बीसवीं सदी की बीस कथाएँ - आनंद प्रकाश माहेश्वरी Beesavin Sadi Ki Bees Kathayen - Hindi book by - Anand Prakash Maheshwari
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बीसवीं सदी की बीस कथाएँ

आनंद प्रकाश माहेश्वरी

प्रकाशक : प्रतिभा प्रतिष्ठान प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :207
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5614
आईएसबीएन :81-85827-90-7

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पुस्तक के माध्यम से पाठकों की यह यात्रा ‘वास्तविक’ से लेकर ‘तात्त्विक’, फिर ‘साहित्यिक’ से लेकर ‘सात्त्विक’ अनुभूतियों की यात्रा होगी।

Beesvin Shadi Ki Bees Kathayen

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

एक वरिष्ट पुलिस अधिकारी द्वारा अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर लघु कथानकों के माध्यम से जिंदगी के विभिन्न पहलुओं एवं विषमताओं पर एक तात्त्विक एवं सारगर्भित प्रस्तुति के साथ-साथ वर्तमान परिवेश में प्रत्येक वर्ग के समक्ष विद्यमान विवशताओं के यथार्थपूर्ण चित्रण का सम्यक् समावेश भी इस पुस्तक में है। व्यवस्था-तंत्र व उसकी कार्यप्रणाली के बारे में आम लोगों के क्या अनुभव एवं प्रतिक्रियाएँ हैं, वे भी भलीभाँति चित्रित की गई हैं। एक साहित्यिक कृति के रूप में विषयवस्तु का विकास करते हुए कथानकों का मंथन भी पद्याशों, के रूप में लेखक द्वारा अभिलिखित किया गया है। प्रत्येक कथानक से उजागर जीवनोपयोगी विचारों को विचार स्पंदन के अंतर्गत सूक्ष्मता में रखकर लेखक ने गागर में सागर भरने की कला का प्रदर्शन किया है।

प्रस्तुत पुस्तक में वैचारिक पटल से आगे बढ़ते हुए लेखक ने आत्मबोध के मार्ग को ही प्रशस्त नहीं किया है अपितु आध्यात्मिक अनुभूति भी कराई है।

पुस्तक के माध्यम से पाठकों की यह यात्रा ‘वास्तविक’ से लेकर ‘तात्त्विक’, फिर ‘साहित्यिक’ से लेकर ‘सात्त्विक’ अनुभूतियों की यात्रा होगी। प्रत्येक जागरूक एवं संवेदनशील पाठक के लिए यह एक अत्यंत उपयोगी पठन सामग्री है।

इस पुस्तक में छोटे-छोटे कथानक हैं,
जो जीवन-बोध के गहरे प्रमाणक हैं।
वक्त कभी मिले तो इन्हें पढ़ लेना,
और कोई बात दिल पर दस्तक दे जाए,
तो मेरे लिए भी दुआ तुम कर लेना।

लेखक

लेखकीय निवेदन

मेरी पहली पुस्तक का विमोचन इसी वर्ष के प्रारंभ में शिवानीजी द्वारा किया गया। पुस्तक सांप्रदायिकता जैसे संवेदनशील विषय पर थी। वह पुस्तक सर्वप्रथम अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित हुई। बाद में प्रकाशक द्वारा हिंदी रूपांतरण भी तैयार कराया गया। शिवानीजी ने मेरी पुस्तक को पढ़ने के बाद अपनी प्रतिक्रियाओं के मध्य कहा, माहेश्वरीजी, आप हिंदी में भी लिखें। पुलिसजन तो लोगों के जीवन को हिला देनेवाली कई घटनाओं का अध्ययन करते हैं।

शिवानीजी के प्रोत्साहन का प्रभाव यह पड़ा कि मैंने इस दिशा में सोचना शुरू किया। यह सही है कि जीवन की कई घटनाएँ विचारों को झंझोंड़ जाती हैं। फिर आदमी अपना दृष्टिकोण बलता है; जीवन की नई मान्यताएँ तलाशता है; अपने जीवन-मूल्यों का परिमार्जन करता है। जिंदगी के कई रूप हैं। सबको यह सृष्टि अलग-अलग बोध कराती है। अपने ही बोध से उत्पन्न विषमताओं से जूझता हुआ आदमी जब थक जाता है, तो ‘परम-बोध’ की दिशा में ‘आस’ और ‘त्रास’ का सिलसिला शुरू होता है। कोई कहीं पहुँचता, तो कोई कहीं। कुछ वहीं-के-वहीं रहते हैं।

विभिन्न अनुभवों के आधार पर कुछ लघु कथानक विकसित कर यह प्रस्तुति कर रहा हूँ। इस कृति में प्रस्तुत कथानक किसी भी प्रकार से शासकीय कार्य प्रणाली पर टिप्पणी स्वरूप नहीं है, न ही मेरे द्वारा लोकसेवक की हैसियत से प्रस्तुत है। कथानकों का घटनाक्रम एवं पात्रगण परिदृश्यता के आधार पर विकसित किए हैं। किसी भी व्यक्ति के जीवन से उनका हू-ब-हू मिलना महज एक इत्तफाक ही हो सकता है। प्रदर्शित घटनाओं में अंतर्निहित बोध जीवन के यथार्थ को अवश्य प्रदर्शित करते हैं। सँजोए गए कथानकों का ध्येय यह बताना नहीं है कि किसके साथ क्या हुआ, अपितु पाठक को उन भावों तक ले जाना है जो कि जीवन मर्म को उद्घाटित करते हैं। कहीं मेरी सोच या अभिव्यक्ति में कमी रही हो तो मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। मेरा परिश्रम तभी सफल होगा जब से कथानक अपने ध्येय में सफल होंगे अथवा इन्हें और अधिक सशक्त बनाने हेतु सही माने में आलोचनात्मक सुझाव प्राप्त हों।

आलोचना के दो पहूल हैं-निंदा अथवा स्तुति। महात्माओं की नसीहत है कि दुनिया में दोनों भावों से दूर रहना चाहिए। निंदा में अकसर द्वेष छुपा रहता है। स्तुति में चापलूसी का अंग प्रधान हो सकता है। अतः आदमी निंदा करे तो स्वयं की और स्तुति करे तो अपने इष्टदेव की। वस्तुतः अपना पहला निंदक मैं स्वयं ही हूँ। इस कृति को मैं साहित्यिक कृति की श्रेणी में रख अवश्य रहा हूँ; पर स्वयं ही उसको निम्नतम मूल्यांकन स्तर पर रखकर अपनी बात कहने का प्रयास कर रहा हूँ। आशावान् हूँ कि बिना साबुन के खर्च के परिमार्जन का अवसर अवश्य मिलेगा।


निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन साबुन पानी बिना, निर्मल करे सुभाय।


(कबीर)


निंदक रहे तो कुसल से, हम को जोखों नाहि।।
हम को जोखों नाहि गाँठि कौ सौबुन लावै।
खरचै अपनो दाम हमारी मैल छुड़ावै।


(पलटू साहिब)


जिंदगी में मैं भी कई पहलुओं से गुजरा हूँ। जिंदगी ने कहीं आँखें ऊँची करके तलने का भी अवसर दिया और कहीं आँखें नीची भी करनी पड़ीं। कभी जीवन गति ‘उधो’ हुई तो कभी ‘अधो’। कभी गिरे, फिर मैले हुए, फिर धुलाई हुई, फिर ‘मँजाई’ का अवसर मिला। ‘एकलव्य’ बनने का भी मौका आया। प्रयास किए; पर अभी पकावट नहीं हो पाई है। इस परिपक्वता की कमी के लिए भी मैं मुआफी की गुजारिश करता हूँ। मैं फिर भी अपनी सामर्थ्य के अनुरूप अपने पिता श्री प्रेमसुख माहेश्वरी पिता-तुल्य श्री बिशन चंद्र गोयल, पुलिस सेवा में अपने वरिष्ठ श्री शैलजाकांत मिश्र और अपनी बहिन श्रीमती विनीता चांडक का शुक्रगुजार हूँ।

मैं श्री दुर्गा दत्त पांडे, आर्ट्स कॉलेज लखनऊ का आभारी हूँ, जिन्होंने इस पुस्तक की अभिव्यक्तियों को कथानक के प्रारंभ में स्केच के रूप में चित्रण किया है।
अंत में मैं अपनी प्रेरक पद्मश्री शिवानीजी का पुनः साधुवाद करता हूँ जिन्होंने इस कृति को सजाया सँवारा ही नहीं, अपितु सूत्रधार के रूप में आशीर्वाद भी प्रदान किया है।


आनंद प्रकाश माहेश्वरी

भूमिका

मैं भूमिका लिखने में सदैव हिचकिचाती हूँ। मेरी दृष्टि में कोई भी श्रेष्ठ कृति स्वयं अपनी भूमिका बन जाती है। किंतु मैंने स्वयं ही श्री माहेश्वरी को यह सुझाव दिया था कि वे एक पुलिस अधिकारी हैं, इसलिए अपने अनुभवों के आधार पर जीवन की मार्मिक घटनाओं को इस प्रकार लिपिबद्ध करें कि वे साहित्यिक परिधि में आकर पाठकों में न केवल सरस भावों का संचरण कर सकें, अपितु उनके समक्ष अपराधियों की विवशता (अर्थात् जिन परिस्थितियों ने उन्हें अपराधी बनाया) आहत व्यक्तियों की व्यथा, पीड़िता घर्षिता नारी की दबी हुई कुंठाओं एवं राजनीतिक दबाव से न्यायतुला के असंतुलित स्वरूप आदि विभिन्न पहलुओं का भी सजीव चित्रण प्रस्तुत करें। मुझे प्रसन्नता है कि माहेश्वरी जी की लेखनी निर्भीक होकर गतिशील रही है। मैं जानती हूँ कि एक सरकारी अधिकारी के लिए कटु सत्य को लिपिबद्ध करना कितना कठिन होता है, फिर भी इन युवा अधिकारी ने कटु सत्य को उजागर करने की पूर्ण चेष्टा की है।

हमें यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि कमजोर व्यक्ति स्वयं अपने ही साये से डरता रहता है, भले ही वह जघन्य दुर्दांत् डाकू क्यों न हो अपराधी का यही दौर्बल्य उसे आध्यात्मिक रूप से अपाहिज बना देता है। वह सत्य या अहिंसा का पालन नहीं कर सकता। ऐसे व्यक्ति को कठोर दंड ही उचित मार्ग पर ला सकता है। किंतु इस युग में क्या यह संभव है ?

कौटिल्य के अनुसार, निष्पक्ष न्याय करना एवं अपराधी को दंड देना राजा के प्रमुख कार्यों में था। न्यायानुशासन एक पवित्र कार्य माना जाता था। जो राजा निरपराध को दंडित करता है और अपराधी को छोड़ देता है, वह महापातकी कहा जाता है। हमारे धर्मशास्त्रकारों ने मानव स्वभाव को गर्हित कहा है। बड़े दुर्लभ होते हैं पवित्र व्यक्ति। अपराधी को केवल दंड का भव ही सीधे रास्ते पर ला सकता है। ‘दंडस्य हि भयाद् भीतो भोगोयेव प्रवर्तते’। आज दंड व्यवस्था निष्प्राण होती जा रही है। यदि अपराधी की पहुँच दूर तक है, तो उसे दंड का क्या भय ?

एक बार एक उच्च पदस्थ अवकाश प्राप्त अधिकारी ने मुझे एक रोचक घटना सुनाई एक बार एक कुपित मंत्रीजी ने उनसे शिकायत स्वरूप कहा कि फलाँ जिले में जब वे गए तो वहाँ उपस्थित पुलिस कर्मचारियों ने उन्हें विनम्र सलामी नहीं दी। अधिकारी ने उक्त पुलिस टुकड़ी के नायक से पूछा, तो उसने तपाक से कहा, ‘‘सर पहले पुलिस के हाथ में डंडा रहता था, अब उसके हाथ में झंडा थमा दिया गया है। इसीसे वह पुराने अदब कायदे भूलने लगा है।’’

आज युग ने हृदयहीन करवट ली है। झंडा बेशक पुलिस के हाथ में बना रहे, किंतु डंडे के महत्त्वपूर्ण अस्तित्व को भी वह न भूले।
जब तक आंतरिक शुद्धि के माध्यम से व्यक्ति की ‘गति’ अथवा ‘स्तर’ न बदले तब तक वह किसी न किसी रूप में भय से ही नियंत्रित होता है। मृत्यु भय अथवा अंतिम अवस्था का बोध ही आध्यात्मिक रुचि को जन्म देता है। अपने हर कथानक में श्री माहेश्वरी ने आंतरिक परिमार्जन के किसी-न-किसी स्तर को उभारा है जो कि उनकी शैली की खूबी है। बीसवीं शताब्दी तो समाप्त हो गई। नया युग अब हम सभी के लिए आत्मचिंतन का युग है। लेखक ने प्रत्येक कथानक का मंथन करके उसे पद्यम के रूप में भी सँवारा है और फिर अपनी समझ के अनुसार विचार स्पंदन की ओर भी सटीक संकेत किया है। उनका यह प्रयास प्रशंसनीय है यह एक अच्छी साहित्यिक कृति है।

मेरी शुभकामनाएँ सदैव श्री माहेश्वरीजी के साथ रहेंगी। उनकी लेखनी सदैव निर्भीक एवं निःसंशय होकर गतिशील बनी रहे।

66, गुलिस्ताँ कालोनी,
लखनऊ।

गौरा पंत ‘शिवानी

पीड़ा

दुःख और सुख जीवन की गाड़ी के दो पहिये हैं-हम सभी यह जानते हैं, कदाचित् मानने से कतराते हैं। जीवन के किस मोड़ पर न जाने कब कोई खुशी मिल जाए या फिर खुशी ही दुःख का कारण बन जाए। विधि का विधान मनुष्य समझ भी नहीं पाता कि जीवन के अंतिम क्षण आ पहुँचते हैं। कभी मौत के शिकंजे से जवानी में ही भेंट हो जाती है। जीवन के उतार-चढ़ाव में अपने अस्तित्व को पा जाना दुर्लभ है। ऐसे ही भँवर से जुड़ी कहानी है स्मिता की।

जीवन में कुछ बनने की तमन्ना लेकर पढ़ाई में काफी आगे निकल गई थी। स्मिता के पिताजी मध्य वर्गीय परिवार से थे और खुद भी ज्यादा नहीं कमा पाते थे। किसी तरह बड़े बेटे राजीव का हॉस्टल का खर्च वहन कर पाते थे। पारिवारिक पुराने मूल्यों को भी नहीं त्याग पाए थे। चाहते तो बहुत थे कि लड़की भी उनका नाम ऊँचा करे। लड़की की उम्र हो आई थी। सभी टोकते थे-शादी क्यों नहीं कर देते ? आखिर जब एक धन-संपन्न व्यवसायी के पुत्र राकेश का रिश्ता आया तो मनोहर लालजी मना नहीं कर पाए। राकेश के पिता वंशीधर राजनीति में भी अपना दबदबा रखते थे। धनाढ्य व असरदार समधी पाकर मनोहर लाल को लगने लगा कि कदाचित् स्मिता का यही भाग्य है, सुखी रहेगी। उन्होंने पढ़ाई छुड़ाकर अगले तीन माह बाद ही स्मिता का विवाह राकेश से कर दिया।

स्मिता के मन में कुछ बनने की चाह अवश्य थी। अपनी भावनाओं को दबाने में उसे स्वयं से बहुत जूझना पड़ा। स्मिता की सहेली रजनी ने भी उससे कहा, "नौकरी करके क्या करोगी ? एक अच्छे परिवार में शादी हुई है; रुपए पैसे की भी कमी नहीं है। आराम से रहो। पशोपेश में रहने से फायदा ?"

स्मिता ने धीरे-धीरे यथार्थ से समझौता कर लिया। फिर उसके अंदर की औरत ने अँगड़ाई ली। राकेश अपनी पढ़ाई पूरी करके अपने पिता का कारोबार सँभाल रहा था। स्मिता को पाकर खुश था। दोनों घूमने के लिए मॉरीशस गए। प्रकृति का रमणीक स्वरूप, यौवन के उद्गार दोनों ने काफी सुखद क्षण गुजारे।
"तुम्हें पाकर में बहुत धन्य हूँ।" राकेश ने स्मिता से कहा था। "सच ! या यूँ ही दिल खुश करने को कह रहे हो ?" स्मिता बोली।
"नहीं-नहीं, मैं वाकई तुम्हें दिल से चाहने लगा हूँ। अब तो जीवन तुम्हारे साथ ही गुजारना है, अच्छी कटेगी।" यह राकेश ही बोला था। जिंदगी में कई उद्गार आदमी व्यक्त कर जाता है। अलफाज तो अपना लेता है, किंतु उसके माने समझने में बरसो लग जाते हैं। राकेश को स्वयं यह मालूम नहीं था कि आनेवाला समय उससे क्या कराएगा। जिन लोगों में गहराई होती है, वे भावनाओं की अभिव्यक्ति में कदाचित् कम विश्वास रखते हैं। कभी-कभी इसका उलटा होता है। औरत के अंदर आभास की एक अजीब शक्ति होती है। जान लेती है कि जिसपर विश्वास कर रही है, वह इसका कितना पात्र है; फिर भी पूर्ण समर्पण करना उसकी नियति है।

चार महीने बीतते-बीतते रिश्तों की कलई खुलने लगी। "पिताजी धंधे में मंदी आ रही है, पैसे का इंतजाम नहीं हो पा रहा।" राकेश ने हौसला जुटाकर अपने पिता वंशीधर से कहा।
‘‘क्या तुम्हारे ससुर मदद नहीं करेंगे ?" वंशीधर ने पूछा।
"जी, पूछ तो सकता हूँ, पर हिचकता हूँ।" राकेश बोला।
"कुछ नहीं, बात करो।" वंशीधर बोले।

राकेश ने मनोहर लालजी से बात करने से पहले स्मिता से पूछा। स्मिता चौंकी।
"क्यों, उनसे क्यों ? अपने बूते पर करो जो कुछ करना है।" स्मिता ने कहा, "मैं नौकरी कर लूँगी, शादी के बाद भी माँ-बाप पर बोझ बनना मुझे गवारा नहीं।"
"तुम तो नाहक इतनी परेशान हो रही हो। जल्दी ही लौटा दूँगा। राकेश बोला।
"नहीं, मैं नौकरी कर लूँगी।" स्मिता ने तटस्थ उत्तर दिया।
राकेश और वंशीधर को यह रास नहीं आया।

आदमी दोहरी जिंदगी जीता है। अपने झूठे आडंबर में कई भ्रम पाल लेता है। स्मिता को डपट दिया। मनोहर लालजी से माँग कर ही डाली।
मनोहर लालजी किसी तरह बच्चों को पालपोस पाए थे। उनकी कमर अब और बोझ उठाने में सक्षम नहीं थी। हाथ जोड़कर क्षमा माँग ली; किंतु फिर बिटिया का खयाल आता और सोचते कि कहीं से उधार ले लूँ। फिर रुक जाते कहाँ से ? कैसे लौटाऊँगा ? राकेश ने समय से पैसे नहीं दिए तो ?

मनोहर लालजी का जवाब न पाकर वंशीधरजी का रुख कड़ा होता चला गया। मनोहर लालजी पर तो बस नहीं चला, स्मिता उत्पी़ड़न का शिकार होने लगी। रोज ताने डाँट फटकार छोटी-छोटी बात पर झड़प।
आदमी अपने मतलब से कितना बँधा है, रात के अँधेरे में स्मिता सोचने लगी। ‘वही राकेश जिसने प्यार की दुहाइयाँ दी थीं, वही ससुरजी जिन्होंने बेटी का तमगा देकर स्वयं को भाग्यशाली कहा, वही आज आँखों में रोष लिये हैं। कहाँ फँस गई मै !

राजनीतिक सभाओं में नारी सम्मान व आन का भाषण देते हैं, वहीं वंशीधर घर में कुछ और रूप धारण किए हैं। राकेश की माँ भी पति व बेटे के साथ थी। क्या नारी स्वयं नारी का उत्पीड़न करने में भागीदार होगी ? नगर के महिला संघ की अध्यक्षा हैं। ‘नारी चेतना’ पर पत्रिका निकालती हैं ? सब ढकोसला है। यह सोचते-सोचते न जाने कब स्मिता सो गई। नए उजाले का उसे इंतजार था; पर क्या नए दिन का मतलब हरेक के लिए ‘नया उजाला’ ही होता है ?

अगले दिन सुबह राकेश ने उसे झँझोड़कर उठाया, "सूरज सिर पर आ गया है, अभी तक महारनीजी सो ही रही हैं ?" यह तो केवल शुरुआत थी। अगले तीन घंटे में गाली-गलौज की नौबत आ गई। सास-ससुर व पति एक तरफ और बेचारी स्मिता एक तरफ। काफी देर तक स्मिता सुनती रही; पर जब उसके माँ-बाप को भला-बुरा कहा जाने लगा; तो वह सह न सकी। कोई भी लड़की शायद ही यह कभी बरदाश्त करेगी। दूर रहकर भी उसका दिल अपने माँ-बाप के लिए भावुक ही रहता है।

वंशीधर व उसका परिवार वहशीपन पर उतर आया। अब उनमें व चांडाल में कोई फर्क नहीं रह गया। जो औरों ने किया, वही उनके हाथों भी हुआ-स्मिता को जलाने का प्रयास। मरने से पहले जान बचाने की तीव्र ललक उठी। दरवाजा खोलकर घर के बाहर भागी। सड़क पर सभी ने उसे जलते हुए भागते देखा; पर मदद को कोई नहीं आया। पड़ोस में कुछ दूर उसके एक प्रोफेसर रहते थे। जाकर उनके द्वार पर चिल्लाती हुई गिर पड़ी। शायद अंतिम उम्मीद थी। विधाता भी प्रोफेसर लाल को कदाचित् उसकी जीवन रक्षा का निमित्त बनाना चाहते थे।

प्रोफेसर लाल घबराकर बाहर दौड़े। स्मिता को पुकारा वह बेहोश थी। खुद हाथ लगाने की हिम्मत नहीं हुई। दौड़कर कंबल ले आए। कंबल में उसे लपेटा। मिसेज लाल बोलीं, पुलिस केस है ! तुम पचड़े में मत पड़ो।"

"क्यों ? मेरी स्टूडेंट रही है। देखो, कितनी मुसीबत में है, भगवान् न करे इसे कुछ हो जाए ! आधी जल चुकी है। ऐसे मामलों में बचने की उम्मीद कम होती है। तुम इसके पास बैठो, मैं डॉक्टर को फोन करके आया।" कहकर प्रोफेसर टेलीफोन की ओर लपके। थोड़ी देर में एंबुलेंस आई और स्मिता को जिला अस्पताल ले गए।

"पुलिस केस है ! पहले पुलिस आकर अपनी कार्यवाही कर ले।" ड्यूटी इंचार्ज बोला।
"अरे क्या कार्यवाही ? तब तक पेशेंट की जान चली जाएगी।" प्रोफेसर बोले। घबराहट में मुँह सुख गया। था, पर पूरे शरीर की ताकत लगाकर अपनी बात कही।
इसी बीच कोई जाकर सीनियर डॉक्टर को बुला लाया, "तत्काल पेशेंट को ओ. टी. में ले चलो। प्रोफेसर साहब आप पुलिस को इत्तला करें।" कर्तव्य बोध से दबे प्रोफेसर झट ही पुलिस को सूचना देने दौड़े। चौकी पर एक सिपाही था।
"मैं डिग्री कॉलेज में प्रोफेसर हूँ। एक लड़की जो मेरी स्टूडेंट थी, जल गई है। अस्पताल में है, जल्दी चलो।’’ प्रोफेसर बोले।
सिपाही भावविहीन बैठा रहा।


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