खण्डहर बोल रहे हैं - भाग 3 - गुरुदत्त Khandahar Bol Rahe Hai 3 - Hindi book by - Gurudutt
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खण्डहर बोल रहे हैं - भाग 3

गुरुदत्त

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :356
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5545
आईएसबीएन :000000

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प्रस्तुत है एक रोचक उपन्यास

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Khandahar Bol Rahe Hain-3

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रथम परिच्छेद

‘‘सब गधे इकट्ठे हे गये हैं।’’ शहंशाह अपनी रिश्ते में अम्मी, परन्तु मन से प्रेमिका और प्रत्यक्ष में बहन महताब बेगम को कह रहा था। शहंशाह अजमेर से अभी-अभी लौटा था और आगरा के शाही महल में पहुँचते ही महताब बेगम को बुला सामने बैठाकर बता रहा था। राजपूतों पर अपनी चतुराई से विजय की कहानी बताकर उसने प्रशंसा का उक्त वाक्य कहा था।

‘‘भैया ! महताब ने पूछा, ‘‘इन गधों में तुम किन-किन को शामिल करते हो ?’’
‘‘सबसे बड़ा गधा अकबर है। वह समझा था कि वह अपने बाप से भी ज़्यादा अक्लमन्द हो गया है। वह कल का छोकरा अपने बाप आलमगीर की ज़िन्दगी के हालात को बिना जाने उससे दुश्मनी करने चल पड़ा है।’’
‘‘तो भैया ! क्या अपने बेटे को मरवा डाला है ?’’
‘‘मरवा ? नहीं बेगम। मुझे उस पर रहम आ गया था।’’

‘‘खैर, खुदा का शुक्र है कि ज़िन्दगी का दूसरा गुनाह-ए-अज़ीम करते-करते बच गये हैं। बाप और भाइयों का कत्ल आपके एहद की कारगुजारी तो कयामत तक तवारीख के वरक रौशन करती रहेगी। आप यह, वैसी ही एक दूसरी, नेकी नहीं कर सके।’’
‘‘आज क्या बात है महताब ? मेरे इतने जोखम के काम से सही-सलामत लौटने पर खुश होने के बजाय जली-कटी सुनाने लगी हो। मैं तो तुम्हें एक खुशी की बात बताने आया था।’’
‘‘तो भैया ! अपने गधों के कारनामों से पहले यह बात ही बता दो न ?’’
‘‘हाँ, तुम्हारा लाडला पुत्र मिला है। वह राजपूतों की ओर से लड़ने के लिए आया हुआ मालूम होता था।’’

महताब का बाहर की साँस बाहर और भीतर-का-भीतर अटक गया। कुछ अनिष्ट की बात सुनने की भय उसके मन में समा गया था, परंतु शहंशाह ने अगले ही साँस में कह दिया, ‘‘मगर वह हाथ में आकर ऐसे निकल गया जैसे मुट्ठी में से पारे की बूँद निकल जाती है।’’
महताब ने दीर्घ और सुख का साँस लिया। शहंशाह ने आगे बताया, ‘‘जब सिपाही उसे बाँहों में पकड़े हुए सामने लाए तो मैंने उसे छोड़ देने के लिए कह दिया। मेरे कहने पर सिपाहियों ने उसे छोड़ दिया, इस पर भी उसे घेरकर खड़े रहे। मैंने सिपाहियों से पूछा, ‘‘यह कहाँ मिला था ?’
‘‘सालार ने बताया, ‘‘यह हुजूर से मिलने के लिए चला आ रहा था। यह डेरे के द्वार पर पहुँचा तो पहरेदार से बोला—मुझे शहंशाह से मिलना है।’

‘नाम और काम लिख दो। इजाज़त होगी तो मिला देंगे।’ दरबान ने कहा।
‘‘जरूरत नहीं समझता। एक तरफ हट जाओ।’
‘‘पहरेदार नहीं हटा तो इसने तलवार खींच ली। पहरेदार ने भी अपनी तलवार निकालनी चाही, मगर तलवार के वार ने उसके हाथ को ज़ख्मी कर दिया। पहरेदार ने शोर मचाया तो हम इसकी ओर भागे। यह पैंतरा बाँध खड़ा हो गया। हम दस थे और यह अकेला था। मैंने पूछा, ‘क्या चाहते हो ?’
‘‘शहंशाह से मुलाकात।’
‘इस बेचारे पहरेदार को ज़ख्मी क्यों किया है ?’’
‘‘यह मुझे जाने से रोकता था।’
‘यह अपना फर्ज़ अदा कर रहा था।’
‘नहीं। यह फर्ज़ अदा करने की बजाय अपनी हुकूमत चला रहा था। इसे कहना चाहिए कि इत्तला कर देता हूँ। मैं इन्तजार कर लेता। अगर शहंशाह चाहते तो यह मेरे हाथ-पाँव बाँधकर वहाँ ले जा सकता था। यह तो मेरा नाम-धाम पूछ रहा था जो मैं बताना नहीं चाहता था। सब नाम बताने वाले नहीं होते।’
‘‘इस पर हमने कहा, ‘तो हम तुमको पकड़कर शहंशाह के पास ले चलते हैं।’
‘मगर मेरी तलवार को मत छूना।’

‘जहाँपनाह।’ सालार ने कहा, ‘हमने इसे बाहों में पकड़ लिया और हुजूर के सामने ले आये हैं।’
‘‘मैंने उससे पूछा, ‘हिदायत हो ?’
‘हाँ अब्बाजान।’ उसे मुझे अब्बाजान कहते सुन सिपाही भौंचक्के हो हमारा मुख देखते रह गये।
‘‘मैंने सिपाहियों को इशारे से वहाँ से चले जाने के लिए कहा तो सब खेमे से बाहर निकल गये। मैंने पूछ लिया, ‘किसलिए आये हो ?’
‘‘इस समय भी उसने हाथ में नंगी तलवार पकड़ी हुई थी। मेरे पूछने पर कि वह किस काम से आया है तो उसने तलवार म्यान में डाल ली और बोला, ‘एक हज़ार तिलई मोहरें लेने आया हूँ।’
‘क्या करोगे उनसे ?’

‘इन बेवकूफ राजपूतों से बचकर भागने के लिए चाहियें।’
‘‘मैं समझ गया था कि अपने मामा की भाँति वह मेरी चतुरायी को भाँप गया है। कुछ देर तक उसके मुख पर उसके मन की छिपी बात को जानने के लिए देखता रहा और जब उसकी निडर आँखों से कुछ नहीं जान पाया तो मैंने पूछा, ‘पर तुम इन बेवकूफों के मुल्क में आये क्यों थे ?’
‘आया था भैया अकबर को इन बेवकूफों से बचाने के लिए, मगर मेरे यहाँ पहुँचने से पहले ही वह आपके चकमे में आकर यहाँ से भाग गये हैं।’
‘कब आये थे राजस्थान में ?’
‘पन्द्रह दिन हुए मैं सूरत में था और वहाँ के एक जानकार मुगल सरदार से यह खबर मिली थी कि शहज़ादा अकबर ने बाप के खिलाफ बगावत कर दी है और यह खयाल कर कि वह अक्ल से धनी राज़पूतों से धोखा खा जायेगा, उसे बचाने के लिए चल पड़ा था। मगर अब्बाजान, मेरे पहुँचने से पहले ही वह बाज़ी हार चुका था और अब उसके पड़ाव से ही आ रहा हूँ।’
‘क्या-क्या देखा वहाँ ?’

‘उल्लू बोल रहे हैं। राजपूत को रात के समय आपकी चिट्ठी पढ़ते ही अकबर भैया को सोता छोड़ भागे थे और राजपूतों को जाते देख मुगल सिपाही भी अपनी-अपनी तलवार उठा आपके डेरे में आ शाही फौज में शामिल हो गये हैं। दिन निकलने पर शहजादा साहब नींद खुली तो डेरे को खाली देख अपने बच्चों को भी छोड़ भाग गया है। जब मैं वहाँ पहुँचा तो अकबर की बीवी और बच्चे परेशानी में थे। बेगम की एक पुरानी खादिमा ने मुझे पहचान लिया और बेगम की परेशानी को बयान कर मुझसे मदद माँगने लगी। मैं उनको यहाँ लाने के लिए तैयार हो गया। बेगम और अकबर के पाँच बच्चों को हरम में पहुँचा दिया तो सोचने लगा था कि घर जाऊँ। देखा कि जेब खाली हो गयी है और इस डेरे में और किसी को न जानता हुआ मदद के लिए अब्बाजान के पास खर्चा लेने चला आया हूँ।’

‘‘बेगम ! तुम्हारा भाई और लड़का बात इस तरीके से करते हैं कि उनके कहने में नुक्स निकलना निहायत ही मुश्किल होता है। मैंने उसी वक्त हरम से खबर मँगवायी तो पता चला कि अकबर की बीवी और बच्चे एक राजपूत सालार के ज़ेर-निगरानी में वहाँ पहुँचे और पता चला कि वह सालार हिदायत ही है तो मुझे उसकी बात पर यकीन आ गया। मैंने उससे पूछा, ‘और अब कहाँ जाना चाहते हो ?’
‘वापस सूरत। वहाँ मेरी बीवी और बच्चे हैं।’
‘वहाँ क्या करते हो ?’
‘सौदागरी करता हूँ।’
‘तलवार के ज़ोर पर ?’
‘अब्बाजान ! यह तो मरहट्टों से अपनी हिफाज़त के लिए रखी है, लेकिन इसके चलाने की मश्क हर रोज़ करता रहता हूँ।’
‘तुम मेरी नौकरी कर लो।’

‘आपका तो मैं फरज़न्द हूँ। भला अब्बाजान की नौकरी कर अपना रुत्बा कम कर लूँ ?’
‘देखो, फरज़न्द तो हो मगर अर्ज़मन्द नहीं हो। तुमको अपनी बीवी के साथ महल में अपनी माँ के साथ रहने के लिए दावत दी थी और तुम अलीवर्दी खाँ को भी साथ लेकर भाग गये। अलीवर्दी खाँ तो बीजापुर की फौज में मुगलों से लड़ता हुआ मारा गया और उसकी बेगमों से बता चला था कि तुम अपनी बीवी को लेकर दक्खिन में कहीं दूर चले गये थे।’
‘हाँ, अब्बाजान ! अब मैं सूरत में हीरे-मोती जवाहरात का व्यापर करता हूँ। मेरी बीवी सुल्ताना और उसके तीन बच्चे मेरे साथ हैं।’
‘उन सबको आगरा ले आओ।’
‘उसमें एक ही शर्त है। मैं और मेरी माँ इकट्ठे किले के बाहर आज़ादी से रहेंगे। जब अलीवर्दी खाँ की नौकरी में था तो मैंने यही अर्ज की थी। अब्बाजान माने नहीं और माँ को आज़ाद करने के बजाय मुझे भी किले में कैद करने का हुक्म सादर कर दिया।’

‘‘मैंने उसे उसके मुताबिक एक हज़ार अशरफी दीं तो वह सलाम और कदमबोसी कर चल दिया। वह कह गया है कि जिस दिन मैं तुम्हें किले के बाहर रहने को मकान बनवा दूँगा, उसी दिन वह मेरे साथ शानाबशाना जंग में लड़ने के लिए आ जायेगा।’’

महताब अभी तक चुपचाप आँखों से आँसू बहाती हूई अपने बच्चे की बात सुनती रही थी। जब शहंशाह बता चुके तो उसने पूछा, ‘‘और आपने भैया की बाबत नहीं पूछा ?’’
‘‘पूछा था। उसने बताया है कि शिवाजी लुटेरे के फौत हो जाने पर अपने बालदैन के पास हरिद्वार में रहने चला गया है।
‘‘बताओ, अब क्या कहती हो ?’’
‘‘बताऊँ तो तब, जब आपने मेरी कोई भी बात मानी हो।’’

‘‘मैं समझता हूँ कि अब हालात बदल गये हैं। मैं मान जाऊँगा।’’
‘‘तो हिदायत की बात मान जाइये। यहाँ किले से बाहर एक छोटा-सा मकान बनवा दीजिये। मैं उसमें जाकर रहने लगूँगी और मैं हिदायत को ढूँढ़कर उसे आगरा में बुला लूँगी।’’
शहंशाह ने कुछ देर तक आँखें मूँदकर विचार किया और फिर कहा, ‘‘अब राजपूतों के लिए सुलह करने के सिवाय दूसरा कोई चारा नहीं रहा। राना फौत हो चुका है। अकबर को धोखेबाज़ समझ राजपूतों के हौसले पस्त हो चुके हैं और मैं भी अब दक्खिन की सुध लेना चाहता हूँ।
‘‘वहाँ मेरे बेवकूफ सरदारों ने सब गड़बड़ घोटाला कर रखा है। वहाँ से लौटकर तुम्हारे मुतल्लिक सोचूँगा।’’

महताब ऐसे कई वायदे सुन चुकी थी और अब लम्बी साँस खींच बोली, ‘‘तो अब मैं जाऊँ ?’’
‘‘क्या करोगी ?’’
‘‘अपने भगवान् से प्रार्थना करूँगी कि आपके दिल में रहम और इन्साफ पैदा करे।’’
‘‘ठीक है। तुम जाकर यह दुआ करो कि मैं अपनी इस नयी मुहिम में कामयाब हो जाऊँ और फिर अपने दिल की आरजू पूरी कर सकूँ।’’


:2:



जब से छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ था तब से मराठा राज-दरबार में भारी परिवर्तन हुआ था। पेड़ गाँव में मुगल शिविर के लूटने के उपरान्त राज्य में चित्र बदलने लगा।
राज्याभिषेक ने शिवाजी के सम्मुख एक स्वाभाविक समस्या उपस्थित कर दी। वह थी युवराज बनाने की। शिवाजी के सामने दो लड़के थे। एक शम्भुजी और दूसरा राजाराम। दोनों भिन्न माताओं से थे। राजाराम की माता सूर्यबाई अपने पुत्र को युवराज बनाने का आग्रह करने लगीं। उस समय राजाराम की आयु नौ वर्ष की थी और दरबार में कोई भी व्यक्ति उसको इस योग्य नहीं मानता था।
एक दिन विश्वनाथ अपने कार्यालय से अपने घर पहुँचा तो राज-प्रासाद की एक सेविका को द्वार पर बैठा देख वहीं रुक गया। सेविका विश्वनाथ को देख खड़ी हो गयी और उसके घर के भीतर जाने की प्रतीक्षा करने लगी। विश्वनाथ ने पूछ लिया, ‘‘यहाँ किस लिए आयी हो ?’’
‘‘भीतर छोटी महारानीजी आयी हैं।’’

‘‘किसलिये ?’’
‘‘वह मुझे पता नहीं।’’
वह भीतर जाने की अपेक्षा गृह के बाहर बैठकघर में बैठ गया। इस समय हरिहर की पत्नी राजीव बाहर आयी और बोली, ‘‘मामाजी ! महारानीजी भीतर बुला रही हैं।’’
‘‘मुझे ?’’
राजीव ने स्वीकृति में सिर हिलाया और खड़ी रही।

विश्वनाथ उठकर भीतर गया तो महारानी सूर्यदेवी को बैठा देख हाथ जोड़ प्रणाम कर प्रश्न-भरी दृष्टि में उसकी ओर देखने लगा। बात सूर्यदेवी ने आरम्भ की। उसने कहा, ‘‘पंडितजी ! बैठिये।’’
विश्वनाथ सामने भूमि पर बैठ गया। सूर्यदेवी ने कहा, ‘‘मैं आपसे एक अत्यावश्यक बात कहने आयी हूँ।’’

‘‘आज्ञा करिये ?’’
‘‘माहाराज के राज्याभिषेक के उपरान्त युवराज की नियुक्ति का भी निश्चय हो जाना चाहिये।’’
‘‘महारानीजी ! अभी कुछ देर तक ठहरिये। इस समय इस विषय को खड़ा करने पर तो दरबारियों में फूट पड़ जायेगी।’’
‘‘तो कब फूट नहीं पड़ेगी ?’’
‘‘जब शम्भुजी अपने कुकृत्यों से इतना बदनाम हो जाये कि उसका स्थानापन्न ढूँढ़ना आवश्यक हो जायेगा। उस समय राजाराम की क्या वयस होती है; इस पर बहुत कुछ निर्भर होगा।’’
‘‘पर क्या शम्भु अभी पर्याप्त बदनाम नहीं हुआ है ?’’
‘‘बदनाम तो है, परन्तु पर्याप्त नहीं। उसकी उच्छृंखलता का एक कारण यह भी हो सकता है कि उससे उत्तरदायित्वपूर्ण काम लिया नहीं जाता।’’

‘‘उसे कई बार समर पर भी तो भेजा जाता रहा है।’’
‘‘किन्तु उन समरों से वह सफल होकर लौटा है। मैं समर के अतिरिक्त कामों के विषय में कह रहा हूँ।’’

‘‘और क्या काम होते हैं ?’’
‘‘महारानीजी ! राज्य-प्रबन्ध के कार्य समर-कार्य से भी अधिक महत्व के होते हैं। यदि राज्य-प्रबन्ध श्रेष्ठ न हो तो समर चल ही नहीं सकते।’’
‘‘राज्य-प्रबन्ध तो तुम लोग करते हो। महाराज तो प्रबन्ध करते कभी देखे नहीं।’’
‘‘महारानीजी ! ऐसी बात नहीं। वास्तव में सब कार्य महाराज ही करते हैं। यदि उनका हम पर अंकुश न हो तो हम परस्पर लड़ पड़ें।’’
‘‘पंडितजी ! यह सब तो आप मेरी बात टालने के लिए कह रहे हैं।’’
‘‘नहीं महारानीजी ! आप राजाराम को कुछ समय के लिए कार्यालय में भेज दिया करिये। यदि वह वहाँ आकर कार्यालय के कार्य में रुचि लेने लगे तो दस वर्ष में राजगद्दी उसकी हो जायेगी। अभी यह समय से पूर्व है।’’
‘‘परन्तु महाराज का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है।’’
‘‘तो उनको अपनी चिकित्सा करानी चाहिये। यदि मुझे कहें तो मैं किसी योग्य भिषगाचार्य का प्रबन्ध कर सकता हूँ।’’
‘‘आप देखते नहीं कि वे दुर्बल होते जा रहे हैं ?’’

‘‘हाँ। राज्याभिषेक के उपरान्त वे बीमार हो गये थे, परन्तु अब तो वे सर्वथा स्वस्थ प्रतीत होते हैं। इस पर भी यदि आप अपनी स्वीकृति दें तो आपकी ओर से कह सकता हूँ कि वह अपने को किसी वैद्य को दिखायें।’’
‘‘नहीं पण्डितजी। मैं उनसे चोरी से यहाँ आयी हूँ।’’
‘‘तब मैं नहीं कहूँगा। इस अवस्था में आपको ही उन्हें कहना चाहिये कि अभी धर्म और देश को उनकी बहुत आवश्यकता है। उन्हें अपने स्वास्थ्य की ओर ध्यान देना चाहिये।’’
‘‘और युवराज पद का निर्णय नहीं होना चाहिये ?’’
‘‘मैं अभी उसके लिए यह समय उपयुक्त नहीं समझता।’’
सूर्यबाई उद्विग्न-चित्त से उठकर चल दी। विश्वनाथ तथा उसकी पत्नी कल्याणी उसे द्वार तक छोड़ने आये। महारानी के चले जाने के उपरान्त विश्वनाथ इत्यादि भीतर को लौटने लगे तो विश्वनाथ के मुख से निकल गया, ‘‘यह स्त्री महाराष्ट्र के भविष्य पर तुषारापात के समान सिद्ध होगी।’’
‘‘आप बचाने का यत्न करिये।’’ कल्याणी ने खिन्न चित्त से कहा।

‘‘असम्भव प्रतीत होता है। इस पर भी यत्न करूँगा।’’
‘‘आप यत्न करेगें तो ठीक हो जायेगा।’’
‘‘बहुत विश्वास है मुझ पर ?’’
‘‘तो इसमें भूल है कहीं ?’’

इस समय ये दोनों भीतर के बैठकघर में पहुँच गये थे। विश्वनाथ ने बैठते हुए कहा, ‘‘देखो कल्याणी रानी ! जब महारानीजी राजाराम को युवराज बनाने के लिए उतावली प्रकट कर रही थीं तब मैं यह विचार कर रहा था कि अब यहाँ से हमें अपना डेरा कूच करना चाहिये। बहुत अन्न खाया है इस राज्य का। अब कहीं बैठकर इस खाये हुए का प्रायश्चित्त करना चाहिये।’’
कल्याणी मुस्कराती हुई पति का मुख देख रही थी। विश्वनाथ ने शोक-मुद्रा बनाये हुए कहा, ‘‘राज्याभिषेक के समय से ही मैं देख रहा था कि यहाँ से बुद्धि का साम्राज्य समाप्त हो रहा है और पूर्वग्रहों की छाया गहरी होती जा रही है। मैं बहुत यत्न से काशीजी से प्रकाण्ड विद्वान विश्वेश्वर भट्टजी को राज्याभिषेक के लिए लाया था, परन्तु वह विद्तवर सब-कुछ समझते हुए भी यहाँ के ब्राह्मणों के पाखण्ड के सामने झुक गये। मैंने कहा था कि महाराज से प्रायश्चित्त कराने की आवश्यकता नहीं। उनको नंगे पाँव देश-भर के मन्दिरों की मिट्टी छानने की आवश्यकता नहीं। वास्तविक प्रायश्चित्त तो वे कर चुके हैं। सब मन्दिरों से बड़े मन्दिर मातृ-भूमि को स्वतन्त्र करने का जीवन-भर का कठोर प्रयत्न तो सैकड़ों प्रायश्चित्तों का एक प्रायश्चित्त है। अब और अधिक आवश्यकता नहीं।

‘‘इस पर पण्डितजी बोले, ‘‘इस मूर्ख जनता को भी तो समझाना है।’
‘‘मेरा कहना था, ‘महाराज ! यह भी समझाना कहा जाता है क्या कि उनकी बात मान ली जाये और उनको भ्रम में डालकर अपना काम किया जाये ? महाराज ! इसे अपना उल्लू सीधा करना कहते हैं।’

‘‘परन्तु वह नहीं माने और महाराज शिवजी की वास्तविक महिमा को प्रकट करने के स्थान पर इन जड़वत् देवी-देवताओं की महिमा को ही बढ़ोत्तरी दी गयी।
‘‘परिणाम यह हुआ कि शम्भुजी के मित्र तान्त्रिक की चल गयी और पहला राज्याभिषेक व्यर्थ सिद्ध हो पुनः राज्याभिषेक कराना पड़ा। यह पिछले बीस वर्ष से चल रहे बुद्धिवाद को रद्द कर पुनः पुराने ढर्रे की प्रथा प्रचलित कर दी गयी।


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