धुन के पक्के - सुनीता Dhun Ke Pakke - Hindi book by - Sunita
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महान व्यक्तित्व >> धुन के पक्के

धुन के पक्के

सुनीता

प्रकाशक : विद्या विहार प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :140
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5590
आईएसबीएन :81-88140-62-2

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आज के हिम्मती बच्चों और उनकी प्रतिभावान् पीढ़ी के लिए

Dhun Ke Pakke

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

दुनिया में हर युग, हर काल में ऐसे अद्भत लोग हुए हैं, जिनके भीतर अपने देश, समाज और मनुष्य की बेहतरी का सपना था, जिसके लिए कुछ कर गुजरने की धुन उन्हें हर वक्त बढने की प्रेरणा देती रही। ऐसे लोगों में लेखक, संत, समाज-सुधारक, स्वाधीनता सेनानी और नई-नई खोजों में जुटे वैज्ञानिक सभी तरह के व्यक्तित्व थे।

‘धुन के पक्के’ पुस्तक में डॉ. सुनीता ने बड़े भावपूर्ण ढंग से भारत और विश्व के अन्य देशों के उन महानायकों और तेजस्वी महिलाओं का चित्रण किया है, जिन्होंने विश्व और मानवता के हित के लिए बड़े-से-बड़े कष्ट हँसते हुए सहे और ऐसे महा अभियानों में लगे रहे, जिनसे इनसान को नई-से-नई मंजिलें मिलीं। इनमें प्रेमचंद और रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे महान् लेखक हैं तो ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु और महर्षि कर्वे जैसे समाज-सुधारक भी; तेनजिंग नोरगे, स्कॉट और लिविंग्स्टन जैसे कठिन अभियानों पर निकले दु:साहसी यात्री हैं तो राइट बंधुओं और एलियस होव जैसे धुनी वैज्ञानिक भी, जिन्होंने अपनी अथक मेहनत के बल पर मनुष्य की असंभव कल्पनाओं को भी सच करके दिखाया।

विश्वास है, विश्व के अनेक तेजस्वी महानायकों का स्मरण कराती यह पुस्तक हर वर्ग के पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी और उन्हें अपने जीवन में कोई बड़ा काम करने के लिए प्रेरित भी करेगी।

भूमिका


धुन के पक्के लोगों की गाथाएँ


इस किताब को लिखने की शुरूआत बरसों पहले हुई थी। बाल पाठकों के लिए देश-विदेश के महान् नायकों, स्वाधीनता सेनानियों, वैज्ञानिकों, लेखकों तथा जान हथेली पर रखकर साहसिक अभियान पर निकले विश्व-यात्रियों आदि को केंद्र में रखकर, संक्षिप्त, सादा और भावपूर्ण जीवनियाँ लिखीं जाएँ, तो आज के बच्चे मनुष्य की अथक संघर्ष-यात्रा के साथ-साथ उन महान् परंपराओं को भी समझ पाएँगे, जिनके कारण आज मनुष्यता बची हुई है। यह विचार बार-बार मन को मथ रहा था। पर जब काम करना शुरू किया, तो इस रास्ते पर आनेवाली कठिनाइयों को भी मैं समझ पाई।

इसलिए कि बहुत थोड़े शब्दों में किसी महान् नायक के संपूर्ण व्यक्तित्व कामों, और उसके समूचे योगदान की तसवीर पेश कर पाना एक मुश्किल काम था। फिर प्रामाणिक आधारभूत सामग्री हासिल कर पाने की मुश्किल अलग थी। कुछ अत्यंत परिचित व्यक्तियों पर लिखी गई जीवनियों की ढेरों पुस्तकें थीं, तो ऐसे व्यक्तियों पर बहुत कम लिखा गया, जिनका त्याग और बलिदान औरों से कम न था, पर वे नींव के पत्थर की तरह अजाने थे। जिन व्यक्तियों पर बहुत अधिक लिखा गया, उनकी जीवनियों में भी पिष्टपेषण और भावोच्छ्वास अधिक मिला। उनके व्यक्तित्व की उन रेखाओं को उभारने पर कम बल था, जिससे आज के पाठक भी सीख सकें और कुछ करने की लगन के साथ अपनी अलग राह चुन सकें।

‘धुन के पक्के’ में देश-विदेश के जिन अट्ठाईस महानायकों और तेजस्वी, संघर्षमयी महिलाओं के जीवन की झलक दी गई है, उम्मीद है, वह किशोर पाठकों को आगे बढ़ने और जीवन में कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देगी। स्वयं इन असाधारण धुनी लोगों के बारे में लिखते हुए मेरी कलम कई बार काँपी, थरथराई है। इन धुन के पक्के लोगों की कहानियाँ कभी स्तब्ध और रोमांचित करती हैं, तो कभी मन को बहा ले जाती हैं-ऐसे भावलोक में जहाँ फायदे-मुनाफे, ईर्ष्या-मत्सर और ‘मैं-पर’ की दुनिया बहुत पीछे छूट जाती है। हम खुद को एक महान् परंपरा का उत्तराधिकारी मानकर मनुष्य और मनुष्यता के लिए कोई सचमुच बड़ा काम करना चाहते हैं..और बड़े से बड़े त्याग के लिए प्रस्तुत हो उठते हैं।

मुझे पूरा विश्वास है कि बच्चों और किशोर पीढ़ी में आज भी शक्ति और रचनात्मक संभावनाओं के खजाने छिपे हुए हैं। बस, उन्हें समझने और राह सुझाने की जरूरत है। यह पुस्तक इस दिशा में कुछ कर पाई, तो मैं अपने श्रम को सार्थक समझूँगी।


26 जनवरी, 2006
545, सेक्टर-29
फरीदाबाद-121008
(हरियाणा)

-सुनीता


ईसप की कथा


घर-घर पहुँचीं वे अनोखी कहानियाँ


आज ईसप की कहानियाँ संसार के हर देश में पढ़ी और सुनी जाती हैं। लोग बहुत आदर से बाबा ईसप को याद करते हैं। संसार के बड़े-से बड़े लेखक और कलावंत भी उनके सम्मान में सिर झुकाते हैं, इसलिए कि बाबा ईसप की कथाओं में जादू है। ये वे कथाएँ हैं जो बच्चों और बड़ों, सभी को लुभाती हैं। शायद ही कोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति हो, जिसने बाबा ईसप की कोई दिलचस्प कथा न पढ़ी हो। ये कथाएँ बेहद लोकप्रिय हैं, पर इनकी लोकप्रियता के पीछे यह बात भी छिपी हुई है कि इनके पीछे सच्चाई की ताकत है। ये कहानियाँ हमें खुली आँखों से दुनिया को देखने और निर्भयता से जीने की सीख देती हैं, साथ ही अन्याय का विरोध करना भी सिखाती है। इसीलिए दुनिया भर में बाबा ईसप की कहानियाँ प्रसिद्ध हैं।

लेकिन इन कथाओं को बुननेवाले बाबा ईसप का जीवन भी खुद एक कहानी है-बड़ी ही दर्दनाक कहानी। उनका जन्म करीब ढाई हजार साल यूनान में हुआ था। तब यूनान में दास-प्रथा का जोर था। मनुष्यों को दास बनाकर बाजारों में बेचा जाता था, जैसे गाय-बैल और गधे बिकते हैं। धनवान लोग थोड़ा-सा धन देकर उन्हें खरीद ले जाते थे और उनसे मन चाहे काम कराते थे। उन्हें बुरी तरह सताया जाता था। उन पर ऐसे अत्याचार होते थे कि उनके बारे में जानकार रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उन्हें घो़ड़ों की तरह गाड़ियों में जोता जाता था। अगर वे तेज न चल पाते तो पीठ पर कोड़ों की बरसात होती थी।

इसी तरह बाजार में बिकनेवाला एक दास ईसप भी था। ईसप तब नवयुवक ही था और उसके भीतर स्वाभिमान व आजादी की आँधी मचल रही थी। उसने अपनी ही तरह जोशीले और ताकतवर उन दासों को इकट्ठा कर किया, जो गुलामी से घृणा करते थे। सबने मिलकर एक मजबूत दल बना लिया और विद्रोह कर दिया। आसमान उनके जोशीले नारों से गूँजने लगा। वे आवेग से भरकर कह रहे थे-‘‘आखिर हम भी इनसान हैं, हम पर ये अत्याचार किसलिए ? हमारे पास भी दो हाथ-पैर हैं। हमारे मन में भी उमंगें हैं। हम जो चाहें, वह कर सकते हैं। हम कुत्तों की मौत मरने के लिए हरगिज तैयार नहीं। हम अत्याचार नहीं सहेंगे और अपना अधिकार प्राप्त करके रहेंगे।’’

इन जोशीले नारों से धनी लोगों की नींद उड़ गई। भला वे यह बात कैसे स्वीकार कर सकते थे कि दास लोग खुल्लम-खुल्ला विद्रोह कर दें और अपनी आजादी की माँग करने लगे। उन्हें यह भी पता था कि ईसप ही उनका नेता है। आखिर सब धनवानों ने मिलकर ईसप को कैद कर लिया। उसे भयानक यातनाएँ दी गई। गरम लोहे से उसके पूरे शरीर को दागा गया। लेकिन ईसप शांत था। वह चुपचाप होठ भीचें अत्याचारों को सह रहा था। उसका मन कह रहा था कि उसने कुछ भी गलत नहीं किया। आखिर हर आदमी को जिसने इस धरती पर जन्म लिया है, आजादी से जीने का हक है।
तरह-तरह से सताने और मारने-पीटने के बाद ईसप को अब एक अँधेरी काल-कोठरी में डाल दिया गया, जहाँ धूप, हवा, रोशनी तक उसके पास नहीं आ सकती थी। वह मन-ही-मन घुटता रहता था। पिंजरे में डाले गए शेर की तरह मन-ही-मन छटपटाता रहता था। जमीन पर सिर पटक-पटककर बेहोश हो जाता।

इसी तरह एक-एक कर कितने ही साल गुजर गए। ईसप को अब साल, महीने तो क्या याद रहते ! वह तो दिन और रात का अंतर करना ही भूल गया, क्योंकि उसकी अँधेरी कोठरी में तो हमेशा रात ही रहती थी। न उसे गरमी, जाड़े, बरसात का पता चलता था और न मौसम के बदलने का। धीरे-धीरे इतने साल गुजर गए कि ईसप बूढ़ा हो गया। यहाँ तक कि उसके घर के लोग भी उसे भूल गए।
धनी लोगों ने जब देखा कि ईसप अब दीन-हीन बूढ़ा और लाचार हो गया है तो उन्होंने दया करके उसे काल-कोठरी से मुक्त कर दिया।

ईसप जब काल कोठरी से बाहर आया तो बहुत कमजोर हो चुका था। यह अंदाज लगा पाना ही मुश्किल था कि इस आदमी में कभी इतनी ताकत थी कि इसने दासों में विद्रोह की भावना पैदा कर दी थी और धनी व शक्तिशाली लोग इसके कारण थर-थर कांपते थे। लेकिन अब ईसप की कमर झुककर तीर-कमान हो गई थी। आँखों से कुछ दिखाई नहीं देता था। कान बहरे हो गए थे। सिर पर उलझी जटाएँ थीं। दाढ़ी सफेद हो चुकी थी।

ईसप के साथी ही अब उसे देखकर दूर भाग जाते थे। उन्हें डर था कि ईसप के साथ देख लिए जाने पर अब भी धनवान लोग उन पर अत्याचार करेंगे। इसलिए ईसप अब भीख माँगने को मजबूर हो गया। वह घर-घर जाता, बच्चों को दुआएँ देता, आशीर्वाद देता और भीख माँगता। कभी-कभी वह कहानियाँ भी सुनाया करता था। इसलिए बच्चे उसे देखकर दूर से दौड़े चले आते थे। दूर से ही चिल्लाकर कहते-‘‘बाबा, कहानी सुनाओ, कोई नई कहानी !’’

ईसप उन्हें नई-से-नई कहानियाँ गढ़कर सुनाया करता। वे कहानियाँ ऐसी थीं जिन्हें सुनकर बच्चे खो जाया करते थे। जिन्हें सुनकर कभी वे रोते, कभी हँसते और कभी गुस्से से भर जाया करते थे, क्योंकि ये कहानियाँ उन्हें अन्याय का विरोध करना सिखाती थीं। इनमें जीवन के बड़े-बड़े सत्य छिपे थे। बाबा ईसप ने मानो अपने सारे जीवन के अनुभवों का सार इनमें निचोड़कर रख दिया था। इसीलिए इन कहानियों का असर बिलकुल जादू जैसा होता था। जो एक बार सुन लेता, वह इन कहानियों को कभी भूल ही न पाता।

इसलिए बाबा ईसप द्वारा बच्चों को सुनाई गई ये कहानियाँ देखते-ही देखते घर-घर में फैलती चली गईं। पूरे यूनान में उनकी गूँज सुनाई देने लगी और फिर ये धीरे-धीरे सारी दुनिया में फैल गई। इन कहानियों में पशु-पक्षियों के जरिए बातें कही गई हैं; पर वे बातें इतनी बड़ी हैं कि जो भी सुनता है, देर तक सोचता ही रह जाता है। इसीलिए इन कहानियों का असर बहुत गहरा होता है।

सच तो यह है कि ईसप अपने जीते-जी विद्रोह नहीं कर पाया, वह विद्रोह और परिवर्तन इन कहानियों के जरिए आया। देखते-ही-देखते समाज बदला। अब दास-प्रथा कहीं नहीं है। हाँ, ईसप की कहानियाँ आज भी हैं और वे हजारों सालों तक बनी रहेंगी, क्योंकि वे हमें एक सुंदर दुनिया गढ़ने की सीख देती हैं।



दानवीर राजा शिवि


शरण में आए हुए की रक्षा


राजा शिवि बड़े दयालु थे। दूर-दूर तक उनका नाम था। सभी उनके उज्जल चरित्र और उदारता की कथा कहते-सुनते थे। पर राजा शिवि को जरा भी इसका अभिमान न था। अगर उनके सामने कोई उनके यश और कीर्ति की चर्चा करता, तो वे इस तरह सुनते, जैसे किसी और की बात हो रही है। लोग चकित होकर कहते-‘‘राजा शिवि धरती और भू-मंडल की शोभा हैं !’’
एक बार की बात, राजा शिवि अपने राजसिंहासन पर बैठे थे। दरबार में सभी मंत्री उपस्थित थे। गंभीर चिंतन-मनन चल रहा था।

उसी समय एक कबूतर आकर उनकी गोद में गिरा। कबूतर बहुत भयभीत था। उसकी साँस जोर-जोर से और जल्दी-जल्दी चल रही थी। उसने घबराकर कहा-‘‘मुझे बचाइए, महाराज !’’ राजा शिवि चकित थे। उन्होंने उसे बाँहों में ले लिया और प्यार से हाथ फेरने लगे।
थोड़ी देर के बाद एक बाज भी वहाँ आ पहुँचा। वह राजा शिवि के सिंहासन के आगे आकर बैठ गया और बोला-‘‘महाराज, मैं कई दिनों से भूखा हूँ। यह कबूतर मेरा आहार है। आप कृपया इसे छोड़ दें।’’

राजा शिवि बोले-‘‘नहीं, यह तो असंभव है। यह कबूतर अपनी रक्षा के लिए मेरी शरण में आया है। शरण में आए हुए की रक्षा करना मेरा धर्म है। यह कबूतर मैं तुम्हें नहीं दे सकता। इसके बदले में जो चाहे माँग लो।’’
बाज ढिठाई से बोला, ‘‘महाराज, मुझे तो अपना आहार चाहिए। अगर आप यह कबूतर नहीं दे सकते, तो इसके बदले इतने ही वजन का अपने शरीर का मांस मुझे दे दीजिए। मेरा काम चल जाएगा।’’

यह सुनकर सारी राजसभा में सन्नाटा छा गया। पर महाराज शिवि बाज की इच्छा पूरी करने के लिए खुशी-खुशी तैयार हो गए। उन्होंने एक तुला मँगवाई। उसके एक पलड़े में कबूतर को बैठा दिया और दूसरे में अपने शरीर का मांस काट-काटकर रखने लगे। पर यह क्या इतना भारी हो गया कि काफी मांस रखने पर भी उसका पलड़ा जमीन से नहीं उठा। अंत में राजा शिवि स्वयं पलड़े पर बैठने लगे।

पर आश्चर्य ! तभी इंद्र और यमराज उनके आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गए। अब वहाँ न कबूतर था और न बाज। आसमान से फूलों की वर्षा होने लगी। इंद्र और यमराज दोनों हाथ जोड़कर बोले-‘‘महाराज शिवि, आपकी दयालुता और दानवीरता की कहानियाँ हमने बहुत सुनी थीं। इसीलिए कौतूहलवश आपकी परीक्षा लेने की ठान ली। हमें क्षमा कर दीजिए। आप वास्तव में महान् हैं।’’
आज भी दानवीरों में सबसे पहले राजा शिवि का नाम लिया जाता है। उनसे बड़ा दानी कोई और नहीं हुआ।

झाँसी की रानी


अपनी झाँसी नहीं दूँगी !


भारत के स्वाधीनता संग्राम में उन वीरांगनाओं का नाम भी स्वर्णक्षरों में लिखा जाएगा जिन्होंने देश के लिए हँसते-हँसते अपनी जान की बाजी लगा दी। उन वीर स्त्रियों में सबसे महान् थीं-झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई। इस महान् रानी के बलिदान को याद करके कवयित्री सुभद्रकुमारी चौहान ने ठीक ही लिखा है-

चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले बरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी।

लक्ष्मीबाई का बचपन का नाम मनुबाई था। उनके पिता मोरोपंत पेशवाओं के बड़े विश्वासपात्र थे।







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