तृज्या - महेन्द्र प्रसाद सिंह Trijya - Hindi book by - Mahendra Prasad Singh
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तृज्या

महेन्द्र प्रसाद सिंह

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1991
पृष्ठ :80
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5565
आईएसबीएन :00000

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ये सभी कविताएँ प्रगाढ़ प्रमानुभूति के भाव से ओत-प्रोत हैं

Trijya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तुति

इन प्रेम कविताओं की विशिष्टता यह है कि यह कोरी भावुक रूमानियत से परे हैं। इनमें नये प्रतीकों के माध्यम से प्रेयसी की कामुक कमनीयता का मांसल संप्रेषण होता है; पर वह मेंहदी लगे हाथों वाली अवगुंठिता नहीं है, ‘फ्रिल्स’ व ‘ब्लू डैनिम’ से कटा-संवारा सम्मोहन होते हुए भी वह ‘अविश्लेष्या’ है। मूलतः वह शक्ति की स्रोत है। पर उसमें एक नैसर्गिक सौंदर्य है (याद है कीट्स की ‘ओड टू अ ग्रेशियन अर्नः सौन्दर्य ही सत्य है और सत्य सौन्दर्य)। यह सभी कविताएँ प्रगाढ़ प्रेमानुभूति के भाव से ओत-प्रोत हैं। लेकिन प्रेयसी के प्रति यह आकर्षण क्षणिक उद्वेग नहीं है। इसमें तो एक युग की-सी तपन है जिसे कवि ने कई विशाल बिंबों से शब्दों में उकेरा है।

भारतीय ज्ञानपीठ नयी साहित्यिक प्रतिभा को पहचानने और उसे प्रतिष्ठित करने में सदा प्रयत्नशील रहा है। आज के अनेक वरिष्ठ लेखकों की प्रारम्भिक कृतियाँ ज्ञानपीठ से ही छपी थीं। अपनी इस परंपरा को सुदृढ़ करने के लिए हमने कुछ वर्ष पहले नयी पीढ़ी के लिए एक नया आयोजन आरम्भ किया था। यह आयोजन एक प्रतियोगिता क्रम के रूप में है जिसमें प्रत्येक वर्ष किसी एक विधा को लेकर हम ऐसे लेखकों की पाण्डुलिपियाँ आमन्त्रित करते हैं जिनकी उस विधा की कोई पुस्तक प्रकाशित न हुई हो। इसमें सर्वप्रथम घोषित पाण्डुलिपी का प्रकाशन ज्ञानपीठ द्वारा होता है और युवा रचनाकार को लब्धप्रतिष्ठ साहित्य-कारों के समकक्ष ही रायल्टी दी जाती है। इस प्रकार की अब तक कहानी, कविता हास्य-व्यंग्य नाटक तथा उपन्यास विधाओं में प्रतियोगिताएँ हो चुकी हैं। उपन्यास प्रतियोगिता का परिमाण अभी हाल ही में घोषित किया गया है। उसे छोड़कर अब तक अन्य चारों प्रतियोगियों में विजयी लेखकों की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। यह बड़ी प्रसन्नता की बात है कि इन कृतियों का अच्छा स्वागत हुआ है। प्रथम दो कतियों-ऋता शुक्ल का ‘क्रौंचवध’ (कहानी-संग्रह) और विनोद दास का ‘ख़िलाफ़ हवा से गुज़रते हुए’ (कविता-संग्रह) के दूसरे संस्करण भी प्रकाशित हो चुके हैं। इससे स्पष्ट है कि भारतीय ज्ञानपीठ इन रचनाकारों के साहित्यिक विकास में भी सक्रिय सहयोग करता है।
 
लेकिन वर्ष में एक प्रतियोगिता के आधार पर एक पुस्तक का प्रकाशन नयी पीढ़ी के लेखकों के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। इसी को ध्यान में रखकर हम प्रतियोगिता के अतिरिक्त नये उदीयमान लेखकों की कृतियों को हिन्दी पाठकों को समय-समय पर समर्पित करते रहते हैं। नये लेखकों को प्रकाशन में कितनी कठिनाई आ रही है इसकी विस्मृत चर्चा करना आवश्यक नहीं। केवल इतना कहना चाहूँगा कि यदि नयी पीढ़ी को प्रोत्साहन देना है तो इनकी रचनाओं के प्रकाशन पर विशेष ध्यान देना होगा। इस सम्बन्ध में इनकी कठिनाईयाँ काफी दुखद हैं। यदि इनमें हम कुछ भी कमी ला सकें तो हमारे लिए प्रसन्नता की बात होगी। हमने हाल ही में विभिन्न भारतीय भाषाओं के नये लेखकों की कृतियों का हिन्दी रुपान्तर प्रकाशित करना आरम्भ किया है। इस पृष्ठभूमि में यह और भी युक्तिसंगत लगता है कि हिन्दी के ऐसे लेखकों का परिचय भी पाठकों को करायें। इसको सुव्यवस्थित ढंग से करने के लिए ‘नये हस्ताक्षर’ श्रृंखला का प्रकाशन आरम्भ किया जा रहा है जिसमें पहली तीन पुस्तकें-इन्दिरा मिश्र, अजय कुमार सिंह और महेन्द्र प्रसाद सिंह के कविता-संग्रह हैं।
मुझे आशा है कि हिन्दी में इन नये लेखकों की साहित्यिक सृजनात्मकता का उचित स्वागत होगा।

नयी दिल्ली
15 फरवरी, 1991

बिशन टंडन
निदेशक

प्राक्कथन



दो तीन वर्ष पहले महेन्द्रजी का कविता संग्रह ‘सूर्यारोहण’ पढ़कर मैंने विशेष परिचय न होते हुए भी, उन्हें एक पत्र में, (भावना से परे) विचारों की इतनी हृदयग्राही अभिव्यक्ति के लिए बधाई दी थी। पर उस समय भी युगान्तर और अजन्ता जैसी कविताओं ने मेरा ध्यान आकर्षित किया था-


‘तुम्हें जानना स्वयं को खोने-सा
त्रासद पर उन्मादक रहा है-
ऐसा संग्राम जिसमें आत्मरक्षा को
मैंने तिलांजलि दे दी है;
शायद इसलिए
कि मैं आश्वस्त हूँ
कि तुमसे हारकर भी
मैं अपराजित हूँ...
शैवाल में खोकर भी
मेरी अग्निधारा युगान्तरों तक जीवित रहेगी।

(‘युगान्तर’)

‘तुम्हें जानना शाक्षात शक्ति को जानना है,
सत्य को जानना है,
शिव और सुन्दर को जानना है।
तुम्हारी आरक्तवसना समुन्नत स्फटिक प्रतिमा
साक्षात् शक्ति नहीं तो क्या है ?
तुम्हारे बालारुण मुखमण्डल पर
चिन्तन के मेघ छाये तो दिगन्त चिन्तनशील हो गया;
जब अचानक निश्छल हँसी फूटी
तो सर्वत्र निर्मेघ धूप- खिल गयी’।

(‘अजन्ता’)

इन्हें पढ़कर मेरे मन में प्रश्न उठा था कि कवि अपने विचारों की ही उधेड़-बुन में अपनी अनुभूतियों और भावों के प्रति पूरा न्याय क्यों नहीं करता ? इसका उत्तर मुझे ‘तृज्या’ की कविताओं में मिला है।’ सूर्यारोहण’ में कवि की उस समय लिखी गयी सभी कविताएँ संग्रहीत नहीं हैं। वास्तव में उसी समय महेन्द्र जी सामाजिक व बौद्धिक प्रतिबद्धता की लालित्यमय अभिव्यक्ति के साथ-साथ वैयक्तिक अनुभूतियों को भी मुखर कर रहे थे।

इसी वैयक्तिक अनुभूति की प्रखरता ‘तृज्जा’ की विशिष्टता है। मन के मीत के प्रबल आकर्षण से बिद्ध व्याकुलता इन कविताओं में फूटी है। इसी बेचैनी की सुध समस्त कविताओं को एक सूत्र में पिरोये रखती है; भिन्न कविताओं के होते हुए भी एक स्थायी भाव सा सृजन करती है। अप्राप्य की चाह और खोज में कवि कई अनुभूतियों के दौर से गुजरा है-


‘‘विगत ग्रीष्म की लम्बी, एकान्त दुपहरियों में
मैंने अस्मिता के अन्तःपुर में
तुमसे आँख-मिचौली खेली थी।
रोज सुबह प्रतीक्षा का नया सबेरा होता था,
अनागत पत्रों का पूर्वाह्न, मध्याह्न और उत्तराह्न।

और, इन सुदीप्त यादों के मरूद्यान में
तड़पता अभिसाराकुल मैं।
मैं तुम्हें नख-शिख सोने से लाद दूँ,
पर तुम तो स्वयं प्रचण्ड क्रूर सोनधार हो।
समुखी स्फिंक्स
मेरे भाग्य के गहन तम में ज्योति का
महारास कब होगा ?

(‘स्वर्णकुमुद’)


लेकिन उसके भाग्य में शायद केवल प्रतीक्षा है-

‘सर्वान्ध अमावस के बाद एक दिन
दूज का चाँद पलभर के लिए पास आया था।
पर कल्पान्त प्रतीक्षा के बाद भी
फिर पूर्णमासी मुलाकात नहीं हुई।
मर्मान्तक प्रतीक्षा के दीमक
पल-पल मुझे खा रहे हैं :
इस वेदना से मुक्ति का मार्ग क्या है ?
प्रतिभाओं और प्रतिमाओं के वृन्दावन में भी
यमुना सूखती जा रही है
नटवर सबका है
पर अन्तरंग केन्द्र के बिना
क्या महाराम की अनन्त लहरें सम्भव हैं ?’’


(‘महारास’)


इन प्रेम कविताओं की विशिष्टता यह है कि कोरी भावुक रूमानियत से परे हैं। इनमें नये प्रतीकों के माध्यम से प्रेयसी की कामुक कमनीयता कामांसल सम्प्रेषण होता है; पर यह मेहँदी लगे हाथों वाली अवगुण्ठिता नहीं है, ‘फ्रिल्स’  व ‘ब्लू डैनिम’ में कटा सँवरा सम्मोहन होते हुए भी वह अविश्लेष्या है। मूलतः वह शक्ति की स्रोत है। ‘तृज्जा’ में ‘सूर्यारोहण’ की ‘अजन्ता’ की साक्षात शक्ति हर रूप में

तुम स्त्रीत्व की अनन्त श्रृंखल आणुनामिक विस्फोट....’

(‘शतरूपा’)

बन गयी है। पर उसमें एक नैसर्गिक सौन्दर्य है (याद है कीट्स की ‘ओड टु ए ग्रेशियन अर्न’: सौन्दर्य ही सत्य है और सत्य सौन्दर्य’)

‘तुम दीपवृक्ष अथवा प्रवाल पारिजात हो
जिससे अक्षर किरणें फूटती हैं।
इतने नैसर्गिक वर्ण तो सुरचाप में भी नहीं हैं।
तुम्हारे केश और काजल से भी
किरणोज्वल तरंगें उठती हैं।’

(‘अविश्लेष्या’)


यह सभी कविताएँ प्रगाढ़ प्रेमानुभूति के भाव से ओत-प्रोत हैं-

‘मेरे कोमल सपने
अजगर के मुँह में भेक-से छटपटा रहे हैं।
मेरी मुक्ति का मार्ग
मेरे लिए दुःसाध्य सही,
पर तुम्हारे लिए तो
कनिष्ठा पर गोवर्धन उठाने-सा सहज है।
उन आँखों से
जिनकी स्मृति मात्र से
निस्तेज धूप में गुलाबी सुरूर भर जाता है,
विश्व कितना मादक दीखता होगा।’

(‘भोरुकवा’)

लेकिन प्रेयसी के प्रति यह आकर्षण क्षणिक उद्वेग नहीं है। इसमें तो एक युग की-सी तपन है जिसे कवि ने कई विशाल बिम्बों से उकेरा है-


‘इस गोलार्द्ध में अब और क्या बचा है
कि यज्ञ का आयोजन करूँ !
इस चन्दन की चिता में
मेरे मसानी भविष्य का भस्मकलश
प्रवाहित कर दो।’

(‘सपने’)

पीड़ा ने कवि को बुझा कोयला तो बना दिया है पर कहीं वह कोयले की खान ही बनकर न रह जाये ? सम्भवतः उसकी नियति का यही रूप है कि ‘शरीर और आत्मा दोनों की चमड़ी उधेड़’ उसमें ‘कबाड़ी वर्तमान और मसानी भविष्य का भूसा भरती-सी’ (‘सपने’) उसे अब कभी भी बचपन की रसभीनी बरसात की ओर नहीं ले जायेगी। ‘अमलतास फिर नखशिख खिलेगा, पर ऋतुराज रीता का रीता रह जायेगा’ (‘मेनका’)। यही नहीं-


‘सन्त्रस्त मन की वेदना कोई समझे तो सुनाऊँ।
हृदय चीर कर दिखाऊँ।
सर्वत्र खारेपन का निरन्त साम्राज्य है।
मँझधार में न तो बहुत पत्र-पुष्प का सहारा है,
न सुपर्ण का सुराग !
चतुर्दिक् व्याप्त खारेपन में
सन्तरण अर्थहीन हो गया है।
इससे तो बेतरह था रेगिस्तान में थमा-पाँव
यह तो पता होता कितने पानी में हैं।’

(‘अर्थहीन’)


यह एक निराश एकाग्रता का मूड है जिसका रसास्वादन निःसन्देह आनन्द-दायक है, विशेषतया उन संश्लिष्ट बिम्बों के कारण है जिनका उपयोग कवि ने बड़े कलात्मक ढंग से किया है। इन नये मुहावरों ने कविता में प्रभावी पैनापन बिखेर दिया है।

लेकिन इन कविताओं में भी कवि अपनी दार्शनिकता नहीं त्याग सका है-


‘परन्तु लगता है
विरह में प्रणय के सूत्र क्षीण नहीं गाढ़े हुए हैं
और अविलम्ब मांगलिक हो सकते हैं।
मैं सर्वशुभवादी हूँ
तथा इस आशावादिता में अकेला नहीं हूँ।
धरती और आकाश के समान्तर का  
इन्द्रधानुषिक संयोग सम्भावना की पूर्ण परिधि में है।’

(‘इन्द्रधनुष’)


‘प्रकृति शायद कुछ लोगों के प्रति पक्षपाती है-
पर इस पक्षपात का मुझे गिला नहीं है।
बल्कि मैं आभारी हूँ कि प्रकृति ने उसे फुर्सत में गढ़ा है,
और निर्माण के बाद भूल नहीं गयी है।
वह अब भी मेरी शिखा है
जो मेरी लपट से अनभिज्ञ है।’’

(‘अब भी लो शेष है’)

इसके अतिरिक्त कुछ विचार प्रधान कविताएँ भी इस संकलन में है-

‘नवागम को गौर से देखो
तो तुम्हें हिन्दुस्की छवियों पर भी
बोधिसात्त्विक और अकबरी प्रभाव स्पष्ट दीखेंगे।
जड़िमा और हकलाहट छँट रहे हैं
और सौम्य पद्मालिंगन की छत्र-छाया में
ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है !
समग्र परिदृश्य में
मन्दाकिनियों के संग-संग
उद्यम और साहस के ज्वालामुखियों के
प्रचण्ड विस्फोट बिखरे हैं;
इन्हें एक सीकरी में गूँथ दें
तो कैसा रहे।’

(‘अश्वत्थ’)

एक अन्य कविता में कवि ने अन्तर्मन के द्वन्द्व के कारण का विश्लेषण इस प्रकार किया है-


‘क्या इसलिए कि
व्यापक दिक्काल-जनिज्ञ संस्कृति और मानस में
समन्वय का उत्फुल्ल शतदल अशेष है ?
क्या इसलिए कि
सुनहरे भविष्यत की मृगतृष्णा की दौड़ में
मैं बेदम हो गया हूँ ?’

(‘द्वन्द्व’)

कविता के दो सक्रिय धरातल होते हैं-एक, अनुभूतियों और भाव का, दूसरा, शिल्प और भाषा का। हमारी परम्परा में शब्द और अर्थ दोनों ही कविता के अनिवार्य अंग माने जाते रहे हैं। इस परम्परा के विकास और आज की स्थिति की विस्तृत व्याख्या का यह स्थान नहीं हैं केवल इतना स्पष्ट कर दूँ कि नयी कविता के पण्डित-पुरोहितों के अनुसार भाव-दर्शन व अर्थ का कविता में विशेष महत्त्व नहीं है। लेकिन ‘सूर्यारोहण’ और ‘तृज्जा’ की कविताओं को पढ़ने पर यह लगता है कि हमारी पारम्परिक मान्यता में अधिक अर्थवत्ता थी। शायद कहीं-कहीं यह कविताएँ कवित्व के दायरे से बाहर जाती दिखाई देती हैं। किन्तु इनकी सबसे बड़ी खूबी है सबल संस्कृतनिष्ठ भाषा का सौष्ठव जो कई सूक्ष्म स्थितियों का परिचय आसानी से करा देता है। कहीं-कहीं कविता में दुरूहता है, पर दुरूहता तो आधुनिक हिन्दी कविता ही नहीं, आज की विश्व कविता की पहचान है। मूलतः यह कविताएँ अनुभूतियों को पकड़ने में तो सफल हुई ही हैं, इनमें विचारों और हमारी आँखों से ओझल वास्तविकता का भी ऐसा वर्णन है जो कविता को अर्थवान बनाता है। और यही महेन्द्र जी की कविता की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

नयी दिल्ली
होली, 11 मार्च, 1990

भूमिका


मेरे विचार से किसी कवि को अपने काव्य-संग्रह की भूमिका नहीं लिखनी चाहिए। क्योंकि कविता की ध्वनि की व्याप्ति सिर्फ उसी क्षितिज तक नहीं जाती जहाँ तक उसका कर्त्ता उसे प्रत्यक्ष पहली दृष्टि में सुन पाता है। प्रत्येक पाठक में कविता कुछ नयी अनुगूँज पैदा करती है जो सर्जक के अभीष्ट की परिधि के पार तक जाती है। इस प्रकार पाठक सर्जक का सहकर्ता बन जाता है। भूमिका लिखकर कवि अपनी कृति के इर्द-गिर्द एक लक्ष्मण रेखा खींच देता है। फिर भी इन कविताओं के सम्बन्ध में दो शब्द कहने से मैंने अपने को रोक नहीं पा रहा। रचना-प्रक्रिया और मानव मस्तिष्क व व्यक्तित्व की बनावट इतनी भूल-भूलैयों से पूर्ण है कि उनके बारे में निश्चयात्मक रूप से कोई स्थापना करना, स्वयं कवि के लिए भी, असम्भव और मूर्खतापूर्ण प्रयास है। अतः निम्नलिखित प्रसंग में अपनी कविताओं की रचना के उपरान्त उनके पाठक की हैसियत से ही प्रस्तुत करना चाहूँगा। वैसे भी, मुझे विश्वास है कि हिन्दी आलोचना जिस परिपक्वता को प्राप्त कर चुकी है वह अपनी स्वायत्तता और दूरंदेशी खोये बिना मेरे इस आत्मकथ्य को मात्र एक साक्ष्य के रूप में लेगी और उससे भ्रान्त नहीं होगी।

‘तृज्जा की कविताएँ, मेरे प्रथम काव्य संग्रह सूर्यारोहण की कविताओं की ही तरह ई. सन् 1980 के दशक की ही रचनाएँ हैं। ‘सूर्यारोहण’ की भाव-भूमि अधिकांशतः सामाजिक और राजनीतिक विचारधारा से संलग्न है, जब कि तृज्जा मेरे घोर वैयक्तिक और निजी अनूभूतियों का दस्तावेज है। इसकी पृष्ठभूमि सौंदर्य श्रृंगार, प्रेम और विरह की है। परिमित विषयवस्तु के बावजूद इन कविताओं का परिसर किंचिंत व्यापक है-सहज स्नेहिल बुतपरस्ती की रवानी और रमणीयता और उसकी सर्वसुलभ अभिव्यक्ति से लेकर विरह, बाधित प्रेम, और असह्य वेदना से उत्पन्न कुण्ठा और लगभग विक्षिप्ति तक। आज मुड़कर पढ़ने पर इनमें से कई कविताएँ एक दुःस्वप्न की त्रासद पुनस्मृति प्रतीत होती हैं, मुझे प्राय: भान होता है कि ये हजारों साल पूर्व के पुरातात्त्विक अवशेष हैं-मेरे मानस के, और मेरी अपनी दृष्टि में। तथापि मैं अपनी प्रेमानुभूतियों सम्मोहनों, ग्रन्थियों, कुण्ठाओं और विक्षिप्तियों को अपने भूत-और वर्तमान-‘आत्म’ के अंश के रूप में स्वीकार करता हूँ। साथ ही, इस समस्त मनोत्यात्मकता (Psychodynamics) को मैं एक समग्रता के रूप में देखता हूँ। आधुनिक मनोविज्ञान सामान्यता (normality) और असामान्यता (abnormality) को एक हद तक एक अविच्छिन्नता के रूप में प्राकल्पित करता है जो सिगमण्ड फ्रायड की अवधारणों और सैद्धिन्तिक स्थापनाओं की भाषा में मानव व्यक्तित्व के तीन अंगीभूत तत्त्व-Id (कामतत्त्व) Ego ((अहम्) Super Ego (पराहम्)-के ‘सन्तुलित’ गत्यात्मकता पर आधारित है। इस सन्तुलित गत्यात्मकता की कोई सार्वभौम परिभाषा नहीं है। यह स्थान और काल की सीमाओं में आबद्ध, अर्थात् संस्कृति-सापेक्ष है। जो एक संस्कृति में सामान्य है, वही दूसरी संस्कृति में अपसामान्य हो सकती है।



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