प्रणाम - अरुण अस्थाना Pranam - Hindi book by - Arun Asthana
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राजनैतिक >> प्रणाम

प्रणाम

अरुण अस्थाना

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :155
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5593
आईएसबीएन :000000

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राजनीति पर आधारित उपन्यास

Pranam

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पहले आप

प्रणाम !

उन सबको, जो इस उपन्यास के पात्र बने। खासतौर पर उन सभी छोटे बड़े नेताओं को जिनके लिए ‘स्व’ ही सब कुछ है। और नई पीढ़ी के उन लोगों को—जिन्हें गुमराह करना बड़ा आसान होता जा रहा है। जिन्हें नहीं मालूम कि उन्हें कहां जाना है और वे कहां जा रहे हैं। जो आसमान छूने की आकांक्षा पाले हुए हैं। जिनकी कुंठा के घर रोज मजबूत होते जा रहे हैं। जो खुद पर तरस खा रहे हैं और जमाने को लानत भेज रहे हैं।

ऐसे लोगों को मैं अक्सर देखता रहा हूँ—बहुत करीब से। जो लोग जीवन में, समाज में, अपने अपने सच के अलग-अलग घेरे बनाए हुए हैं—जहां ये सारे लोग अपनी अपनी भूमिकाएं—अपने अपने हिसाब से—बहुत अच्छे से’ निभा रहे हैं।
एक रस्मी जावा तो करना पड़ेगा मुझे भी कि—‘इस उपन्यास में सभी घटनाएं, स्थान और पात्र काल्पनिक हैं ‘पर इस दावे को न तो मैं पचा पा रहा हूं, न ही शायद आप पचा पाएंगे। क्योंकि ये सभी आपको भी थोड़ा सा गौर करने पर अपने आसपास दिख सकते हैं।

प्रणाम !


उन लोगों को जिन्होंने मुझसे ये उपन्यास—जो काफी अरसे से अधूरा पड़ा था—करवा कर ही दम लिया। मेरी पत्नी ‘स्मृति’ इस गैंग की लीडर है। लंदन में हमारी गृहस्थी के शुरुआती दिनों में भी उन्होंने पीछे पड़ कर इसे पूरा करवाया।
पूरा करने का दबाव बनाने वालों में मेरे अग्रज मित्र मधुकर उपाध्याय भी काफी आगे रहे। मुझे लिखते रहने पर मित्र—बड़ी बहन—बॉस अचला शर्मा ने भी खूब मजबूर किया तो आदरणीय कवि अजित कुमार भी लगातार प्रेरित करते रहे—कुछ करने को।

प्रणाम !


स्वर्गीय ओंकार नाथ श्रीवास्तव को। बीबीसी में मेरे मार्गदर्शक रहे ओंकारजी ने इस उपन्यास का फाइनल ड्राफ़्ट पढ़कर जो टिप्पणी दी उसके लिए। अफसोस कि अपने अंतिम दिनों में डायलिसिस के बीच इसे पढ़ते रहे ओंकार जी को मैं छपी हुई किताब नहीं दिखा पाऊँगा।

प्रणाम !


आपको, जो मेरा ये पहला उपन्यास शुरू से अंत तक पढ़ने की ठान बैठे हैं।
अरुण अस्थाना
14 दिसंबर 2002
लंदन

एक


...सच जानने वाले तो ये जानते हैं कि झूठ क्या है, लेकिन जो झूठ ही जानते हों उन्हें क्या पता कि सच क्या है..या जो झूठ को ही सच मान बैठे हों उनके लिए सच की अहमियत कितनी है ? उन्हें मानने दो, जो वो मान बैठे हैं, तुम बस वो मानो जो तुम जानते हो। तुम जानते हो कि सच क्या है...बस, काफ़ी है...खुद खुश रहो—उन्हें भी रहने दो—क्या समझे—चलो उठाओ—बॉटम्स अप...मधुर ने उसका गिलास उठाकर उसे पकड़ाना चाहा। पर वह मधुर के इस पूरे मोनोलॉग में से एक भी लफ़्ज़ नहीं समझना चाह रहा था, फिर भी वह चाह रहा था कि कोई इसे यूँ ही समझाता रहे, सो उसने और रुकना चाहा—‘नहीं यार, धीरे-धीरे पीने दो मुझे, बातें करते हैं थोड़ी देर...मैं क्या करूँ ऐसे लोगों का, समझ नहीं पा रहा, छोड़ो अब...।’

‘नहीं यार, ख़त्म करो इसे, कहीं और चलते हैं, फिर बैठकर बतियाएँगें—कहीं खुले में बैठकर’ मधुर ने ज़ोर दिया तो उसने गिलास उठा लिया।
शराब वह जब भी पीता है, हालाँकि अब लगभग रोज़ ही पीता है, तो उसे भारी अपराध बोध होता है। उसे लगता है—कि वह अन्याय कर रहा है, खुद के साथ भी और आस-पास के सभी लोगों के साथ भी। वह ये भी तय करता है कि अब उसे शराब पीना बन्द कर देना चाहिए, पर साथ ही उसके दिमाग़ में ये भी आता है कि वह किससे न्याय करे, खुद भी वह खुद कहाँ रह गया है। वो वो कहाँ रह गया है जो था, जो वो है—वो तो वो न कभी था, न कभी होना चाहा था।

मामू का होटल कहलाने वाले उस ढाबे से निकलने में उन्हें कुछ देर लगी। असल में वह खुद निकलना नहीं चाह रहा था। होश में तो कई नहीं। सामने दारूलशफ़ा है—सत्ता के दलालों का अड्डा। सरकारी अय्याशों का घर—रंडीख़ाना। और होश में तो वह इस इमारत को देखते ही पागल हो उठता है। लेकिन मामू के होटल पर भी वह ज़रूर आता है—क्या करे—शहर में किसी भी जगह से ज़्यादा सुकून उसे यहीं बैठकर मिलता है। और चूंकि वह दारुलशफ़ा को नहीं झेल पाता इसीलिए मामू के होटल से वह तभी निकलता है जब बेहोश होने की हद के आसपास पहुँच जाता है।

अकसर वह यह सोचता है कि यही जगह उसे सबसे ज़्यादा सुकून क्यों देती है। यहाँ भी तो आखिर उसे भाईजी ही लाए थे पहले-पहल। उन्होंने ही तो मामू को बुलाकर उसका परिचय कराया था—‘मामू मेरा भाई है ये, पहचान लो ढंग से।’ और मामू पहचान गये थे उसे। आज तक पहचानते हैं—भाईजी ने भाई के तौर पर। फिर भी वह यहीं बैठकर पीना सबसे ज़्यादा क्यों पसंद करता है—शायद इसलिए, क्योंकि यहीं बैठकर उसने कई फैसले किए थे, हालाँकि फ़ैसले करना बेहद मुश्किल काम रहा है उसके लिए। यहीं तो उसकी बहसें चलती थीं—छात्र क्रांति की...(हुँह—क्या शब्द हैं—सनसनी भरने वाले—सड़े—बेमायने—गुमराह करते हैं।) यहीं तो उसने सपने देखे थे—बचकाने टाइप के..कि कुछ ऐसा किया जाए कि पढ़ाने वाले सचमुच पढ़ाने लगें, पढ़ने वाले सचमुच पढ़ने लगें, कुछ ऐसा करने के कि छात्रों की बँधी मुट्ठियाँ जब हवा में उठें तो लोग डरे नहीं बल्कि मुट्ठियाँ बाँधकर उनके साथ खड़े होने को तैयार हों। अब भी कभी-कहीं वह देख लेता है ऐसे सपने, पर अब उन पर विश्वास नहीं करता। और बेहोशी की हद तक वह इसलिए पीता है क्योंकि वह भाईजी का भाई है। वह नहीं देखना चाहता दारूलशफ़ा की ओर, पर नजरें हैं कि मानती नहीं।

‘क्यों अजित, लालबाग चलें या स्टेडियम...या खाओगे कुछ...’ मधुर की आवाज़ सुनी तो कमर टटोली अपनी, रिवाल्वर छुआ—साले, दिन खराब चल रहे हैं, कब, कहाँ क्या हो जाए कोई ठिकाना नहीं—‘स्टेडियम चलो, चायना बाजार होते हुए, कबीरदा से मिलना है...उसने दारूलशफ़ा पर नज़रें टिकाए हुए कहा मधुर चौंक पड़ा—‘कबीरदा..! अरे नहीं, अभी नहीं, अभी प्रेस क्लब में बहुत भीड़ होगी, रात में फोन कर लेना या कल बतियाना, अभी कोई चूतियापा नहीं।’’
रिक्शे पर दोनों चुप थे। उसे मालूम है कि मधुर कबीरदा को क्या मानता है, पर वह खुद बस इतना जानता है कि कबीरदा चाहे जो हों, उसके हमदर्द हैं। उसकी मदद को तैयार रहते हैं, अख़बारनवीस होते हुए भी उससे कभी ख़बर की अपेक्षा नहीं करते। वह उनके लिए एक सूत्र नहीं है, हालाँकि उसके पास ख़बरों के नाम पर अकसर बारूद होता है—सुलगता हुआ। पर नहीं, वह खबर नहीं है, कबीरदा के लिए—सूत्र भी नहीं। लेकिन मधुर या उसके जैसे दूसरे लोग मानते हैं कि कबीरदा को कबीरदा बनाने वाले उसके जैसे लोग ही हैं। उसके जैसे लोगों के कारण ही कबीरदा के पास हमेशा बायलाइन्स रहती है। कबीरदा उसे झेलते हैं—अपने मतलब के लिए, अपने पेशे के लिए, अपनी नौकरी के लिए, अपनी ख़बरों के लिए। लेकिन ये तो वह ही जानता है कि कबीरदा के साथ हुई उसकी बातचीत में से कोई भी मसला कभी ख़बर नहीं बना। लेकिन अब वह किसी को कुछ बताना नहीं चाहता—कोई सफाई नहीं।

अचानक उसके मन में आया कि वह रिक्शे से फौरन उतर जाए और अकेला चला जाए कबीरदा के पास। लेकिन उसका अपराध बोध फिर उभर आया—शायद ज़्यादा पी ली है इस वक़्त, शायद इस वक़्त सचमुच प्रेस क्लब जाना ठीक नहीं होगा। सही कह रहा है मधुर—वहाँ कोई चूतियापा हो गया तो यही होगा कि पीकर हंगामा किया प्रेस में। दिन भी साले खराब चल रहे हैं, कब कहाँ क्या हो जाए क्या ठिकाना। उसने रिवाल्वर को फिर ठीक किया, चुभ रही थी बैठने पर, और नॉवेल्टी में लगी फिल्म का विराट पोस्टर देखने लगा—फिल्म का नाम पढ़ा—पर नहीं पढ़ा—पढ़कर भी वह उसे अगले ही क्षण याद नहीं रख पाया। उसे लगा—पढ़ा ही नहीं। बस इतना याद रहा कि लाल—नीली-हरी लकीरों से कुछ लिखा था, इतना और याद रहा कि पोस्टर पर आमिर खान, प्रीती जिंटा और एक और ऐक्ट्रेस—न जाने कौन—का चेहरा हूबहू बनाने की भरपूर कोशिश की गयी थी। उसे लगा कि वह दारू ज़्यादा पीने लगा है, इसीलिए उसकी याद्दाश्त कमज़ोर हो रही है—और फ़िल्म का नाम याद करने की फिर वह कोशिश करने लगा।

‘अबे अजित—वो देख, वंदना...’ अचानक मधुर लगभग चीख-सा पड़ा। उसका सिर झटके से घूम गया जिधर मधुर की आँखें अब भी टिकी हुई थीं। नॉवेल्टी चौराहे पर पिक्चर हाल से निकल रही भीड़ में रास्ता बना रही सफेद टाटा सूमो में आगे ही बैठी थी वह...। उसकी नज़र तेज़ी से टाटा सूमो तक पहुँची थी उतनी ही तेजी से वहाँ से हट भी गयी।
‘सच यार, ये ठीक नहीं हुआ...’ इतनी देर से उसे समझा रहे मधुर ने पहली बार ऐसी बात कही, जो उसे समझ में आयी, पर वह चुप था।
‘...लेकिन डियर जम रही थी—बहुत दिनों बाद देखा हूँ, कुछ भर भी गयी है, वाकई...मधुर जैसे खुद से कह रहा था—उधर ही टकटकी लगाए—जिधर टाटा सूमो धीरे-धीरे बढ़ रही थी—लोलुप-सा। उसे अच्छा नहीं लगा। उसने रिक्शा रुकवाया और उतर पड़ा—मैं घर जा रहा हूँ।’ मधुर असमंजस में। फिर वह भी उतर पड़ा। रिक्शेवाले को पाँच का नोट पकड़ाया और उसकी बाँह पकड़ ली—बायीं।

‘नहीं यार, मैं घर जाऊँगा।’ उसने बाँह छुड़ाई अपनी और चल पड़ा।
‘चलो अच्छा टैम्पो तक चलते हैं साथ-साथ।’ मधुर साथ तो चल दिया पर उसे इस वक़्त मधुर का साथ रास नहीं आ रहा था, वह अकेला होना चाहता था, इस वक़्त नितान्त अकेला। वंदना नाच रही थी उसकी आंखों में, भाईजी दिमाग़ में। हलवासिया तक चुप्पी पसरी रही दोनों के बीच और हलवासिया पर वह बिना कुछ बोले टैम्पो पर सवार हो गया। मधुर देखता ही रह गया। मिलाने को बढ़ा उसका हाथ भी उससे दूर रह गया। चंद सेकेण्ड बाद उसे अफसोस हुआ और उसने टैम्पो से सिर बाहर निकाल कर देखा, तब तक मधुर मुड़ चुका था—वापस।
यूनिवर्सिटी के सामने कॉल्विन कालेज की दीवार पर चमक रहे थे गहरे रंग के बैकग्राउण्ड पर सफेद अक्षर—विशाल रैली—बेगम हज़रत महल पार्क में 26 अगस्त को—निवेदक सूरज सिंह ‘भाईजी’ उसने आँखें मूँद ली।


दो


दरवाजा खोलकर अन्नू चुपचाप वापस अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। माँ और पापा बैठक में ही थे और टीवी देख रहे थे। उसे लगा—दोनों में से कोई भी टीवी पर आ रहा कार्यक्रम नहीं देख रहा—बस टीवी को देख रहा है। बहन ने रसोई से ही पूछा—‘दादा, खाना...। उसने मना कर दिया।
उसके कमरे का बल्ब जल रहा था—यानी माँ आयीं थी कमरे में आज भी...। अभी कल ही बवाल मचाया था उसने इसी बात पर, शायद इसीलिए कल से वह उससे बोली नहीं, फिर भी...। क्यों मानतीं वह, अपनी आदत क्यों नहीं छोड़तीं, क्यों रोज उसके कमरे की बत्ती जला देती हैं, क्यों रात में पानी पीने को धर जाती हैं। उसने सख्ती से मना कर रखा है—कोई मेरे कमरे में न घुसे—फिर भी। कैसे मना करे अब वह—माँ का अक़सर रात में छत पर बैठकर चुपचाप रोना भी तो वह नहीं झेल पाता।

उसने धीरे से झाँका कमरे के बाहर। टीवी चल रहा था, पापा के सामने कोई मैगज़ीन आ गयी थी और माँ उसके कमरे की तरफ ही देख रही थी। उसने दरवाजा बंद कर लिया—भड़ से, डर के।
...पर किसके डर से। किसका डर है उसे। बिस्तर पर पसरा तो रिवाल्वर गड़ा कमर में, उतार कर मेज पर फेंक दिया। कमर दर्द होने लगा था, नशा भी उतर रहा था, सिर भी भन्नाने लगा था। नींद भी नहीं—भूख भी नहीं। क्या करे...
अचानक ध्यान आया—चंदू वाले मामले की तारीख है परसों, कल वकील साहब से मिलना होगा। उसने मेज की दराज़ में लगा ताला खोला और चंदू वाले मसले के कागज़ात निकालने लगा—307 लगा है, देखना ही पड़ेगा एक बार। उन्हीं कागज़ों के नीचे दिख गयी—हरी डायरी और उसके नीचे पीला पॉलीथीन बैग—यानी वंदना। दरवाजे पर दस्तक हुई तो उसने झट से दराज बंद कर दी और रिवाल्वर पर कमीज़ डाल दी। दरवाजा खोला—माँ थी।
‘खाना’ वह पूछ नहीं रही थी, बता नहीं रही थीं, बस उनके मुँह से एक शब्द भर निकला था।
‘नहीं खाना’ वह बोला।

माँ कुछ कहना चाहती थी, वह समझ गया था—वह दरवाजे से हटी नहीं थी ना। लेकिन वह नहीं चाहता था कि माँ कुछ कहे उससे।
जाइये, आप आराम कीजिए। उसने उन्हें जबरन हटाना चाहा पर नाकाम रहा।
‘सूरज आया था आज, तुम्हें तलाशते हुए, कुछ हिसाब देना है क्या उसका ? माँ ने अटकते हुए पूछा, बताया।
‘मिल लूँगा।’
‘कैसा हिसाब है तुम लोगों का, बड़ा परेशान था उसके लिए, तुम्हारे कमरे में भी आ रहा था, पर मैंने रोक दिया।
माँ शायद सब कुछ जानना चाहती थी, पर कुछ भी बता कर उन्हें छत पर बैठकर घंटों रोने की एक और वजह नहीं देना चाहता था। वह चुप रहा और माँ को जबरन वहाँ से खींच ले जाना पड़ा खुद को।

क्या बताए वह—भाईजी की करनी का पता काफी कुछ तो माँ को भी है। आखिर भाईजी ने माँ को दिया भी क्या एक टीस फाँस के सिवा, जो रह रह कर उठती है, चुभती है भीतर ही भीतर। दूध नहीं पिलाया तो क्या। मौसी बताती हैं—तीन महीने के थे भाईजी जब वह उन्हें लेकर नानी के घर आयीं थीं, और उसके बाद अगले दस महीने के मायके प्रवास में उन्होंने कभी भी भाईजी को न तो कभी नहलाया था, न तेल लगाया था, सब कुछ माँ ही करती थी। भाईजी के मुँह से भी पहला बोल जो फूटा था वो ‘माँ’ नहीं ‘सी’ था यानी मौसी। और खुद माँ ही तो बताती है जब उनकी शादी हुई तो विदाई के वक्त तीन वर्ष के भाईजी ने उनके साथ जाने के लिए क्या हंगामा मचाया था।

और उसे याद है, जब भाईजी मुस्तकिल रहने आए थे उसके घर तो सातवीं में पढ़ते थे, वह तीसरी में था, अन्नू गोद में और छोटी यावी विन्नी तो तब पैदा ही नहीं हुई थी। यहीं रहते थे वह, इसी कमरे में, जो अब उसका है। उसे याद है, वह पापा के साथ बैठक में सोता था, अन्नू माँ के साथ बड़े कमरे यानी माँ के बेडरूम में और भाईजी के लिए—अकेले के लिए—वह कमरा था। तब वह सोचता था—ये घर तो उसका है, उसके पापा का, उसकी मम्मी का, फिर भाईजी का क्यों है, उसका क्यों नहीं। लेकिन उसके थोड़ा-सा और बड़े होने पर उसका और भाई जी का यानी दोनों का हो गया कमरा। दोनों इसी में पढ़ते, इसी में सोते, इसी में लड़ते, इसी में खेलते। दोनों की एक पूरी दुनिया थी इसी कमरे में।
भाईजी उसे गाँव के किस्से सुनाते—अपनी बँसवाड़ी के भूत के—‘पता है, वहाँ टट्टी करने कोई जाता है तो ऐसा धक्का देता है भुतवा कि सीधे पोखरा में ही गिरता है आदमी।’ किस्से शुरू होते तो फिर ख़त्म होने का नाम ही न लेते—बरम बाबा के, डीह देवता के कारनामे, जामुन के बाग़ के किस्से, नरैना के कुएँ के किस्से। उसे लाठी चलाना सिखाते भाईजी उसी कमरे में—पापा के छाते से।
कहाँ वह सोचता था कि ये कमरा भाईजी का क्यों है कहाँ साल भर बाद ही ये आलम हो गया कि भाईजी जब जब गाँव जाते तो उसे कमरा काटने को दौड़ता। गाँव वह कभी नहीं गया था तब तक लेकिन गाँव के बारे में उसे बहुत कुछ मालूम हो गया था, चौथी पास करते-करते। और जब वह स्कूल में बताता अपने दोस्तों को कि चावल धान से पैदा होता है, दो खेतों की बाउण्ड्रीवॉल मेढ़ कहलाती है, जैसे परकाश अंकल और उसके लान के बीच है। हर गाँव के एक अपने भगवान होते हैं—डीह बाबा, ट्यूबवेल से ख़ूब तेज़ धार से पानी निकलता है, जिसमें नहाने में बड़ा मज़ा आता है, जैसे बड़ा, बहुत शावर—तो सब दंग रह जाते।
भाईजी ने ही बताया था कि इंसान की भी किस्में होती हैं, कई करह की। हुआ यूँ कि एक दिन पापा, माँ को बता रहे थे—‘वो वर्मा है ना, टेलीफोन वाला, चमार है वो..तभी तो देखो प्रमोशन पर प्रमोशन मिल रहे हैं, चार साल में ही गाड़ी खरीद ली...सूत कर कमा रहा है साला, मज़ाल है कोई हाथ डाल दे....।’
उस वक्त अपने कमरे में पढ़ रहा था भाईजी के साथ, उसने भाईजी से पूछा ‘ये चमार क्या होता है ?’
‘चमार-कहार यहाँ नहीं होते हैं...’भाईजी ने बताया था।

नहीं यहाँ होते हैं, देखो पापा कह रहे हैं कि वर्मा अंकल चमार हैं, क्या है चमार...उसकी सुई अटकी हुई थी।
‘अच्छा, कोई-कोई यहाँ भी होते होंगे, पर ज्यादा तो गाँव में होते हैं चमार, कहार, कुर्मी, लोध सब...’
उसने भाईजी को काटा....पर ये सब क्या होते हैं ?
‘ये लोग गंदे होते हैं’ भाईजी ने ज्ञान बघारा—‘कायस्थ, बामन, ठाकुर अच्छे होते हैं।’
माने—मेहतर...’ उसके पास सवालों की कमी नहीं थी।
‘हाँ, और क्या—चमार वमार तो घर में घुसने ही नहीं दिए जाते—
‘क्यों, ये लोग चोर होते हैं क्या...’
नहीं भाई...

‘फिर क्यों नहीं घुसने दिये जाते, वर्मा अंकल तो...’
‘नहीं, सबको थोड़े...आदमी नहीं घुसने दिए जाते’ भाईजी ने बताना शुरू किया—चमारों की लड़कियाँ आती हैं खेतों पर ट्यूबवेल वाले कमरे में—जब भी चाचा जब भी बुलाते हैं। और चुन्नू चमार है ना, उसकी अम्मा को तो बाबू अकसर बुला लेते हैं, घर में ही, दोपहर को, बैठक में। पता है, जब घुन्नू की अम्मा आती है ना, तो हमें बाबू बुलाकर एक चवन्नी देते हैं, कहते हैं—यहीं ओसारे में खेलो और किसी को बैठक में नहीं आने देना। हम किसी को बताते भी नहीं, पर चाचा कहते हैं—धुन्नू के साथ मत खेला करो वो चमार है।’
‘मतलब चमार लड़कियाँ चमार नहीं होती हैं गाँव में, केवल लड़के होते हैं...’
उसके सवाल फिर शुरू हो गए।

   
   

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