उमराव जान अदा - मिर्जा हादी रुसवा Umrao Jaan Ada - Hindi book by - Mirza Hadi Rusva
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उमराव जान अदा

मिर्जा हादी रुसवा

प्रकाशक : ग्लोबल एक्सचेंज पब्लिशर्स प्रकाशित वर्ष : 2007
आईएसबीएन : 978-81-904837-2 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :152 पुस्तक क्रमांक : 5569

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उमराव जान...

Umrao Jaan Ada

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

एक थी उमराव


हम को भी क्या क्या मजे की दास्तानें याद थीं
लेकिन अब तमहीदे जिगरे दर्द मातम हो गईं।

यह किस्सा शुरू यों होता है कि दस बारह बरस पहले दिल्ली की तरफ के रहने वाले मेरे एक दोस्त, मुंशी अहमद हुसैन साहब, सैर-सफर के लिए लखनऊ तशरीफ लाए थे। इन्होंने चौक में सैयद के फाटक के पास एक कमरा किराये पर लिया था। यहां अक्सर, दोस्त सरेशाम आ बैठते थे। बहुत ही लुत्फ की सोहबत होती थी। मुंशी साहब की शायरी समझने की लियाकत, आला दर्जे की थी। खुद भी कभी-कभी कुछ कह लेते थे और अच्छा कहते थे, लेकिन ज्यादातर सुनने का शौक था। इसलिए अक्सर शेरो-शायरी का चर्चा रहता था।

इसी कमरे के बराबर एक और कमरा था। इसमें एक तवायफ रहती थी। रहन-सहन की तरीका और रंडियों से बिलकुल अलहदा था। न कभी किसी ने कमरे पर सरे राह बैठते देखा, न वहां किसी का आना-जाना ही था। दरवाजों में दिन-रात पर्दे पड़े रहते थे। चौक की तरफ, निकास का रास्ता, बिलकुल बंद रहता था। गली की तरफ एक और दरवाजा था। इसी से नौकर-चाकर आते-जाते थे।

अगर कभी-कभी रात को गाने की आवाज न आया करती, तो यह भी न मालूम होता कि इस कमरे में कोई रहता भी है। जिस कमरे में हम लोगों की बैठक थी, इसमें एक छोटी-सी खिड़की लगी थी, मगर इसमें कपड़ा पड़ा रहता था।
एक दिन हमेशा की तरह दोस्तों का जलसा था। कोई गजल पढ़ रहा था। दोस्त दाद दे रहे थे। इतने में मैंने एक शेर पढ़ा। उस खिड़की की तरफ से ‘वाह-वाह’ की आवाज आई। मैं चुप हो गया और दोस्त भी उस तरफ हैरत से देखने लगे।
मुंशी अहमद हुसैन ने ऊंची आवाज में उलाहना-सा दिया, ‘छुपी हुई तारीफ ठीक नहीं। अगर शेरो-सखुन का शौक है, तो जलसे में तशरीफ लाइए।’

इसका कोई जवाब न मिला। मैं फिर गजल पढ़ने लगा। बात आई-गईं हो गई, पर थोड़ी देर बाद एक महरी आई। उसने पहले सबको सलाम किया फिर कहा, ‘मिर्जा रुस्वा कौन साहब हैं ?’
दोस्तों ने मेरी तरफ इशारा किया। तब महरी मुझसे मुखातिब हुई, ‘‘बीबी ने आपको याद किया है।’’
‘‘मैंने पूछा, ‘‘कौन बीबी ?’

महरी ने कहा, ‘बीबी ने ताकीद की है कि मेरा नाम न बताना। आगे आपका हुकुम।’
मुझे महरी के साथ जाने में हिचक हुई। दोस्त मुझसे मजाक करने लगे, ‘हां साहब, क्यों नहीं ! कभी की साहब-सलामत है, जब ही तो इस तरह बुला भेजा !’

मैं दिल में गौर कर रहा था, कि कौन साहिबा ऐसी बेतकल्लुफ हैं।
इतने में महरी ने कहा, ‘हुजूर, बीबी आपको अच्छी तरह जानती हैं, जब तो बुला भेजा है।’
आखिर जाना ही पड़ा। जाके देखा तो, अहा ! उमराव जान तशरीफ रखती थीं !
देखते ही बोलीं, ‘वल्लाह ! मिर्जा साहब आप तो हमें भूल ही गए।’

‘यह मालूम किसे था कि आप किस कोहे काफ में तशरीफ रखती हैं ?’
उमराव जान: यों तो मैं अक्सर आपकी आवाज सुना करती थी, लेकिन कभी बुलाने की हिम्मत न हुई। मगर आज आपकी गजल ने बेचैन कर दिया। अचानक मुँह से ‘वाह’ निकल गया। उधर किसी साहब ने कहा, ‘यहां आइए।’ मैं अपनी जगह पर आप ही शर्मिंदा हुई। जी में आया चुप रहूं, मगर दिल न माना। आखिर अगली खसूसियतों के लिहाज से आपको तकलीफ दी। माफ कीजिएगा। हां, वह शेर जरा फिर पढ़ दीजिए।’

‘माफ तो कुछ न होगा, और न मैं शेर ही सुनाऊँगा। अगर शौक हो तो, वहीं तशरीफ ले चलिए।’
उमरान जान: मुझे चलने में कोई एतराज नहीं। मगर ख्याल है कि साहबे खाना या और किसी साहब को मेरा जाना बुरा न लगे।
मैं: आपके होश तो दुरुस्त हैं न ! भला ऐसी जगह आपको चलने के लिए क्यों कहना ? बेतकल्लुफ सोहबत है। आपके जाने से और लुत्फ होगा।

उमराव जान: यह तो सच है, मगर कहीं ज्यादा बेतकल्लुफी न हो !
मैं: जी नहीं ! वहां मेरे सिवा कोई आपसे ज्यादा बेतकल्लुफ नहीं हो सकता।
उमराव जान: अच्छा, तो कल आऊंगी।
मैं: अभी क्यों नहीं चलतीं ?

उमराव जान: ऐ हे ! दिखिए तो किस हैसियत से बैठी हूं !
मैं: वहां कोई मुजरा तो है नहीं। बेतकल्लुफ सोहबत है। चली चलिए।
उमराव जानः उई मिर्जा! आपकी तो बातें लाजवाब होती हैं। अच्छा, चलिए। मैं आती हूं।
मैं उठ कर चला आया। थोड़ी देर बाद उमराव जान साहबा जरा कंघी-चोटी करके, कपड़े बदल के आईं।

मैंने दोस्तों से चंद अलफाज में उनके शेरो-सखुन के मजाक और गाने के कमाल वगैरह की तारीफ कर दी। लोग लट्टू हो गए थे। जब वह तशरीफ लाईं, तो यह ठहरी की सब साहब अपना-अपना कलाम पढ़ें और वह भी पढ़ें। खुलासा यह कि वहां बड़े लुत्फ का जलसा हुआ।

उस दिन से उमराव जान अक्सर शाम को चली आती थीं। घंटे-दो घंटे बैठकी रहती थी। कभी शेरो-शायरी का जलसा हुआ, कभी उन्होंने कुछ गाया। दोस्त खुश हुए। ऐसे ही एक जलसे का हाल हम यहां लिख रहे रहे हैं।
उस दिन उमराव जान ने एक शेर पढ़ा।

सुनते ही मुझसे रहा न गया। मैंने कहा, ‘क्या कहना, बी उमराव जान साहबा। यह मकता तो आपने हाल के मुताबिक ही कहा है। और शेर ! क्यों न हो ?’
उमरान जान: तसलीम मिर्जा साहब ! आपके सर की कसम बस यह मतला याद था। और वह मतला भी खुदा जाने किस जमाने की गजल है। जबानी कहां तक याद रहे ? बेयाज निगो़ड़ी गुम हो गई।

मुंशी साहब: और वह मतला क्या था ? हमने नहीं सुना।
मैं: आप तो इंतजाम में लगे हुए हैं। सुने कौन ?
इसमें कोई शक नहीं कि मुंशी साहब ने आज के जलसे के लिए बड़े सलीके से इंतजाम किया था।

गर्मियों के दिन थे। दो घड़ी दिन रहे से सेहन में छिड़काव हुआ था ताकि शाम तक जमीन ठंडी रहे। उस पर दरी बिछाकर उजली चांदनी का फर्श कर दिया था। कोरी कोरी सुराहियां पानी भर कर और केवड़ा डालकर मुंडेर पर चुनवा दी थीं, उन पर मिट्टी के प्याले ढंके हुए थे। बरफ का इंतजाम अलग से था। कागजी हंडियों में सफेद पानी की सात सात गिलोरियां लाल रुमालों में लपेट कर केवड़े में बसाकर रख दी गई थीं। ढकनियों पर थोड़ा थोड़ा खाने का तंबाकू रख दिया था।

पेचदार हुक्कों के नेवों पर पानी छिड़क छिड़क कर हार लपेट दिए गए थे। चांदनी रात थी, इससे रोशनी का इंतजाम ज्यादा नहीं करना पड़ा था। सिर्फ एक सफेद कमल घुमाने के लिए जला दिया गया था। आठ बजते बजते सब दोस्त मीर साहब, आगा साहब, खां साहब, शेख साहब, पंडित साहब, वगैरह-वगैरह तशरीफ ले आए थे। पहले मीठे फालूदे के एक एक प्याले का दौर चला था, फिर शायरी का चर्चा शुरू हो गया।

मुंशी: तो मिर्जा साहब, हमारा इंतजाम आपके हवाले। हम तो शेर सुनेंगे।
मैं: माफ फरमाइए। मुझसे यह दर्दे-सर न होगा।
मुंशी: अच्छा, वह मतला क्या था, मोहतरमा, जरा हम भी तो सुनें।

काबे में जा के भूल गया राह दैर की
ईमान बच गया, मेरे मौला ने खैर की।

मुंशी: खूब कहा है।
खां साहब: अच्छा मतला है। मगर यह भूल गया क्यों ?
उमराव जान: तो क्या खां साहब, रेखती कहती हूं ?
खां: मजा तो रेखती का है। ‘मेरे मौला ने खैर की’ आप ही की जबान से अच्छा मालूम होता है।
मैं: बस आपके हमले शुरू हो गए। अभी तो शेर सुनने दीजिए, खां साहब। अगर सब आप ही के से पढ़े-लिखे हो जाएं तो शेरगोई का मजा तशरीफ ले जाए। उमराव जान, तुम तो कोई और गजल पढ़ो।
उमरान: कुछ याद आए तो अर्ज करूं।

शबे फुरकत बसर नहीं होती।

सब लोग: वाह वाह ! सुभान अल्ला ! क्या कहना !

शोरे फरियाद ता फलक पहुंचा,
मगर उसको खबर नहीं होती।

मैं: क्या शेर है। मेरे साथ साथ तमाम सुनने वालों ने भी तारीफ की और फिर इस उम्मीद में कान लगाए कि उमराव जान अगला शेर क्या पढ़ती हैं।

तेरे कूचे के बेनवाओं की, हविसे मालो जर नहीं होती।

सुनकर भी अहबाब ने तारीफ की, उमराव जान ने तस्लीम कर अगला शेर पढ़ा,
जान देना किसी पर लाजिम था,
जिंदगी यूं बसर नहीं होती।
मैं: वाह ! खां साहब, शेर मलाहजा हो।
खां साहब: सुभान अल्लाह ! हकीकत में क्या शेर कहा है।
उमराव: आप सब साहब कदर-अफजाई फरमाते हैं, वर्ना मैं क्या मेरी हकीकत क्या ?

है यकीं वह न आएंगे फिर भी, कब निगाह सूये दर नहीं होती।

खां साहब: यह भी खूब कहा।
पंडित साहब: क्या तर्जे कलाम है।
उमराव जान तस्लीम करके अगला शेर पढ़ने लगीं :

अब किस उम्मीद पर नजर मेरी, शिकवा संजे-असर नहीं होती।

खां साहब: क्या खूब कहा है ! फारसीयत ठसक रही है।
मुंशी साहब: कुछ भी हो, मजमून अच्छा है।

हम असीराने इश्क को सैयाद, हबिसे वालों पर नहीं होती।

अहबाब तारीफ करते हैं, उमराव तस्लीम करती हैं।

गलत अंदाज ही सही वह नजर, क्यों मेरे हाल पर नहीं होती।

खां साहब: हां, होना चाहिए। खूब कहा है !
उमराव जान: मकता मुलाहजा हो,

ए ‘अदा’ हम कभी न मानेंगे, दिल को दिल की खबर नहीं होती।

खां साहब: क्या मकता कहा है ! यह आप अपना तजरबा बयान करती हैं। और लोगों की राय इसके खिलाफ है।
उमराव: जाती तजरबा जो कुछ भी हो। मैंने तो शायराना मजमून कहा है।
मुशायरा खत्म होने के बाद फालसे की बरफ जमाई गई। उसकी दो दो कुलफियां दोस्तों ने खाईं। सब अपने अपने मकान की तरफ तशरीफ ले गए। इसके बाद खाना लगा दिया गया। मुंशी साहब ने, मैंने और उमराव जान ने खाना खाया।
मुंशी साहब: मोहतरमा, जरा अपना वह मतला तो पढ़िए, जो आपने पहले पढ़ा था।
उमराव जान ने मतला फिर पढ़ा।

किसको सुनाएं हाले-दिले जोर ए, अदा,
आवारगी में हमने जमाने की सैर की।

मुंशी साहब: इसमें कोई शक नहीं कि आपके हालात बहुत ही दिलचस्प होंगे। जब से आपने यह मतला पढ़ा है, मुझे यही खयाल है। अगर आप अपनी आपबीती बयान कर दें, तो लुत्फ से खाली न हो।
मैंने मुंशी साहब के कलाम की ताईद की। मगर उमराव पहलू बचाती थीं। हमारे मुंशी साहब को किस्से-कहानियों का बड़ा शौक था। अलिफ लैला, अमीर हमजा की दास्तान के अलावा, बीस्ताने-खयाल की तमाम जिल्दें नजर से गुजरी हुई थीं। कोई नाबिल ऐसा न था, जो आपने देखा न हो।

मगर लखनऊ में चंद रोज रहने के बाद जब अहले-जवान की अस्ली बोल-चाल की खूबी खुली तो अक्सर नाबिल—नवीसों के बेतुके किस्से, बनावटी जबान और ताज्जुब आमेज, बेहुदा जोश दिखाने वाली तररीरें आपके दिल में उतर गईं। लखनऊ के वा-मजाक लोगों की बोलचाल बहुत ज्यादा ही पसंद आई थी।
उमराव जान के इस मतला ने आपके दिल में यह खयाल पैदा किया, जिसका इशारा ऊपर किया गया है। अलकिस्सा, मुंशी साहब के शौक और उकसाने और उभारने में उमराव जान को मजबूर किया, और वह अपनी आपबीती कहने पर मजबूर हो गईं।

इसमें कोई शक नहीं कि उमराव जान की तकरीर बहत शुस्ता थी और क्यों न हो ? अव्वल तो पढ़ी-लिखी, दूसरे आला दर्जे की रंडियों में परवरिश पाई, शहजादों और नवाबजादों की सोहबत उठाई और महलात शाही तक रसाई ! जो कुछ उन्होंने आंखों से देखा, और लोगों ने कानों से न सुनो होगा।

अपनी आपबीती, वह जिस कदर कहती जाती थीं, मैं उनसे छुपा के लिखता जाता था। पूरी होने के बाद मैंने मसीदा लिखाया। इस पर उमराव जान बहुत बिगड़ीं। आखिर खुद पढ़ा और जा-बजा जो कुछ रह गया था, उसे दुरुस्त कर दिया। मैं उमराव जान को उस जमाने से जानता हूं, जब उनकी नवाब साहब से मुलाकात थी। उन्हीं दिनों मेरा उठना-बैठना भी, अक्सर उनके यहां रहता था। बरसों बाद फिर एक बार उमराव जान की मुलाकात नवाब साहब से उनके मकान पर हुई, जब वह उनकी बेगम साहिबा की मेहमान थीं। इस मुलाकात का जिक्र आगे है। इसके कुछ अर्से बाद उमराव जान हज करने चली गईं।

उस वक्त तक की उनकी जिंदगी की तमाम घटनाओं को मैं निजी तौर से जानता था। इसलिए मैंने यह किस्सा वहीं तक लिखा, जहां तक मैं अपनी जानकारी से उनके बयान के एक एक लफ्ज को सही समझता था।
हज वापसी के बाद उमराव जान खामोशी की जिंदगी बसर करने लगीं। जो कुछ पास जमा था उसी पर गुजर औकात थी।

वैसे उनको किसी चीज की कमी नहीं थी। मकान, नौकर चाकर, आराम का सामान, खाना पहनना, जो कुछ पास जमा था, उससे अच्छी तरह चलता रहा। वह मुशायरों में जाती थीं, मुहर्रम की मजलिसों में सोज पढ़ती थीं और कभी कभी वैसे भी गाने बजाने के जलसों में शरीक होती थीं।
इस आप बीती में जो कुछ बयान हुआ है, मुझे उसके सही होने में कोई भी शक नहीं है। मगर यह मेरी जाती राय है। नाजरीन को अख्तियार है, जो चाहें समझें।

उमराव जान अदा


सुनिए मिर्जा रुस्वा साहब। आप मुझसे क्या छेड़-छेड़ के पूछते हैं ? मुझ कम-नसीब आपबीती में ऐसा क्या है, जिसके आप आशिक हैं ? एक नाशाद नामुराद के हालात सुन कर, मुझे हरगिज उम्मीद नहीं कि आप खुश होंगे।
बाप-दादा का नाम ले के अपनी बड़ाई जताने से फायदा क्या, सच तो यह है कि मुझे याद भी नहीं। हां, इतना जानती हूं कि फैजाबाद में शहर के किनारे किसी मुहल्ले में मेरा घर था। मकान पुख्ता था। आसपास कुछ कच्चे मकान, झोंपड़े और कुछ खपरैलें थीं, रहने वाले जो ऐसे वैसे लोग होंगे। कुछ भिश्ती, कुछ नाई, धोबी, कहार।

मेरे मकान के सिवा एक ऊंचा घर इस मुहल्ले में और भी था। इस मकान के मालिक का नाम दिलावर खां था। मेरे अब्बा बहू बेगम साहबा के मकबरे पर नौकर थे। मालूम नहीं, काहे में नाम था, क्या तनख्वाह थी। इतना याद है कि लोग उनको जमादार कहते थे। दिन भर मैं अपने भाई को खिलाया पिलाया करती थी और वह भी मुझसे इस कदर हिला हुआ था कि दम भर को न छोड़ता था।

अब्बा जब नौकरी पर से आते थे, उस वक्त की खुशी, हम भाई बहनों को, कुछ न पूछिए। मैं कमर से लिपट गई, भाई अब्बा अब्बा करके दौड़ा, दामन से चिपट गया। अब्बा की बाछें मारे खुशी के खिली जाती हैं। मुझे चुमकारा, भैया को गोद में लिया, प्यार करने लगे।

मुझे खूब याद है, अब्बा कभी खाली हाथ घर न आते थे। कभी दो कतारे हाथ में हैं, कभी बताशों या तिल के लड्डुओं का दोना हाथ में है। अब इसके हिस्से लगाए जा रहे हैं भाई बहनों में, किस मजे की लड़ाइयां होती थीं। वह कतारा छीने लिए जाता है। मैं मिठाई का दोना हथियाए लेती हूं। अम्मां सामने खपरैल में बैठी खाना पकी रही हैं।

अब्बा इधर आ के बैठे नहीं कि उधर मेरे तकाजे शुरू। अब्बा अल्ला गुड़िया नहीं लाए ? देखो मेरे पांव की जूती कैसे टूट गई है। तुम को तो खयाल ही नहीं रहता। लो, अभी तक मेरा जेवर सुनार के यहां से बन के नहीं आया। छोटी खाला की लड़की की दूध बड़ाई है, भई, मैं क्या पहन के जाऊंगी ? चाहे कुछ हो ईद के दिन तो, मैं नया जोड़ा पहनूंगी, हां। मैं तो नया जोड़ा पहनूंगी, हां मैं तो नया जोड़ा पहनूंगी।

अम्मां खाना पका चुकीं तो मुझे आवाज दी। मैं गई, रोटी की टोकरी और सालन की पतीली उठा लाई। दस्तरखान बिछा। अम्मां ने खाना निकाला। सब ने सिर जोड़ के खाना खाया, खुदा का शुक्र किया। अब्बा ने इशा की नमाज पढ़ी, सो रहे। सुबह जो तड़के अब्बा उठे, नमाज पढ़ी। उसी वक्त में खड़ाक से उठ बैठी। फिर फरमाइशें शुरू हुईं।
आज न भूलना। गुड़िया जरूर लेते आना। अमरूद और सारंगियां भी...

अब्बा, सुबह की नमाज पढ़ कर, वजीफा पढ़ते हुए कोठे पर चढ़ जाते। कबूतरों को खोल के दाना देते। एक दो हवा में उड़ाते। इतने में, अम्मां झाड़ू बुहारी से निपट कर खाना तैयार कर लेतीं क्योंकि अब्बा पहर दिन चढ़ने से पहले ही नौकरी पर चले जाते थे। अम्मां सीना पिरोना ले के बैठ जातीं। मैं भैया को ले के कहीं मुहल्ले में निकल गयी या दरवाजे पर जो इमली का दरख्त था, वहीं चली गई। हमजोली लड़कियां लड़के जमा हुए। भैया को बिठा दिया, खुद खेल में लग गई। हाय, क्या दिन थे, किसी बात की फिक्र ही न थी। अच्छे से अच्छा खाती थी और बेहतर से बेहतर पहनती थी।

हमजोली लड़के लड़कियों में तो कोई मुझे अपने से बेहतर नजर न आता था। दिल खुला हुआ न था, निगाहें फटी हुई न थीं। जहां मैं रहती थी, वहां कोई मकान मेरे मकान से ऊंचा न था। सब कोई एक कोठरी या खपरैल में रहते थे। मेरे मकान में आमने सामने दो दालान थे। बड़े दालान के आगे दो खपरैली कोठरियां थीं। सामने दालान के एक बावरचीखाना था, दूसरी तरफ कोने का जीना। कोठे पर एक खपरैल, दो कोठरियां थीं। खाना पकाने के बरतन जरूरत से ज्यादा। दो चार दरियां, चांदनियां भी थीं। ऐसी चीजें मुहल्ले के लोग हमारे घर से मांगने आते थे।

हमारे घर में भिश्ती पानी भरता था। मुहल्ले की औरतें खुद ही कुएं से पानी भर लाती थीं। हमारे अब्बा जब घर से वर्दी पहन कर निकलते तो लोग झुक झुक कर सलामें करते। मेरी अम्मां, डोली पर सवार होकर जाती थीं और पड़ोसिनें पांव-पैदल।

सूरत शक्ल में भी मैं अपनी हमजोलियों से अच्छी थी। हालांकि खूबसूरती में मेरी गिनती नहीं हो सकती, मगर ऐसी भी न थी जैसी अब हूं। खुलती हुई चंपई रंगत थी। नाक नक्शा भी खैर, कुछ ऐसा बुरा न था। माथा किस कदर ऊंचा और आंखें बड़ी बड़ी। बचपन के फूले-फूले गाल थे। नाक अगरचे सुतवां न थी, मगर चपटी और पहियाफिरी भी न थी। डील-डौल भी उम्र के मुताबिक अच्छा ही था, अगररचे अब वैसा नहीं रहा। नाजुकों में मेरा शुमार न तब था, न अब है। इस किता पर पांव में लाल गुलबदन का पायजामा, छोटे छोटे पायलों को, टुइल का नेफा, नेनून की कुर्ती, तनजेब की ओड़नी। हाथों में चांदी की तीन-तीन चूड़ियां, गले में तौक, नाक में सोने की नथनी। और सब लड़कियों की नथनियां चांदी की थीं। कान अभी ताजे-ताजे छिदे थे। इनमें सिर्फ नीले डोरे पड़े थे। सोने की वालियां बनने को गई थीं।

मेरी शादी, मेरी फूफी के लड़के साथ ठहरी हुई थी। मंगनी नौ बरस में ही हो गई थी। अब उधर से शादी का तकाजा था। मेरी फूफी, नवाबगंज में ब्याही हुई थीं। फूफा जमींदार थे। फूफी का घर, हमारे घर से ज्यादा भरा पूरा था। मंगनी होने से पहले, मैं कई मर्तबा अपनी मां के साथ वहां जा चुकी थी। वहां के कारनामे ही और थे। मकान तो कच्चा था, मगर बहुत बड़ा, दरवाजे पर छप्पर पड़े थे। गाय, बैल, भैंसें बंधी थीं। घी, दूध, दही की इफरात थी, अनाज की कसरत। भुट्टों की फसल में, टोकरों भुट्टे चले आते थे। कतारों की फांदियां पड़ी हुई थीं। ऊख के ढेर लगे हुए थे, कोई कहां तक खाए ?
मैंने अपने होने वाले दूल्हा को भी देखा था, बल्कि साथ-साथ खेली भी थी। अब्बा पूरा जहेज का सामान कर चुके थे, कुछ रुपयों की और फिक्र थी। रजब के महीने में शादी मुकर्रर हो गई थी।




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