेरे साथ पूना चलोगे ?’’
‘‘पर अम्मी जाने नहीं देंगी।’’
‘‘तुम चलना चाहते हो तो मैं कोशिश कर सकता हूँ।
‘‘पर मामा ! बदरुन्निसा को भी ले चलेंगे ?’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘मैं उससे शादी करूँगा।’’
‘‘तब तो तुमको उसका बाप जरूर ही मरवा डालेगा।’’ इतना कह विश्वनाथ हँस पड़ा। फिर कुछ विचार कर उसने पूछा, ‘‘परन्तु क्या तुम भी उससे मुहब्बत करने लगे हो ?’’
‘‘वह मुझको अपने गले लगाती है। मेरा मुख चूमती है और प्यार करती है।’’
‘‘मैं समझता हूँ वह ठीक लड़की नहीं है।’’
‘‘नहीं मामा, बहुत अच्छी है वह ! वह कभी-कभी मेरे साथ भाग चलने की बात भी करती है। वह कहती है कि जब मैं उसे भगा ले चलने के लायक हो जाऊँगा, तब वह भागेगी।’’
‘‘देखो हिदायत ! वह अच्छी लड़की नहीं है, जो बाप के घर से भागना चाहती है। साथ ही वह अभी भाग ही नहीं सकती। तुम भागना चाहो तो मैं तुमको ले चलूँगा।’’
‘‘अम्मी से पूछ लूँ ?’’
‘‘तुम मत पूछना। नहीं तो वह तुमको मेरे साथ यहाँ घूमने भी नहीं आने देगी।’’
इससे हिदायत सहम गया।
बेगम दिलरस के लड़का हुआ तो वह बहुत दुर्बल हो गई। इन दिनों औरंगजेब के अपने वालिद की कैद करने और मुराद भाई को धोखा देकर ग्वालियर के किले में बन्द कर देने का समाचार आया। विश्वनाथ ने बेगमों को सुनाया। बेगमें बैठकघर और हरम के बीच के द्वार पर चिक डलवा कर, चिक के पीछे बैठी जंग की बातें सुना करती थीं। विश्वनाथ ने मुराद के साथ खेले गए धोखे की बात सुनाई तो दिलरस बेगम को प्रसव के कारण बहुत दुर्बल हो गई थी, दिल बैठ जाने से वहीं चिक के पीछे ही मर गई।
इस घटना का, पूर्ण हरम पर भारी प्रभाव पड़ा। अब नवाब बाई ही विश्वनाथ से बातचीत करने आने लगी। जब विश्वनाथ ने सुना कि मीर जुमला औरंगा बाद आ रहा है और यहाँ से ही आगरा जाने वाला है, तो उसने यही उचित समझा कि वह यहाँ से ही चल दे। उसने बेगम को कहला भेजा कि उसे एक अत्यावश्यक विषय पर बात करनी है। इस पर नवाब बाई चिक के पीछे खड़ी हुई और विश्वानाथ से पूछने लगी, ‘‘क्या बात है, पण्डितजी ?’’
विश्वनाथ ने झुककर चिक को सलाम कर दी और कहा, ‘‘पूना से मालिक की चिट्ठी आयी है कि फौरन वहाँ हाजिर हो जाऊँ। साथ ही मीर जुमला साहब यहाँ आ रहे हैं और वे आपको वहाँ पहुँचा देंगे।
‘‘मगर हमारी इस मुसीबत के वक्त, तुम्हारी की गई खिदमत का हम तुम्हें इनाम दिलवाना चाहती हैं। वह यहाँ नहीं हो सकता।’’ नवाब बाई ने कहा।
‘‘हुजूर ! मैंने जो कुछ भी सेवा की है वह इनाम के लोभ में नहीं की। शहंशाह आलमगीर मुझे अपना दोस्त मानते हैं और मैं उनकी दोस्ती के एवज में ही यहाँ ठहरा था और उसी दोस्ती की खातिर मैं खिदमत कर रहा था।’’
‘‘फिर भी कुछ तो देना ही चाहिये।’’
‘‘अगर हुजूर देना ही चाहती हैं तो एक अर्ज है। वह कर सकें तो जिंदगी-भर आपका एहसान मानूँगा। और वह आप यहीं कर सकती हैं।’’
‘‘बताओ, क्या चाहते हो ?’’
‘‘यह हिदायत को मेरे साथ कर दीजिये। वह मेरे खून का हिस्सा है। और फिर यहाँ हरम में रहता हुआ वह बिगड़ रहा मालूम होता है।’’
‘‘क्या बिगाड़ हो रहा है उसमें ?’’
‘‘वह बेवकूफ लड़का एक बदरुन्निसा लड़की से उल्फत महसूस करने लगा है।’’
इस पर नवाब बाई चुप कर गयी। विश्वनाथ उसकी ओर से किसी जवाब की प्रतीक्षा में खड़ा रहा।
आखिर नवाब बाई बोल उठी, ‘‘लड़का बदतमीज होता जा रहा है।’’
‘‘हुजूर, नौ साल का एक लड़का क्या जानता है इन बातों को ! वह तो इस उल्फत को एक खुदाई बरकत समझ रहा है। मगर हरम में रहते हुए वह चार-पाँच साल में इस जज्बात के दूसरे मायने समझने लगेगा। मेरी अर्जी है कि उसको अभी से मेरी देखरेख में कर दिया जाये और उसके जवान होने पर मैं उसे शहंशाह की खदमत के लिए हाजिर कर दूँगा।’’
नवाब बाई ने उत्तर दिया, ‘‘अगर वह जाना चाहता है तो ले जाओ।’’
बेगम समझती थी कि दो-तीन साल में लड़की इसके इश्क में फँस गयी तो मामला टेढ़ा हो जायेगा। विश्वनाथ ने कह दिया—
‘‘मैं उसको अपने साथ चलने के लिए राजी करने की कोशिश करूँगा। मैं आपकी इस इज़ाजत के लिए आपका निहायत ही मश्कूर हूँ।’’
नवाब बाई यह समझी थी विश्वनाथ उनके साथ दिल्ली तक तो चल ही रहा है। वहाँ उसे शहंशाह की भी इजाजत लेनी होगी। मगर एक बात उसने कर दी कि हिदायत को अब हरम से बाहर रहने और सोने की आज्ञा दे दी। इस पर हिदायत को विस्मय हुआ। उसने विश्वनाथ से इसका कारण पूछा तो विश्वनाथ ने कह दिया, ‘‘इसका मतलब यह है कि तुम मेरे साथ पूना चलोगे।’’
‘‘और बदरुन्निसा ?’’
‘‘जब तुम पन्द्रह साल के हो जाओगे तो तुम उससे विवाह कर सकोगे। इस पर हिदायतुल्ला प्रसन्न रहने लगा।
बेगमें दिल्ली की लंबी यात्रा की तैयारी कर रही थीं कि मीर जुमला साहिब वहाँ आ पहुँचे। उनके आते ही विश्वनाथ ने वहीं से छुट्टी पाने की अर्जी कर दी। इस बार मीर जुमला आया तो अपनी बेगमों को भी साथ लेकर आया था। इससे विश्वनाथ को छुट्टी मिलने में और भी आसानी हो गई।
विश्वनाथ ने छुट्टी ली और पूना जा पहुँचा। वहाँ उसने हिदायत को अपनी पत्नियों की देखरेख में रखा और शिवाजी की आज्ञा से पंजाब की अवस्था देखने के लिए चला गया।
पंजाब से वह लौटा तो राज्य-सभा बुलाई गई और भविष्य की योजना बनने लगी।

:2:


राज्य-सभा में विश्वनाथ ने पंजाब की स्थिति के विषय में अपनी सूचना प्रस्तुत कर दी। उसने बताया, ‘‘महाराज के आदेशानुसार में यह पता करने आया था कि गुरु के सिक्ख पंजाब में मुसलमानों को कितना व्यस्त रख सकते हैं और अगर हो सके तो उनको छापा-मार युद्ध की शिक्षा दी जाये, जिससे वे दिल्ली के शहंशाह की तवज्जो अपनी ओर खींच सके। और हम अपने राज्य को और विस्तार दे सकें।
‘‘दिल्ली में बाप-बेटे और भाइयों के झगड़े में हमने उत्तरी कोंकण पर अधिकार कर लिया है। थाना और कोलाबा अब हमारे अधिकार में है। इस समय कल्याण और भवण्डी पर हमारा भगवा फहरा रहा है और यहाँ हम अपनी सागर की सेना तैयार करेंगे।
‘‘अतः हमारा विचार था कि यदि सिक्ख मुगलों की तवज्जो अपनी ओर खींच सके तो मुगलों को अपने हाथ दिखायेंगे। और जब मुगल इधर आयें तो गुरूजी महाराज अपनी लाम तेज़ कर दें। साथ ही उन्हें अपना राज्य स्थापित करने का ढंग बताना था। इसीलिए मैं वहाँ गया था।
‘‘औरंगज़ेब दारा को लाहौर से आगे धकेलने के लिए गया हुआ था। उसकी सेना दारा का पीछा करती हुई मुल्तान की तरफ बढ़ रही थी।
‘‘मैं गुरूजी की खोज में भटिण्डा, फिरोजपुर और फिर लाहौर होता हुआ अमृतसर जा पहुँचा। वहाँ से पता चला कि गुरूजी दारा को सतलुज नदी के पार करने में सहायता देकर, हरगोविन्दपुर चले गये हैं।
‘‘मैं हरगोविन्दपुर पहुँचा तो मैंने जो कुछ वहाँ देखा, सुना और जाना, उससे निराश होकर ही आया हूँ।
‘‘हमारे यहाँ तो गुरु समर्थ जी स्वयं तलवार नहीं उठाते और उनकी कृपा से हम सब लड़ने-मरने के लिए तैयार हैं। वहाँ गुरूजी स्वयं प्रचार भी करते हैं और समय पड़ने पर लड़ते भी हैं।
‘‘अर्थात् उनमें ब्राह्मण और क्षत्रिय का कार्य एक ही व्यक्ति करता है। यह कुछ आशाजनक नहीं है।
‘‘दूसरी बात जो मैंने देखी, वह उनके धर्मग्रन्थ की है। मूलतः परलोक सुधारने का ग्रन्थ है। उस धर्म-ग्रन्थ में ऐसा भाव कहीं नहीं मिलता जैसा पूज्यपाद समर्थ जी ने अपने दोहों में कहा है। समर्थ जी तो कहते हैं —

धर्मासाठी मरावें, मरोनि अवघ्यांसी मारावें।।
मारितां मारितां ध्यावे। राज्य आपुले।।1।।
मराठा तितुका मलवावा। आपुला राष्ट्र धर्म बाढ़वावा।।
येविशीं न करितां तकवा। पूर्वज हासती।।2।।1

‘‘वहाँ पर उनके हरि मन्दिर में दिन-रात एक गीत गाया जाता सुना है। गाने वाले बहुत मीठा गाते थे। सुनने वाले बहुत श्रद्धा-भक्ति से सुनते थे। अतः मैंने यह गीत लिखा और फिर इसके अर्थ भी जान लिये।
‘‘गीत ऐसा है—
सुणि बड़ा आखे सभु कोई। केवड़ बड़ा डीठा होई।
की मति पाई न कहिया जोई। कहने वाले तेरे रहे समाई।।
बड़े मेरे साहिबा गहिर गंभीरा गुणी गहीरा।
कोई जाणे तेरा केता केवड़ चीरा।।
‘‘इसका अर्थ है, सुना है वह बहुत बड़ा है। सब कहते हैं, उससे बड़ा कौन है ! उससे इतना कुछ पाया है कि कहा नहीं जा सकता। जो कहने वाले हैं उनमें भी तो वह समाया हुआ है। वे मेरे साहब जी बहुत बड़े हैं, गंभीर हैं और बहुत गुणी हैं। कोई नहीं जानता कि वे कहाँ हैं और कितने बड़े हैं।
‘‘यह परमात्मा की भक्ति ही है, परन्तु इसके आश्रय जो देश और राष्ट्र का कार्य है, उसका कहीं भी चिह्न नहीं।’’
‘‘मैं गुरूजी से भी मिला हूँ। बहुत ही शान्त स्वभाव, सरलचित्त तेजोमय व्यक्ति हैं। इस पर भी उनसे बात करने पर सब उत्साह ठण्डा पड़ गया। श्रद्धा तो बड़ी है परन्तु राजनीति के कार्य के लिए उत्साह नहीं बना। वर्तमान गुरु के बाबा ने आक्रमण होने पर तीन बार मुगल सेना से
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1. धर्म हेतु प्राण विसर्जित करो। मृत्यु का आलिंगन करते-करते भी शत्रुओं का संहार करो। राज्य प्राप्ति के लिए प्राण भी विसर्जित हों तो करो और मराठों को संगठित करो। राष्ट्र-धर्म को बढ़ाओ। यदि तुम अपने इस कर्तव्य से च्युत हुए तो पूर्वजों की हँसी के पात्र बनोगे।
लड़ाई की थी और विजय प्राप्त की थी, परन्तु वह झगड़ा हुआ था तीन घोड़ों पर। वह झगड़ा देश अथवा राज्य प्राप्त करने के लिए नहीं था। राज्य की वहाँ शिक्षा ही नहीं है।
‘‘मैं नित्य प्रातः-सायं उनके उपदेश के पीछे उनकी रंगत में रहने लगा था। मैं चाहता था कि जब तक वे स्वयं न पूछें कि मैं कहाँ से आया हूँ और कौन हूँ तब तक उनको अपना परिचय न दूँ। सैकड़ों लोग नित्य नये आते थे। इस कारण कई दिन तक वे मुझे देखते रहे तो एक दिन मुझसे कहने लगे, ‘‘भक्त’, आपको मैं कई दिन से यहाँ देख रहा हूँ और आपने अपना परिचय नहीं दिया।’’
‘‘मैंने अपना मुख खोला, ‘‘महाराज ! वह इसलिये कि परिचय, रुचि रखने वालों को दिया जाता है। बिना इच्छा के परिचय देना तो रेता पर जल की बूँद गिरने के समान होता है।’
‘‘इस पर गुरूजी मुस्कराए और बोले, ‘‘अब तो इच्छा जाग पड़ी है। अतः यह रेते पर जल की बूँद के समान नहीं होगा। सो भक्त ! बताओ, कहाँ के रहने वाले हो ?’’
‘‘मैंने कहा, ‘‘महाराज ! मैं पूना से केवल मात्र आपके दर्शन के लिए आया हूँ।’’
‘‘इस पर गुरूजी आँखें मूँद कुछ स्मरण करने लगे। कुछ देर विचार कर वे बोले, ‘‘वह तो दक्षिण में एक नगर है।’
‘जी।’
‘तो दर्शन हुए ?’
‘महाराज, नहीं। आपके शरीर और तेज को देखा है, परन्तु आपके मन और आत्मा के दर्शन करने की इच्छा कर रहा हूँ।’
‘‘और क्या जाना है अभी तक ?’
‘महाराज, यदि नाराज न हों तो एक बात पूछूँ ?’
‘हाँ भक्त ! पूछो।’
‘आप यह देख नहीं रहे क्या, कि विधर्मियों का राज्य धर्म के प्रसार में बाधक बन रहा है ?
‘‘परन्तु धर्म है कहाँ ? जिस वस्तु का अस्तित्व ही नहीं, उसमें बाधा कहाँ और कैसे हो सकती है ?



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