चैत्या - श्रीनरेश मेहता Chaitya - Hindi book by - SriNaresh Mehta
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चैत्या

श्रीनरेश मेहता

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :228
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5547
आईएसबीएन :81-263-0957-1

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नरेश मेहता की सम्पूर्ण रचनाओं से चुनी हुई कविताओं का प्रतिनिधि संकलन...

Chaitya a hindi book by - Naresh Mehta - चैत्या - नरेश मेहता

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हिन्दी के यशस्वी कवि श्री नरेश मेहता उन शीर्षस्थ लेखकों में हैं जो भारतीयता की अपनी गहरी दृष्टि के लिए जाने जाते हैं। ‘चैत्या’ उनकी सम्पूर्ण रचनाओं से चुनी हुई कविताओं का प्रतिनिधि संकलन है।
नरेश मेहता ने आधुनिक कविता को नयी व्यंजना के साथ नया आयाम दिया है। रागात्मकता, संवेदना और उदात्तता उनकी सर्जना के मूल तत्त्व है, जो उन्हें प्रकृति और समूची सृष्टि के प्रति पर्युत्सुक बनाते हैं। नरेश मेहता का अनुभव है कि कविता ही कविता को ‘तीसरा आँख’ देती है जिससे वह सृजन का लालित्य मधुर भाव-संसार रचता है।

आर्ष परम्परा और साहित्य को श्रीनरेश मेहता के काव्य में नयी दृष्टि मिली है। साथ ही, प्रचलित साहित्यिक रुझानों से एक तरह की दूरी ने उनकी काव्य-शैली और संरचना को विशिष्टता दी है।

आशा है, उनके भावबोध, काव्य-शैली और औदात्य से सम्पृक्त ये रचनाएँ पुनः प्रकाशित होकर पाठकों को काव्य का नया आस्वाद प्रदान करेंगी।

मात्र संकेत


काव्य पर विचार करना बहुत आसान भी हो सकता है और कठिन भी। वस्तुतः यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हम किस अयन में खड़े होकर काव्य को देख रहे हैं या उससे साक्षात् करना चाहते हैं तथा उसके साथ हमारी संस्पर्शिता का अक्षांश-देशान्तर क्या है। यदि काव्य हमारे लिए केवल मनोरंजन या तत्कालिक प्रतिक्रिया अथवा फतवेबाजी है तो काव्य की इस प्रकृति, स्वरूप और सत्ता को जानने में कोई खास परेशानी नहीं होगी, लेकिन यदि वह हमारे लिए एक गम्भीर सृजनात्मक कर्म अथवा रचनात्मक दायित्व या संज्ञा है जिससे हम अनिवार्य रूप से ग्रथित हैं तो हमारी जिज्ञासा और पड़ताल का दायरा भी अधिक गहन और विशाल होगा। वस्तुतः यह हमारी जिज्ञासा और पड़ताल की प्रकृति पर निर्भर है और वह कितनी तात्विक है, या फिर कामचलाऊ। ऐसा भी नहीं कि काव्य मनोरंजन नहीं करता या सिरे से तात्कालिक प्रतिक्रिया काव्य नहीं हो सकता। लेकिन कहना न होगा कि यह उसका मूल स्वरूप और प्रकृति नहीं है क्योंकि मुख्य रूप से, काव्य एक गंभीर सृजनात्मक कर्म तथा सत्ता है जो सर्जक और पाठक दोनों से समग्र उत्सर्गता चाहता है। सृष्ट जीवन को पुनः रचकर काव्य, एक प्रतिजीवन या प्रतिसृष्टि बनकर अपनी सृजनात्मक उपस्थिति से जीवन पर हर देश और काल में प्रश्नचिह्न लगाता चलता है, इसलिए काव्य न तो कोई देश होता है और न काल। जीवन की सार्वदेशिकता या शाश्वतता की तरह काव्य भी सार्वदेशिक और शाश्वत होता है। इसलिए काव्य की जिज्ञासा प्रकारान्तर से जीवन की ही जिज्ञासा है, कहना चाहिए कि तात्त्विक भी। अस्तु—

काव्य का स्थान समस्त वैचारिक सत्ता और जगत् में न केवल सर्वोपरि है बल्कि अपनी भाववाची सर्जनात्मक प्रकृति के कारण उसे परमपद भी कहा जा सकता है। अन्य वैचारिक संज्ञाएँ भले ही वे धर्म, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान या अध्यात्म ही क्यों न हों, भाववाची सृजनात्मक न होने के कारण वे किसी-न-किसी कारण से सीमाएँ ही हैं। इस अर्थ में काव्य ही एकमात्र निर्दोष सत्ता है। वैचारिक विराटता जब सर्जनात्मक तथा संकल्पात्मक होती है तब उस ऋतम्भरा मधुमती भूमिका की प्रतीति सम्भव है जिसके लिए धर्म, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान या अध्यात्म विभिन्न मार्ग और माध्यम सुझाते हैं। वैसे तो प्रयोजन एक ही है अतः काव्य का भी प्रयोजन है कि मनुष्य मात्र को उसके भीतर जो अनभिव्यक्त ‘पुरुष’ है उसे रूपायित और संचरित किया जाए, साथ ही जितनी भी पदार्थिक संज्ञाएँ हैं उनको उनके महत् रूप ‘प्रकृति’ के साथ तदाकृत किया जाए। विराट् ‘पुरुष’ और महत् प्रकृति की यह युगल लीला ही काव्य का भी प्रेय है। काव्य ही शब्द-शक्ति और प्राण-शक्ति दोनों की पराकाष्ठा है। काव्य न तो विज्ञान की पदार्थिक खण्ड-दृष्टि है और न ही अध्यात्म की अनासक्त तत्त्व-भाषा, योग-मुद्रा। यदि काव्य की कोई मुद्रा संभव है तो वह अर्धनारीश्वर जैसी ही होगी। लग्न में जिस प्रकार ‘मिथुन’ और राशियों में जिस प्रकार ‘कन्या’ है, प्रतीति और अभिव्यक्ति के क्षेत्र में वही स्थिति काव्य की है। कहा जा सकता है कि सृष्टि, सृष्टि का कारण और सृष्टि की क्रिया का यदि कोई नाम सम्भव है तो वह ‘काव्य’ ही हो सकता है। जब काव्य किसी का तिरस्कार नहीं करता तब भला मनुष्य का तिरस्कार कैसे सम्भव है ? सच तो यह है कि काव्य तिरस्कार नहीं संस्कार करता है समस्त जैविकता का। जहाँ अन्य वैचारिक माध्यम, मानवीय जगत् और इतर जैविक जगत् के बीच चेतना और सम्प्रेषणा के स्तर-भेद देखते हैं, स्थितियों का द्वन्द्व देखते हैं वहाँ काव्य ‘पुरुष’ की विराटतम अखण्ड महासत्ता और ‘प्रकृति’ की आणविक नगण्य संज्ञा तक में चेतना, शक्ति और स्थिति की समरसता का छन्दगान करता दिखलाई देता है। देश और काल दोनों के सामरस्य स्वरूप का नाम ही काव्य है। आकाशी सूर्य और धरती के सूर्यवंशी राम दोनों के लिए काव्य के पास मन्त्र और छन्द हैं। यह समरसता ही काव्य का इष्ट और आत्मा है तथा अभिव्यक्ति का अयन भी। अस्तु—

यदि यह कहा जाए कि ये कविताएँ अभिव्यक्त होने से पूर्व भी थीं तो इसका तात्पर्य यही है कि कविता सर्वत्र तथा सार्वकालिक भाव से नित्य उपस्थित है, अनभिव्यक्त रूप में। अपनी अभिव्यक्ति के लिए इन कविताओं ने मुझे माध्यम चुना तो इसका तात्पर्य भी यही है कि काव्य का कोई कर्ता नहीं है, क्योंकि वह स्वयं आत्मकर्ता है, स्वयं स्रष्टा है। जिसे कवि कहा जाता है वह तो मात्र प्रस्तोता होता है, वह इसलिए कि कवि नहीं बल्कि उसका मनीषी व्यक्तित्व या चैत्य-पुरुष उस काव्य-साक्षात् का दृष्टा होता है। कवि-व्यक्तित्व ने तो उस अनभिव्यक्त को केवल अभिव्यक्त भर किया होता है। मैं भी प्रस्तोता के अर्थ में ही अपने काव्य का कवि हूँ, कर्ता के अर्थ में नहीं। मेरा यह कथन शायद रचनात्मकता की प्रक्रिया या वस्तुस्थिति की वास्तविकता के अधिक निकट हो। यह की यह आरोपित मुद्रा है, या यह कि कवि और काव्य की रचनात्मक पारस्परिकता को रहस्यात्मक बना रहा हूँ—वैसे ऐसा लगना तो नहीं चाहिए क्योंकि जिस प्रकार कुछ सत्यों की वास्तविकता या अस्ति के बारे में ‘नेति’ के द्वारा ही इंगित किया जा सकता है, या अस्वीकृति के द्धारा ही स्वीकृति को सूचित किया जा सकता है। शायद सृजनात्मक प्रक्रिया के बारे में भी इसी प्रकार कहा जा सकता है। पराविश्वसनीयता के प्रासाद में प्रवेश अविश्वसनीयता के गोपुर से ही सम्भव है। सन्तों की सन्ध्या भाषा का भी यही अर्थ है।

काव्य के विषय में मैं अपनी विभिन्न भूमिकाओं में तथा स्वतंत्र रूप से विशद चर्चा करता रहा हूँ। यह संकलन एक विशेष अवसर पर उद्देश्य-विशेष को लेकर प्रकाशित हो रहा है और वह भी अफरातफरी में, अतः अच्छा तो यही होगा कि ये कविताएँ सीधे आपसे संवाद स्थापित करें। (इस नये संस्करण में हम उनकी प्रसिद्ध कविता ‘समय देवता’ को सम्मिलित कर रहे हैं।–प्रकाशक) चूँकि प्रयत्न था कि प्रारम्भ से लेकर आज तक के विकास-क्रम को कुछ रेखांकित किया जा सके।

जहाँ तक आभार का प्रश्न है तो सबसे पहले मैं ‘लोकभारती’ का आभारी हूँ कि उन्होंने अत्यन्त सहजता से मेरा मार्ग प्रशस्त किया। इसके अतिरिक्त न जाने कितने आत्मीय स्वजन मेरी इस सृजनात्मक यात्रा से जुड़े रहे और मुझे शक्ति दी। इस सारी यात्रा में मेरे व्यक्ति के साथ जो भी हुआ हो, परन्तु प्रयत्न भर लेखन को अखण्डित जैसा ही यहाँ तक ला सका और इसका सारा श्रेय परिवार तथा मित्रों, आत्मीयों को जाता है—जो नर्मदा, शिप्रा से लेकर गंगा तक फैले हुए हैं। भला सौभाग्य और क्या होता है !

यदि मैं इस अवसर पर स्वर्गीया श्रीमती रमा जी का स्मरण नहीं करता तो कृतघ्नता ही होगी। वह परम विदुषी तो थीं ही, साथ ही, रसज्ञ और गुनग्राही भी थीं। सच तो यह है कि—
जाने अनजाने योग दिया जिनने
वे सब वरेण्य हैं
मुझ अपात्र के निर्माता हैं।

भारतीय ज्ञानपीठ का मैं अत्यन्त आभारी हूँ और विशेष रूप से डॉ. पाण्डुरंग राव का जिन्होंने मेरे अक्षर को संचार का स्वर दिया।

-श्रीनरेश मेहता

[प्रथम संस्करण 1995 से]


‘‘मेरी भाषा
मेरे शब्द और
मेरी रचना—
इन्हें मैं समय को वैसे ही दे देना चाहता हूँ
जैसे की वृक्ष
फूलों को अनाम दे देते हैं।

किरन-धेनुएँ


उदयाचल से किरन-धेनुएँ
हाँक ला रहा वह प्रभात का ग्वाला।

पूँछ उठाए चली आ रही
क्षितिज जंगलों से टोली
दिखा रहे पथ इस भूमा का
सारस, सुना-सुना बोली

गिरता जाता फेन मुखों से
नभ में बादल बन तिरता
किरन-धेनुओं का समूह यह
आया अन्धकार चरता,
नभ की आम्रछाँह में बैठा बजा रहा वंशी रखवाला।

ग्वालिन-सी ले दूब मधुर
वसुधा हँस-हँस कर गले मिली
चमका अपने स्वर्ण सींग वे
अब शैलों से उतर चलीं।

बरस रहा आलोक-दूध है
खेतों खलिहानों में
जीवन की नव किरन फूटती
मकई औ’ धानों में
सरिताओं में सोम दुह रहा वह अहीर मतवाला।

उषस् (एक)


नीलम वंशी में से कुंकम के स्वर गूँज रहे !!

अभी महल का चाँद
किसी आलिंगन में ही डूबा होगा
कहीं नींद का फूल मृदुल
बाँहों में मुसकाता ही होगा
नींद भरे पथ में वैतालिक के स्वर मुखर रहे !!

अमराई में दमयन्ती-सी
पीली पूनम काँप रही है
अभी गयी-सी गाड़ी के
बैलों की घण्टी बोल रही है
गगन-घाटियों से चर कर ये निशिचर उतर रहे !!

अन्धकार के शिखरों पर से
दूर सूचना-तूर्य बज रहा
श्याम कपोलों पर चुम्बन का
केसर-सा पदचिह्न ढर रहा
राधा की दो पंखुरियों में मधुबन झीम रहे !!

भिनसारे में चक्की के सँग
फैल रहीं गीतों की किरनें
पास हृदय छाया लेटी है
देख रही मोती के सपने
गीत ने टूटे जीवन का, यह कंगन बोल रहे !!

उषस् (दो)


हिमालय के तब आँगन में—
झील में लगा बरसने स्वर्ण
पिघलते हिमवानों के बीच
खिलखिला उठा दूब का वर्ण
शुक्र-छाया में सूना कूल देख
उतरे थे प्यासे मेघ
तभी सुन किरणाश्वों की टाप
भर गयी उन नयनों में बात
हो उठे उनके अंचल लाल
लाज कुंकुम में डूबे गाल
गिरी जब इन्द्र-दिशा में देवि
सोमरंजित नयनों की छाँह
रूप के उस वृन्दावन में !!

व्योम का ज्यों अरण्य हो शान्त
मृगी-शावक-सा अंचल थाम
तुम्हें मुनि-कन्या-सा घन-क्लान्त
तुम्हारी चम्पक—बाँहों बीच
हठीला लेता आँखें मीच
लहर को स्वर्ण कमल की नाल
समझ कर पकड़ रहे गज-बाल,
तुम्हारे उत्तरीय के रंग
किरन फैला आती हिम-शृंग
हँसी जब इन्द्र दिशा से देवि
सोम रंजित नयनों की छाँह
मलय के चन्दन-कानन में !!

हिमालय के तब आँगन में !!

उषस् (तीन)


थके गगन में उषा-गान !!

तम की अँधियारी अलकों में
कुंकम की पतली-सी रेख
दिवस-देवता का लहरों के
सिंहासन पर हो अभिषेक
सब दिशि के तोरण-बन्दनवारों पर किरणों की मुसकान !!

प्राची के दिकपाल इन्द्र ने
छिटका सोने का आलोक
विहगों के शिशु-गन्धर्वों के
कण्ठों में फूटे मधु-श्लोक
वसुधा करने लगी मन्त्र से वासन्ती रथ का आह्वान !!

नालपत्र-सी ग्रीवा वाले
हंस-मिथुन के मीठे बोल
सप्तसिन्धु के घिरें मेघ-से
करें उर्वरा दें रस घोल
उतरे कंचन-सी बाली में बरस पड़ें मोती के धान !!

तिमिर-दैत्य के नील-दुर्ग पर
फहराया तुमने केतन
परिपन्थी पर हमें विजय दो
स्वस्थ बने मानव-जीवन
इन्द्र हमारे रक्षक होंगे खेतों-खेतों औ’ खलिहान !!

सुख-यश, श्री बरसाती आओ
व्योमकन्यके ! सरल, नवल
अरुण-अश्व ले जाएँ तुम्हें
उस सोमदेन के राजमहल
नयन रागमय, अधर गीतमय बनें सोम का कर फिर पान !!

उषस् (चार)


किरणमयी ! तुम स्वर्ण-वेश में
स्वर्ण-देश में !!
सिंचित है केसर के जल से
इन्द्रलोक की सीमा
आने दो सैन्धव घोड़ों का
रथ कुछ हल्के-धीमा,
पूषा के नभ के मन्दिर में
वरुणदेव को नींद आ रही
आज अलकनन्दा
किरणों की वंशी का संगीत गा रही
अभी निशा का छन्द शेष है अलसाये नभ के प्रदेश में !!

विजन घाटियों में अब भी
तम सोया होगा फैला कर पर
तृषित कण्ठ ले मेघों के शिशु
उतरे आज विपाशा-तट पर

शुक्र-लोक के नीचे ही
मेरी धरती का गगन-लोक है
पृथिवी की सीता-बाँहों में
फसलों का संगीत लोक है
नभ-गंगा की छाँह, ओस का उत्सव रचती दूब देश में !!

नभ से उतरो कल्याणी किरनो !
गिरि, वन-उपवन में
कंचन से भर दो बाली-मुख
रस, ऋतु मानव-मन में
सदा तुम्हारा कंचन-रथ यह
ऋतुओं के संग आये
अनागता ! यह क्षितिज हमारा
भिनसारा नित गाये
रैन-डूँगरी उतर गये सप्तर्षी अपने वरुण-देश में !!




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