करो या मरो - जयन्त वाचस्पति Karo Ya Maro - Hindi book by - Jayant Vachaspati
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करो या मरो

जयन्त वाचस्पति

प्रकाशक : सहयोग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :116
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5608
आईएसबीएन :81-8070-047-X

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प्रस्तुत है ऐतिहासिक उपन्यास...

Karo Ya Maro

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

गांधीजी ने अपने अहिंसात्मक संघर्ष का अंतिम परीक्षण सन् उन्नीस सौ चालीस में व्यक्तिगत सत्याग्रह के रूप में किया था। शायद इस परीक्षण के बाद उन्होंने समझ लिया था कि अब देश की युवा पीढ़ी के हाथ में देश की बागडोर देने का समय आ गया है।
अगस्त, 1942 में उन्होंने ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ और देशवासियों को ‘करो या मरो’ का आदेश दिया। उस चुनौती को चेतन मस्तिष्क वाले युवकों और युवतियों ने समान रूप से स्वीकार किया और अंग्रेजी सरकार की नींव उखाड़ने के लिए आत्म-बलिदान का व्रत लेकर मैदान में कूद पड़े।
‘तलवार और मशाल’, ‘एक इंसान’, ‘रावी के किनारे’ आदि पुस्तकों के लेखक जयन्त रचना की यह रचना उनके व्यक्तिगत सत्याग्रह तथा अगस्त-क्रांति के अनुभवों पर आधिरत है। यह रचना उन्होंने सन् 1944 में फिरोजपुर जेल में लिखी थी।

करो या मरो

विमला।
अपने माता पिता की अकेली संतान विमला। जब उसका जन्म हुआ तो माता की आयु सैंतीस वर्ष और पिता की पैंतालीस थी। ढलके यौवन तो अधपके बालों के उस मौसम में उनकी बगिया में बहार आई लेकिन...माँ ने अपना माथा ठोक लिया, ‘‘हाय रे करम ! हुई भी तो लौंडिया। पिछले जन्मों का कौन सा बैर था इसका जो इसने मेरे घर जन्म लिया।’’ और संतानोत्पत्ति का उसका सारा उत्साह नष्ट हो गया था। फिर भी माँ के स्तनों में दूध तो उतरना ही था और पिलाए बिना भी नहीं रह सकती थी।

पिता को भी कोई खास खुशी नहीं हुई। परंतु विमला जैसे माता-पिता के असंतोष और तटस्थता को मिटाने का निश्चय करके आई थी। वह बहुत ही कम रोती, भूखी होने पर भी वह आँखें टिमका-टिमकाकर देखा-भर करती थी या सो जाती थी। पेट भरा होने पर तो उसकी मुस्कराहट देखने लायक होती थी। चार-पाँच महीने की होते-होते उसने हँसना सीख लिया था। हँसते में उसकी ठोढ़ी और गालों में नन्हें-नन्हें गड्ढे पड़ते थे, जिन पर लोगों की आँखें अटक जाती थीं। रंग साँवला था, फिर भी वह सुंदर थी।
और जब वह बोली तो तुतलाई नहीं, पहला शब्द जो उसने बोलना सीखा वह था ‘बाबूजी !’’
छः वर्ष की उम्र में वह स्कूल जाने लगी। उसके नम्र स्वभाव व कुशाग्र बुद्धि के लिए उसकी अध्यापिकाएँ उससे बहुत स्नेह करती थीं।

अपने आँगन में लगे मोतिया के झाड़ से और मौलश्री के पेड़ के नीचे से फूल चुनकर, तारों की छाँह में, वह तीन मालाएँ बनाती थी। एक वह चुपके से माँ के श्रंगारदान पर रखती, एक पूजा के आले में श्रीकृष्ण जी के झूले पर और एक वह स्कूल ले जाया करती थी, अपनी ‘बहिन जी’ के लिए।
चौथी कक्षा की वार्षिक परीक्षा में जब विमला ने फिर नब्बे प्रतिशत अंक प्राप्त किए तो उसकी माँ को पश्चात्ताप हुआ कि उसने उसके जन्म पर माथा क्यों ठोका था। विमला के स्कूल की हैडमिस्ट्रेस और क्लास टीचर दोनों बधाई देने उसके घर गईं तो माँ का दिल और भर आया।
चौदह वर्ष की उम्र होते-होते विमला घर के कामो में भी निपुण हो गई थी और माँ को एक दिन भी याद नहीं आया जब विमला ने माँ को किसी बात को दुबारा कहने का अवसर दिया हो।
पन्द्रह की होते ही परिवार के पंडित जी ने विमला के लिए रिश्ता ला दिया, मुहूर्त निकाल दिया और हाथ पीले कर दिए।
घर बड़ा था, सारा कुटुंब साथ ही रहता था। चार भाई थे, जिनमें विमला का पति लज्जाराम सबसे छोटा था। औरों की तरह लज्जाराम को भी एक कोठरी दे दी गई।

मँझली बहू सावित्री उस छोटी सी दुनिया की सर्वसत्ताधारी थी। अपनी कूटनीति से उसने सबसे बड़े भाई को परास्त कर दिया था और सबको सावित्री के ही आदेशानुसार चलना पड़ता था।
ससुराल आने पर विमला ने पाया कि उसका पति सबसे छोटा तो था ही, उसका वहाँ अस्तित्व भी नगण्य ही था। उसे न तो कोई जेब खर्च दिया जाता था, न उसकी कुछ परवाह की जाती थी। तीन बड़े भाई एक ही दुकान में काम करते थे आय और सम्पत्ति में लज्जाराम को हिस्सेदार नहीं समझा जाता था।
लज्जाराम को न जाने कैसे भ्रम हो गया था कि वह नमक मिर्च तोलने के लिए नहीं, एक चित्रकार बनने के लिए पैदा हुआ है। पहली ही रात जब विमला उस कोठरी में गई तो सारी रात घुटनों में देकर सोती-जागती रही थी कभी-कभी घबराकर मुँह उठाती तो लाल रेशमी घूँघट में से देखती कि उसका पति लज्जाराम, नीचे चटाई बिछाए, एक ड्राइंगबोर्ड पर लगे कागज पर बने चित्र में रंग भर रहा है। उसने यह भी देखा कि कोठरी में हर तरफ पुस्तकें, पत्रिकाएँ या दीवारों पर विभिन्न आकारों और रंगों के चित्र टँगे हैं।

एक दीवार से टिका चित्र बनाने का ईजल रखा था, जिसकी खूँटी से पान की शक्ल का एक रंगपट लटका था।
विमला ने शीघ्र ही समझ लिया कि माता-पिता ने शादी में जो भी चीजें दी थीं, वह सब मँझली ने अपने कब्जे में कर ली हैं। यहाँ तक कि उनकी कोठरी में शीशा भी चौदह आने वाला और तीन आने वाला कंघा रख दिया गया था। एक गर्दन टूटी बोतल में कड़वा तेज भी शायद सिर में लगाने के लिए रखा गया था। विमला को तेल से परहेज नहीं था, उसको आश्चर्य टूटी बोतल देखकर हुआ था।
शीघ्र ही विमला ने समझ लिया कि उसके पति ने विवाह इसीलिए किया था कि उसके भाई यह नहीं चाहते थे कि बिरादरी वाले कहें, उन्होंने छोटे भाई की उपेक्षा की। वास्तव में लज्जाराम की शादी के लिए सबसे ज्यादा आग्रह मँझली बहू सावित्री का था क्योंकि विमला के परिवार के पुरोहित जी ने दिए जाने वाले दहेज का जो जिक्र किया था, उससे सावित्री के मुँह में पानी आ गया था।

जहाँ तक लज्जाराम का प्रश्न था, वह अभी अपने को विवाह के योग्य नहीं समझता था, उसे न तो पत्नी की जरूरत थी और न वह अपने को गृहस्थी का भार उठाने में समर्थ पाता था। एक सफल कलाकार बनने के लिए वह साधना करना चाहता था और जानता था कि पत्नी उसकी साधना में बाधक हो सकती है। परंतु भाइयों की आज्ञा न मानना भी उसके लिए एक अनहोनी बात थी। उनके सामने कभी मुँह नहीं खोला था। बस एक ही बात वह किसी की नहीं मान सकता था कि वह चित्र बनाना छोड़ दे। भाइयों और मँझली भाभी ने उसे चेतावनी दे दी थी कि यदि वह विवाह नहीं करेगा तो उसे घर से निकाल दिया जाएगा।
लज्जाराम ने ‘सत्यार्थप्रकाश’ खोलकर अपने एक भाई को बाल-विवाह के दोष बताए भी थे, परंतु भाई ने उसे केवल चेतावनी दे दी थी कि फिर उसने ऐसी बात कही तो सदा के लिए परिवार से निकाल दिया जाएगा। फिर लज्जाराम ने कुछ नहीं कहा।

लज्जाराम के विवाह के साथ ही उसकी कॉलिज की पढ़ाई भी खत्म कर दी गई और उसे दुकान में काम करने का आदेश दिया गया, जिसको गर्दन झुकाकर, और मौन रहकर उसने अस्वीकार कर दिया। उसका नतीजा यह हुआ कि मँझली ने अपने छोटे देवर का रोष विमला पर उतारा। अभी तक आटा बाजार से आता था, चक्की दीवार पर टिकी, आँगन में विश्राम कर रही थी। बड़े भाई को खाना परोसते मँझली ने प्रस्ताव रखा, ‘‘बाजार का आटा बहुत खराब आ रहा है, घर पर ही पिसे तो अच्छा है।’’ बड़े भाई ने सिर हिलाकर स्वीकृति दे दी। अगले दिन सुबह ही विमला को आटा पीसने की ड्यूटी दे दी गई थी। पहले ही तीन बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना, जो-जो खाता जाए, उसके जूठे बर्तन साथ के साथ माँजते जाना विमला का रोज का काम था। चौके की सफाई, धुलाई मैले कपड़ों का ढेर धोते-धोते शाम के पाँच बज जाते थे और रात का खाना, बर्तन चौका करते ग्यारह।

दिन-भर की थकी, दुखती पीठ और छाले पड़े हाथों को लिये विमला जब पति के कमरे में आती तो उसे फर्श पर चित्र बनाने का समान या पत्रिकाएँ फैलाए देखती। विमला पलंग के पाँयते आकर सिमटकर बैठ जाती थी और प्रतीक्षा करने लगती थी कि उसका पति उससे कुछ बोले, उससे उसका कष्ट पूछे, सान्त्वना सहानुभूति और प्यार की थपकी दे या छाती पर सिर रखकर, कम से कम उसे रो लेने दे। परंतु कभी-की सारी रात लज्जाराम नीचे चटाई पर बैठा अपनी साधना में लगा रहता था और विमला पलंग की पाँयत पर बैठी, उभर-उभरकर आते रुदन को अपनी कोमल छाती में दबाने का प्रयत्न करती थी या एक ओर को लुढ़क जाती थी।
साढ़े चार बजे जब मँझली उसे पुकारती तो वह उठी होती थी और उसका शरीर रात से भी अधिक थका होता था। फिर भी वह अपने भगवान् का नाम लेकर उठ खड़ी होती थी और पाती थी कि लज्जाराम नीचे चटाई पर, एक कम्बल ओढ़े, सिर के नीचे पुस्तकें या पत्रिकाएँ रखे सो रहा होता था।
कुछ ही दिन में विमला ने समझ लिया कि उसे अपने पति के अस्तित्व को भुला देना होगा, भुला देना होगा कि वह विवाहिता है।

एक वर्ष ऐसे ही बीत गया।
एक दिन सुबह का गया लज्जाराम जब रात को भी नहीं लौटा तो विमला ने उसके खाने की थाली लाकर अपनी कोठरी में रख ली और उसके आने की प्रतीक्षा करने लगी। पलंग पर बैठी वह सोचने लगी कि उसका जीवन भी कैसा अनोखा है कि वह विवाहित फिर भी कुँवारी-पति ने उसका स्पर्श भी नहीं किया था। ऐसा नहीं था कि लज्जाराम उसका ख्याल नहीं रखता था। पिछले दिनों उसने अपने कुछ चित्र बेचे थे, पत्र-पत्रिकाओं में भी कुछ छपे थे और उनसे उसे जो मिला था, शायद अस्सी रुपए उनमें से कुछ उसने बिना कुछ कहे, विमला के सामने रख दिए थे। वह उसके लिए चूड़ियाँ, कुछ दूसरा श्रृंगार का सामान और एक रेडीमेट रेशमी ब्लाउज भी लाया था।
विमला थकी थी, फिर भी उसे नींद नहीं आई और वह पलंग से उतरकर, नीचे शीतलपाटी पर बैठ गई और अपने जाने, फिर भी अनजाने, पहचाने फिर भी अपरिचित अपने फिर भी पराये पति के कागजों के ढेर को देखने लगी। उन्हीं कागजों के बीच में दबी एक छोटी सी डायरी विमला ने देखी। उसने उठाकर उसे खोला तो पहले ही पृष्ठ पर उसने अपना नाम देखा। और फिर अनेक पृष्ठों पर।

एक पर लिखा था, ‘भाग्य ने विमला के साथ कितना अन्याय किया है-वह मुझसे पता नहीं क्या-क्या चाहती है-मैं उसे कुछ भी नहीं दे सकता। मैंने निश्चय किया है कि जब तक मैं अपनी गृहस्थी का आर्थिक भार उठाने में स्वयं समर्थ नहीं हो जाऊँगा, जब तक एक अलग मकान लेकर उसे अपने घर की रानी बनाने की क्षमता मुझमें नहीं होगी, तब तक मैं किसी भी प्रकार का अतिरिक्त भार उस पर नहीं डालूँगा। मैं नहीं चाहता कि मेरी संतान भाई-भाभियों की दया पर रहे। नहीं, मुझे तब तक विमला से पति-पत्नी का संबंध स्थापित नहीं करना, जब तक मैं उसके लिए तैयार नहीं हो जाता।’’
एक अन्य स्थान पर लिखा था, ‘‘भाइयों ने मेरा विवाह किया था दहेज के लालच में, वह उन्हें मिल गया। चौबीस घंटे की बिना तनख्वाह की नौकरानी भी उन्हें मिल गई। विमला मेरी पत्नी तभी बनेगी जब मैं उसकी सब आवश्यकताओं को पूरा करने लगूँगा।’

एक और जगह लिखा था, ‘‘रात विमला सो रही थी, कैसी गहरी नींद में, देखा, तो देखता ही रह गया। वह कितनी भोली है, कितनी सरल। कभी उसने शिकायत नहीं की, किसी की ओर आँख उठाकर नहीं देखा। कभी किसी को जवाब नहीं दिया और उसके साथ कितना अन्याय हो रहा है। भगवान् मुझे शक्ति दे कि मैं शीघ्रातिशीघ्र अपना घर बसा सकूँ। चित्र बिकने लगे हैं। जब मेरी मासिक आय सत्तर-अस्सी रुपए हो जाएगी, एक कोठरी कहीं भी किराए पर ले लूँगा।’’

और अंतिम पृष्ठ पर लिखा था, ‘‘आज मुझे पचास रुपए मिले हैं। कल सुबह से मकान की खोज में निकलूँगा। मुझे कितनी प्रसन्नता होगी, जब मैं विमला का हाथ पकड़कर उसे उस जगह ले जाऊँगा, जो मेरी और उसकी होगी, और तब वह समझेगी कि मैं कितना प्यार करता हूँ। उसने अब तक जो कष्ट सहे हैं, उनका अंत हो जाएगा, उसे फूलों की सेज पर सुलाऊँगा, इन्द्रधनुष के वस्त्र पहनाऊँगा, उषा की किरणों के आभूषणों से सँवारूँगा। अपने हाथ से और तब...बस आज मैं तभी लौटूँगा, जब उस मकान में अपना ताला लगा लूँगा जो कि अब मेरा होगा।’’

विमला का दिल उछलने लगा, तो अब मेरे कष्टों का अंत होगा, मेरा पति मेरा होगा-ओह, वह मुझे कितना प्यार करते हैं-साल भर में वैतरणी मैंने पार कर ली है, और अब स्वर्ग मेरा होगा और मेरा भगवान् मेरा होगा।’ विमला ने आँखें मूँदकर अपनी माँ के पूजा के आले में रखी भगवान् की मूर्ति की कल्पना कर, विनती की, ‘‘उन्हें सफलता मिले, वह आएँ, मेरा हाथ पकड़कर कहें, चलो, अपनी दुनिया में चलें। और मैं आँखें मूँदे, उनका हाथ थामे चल दूँ।’’
परंतु रात बीत गई, लज्जाराम नहीं आया। विमला रात-भर उसके लिए मिन्नतें मनाती रही और तब उसके कानों पर हथौड़ा-सा पड़ा, ‘‘विमला उठ कब तक सोएगी ?’’

चक्की चल रही थी, पर उसकी चाल आज धीमी थी। उसकी कलाई में चक्की का हत्था धकेलने की शक्ति नहीं थी। मँझली न जाने कब उसके पीछे आ खड़ी हुई थी, ‘‘ऐसे तो सारे दिन में भी आटा नहीं पिसेगा, विमला रानी।’’
विमला ने सुना, मँझली ने फिर कहा, ‘‘जल्दी पीसो, अभी घंटे-भर में छोटे लाल को मुरादाबाद जाना है।’’ परंतु यह सुनने पर भी चक्की की चाल तेज नहीं हुई तो मँझली ने उसकी पीठ में पाँव से ठोकर मारी, ‘‘जल्दी चला, निखट्टू की बीवी, इसके नखरे तो देखो।’’

विमला ने उसकी बात का उत्तर नहीं दिया, केवल कहा, ‘‘वो रात नहीं आए !’’
‘‘वो रात नहीं आए !’’ कड़वे से मुँह से मँझली ने दोहराया, ‘‘नहीं आया तो मैं क्या करूँ ? आवारा है, जा मरा होगा कहीं, तू जल्दी से गेहूँ निबटा।’’ कहती हुई वह चली गई।
विमला की छाती में जैसे किसी ने घूँसा-सा-मारा, कैसे अपशब्द कहे मँझली ने-विमला की सारी शक्ति जैसे तले से फूटे घड़े के पानी सी बह गई, उसका सारा शरीर निर्जीव सा हो गया और जा मरा होगा कहीं, जा मरा होगा कहीं शब्द उसके जेहन में गूँजने लगे। वह हड़बड़ाकर उठी और अपनी कोठरी में जाकर कटी शाख-सी औंधी गिर पड़ी। इतनी निर्बलता थी कि वह जोर से रो भी न पाई।

और तभी घर में शोर मचा। बड़े भाई मँझले को, छोटे को, सबको पुकार रहे थे। विमला सहमकर बैठ गई। उसके कान में कई प्रकार के प्रश्नोंत्तर पड़ रहे थे-
‘‘कब हुआ ?’’
‘‘कल शाम, अभी सिविल अस्पताल का आदमी आया था, उसने बताया।’’
‘‘कैसे ?’’

‘‘बस के नीचे आ गया-बचने की आशा...’’
विमला इससे आगे नहीं सुन पाई, ‘‘तो क्या सुबह सुबह मँझली ने...’’ वह अचेत हो गई।
लज्जाराम ने शहर के बाहर, एक छोटी सी बस्ती में एक कमरा लिया था, जिसके साथ रसोई और गुसलखाना था, पास ही एक हैंडपम्प भी लगा था। एक महीने का किराया देकर अपना ताला लगा दिया था और अपने सुनहरे संसार की कल्पना करते हुए घर की ओर आ रहा था कि एक प्राइवेट बस ड्राइवर ने एक ओर बैलगाड़ी और दूसरी ओर साइकिल वाले को बचाने का प्रयत्न किया कि बस पटरी पर चढ़ गई और उसकी झपेट में आ गया लज्जाराम।
शोर मच गया, कहीं पास से एक सिपाही आया, फिर सब-इंस्पेक्टर और उसका अमला, तब कोई दो घंटे बाद करीब दस बजे रात में पुलिस की मोटर, एक बेहोश बुरी तरह घायल अज्ञात युवक को लेकर सिविल अस्पताल गई। सुबह छः बजे तक हस्पताल वालों को युवक का अता-पता कुछ भी ज्ञात न हो सका, परंतु जब उसे कुछ होश आया, उसने अपने घर का पता बताया।

जब घरवाले पहुँचे, उस समय युवक लज्जाराम अंतिम साँसें ले रहा था। विमला का सुहाग सिंदूर पोंछ दिया गया और चूड़ियाँ तोड़ डाली गई थीं।
अगले छः महीने में उसके माता-पिता भी इस दुनिया को छोड़ गए थे और उसे पूर्णतया अनाथ बना गए थे। अब विमला वास्तव में अबला हो गई थी।
दो एक बार जीवन से तंग आकर, विमला ने गले में रस्सी डाल झूल जाने का भी प्रयत्न किया, पकड़ी गई और निगरानी और भी कड़ी कर दी गई। घरवाले इस बिना तनख्वाह की नौकरानी को खोना नहीं चाहते थे।
इस रुखे बंजर रेगिस्तान में विमला को एक दिन कुछ हरियाली दिखाई दी। उसके पति की दूर की एक रिश्तेदार, शायद मौसी आईं। विमला से उनकी बातें हुईं, तो उनके हृदय में विमला के लिए कुछ दया उपजी।
मौसी वहाँ से हरिद्वार, कुम्भ स्नान के लिए जाने वाली थीं। उन्होंने कुछ बूढ़ी औरतों को भी अपने साथ चलने को राजी कर लिया था।

मँझली का अनुमान था कि मौसी अपनी कोई संतान न होने के कारण सब कुछ उन्हीं के नाम कर देंगी। इसलिए वह मौसी को विशेष रूप से प्रसन्न करने का प्रयत्न करती थी। मौसी ने जब विमला को भी कुम्भ पर अपने साथ ले जाने का प्रस्ताव रखा तो मँझली मना नहीं कर सकी।
दूसरे पहर के ढाई बजे के करीब चन्द्रग्रहण पड़ना आरंभ होने वाला था। दस बजे से ही साधुओं का जुलूस निकलना आरम्भ हो गया। विमला स्त्रियों के साथ धर्मशाला की छत पर खड़ी थी। नागा साधुओं का जुलूस जब उसकी दृष्टि की सीमा में आया और जब इन साधुओं का नग्न रूप देखा तो जिनके प्रति अपने संस्कारों के कारण, उसके हृदय में बहुत श्रद्धा थी, वह ग्लानि में बदल गई। त्याग और त्याग के साथ कुरूप नग्नता का यह बेमेल-सा मेल उसे अच्छा नहीं लगा और उसने मुँह फेर लिया। फिर वह नीचे आकर अपने सामान के पास बैठ गई और उसे लगा कि उसका कोई नहीं, न भगवान् उसका है न इंसान। एक अजीब खोखलापन-सा उसने अपने अंतर में पाया। एक बार फिर जीवन का अंत कर देने की इच्छा जागी और उसने सोचा कि उस असाधारण अव्यवस्था और शोर-शराबे के वातावरण में यदि वह अपनी नाव मँझधार में डाल दे, तो वह अवश्य डूब जायेगी। वह उठी, धर्मशाला से निकली और घाटों की तरफ चल दी।

कुछ ही दूर चलने पर वह एक ऐसे भीड़ के रेले में फँस गई कि जिसमें से निकलने का प्रयत्न करने पर भी वह निकल नहीं सकती थी। सब ओर से उस पर दबाव पड़ रहा था और दो एक आदमी तो जैसे जानबूझकर उससे सटे जा हे थे। अपने शरीर को अछूता रखना असम्भव था और उसके साथ कोई रक्षक भी नहीं था। उन उद्दंड व्यक्तियों के हाथ उसके अंग प्रत्यंगों को छू रहे थे। विमला अपनी अबलता पर दिल ही दिल में रो रही थी-कुछ अपने अकेली निकलने और घर छोड़ने की मूर्खता पर।

तभी एक सहानुभूति भरा स्वर उसके कान में पड़ा, ‘‘तुम्हारे साथ वाले कहाँ है ?’’
विमला ने देखा, जिस धर्मशाला में वह ठहरी थी उसी में यह युवक भी ठहरा था।
‘‘मुझे बचाइए !’’ विमला ने कहा। और वह युवक के पास को बढ़ी। वह हाथ जो भीड़ में उसके शरीर को छू रहे थे, उससे दूर हो गए। युवक रास्ता बनाता हुआ विमला को भीड़ में से बाहर ले गया।
‘‘तुम्हारे साथवालियाँ कहाँ हैं ?’’
‘‘मेरा कोई नहीं।’’ विमला ने झूठ कहा जो उतना ही बड़ा सत्य भी था।
‘‘तुम कहाँ जाना चाहती हो ?’’
‘‘मुझे नहीं पता।’’
‘‘तुम्हारा यहाँ कोई है ?’’
‘‘नहीं ।’’
‘‘तो कहाँ जाओगी ?’’

‘‘पता नही !’’
युवक ने कुछ सोचा और बोला, ‘‘मुझे अपनी माँ-बहिन को लेकर स्नान करने जाना है, वह मेरी प्रतीक्षा कर रही होंगी। तुम्हें भी ऐसी हालत में नहीं छोड़ सकता। जहाँ कहो, पहुँचा दूँ।’’
विमला कुछ न कह पाई, केवल मुँह नीचा किए खड़ी रही।
‘‘बताओ, कहाँ जाना चाहती हो ?’’ झुँझलाकर युवक ने कहा।
विमला का मन किया, कहे कि वह उसे गंगा के किनारे ले जाकर उसमें ढकेल दे परंतु कुछ न कह पाई और अपनी असहायता पर रोने लगी। युवक ने उसके आँसू नहीं देखे, ‘‘मुझे जल्दी जाना है। तुम बताओ, कहाँ जाना है, नहीं तो मैं जा रहा हूँ।’’ वह जाने लगा।
‘‘उन औरतों को मत बताइएगा कि आप मुझसे मिले हैं।’’ विमला ने विनती की।
‘‘क्यों ?’’
‘‘बस, आप कह दीजिएगा कि आपने मुझे गंगा में डूबते देखा है। मुझ पर आपका बहुत उपकार होगा।’’





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