चन्दन के फूल - महेन्द्र सिंह Chandan Ke Phool - Hindi book by - Mahendra singh
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चन्दन के फूल

महेन्द्र सिंह

प्रकाशक : नालंदा प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :189
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5606
आईएसबीएन :81-8073-039-5

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समाज में सकारात्मक परिवर्तन व विकास की प्रक्रिया पर.....

Chandan Ke Phool

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


समाज में सकारात्मक परिवर्तन व विकास की प्रक्रिया में स्वैच्छिक संगठनों का आम जनमानस से जुड़ाव निरन्तर बना हुआ है। समाजिक विकास हेतु प्रतिबद्ध इन स्वैच्छिक संगठनों की भरोसे मंद, सहज व प्रभावकारी भूमिका निस्पादन से लोगों के बीच विश्वसनीयता भी स्थापित हुई है। स्वैच्छिक संगठनों की बढ़ती लोकप्रियता को देख उनकी विशिष्ट व उज्जवल छवि समाज में स्थापित करने के लिए चन्दन के फूल काल्पनिक उपन्यास में ऐसे ही सामाजिक संस्थान की कल्पना की गई है, जो समाज में ऊँच-नीच के भेद-भाव को मिटाने का प्रयास करता है। मासूम बच्चों का शोषण रोकने व उनके उज्जवल भविष्य के लिए कार्य करता है। इस उपन्यास का एक पात्र गरीब नवयुवक आदर्श के लिए खुद को जलाकर, अन्य लोगों को नई दिशा और रोशनी देकर चला जाता है। जिससे इंसान मानवीय जिंदगी जीने का सबक हासिल करता है और धीरे-धीरे सब कुछ बदल देता है।
इस उपन्यास के सभी पात्र काल्पनिक हैं, व इन पात्रों का किसी भी घटना से कोई संबंध नहीं है।

महेन्द्र सिंह

भूमिका


चन्दन के फूल उपन्यास में लेखक श्री महेन्द्र सिंह ने एक ऐसे गरीब युवक की पीड़ा को वर्णित किया है, जिसे बचपन से किसी का प्यार नहीं मिला। वह बचपन से समाज में सच्चे प्यार की कमी को महसूस करता आया था। इंसानों में धोखा, नफरत ऊँच-नीच, भेद भाव को पनपता हुआ देखता आया था। युवा होने पर उसके मन में ऐसा समाज बनाने की अभिलाषा थी, जहाँ लोगों को उनकी जाति की जगह उनके आचरण व स्वभाव के अनुसार विभाजित किया जाए। जहाँ सभी एक दूसरे से प्रेम बंधन में बँधे हों व हर पल बँधे रहना चाहते हों। एक दूसरे की उन्नति व सुख के लिए प्रयत्न शील हों। ऐसा समाज जहाँ पर बाल शोषण न हो बच्चों को शोषण से मुक्त करने के लिए नयी योजनाएँ बनाई जा सकें। वह चन्दन के फूल बन कर महक सकें।
उस युवक के जीवन में एक विद्वान व आधुनिक विचारों वाला आदमी आया जिसके परिवार में उसकी पत्नी व दो पुत्र थे। इस परिवार से उसे असीम स्नेह व जीवन को दिशा मिल गई।

एक महिला निदेशक ने उस युवक को अपने कार्यालय में साक्षात्कार देने के कुछ दिन बाद एक सामाजिक संस्था में ऐसे कार्य करने का अवसर दिया। उस युवक के त्याग, व अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए संघर्ष को तथा उसकी मृत्यु उपरांत अन्य लोगों द्वारा उस कार्य को पूरा करने तथा उसकी विधवा निस्संतान पत्नी को जो श्मशान में रह रही थी उसे समाज में सम्मानजनक स्थान देने के लिए किये गये प्रयासों का वर्णन बहुत ही मार्मिक व आशावादी है।
चन्दन के फूल में उल्लेखित चरित्रों का कार्यक्षेत्र त्याग व सिद्धांत एक ही रहा है कि मानव मन में एक दूसरे के प्रति प्यार की ज्योति इतना बड़ा रूप ले लेती है सभी आपस में प्यार व उन्नति की दिशा में चले जाते हैं। उनके अंदर यह भावना जाग्रत हो जाती है कि अपनी वृत्तियों में संशोधन कर उन्हें ऊर्ध्वगामी बनाकर मनुष्य किसी भी युग को बदल सकता है। मुझे आशा है। यह उपन्यास समाज में चेतना, जाग्रति के साथ-साथ मानव में प्रेम व कल्याण की भावना पैदा करेगा।

डॉ. राजेन्द्र अवस्थी

चन्दन के फूल

विवेकानंद नगर बहुत ही अजीबोगरीब नगर है। धन्य है, यहाँ के आदमी की किस्मत। पुण्यात्मा, परोपकारी, आत्मावलंबी व्यक्ति भले ही संख्या में कम हों, परन्तु जब वे अपना प्रकाश फैलाते हैं तो उनका अस्तित्व यह तो सिद्ध करता ही है कि मनुष्य में देवत्व मौजूद है और जो चाहे उसे थोड़े से प्रयत्न से सजीव व सक्रिय कर सकता है। मनुष्य को गौरवान्वित करने में यहाँ के महा-मानवों का अस्तित्व ही इस संसार को इस योग्य बनाये हुए है कि भगवान बार-बार तन धारण करके इस धरा-धान में अवतार लेने के लिए ललचाएँ।
इस विवेकानंद नगर के लोग अभावग्रस्त होते हुए भी सुखी और सदा सुखी थे। वे दूसरों के सुख में अपना सुख और दुःख में अपना दुःख अनुभव करते थे तथा सुख बढ़ाने और दुःख मिटाने का प्रयास करते थे। वह जमाना था जब लोग रुपये-पैसे सोना चाँदी से ज्यादा मूल्य जुबान से कही गई बात को यह वचन को देते थे।

विवेकानंद नगर में छोटे-छोटे दुःख-सुख के जाल में घिरे हुए लोगों में अपने आस-पास फैले हुए हुस्न और संताप को देखने की शक्ति मौजूद है। नगर की पुण्यात्माओं का ही अनुदान है जिनके पुण्य प्रयास लोकमंगल के लिए निरंतर गतिशील रहे।
रामदास जो पेशे से बढ़ई था, कई वर्षों से इस नगर में किराये के घर में अपने पुत्र व पत्नी के साथ रहता था। उसका पुत्र सुनील पढ़-लिखकर जवान हो चुका था व नौकरी की तलाश में इधर-उधर भटक रहा था।
रामदास जब अपने लम्बे संघर्षमय जीवन के बारे में सोचता था, तब उसका हृदय भर आता था। आँखों डबडबा जाती थीं। परंतु मर्द तो हमेशा ही रोने के खिलाफ रहा है। इसलिए वह अपने आसुँओं को किसी भी हालत में बाहर नहीं आने देता था। अतीत के बोझ को सिर और पीठ पर लादे हुए वह उम्रभर ढोता रहा।

विवेकानंद नगर में अब काफी बदलाव आ चुका था। लोगों पर क्लब सोसायटी, कैफे होटल, कॉलेज-किताबों की आधुनिकता हावी हो चुकी थी। शहर में बढ़ते अपराधों और पापों के दावानल में झुलसते, बिलखते, चिल्लाते-चीत्कार करते लोगों की यातनाएँ सुनकर उसकी अंतरात्मा रोने लगती थी। वह यह सोचकर अक्सर परेशान हो जाया करता था कि ऐसे माहौल में उसका युवा पुत्र उसकी तरह शांत, सुखद लंबा जीवन जी पाएगा या नहीं !
उसके घर के बाहर एक सड़क थी। सड़क के दूसरी तरफ आधुनिक किस्म के मकानों की कतार थी।
रामदास के घर के सामने किसी विदेशी आदमी ने नया मकान खरीदा था। वह वहाँ अपने परिवार सहित रह रहा था। आस पड़ोस के लोग उस आदमी की काफी प्रशंसा किया करते थे।

एक दिन सवेरे रामदास की आँख खुली तो सामने दीवार पर टँगी हुई घड़ी में सात बजे थे। उसके बराबर ही पत्नी निर्मला व बेटा सुनील गहरी नींद में सो रहे थे। सुनील की बड़ी-बड़ी आँखें शांत भाव से मुँदी हुई थीं। न उसकी पलकों पर कोई सिलवट थी, न माथे पर कोई लकीर। एकदम तनावहीन शांत और स्थिर।
पुत्र के मुख से निगाहें उठाकर वह निर्मला को देखने लगा। वह सोचने लगा, जैसे उसे कोई फिक्र नहीं कि आज घर में दो जून का आटा भी नहीं। वह अपना पूरा विश्वास पति को सौंप, नितान्त चिन्तामुक्त होकर सो रही थी।
रामदास ने चाहा कि वह उसे झकझोर कर जगा दे। परंतु पिछली शाम वह काम से देर से लौटी थी वह रोज की अपेक्षा रात को देर से सोई थी।
निर्मला अपने आप उठ बैठी। साड़ी के पल्लू से सिर और सीने को ढंकते हुए उसने कहा, ‘‘आपने मुझे जगाया क्यों नहीं ?’’
रामदास ने कोई जवाब नहीं दिया। शायद उसने सुना ही नहीं। वह अपने औजारों को एक थैले में डालकर काम पर जाने की तैयारी कर रहा था।

निर्मला निपट, नहाकर किचन में खाना पकाने लगी। रामदास बिना कुछ खाए-पिए ही काम की तलाश में निकल पड़ा। घर से बाहर वह कुछ ही कदम चल पाया था कि किसी ने उसे पुकारा, ‘‘ए बाबा ! सुनो तो। क्या तुम मेज, कुर्सी पलंग बनाने का काम करते हो ? मेरा पलंग टूट गया है। क्या तुम उसे ठीक कर दोगे ?’’
रामदास आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगा। अरे ! यह तो वही विदेशी आदमी है, जिसका गुणगान लोग करते हैं। वह सफेद रंग का कुर्ता-पायजामा पहने हुए था, व उनके हाथ कुर्ते की जेबों में थे।
वह आदमी मुस्कुराकर बोला, ‘‘मेरा नाम हरीश है। मैं इस नगर में नया आया हूँ। क्या मेरा पलंग ठीक कर दोगे ?’’
रामदास अपने औजारों की तरफ देखता हुआ बोला, ‘‘साहब, मैं आपका पलंग ठीक कर दूँगा। चलिए, कहाँ पर चलना है। पलंग दिखा दें मुझे।’’
हरीश उसे अपने घर लेकर चला गया। घर के बाहर दो छोटे-छोटे लड़के खेल रहे थे। एक सुंदर औरत जिसने गहरे पीले रंग के कपड़े पहने हुए थे। पलंग पर बैठी सब्जी काट रही थी।

हरीश मुस्कुराता हुआ बोला, ‘‘बाबा, यह मेरी पत्नी है और ये दोनों मेरे नटखट बेटे हैं। सारे दिन पलंग पर उछल-कूद करते रहते हैं। इन्होंने ही पलंग तोड़ी है।’’ फिर उसने अपनी पत्नी से कहा। ‘‘सुनो ! जरा पलंग खाली कर दो। बाबा पलंग ठीक करने को आए हैं।’’
‘‘जी, मैं अभी खाली कर देती हूँ।’’ इतना कहकर वह सामान उठाकर अंदर चली गई।
रामदास पलंग को देखने के बाद उसकी मरम्मत करने में व्यस्त हो गया। हरीश बहुत ध्यान से देख रहा था। उसने पूछा, ‘‘तुम्हारे घर में कौन है बाबा ?’’
रामदास बोला, ‘‘जी मेरी पत्नी और एक बेटा, जो पढ़ लिखकर नौकरी की तलाश में भटक रहा है।’’
तभी हरीश के दोनों बच्चे आपस में लड़ने लगे, हँसने लगे। वे आम के पेड़ के पत्तों को मोड़कर उसके पटाखे बजाने का प्रयत्न कर रहे थे।

‘‘साहब जी, आपका पलंग अब बिल्कुल ठीक हो गया है।’’ इतना कहकर रामदास अपने औजार समेटने लगा।
‘‘बाबा, यह पचास रुपये रख लो। तुमने काफी मेहनत की है।’
पचास रुपये का नोट अपने हाथ में लेकर रामदास अपने घर की तरफ चल पड़ा।
घर पहुँचकर उसने देखा कि निर्मला काम पर जा चुकी थी। सुनील पढ़ने में व्यस्त था।
‘‘बेटा सुनील, तुमने खाना खा लिया है क्या ?’’
‘‘जी, पापा।’’
‘‘अच्छा यह पचास रुपये रख लो। माँ घर आए तो दे देना।’’ रामदास ने बेटे को हाथ का नोट थमा दिया।
पचास रुपये का नोट हाथ में लेकर सुनील फिर पढ़ने में मगन हो गया। रामदास औजार उठाकर फिर से काम की तलाश में निकल पड़ा।

सुनील हताश-सा होकर चारपाई पर लेट गया। वह सोचने लगा कि अपनी बेकारी का वह क्या करे ! कैसे तत्काल काम पाए ? क्या इन चंद रुपयों की कोई सूरत निकल सकती है कि इनका ऐसा उपयोग करे जिससे उसका काम भी चल जाए व उसका परिवार पेट भर खा सके। जो गरीबी व दुःख भरे दिन उन्होंने बिताए हैं, वह न देख सके और उनका भविष्य उज्जल व सुखमय हो। सोचते-सोचते उसकी आँख लग गई उसे पता नहीं चला कि कब शाम हो गई।
तभी उसके कानों में आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘क्यूँ लेटे हुए हो बेटे ?’
निर्मला ने घर वापस आकर चिंता भरे स्वर में पूछा, ‘चलो उठो, बाजार से सामान लाना है। भूल गए, कल तुम्हें इण्टरव्यू के लिए जाना है।’

वह फुर्ती से उठा। हाथ मुँह धोकर अपने बालों पर पानी का हाथ फेरा और बाजार चला गया।
रामदास भी घर वापिस आ गया। निर्मला से बातचीत के दौरान उसने हरीश के परिवार के बारे में बताया कि आज उसकी भेंट एक सज्जन पुरुष से हुई। वह उसके घर पलंग ठीक करके काफी पैसा कमा लाया है कि पाँच दिन तक के खाने-पीने का इंतजाम हो जाएगा।
अपने पिता की बातें सुनकर उसके मन में हरीश को देखने की उत्सुकता बढ़ती ही जा रही थी। वह सारी रात उसके व उसके, परिवार के बारे में सोचता रहा।
अगली सुबह सुनील जल्दी उठ बैठा व नहाने के बाद उसने ट्रंक से पुराना सूट निकालकर पहन लिया। रामदास उसे आवाज दे रहा था, ‘‘बेटे, मैं तुम्हारे लिए नये जूते व गले के लिए टाई किसी से माँगकर लाया हूँ। इसे पहनकर तुम बहुत सुंदर लगोगे।’’

सुनील ने वे नये जूते देखे। कुछ देर बाद तैयार होकर, माता-पिता का आशीर्वाद लेकर वह घर से चल पड़ा। बड़े ही स्नेह से दोनों उसे देख रहे थे। कुछ क्षण बाद रामदास ने उदास भरे स्वर में कहा, ‘निर्मला, न जाने इसकी जिंदगी में कितनी मुसीबतें झेलनी व कितनी रातें जागना इसके भाग्य में बदा है। पढ़ने लिखने में यह हमेशा अव्वल आता रहा है। इतना मेहनती है। फिर भी, इसे अच्छी नौकरी नहीं मिलती। शायद आज इसका भाग्य बदल जाए।’’
सुनील राष्ट्रीय जीवन बीमा निगम कार्यालय में इण्टरव्यू के लिए पहुँच गया। काफी संख्या में उम्मीदवार वहाँ पहले से ही मौजूद थे। उसने तुलना करने पर महसूस किया कि वह किसी भी बात में उनसे कम नहीं है। चयन-समिति की बैठक शुरू हो चुकी थी। उम्मीदवारों को बारी-बारी से बुलाया जाता। कोई दस मिनट बाद, कोई दो मिनट, एक तो कुछ सेकेण्ड में ही कमरे से बाहर आ गया।
तभी अचानक चपरासी ने जोर से सुनील का नाम पुकारा। वह एकदम काँप उठा। फिर धीरे-धीरे वह चयन समिति के कमरे की ओर चल पड़ा।

‘‘मे आई कम इन सर ?’’ सहमे स्वर में उसने अनुमति चाही।
‘‘यस, प्लीज ! कम इन एण्ड टेक योर सीट।’’
‘‘थैंक यू !’’ गुडमार्निंग टू आल ऑफ यू !’’ कहकर वह एक कुर्सी पर बैठ गया।
सुनील के समाने चार सदस्य बैठे हुए थे। वह उनके सामने रखी नेम प्लेट पर लिखे हुए नाम पढ़ने लगा। हरिन्द्र सिंह, डॉ. गिरिजेश कुमार मेहता, डॉ. स्वप्न दत्ता और एक महिला सदस्या मिस अनीता गुप्ता।
एक सदस्य ने फाइल देखते हुए उससे कहा, ‘‘आपके हर विषय में नंबर बहुत अच्छे हैं। आपने इस कार्यालय में पहले भी कभी आवेदन किया है ?’’
‘‘नहीं सर।’’ सुनील ने जवाब दिया।

महिला सदस्या ने पूछा, ‘‘आपके जीवन का लक्ष्य क्या है ? आप इस देश के लिए क्या करना चाहते हैं मिस्टर सुनील ?’’
सुनील काफी गंभीर स्वर में सभी की तरफ देखता हुआ कहने लगा, ‘‘मैडम बचपन से मैंने समाज में सच्चे प्यार की कमी महसूस की है। इंसानों की रग-रग में धोखा नफरत ऊँच नीच भेद-भाव को पनपता हुआ देखा है। एक आदमी को दूसरे आदमी पर जुल्म ढाते, एक दूसरे की भावनाओं का शोषण करते व घृणा फैलाते हुए देखा है।’’
सभी सदस्य बड़े ध्यान से सुन रहे थे व उसके चेहरे को देखे रहे थे।  वह कह रहा था, ‘‘मेरे मन में ऐसा समाज बनाने की अभिलाषा है, जहाँ आदमी पृथ्वी पर स्वर्ग बसाने में प्रयत्नशील हो। उसे महसूस हो कि उसका जन्म कुछ करने के लिए हुआ है। ऐसा संसार जहाँ हर चेहरे पर मुस्कुराहट, आँखों व होठों पर चमक व एक दूसरे के कल्याण के लिए त्याग करने की भावना हो।’’
सभी आश्चर्यचकित हो उसे देख व सुन रहे थे। कुछ देर बाद चयन-समिति ने कुछ और प्रश्न पूछने के बाद उसे भी बाहर भेज दिया।

सुनील बड़ी तेज चाल से चलता हुआ घर को वापिस आ रहा था। तभी किसी ने उसे देखकर जोर से सीटी बजाई। वह खाँसता हुआ, शरारत-भरी निगाहों से देखता हुआ, गाना गाता हुआ उसी के साथ चलने लगा। सुनील ने देखा, उसकी पीठ पर किताबों का बैग था। नाचता हुआ वह घर की तरफ बढ़ता जा रहा था।
सुनील उस नटखट लड़के को बड़े ध्यान से देखता हुआ उसी के पीछे चल रहा था। वह अपने घर पहुँचकर भी उस लड़के को देखता रहा। वह लड़का एक घर में प्रवेश कर चला गया।

सुनील अपने घर वापिस आया तो घर पर कोई नहीं था। बाहर दरवाजे पर ताला लगा हुआ था। वह घर के बाहर फर्श पर बैठकर उस लड़के के विषय में सोचने लगा। उसके घर के बाहर आम का पेड़ था। चारों तरफ झाड़ियाँ थीं। वह कुछ सोच ही रहा था कि उसे उस घर से लड़ाई झगड़े की आवाजें सुनाई पड़ीं। वह लड़का गुस्से से किसी को कह रहा था, ‘‘अबे ! संजय, सुधर जा। बहुत मार खाएगा।’’ इतना कहकर वह सेब खाने लगा। उसने अपनी कमीज के कालर खड़े कर दिए। तभी घर के अंदर से किसी ने रेडियो की आवाज को तेज कर दिया। वह लड़का हाथ में सेब लिये, दूसरे लड़के जिसे वह संजय कहकर डाँट रहा था, जो उम्र में उससे कुछ बड़ा था, उसके साथ आम के पेड़ पर चढ़ गया। वे सेब खाने लगे।
सुनील चुपचाप उन दोनों को बड़े स्नेह से देखने लगा व अपने बचपन को याद करने लगा। बचपन में माँ बाप घर की दैनिक जरूरतों को जुटाने के लिए चले जाते थे। वह भूख-प्यास से तड़पता रहता। घर के बाहर आस पड़ोस के बच्चे उसे व उसके पिता के व्यवसाय का अपमान करते थे। जब वह घर के बाहर मिट्टी व रेत के खिलौने बनाने का प्रयत्न करता तो किस तरह से मकान मालिक बेरहमी से तोड़ डालता था।

सुनील सहमा-सहमा बचपन की यादों में खोया हुआ था कि अचानक उस किसी ने ‘डाकू !’ कहकर उसे पुकारा। उसने ध्यान से देखा तो सामने आम के पेड़ पर बैठे हुए उस नटखट लड़के ने एक सेब उसकी तरफ खींचकर मारा व हँसने लगा। फिर तेजी से पेड़ से उतरकर वह घर के अंदर भाग गया।
सुनील को बैठे-बैठे नींद आ गई। उसे पता नहीं चला कि कब शाम हो गई थी। माता-पिता ने कब उसे फर्श से उठाकर चारपाई पर डाल दिया था, उसे कुछ पता नहीं था। जैसे ही उसने अँगड़ाई ली और उठकर  बैठा तो माँ जोर से उसे पुकार रही थी, ‘‘सुनील ! चल, उठ बेटे।’’

‘‘आओ, चलो खाना खा लो। सेहत तो तुम्हारी पहले से अच्छी लग रही है। तुम्हारा साक्षात्कार कैसा रहा ?’’ माँ ने पूछा।
वह जरा हँसा। होंठों से हठात् विलुप्त हो जाने वाली मुस्कान को बरबस प्रकट करते हुए कहने लगा, ‘‘नौकरी पाना एक लंबा किस्सा है माँ। मेरे लिए कोई काम नहीं है। कोई अस्थायी काम भी देने को राजी नहीं है। क्योंकि मेरे पास कोई सिफारिश व देने के लिए रिश्वत नहीं है।’’ इतना कहकर वह खाना खाने लग गया।
अगली सुबह रामदास अपने बेटे के साथ कहीं जा रहा था। किसी ने बहुत ही मधुर स्वर में पूछा, ‘‘कैसे हो रामदास ? तुम्हारे साथ यह लड़का कौन है ?

उसने पीछे मुड़कर देखा तो हरीश थे। दोनों हाथों को जोड़कर उसने उन्हें ‘‘नमस्ते साहब’’ कहा।
वह बेटे का परिचय देने लगा, ‘‘साहब, यह मेरा बेटा है। बहुत पढ़ा-लिखा है। इसे कहीं पर रोजगार मिल जाए इसलिए अपने साथ लेकर जा रहा हूँ। नमस्ते कर बेटा। यह वही साहब हैं जिनके घर में...’’
नमस्ते अंकल !’’ सुनील ने सहमे स्वर में कहा व चुपचाप खड़ा हो गया।
हरीश ने थोड़ा मुस्कान के साथ सुनील से कहा, ‘‘आओ बेटा ! तुम आज मेरे साथ घर चलो। मेरा घर तो तुम्हारे घर के सामने ही है। आओ चलें।’’

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