कर्मात्मा और कर्म का सिद्धांत - सरजी Karmatma Aur Karma Ka Siddhant - Hindi book by - Sarsri
लोगों की राय

व्यवहारिक मार्गदर्शिका >> कर्मात्मा और कर्म का सिद्धांत

कर्मात्मा और कर्म का सिद्धांत

सरजी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :192
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5641
आईएसबीएन :81-288-1563-6

Like this Hindi book 9 पाठकों को प्रिय

436 पाठक हैं

कर्म के सिद्धांत और कर्म के फल पर आधारित...

Karmatma Aur Karma Sidhant

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

इंसान के जीवन में कई क्षेत्र हैं। किसी एक आयाम पर ध्यान दिया तो दूसरा छूटता है, दूसरे पर ध्यान दिया तो तीसरा कमजोर हो जाता है। कब, किस क्षेत्र में कर्म करना चाहिये, यह कर्म संकेत कुदरत हमें हरदम देती है। जैसे कोई इंसान व्यायाम नहीं करता और एक दिन बीमार होता है तब उसे पता चलता है कि यह बीमारी व्यायाम शुरू करने का संकेत है। कुदरत की यह सुंदर व्यवस्था है, जिस पर जितना मनन करेंगे, उतना आपको आश्चर्य होगा, आनंद होगा। कुदरत के कर्म संकेत को बोझ नहीं, कृपा समझें।
अपने जीवन में कर्म संकेतों का पूर्ण लाभ पाने के लिये कर्म सिद्धांत का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। यह पुस्तक ऐसा ही एक शक्तिशाली और असरदार कर्म संकेत है। यह केवल पुस्तक नहीं बल्कि सेल्फ शिविर है। आपके जीवन को बदलने का यह शक्तिशाली कर्म संकेत है। इस पुस्तक द्वारा प्रतिकर्म, कर्म, सुकर्म, विकर्म, अकर्म, तेजकर्म, कर्म की आत्मा-कर्मात्मा तथा कर्म बंधन से मुक्ति पाने के 22 उपाय जानकर अपनी यात्रा शुरू करें।
जिन लोगों ने सही समय पर कर्म संकेत पहचानकर उस पर अमल किया, वे जीवन की सारी उपलब्धियाँ प्राप्त कर पाये हैं। क्या आप भी अपने जीवन के सारे आयाम विकसित करना चाहते हैं ? क्या आप भी उच्चतम सफलता प्राप्त करना चाहते हैं? क्या आप कर्मात्मा को प्राप्त करना चाहते हैं ? क्या आप आज़ादी से प्रेम करते हैं ? क्या आप गुलामी के हर कर्म बंधन से मुक्त होना चाहते हैं ? यदि हाँ तो कर्म संकेत के प्रति सजग हो जायें। ‘कर्म की कला सीखने का कर्म’ तुरंत शुरू करें।
कर्म सिद्धांत का ज्ञान फल से ध्यान हटाने का कार्य करता है और इंसान से महान अभिव्यक्ति की तैयारी करवाता है।

कर्म संकेत

कर्म की कला सीखने का कर्म

जीवन में हमें कुदरत द्वारा ‘कर्म संकेत’ मिलते हैं। कर्म संकेत यानी कुदरत आपको अपनी भाषा में कहती है कि ‘अब आप इस विषय पर, इस आयाम पर, अपने जीवन के इस पहलू पर कर्म करें।’ जैसे कोई इंसान कभी व्यायाम नहीं करता और एक दिन बीमार होता है तो उसे पता चलता है कि यह बीमारी व्यायाम शुरू करने का कर्म संकेत है। कर्म संकेत मिलने के बाद तुरंत कर्म शुरू हो जाना चाहिए, तमोगुण मिटाना चाहिए। जो इंसान सही समय पर कर्म संकेत पहचान कर योग्य कर्म शुरू करता है, वही संपूर्ण सफलता प्राप्त करता है।

कुदरत हमें कर्म संकेत क्यों देती है ? इंसान के जीवन के 7 आयाम (Dimension) हैं, 7 कर्म हैं, जो उसे एक साथ देखने हैं। सभी क्षेत्रों को एक साथ सँभालने के लिये कुदरत हमें कर्म संकेत देकर मदद करती है। ये 7 क्षेत्र इस प्रकार हैं :
1) स्वयं के शरीर में सारे गुण और अनुशासन लाना है।
2) अपनी बुद्धि को पूरी तरह से खोलना है
3) संसार में सफल होकर जीना है
4) रिश्ते-नातों में सुधार लाना है
5) घर सँभालना और चलाना है
6) नौकरी अथवा व्यापार सँभालना है और
7) ये सब करते हुए अपना स्वास्थ्य भी अच्छा रखना है
इंसान के जीवन में ये 7 मुख्य क्षेत्र (आयाम) हैं, जिनका निरंतर विकास होना चाहिये। किसी एक आयाम पर ध्यान दिया तो दूसरा छूटता है, दूसरे पर ध्यान दिया तो तीसरा कमजोर हो जाता है। इन सबको एक साथ सँभालने के लिए कुदरत हमें कर्म संकेत देकर बताती है कि अब हमें किस क्षेत्र में ध्यान देना चाहिए, किस पहलू पर कर्म करना चाहिए। कुदरत की यह कितनी सुंदर व्यवस्था है। अगर इंसान को ये सारे आयाम बिना कर्म संकेत दिये सँभालने के लिये कहा गया होता तो उसे बहुत मुश्किल हो जाती। कुदरत कर्म संकेत देकर बहुत खूबसूरत ढंग से काम कर रही है। कुदरत की इस व्यवस्था पर जितना मनन करेंगे, उतना आपको आश्चर्य होगा, आनंद होगा।
जब इंसान को पता चलता है कि उसे जीवन के सातों क्षेत्रों को सँभालना है तब उसे यह कर्म बोझ लगता है लेकिन जब वह स्वयं को जान जाता है तब उसके लिए हर कर्म सेवा, भक्ति और अभिव्यक्ति बन जाता है। यह समझ प्राप्त करके वह कुदरत के कर्म को बोझ नहीं, कृपा समझता है।
अपने जीवन में कर्म संकेतों का पूर्ण लाभ पाने के लिए कर्म सिद्धांत का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। यह पुस्तक ऐसा ही एक शक्तिशाली और असरदार कर्म संकेत है। यह पुस्तक (कर्म संकेत) इस वक्त आपके हाथ में है। आपके जीवन को बदलने के लिए यह शक्तिशाली कर्म संकेत है। इस पुस्तक द्वारा क्रिया, प्रतिकर्म, कर्म, विकर्म, अकर्म, तेजकर्म की यात्रा शुरू करें। इस पुस्तक में कर्म बंधन से मुक्ति पाने के 22 उपाय दिये गये हैं, जिनका लाभ लेकर आप हर कर्म के बंधन से मुक्त होकर, महाफल प्राप्त कर सकते हैं।
यह केवल पुस्तक नहीं बल्कि सेल्फ शिविर है, जिसे पढ़ कर आपको अपना पूरा जीवन दिखायी देगा, आज तक किया हुआ हर कर्म दिखायी देगा। यह शिविर आप अपने लिये खुद लेने वाले हैं। इस शिविर (पुस्तक पढ़ने) के उपरांत आप अपना भविष्य सुधारने का कर्म वर्तमान में शुरू कर पायेंगे। कर्म सिद्धांत का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के बाद आप कुदरत द्वारा दिये गये हर कर्म का लाभ ले पायेंगे। जिन लोगों में सही समय पर कर्म संकेत पहचान लिया है उस पर अमल किया, वे जीवन की सारी उपलब्धियाँ प्राप्त कर पाये हैं। क्या आप भी अपने जीवन के सारे आयाम विकसित करना चाहते हैं ? क्या आप भी उच्चतम सफलता प्राप्त करना चाहते हैं ? क्या आप आजादी से प्रेम करते हैं ? यदि हाँ तो कर्म संकेत के प्रति सजग हो जायें। ‘कर्म की कला सीखने का कर्म’ पूरे ध्यान से और पूरी ग्रहणशीलता के साथ करें। पुस्तक पढ़कर, कर्म संकेत पर अमल करना जारी रखें।

सरश्री

प्रेम, भाव और प्रज्ञा के संगम से कर्मात्मा (कर्म का आत्मा) का जन्म होता है। कर्म के साथ यदि प्रेम हो, भक्ति हो तो वह कर्म अव्यक्तिगत हो पाता है। अगर यह समझ नहीं है तो कर्म की आत्मा कमजोर है। प्रेम भाव और प्रज्ञा तीनों बराबर हों तो कर्मात्मा बलवान है।

कर्मज्ञान

कर्म की परिभाषा

आपके जीवन का नाता आपके परिवार, समाज और देश के साथ है, यह बात आप जानते हैं लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि आपके जीवन का नाता आपके कर्मों के साथ पहले हैं ? आपके कर्मों के अनुसार आपका वर्तमान बदल चुका है। आज आप सुखी हैं या दुःखी हैं, अमीर हैं या गरीब हैं, बीमार हैं या स्वस्थ हैं, सब अपने किए गये कर्मों की वजह से हैं। कर्मों की यह गुत्थी आप तभी समझ सकते हैं जब आप कर्म का सिद्धांत, कुदरत का कानून, कर्मात्मा, कर्म संकेत, ‘कर्ता कौन-भोक्ता कौन-आप कौन’, जान जायेंगे। आइये विश्व के सबसे उलझे हुए विषय को समझें, जिसे समझते-समझते ज्ञानी भी कई बार उलझ जाते हैं। सबसे पहले कर्म की परिभाषा आज की भाषा में समझें।
आज हमारे जीवन में जो अच्छा चल रहा है, वह जिन कर्मों की वजह से हुआ, वे कर्म हमसे होने बंद न हो जायें।

।। 1.कर्म का अर्थ ।।


इंसान के द्वारा सुबह से लेकर रात तक होने वाली शारीरिक अथवा मानसिक क्रियाएँ, जो उस पर अथवा उसके परिसर पर असर करती हैं, वे कर्म कहलाती हैं। इसका अर्थ इंसान के अंदर उठने वाले भाव, विचार, उसके द्वारा कही गयी वाणी और उसके द्वारा की गयी क्रियाएँ, ये सभी कर्म हैं क्योंकि इन सब बातों का उस पर तथा उसके परिसर पर असर होता है।
सिर्फ बाहर से कोई क्रिया होते हुए दिखायी देना ‘कर्म’ नहीं है बल्कि कहे गये शब्द, आंतरिक भाव और विचार भी कर्म का रूप लेकर असर दिखाते हैं। कर्म के इस अर्थ को भाली भाँति अपने मन में बिठा लें। यह पुस्तक पढ़ना भी एक कर्म है, जिसका फल अवश्य आने वाला है। इसका अर्थ पढ़ना, लिखना, उठना, बैठना, सोना, गाना, खाना-पीना, कहना-सुनना (श्रवण) इत्यादि सब कर्म है।
कर्म का अनोखा और आश्चर्यचकित कर देने वाला अपना कानून और सिद्धांत है। सैद्धांतिक आधार पर ही कर्म की इमारत खड़ी है। ‘किसी खास उद्देश्य, प्रेरणा या विकार से प्रेरित होकर, स्वयं अथवा औरों के लाभ के लिए जो क्रियाएँ शरीर एवं मन द्वारा की जाती है, उन्हें कर्म कहा जाता है।’ कर्म की इस परिभाषा से कर्म का असली अर्थ अधिक विस्तार से सामने आता है। जो क्रिया किसी खास उद्देश्य से की जाती है और जिसके पीछे घृणा, नफ़रत, क्रोध, डर, प्रेम, अहंकार, मोह जैसे विकारों का प्रेरणा होती है, उसे कर्म कहा गया है। कर्म किसी एक विकार की प्रेरणा से हो रहा है या अनेक विकारों की प्रेरणा से, यह ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह जानना महत्त्वपूर्ण है कि कोई भी कर्म विकारों से मिली हुई प्रेरणा से हो रहा है या सहजभाव अथवा प्रज्ञा से हो रहा है।

।।2. कर्म की सरल भाषा में गहरी परिभाषा।।

कर्म यानी इंसान के शरीर द्वारा होने वाली ‘क्रिया’। जैसे आप सुबह उठते हैं और नहीं उठते हैं तो भी कर्म है। अगर आपने ‘नहीं उठने’ का कर्म किया है तो उसका फल (सुस्ती, दैनिक कार्य न होने का फल) आपको मिलता है। कर्म यानी कुछ करना ही है, ऐसा नहीं है। समय पर कार्य न करना भी कर्म है क्योंकि ‘कार्य न करने’ का भी फल आता है। उदाहरण परीक्षा में पढ़ाई न करना भी कर्म है और उसका भी फल आता है। एक विद्यार्थी स्कूल में टीचर से सवाल पूछता है, ‘‘क्या मुझे उस कर्म की सजा मिलेगी जो मैंने किया ही नहीं ?’’ टीचर ने कहा, ‘‘नहीं, जो कर्म तुमने किया ही नहीं उसकी सजा तुम्हें नहीं मिलेगी।’ तब विद्यार्थी ने टीचर से कहा, ‘‘मैंने आज होमवर्क नहीं किया है तो क्या इसकी सजा मुझे मिलेगी?’’ आप जानते हैं टीचर ने क्या किया होगा। टीचर उसे होमवर्क न करने की सजा देगी क्योंकि ‘होमवर्क न करना’ भी एक कर्म हैं और उसका भी फल आता है इसलिए ‘कुछ न करने का कर्म’ भी कर्म कहलाता है। यह कर्म सिद्धांत की एक महत्त्वपूर्ण छूटी हुई कड़ी है। इस बात का ज्ञान न होने की वजह से लोग कर्म के कानून का संपूर्ण लाभ नहीं उठा पाते। जो लोग इस बात को जान जाते हैं, वे कुदरत द्वारा दिए गए कर्म संकेत को तुरंत पकड़ लेते हैं और समय रहते सही कर्म करके महाफल प्राप्त करते हैं। फल क्या है, महाफल क्या है, यह बात हम पुस्तक में आगे समझेंगे।

।।3.कर्म और फल का संबंध।।

कर्म और फल के बीच गहरा संबंध है। कर्म कारण है और फल परिणाम है, जैसे कठपुतली के खेल में काठ की गुड़िया नाचती है और लोग उसका आनंद उठाते हैं। गुड़ियों का नाचना फल है मगर उसके पीछे कौन से कर्म हो रहे हैं, उसका कारण क्या है, यह हमें दिखायी नहीं देता।
जब बल्ब जलता है तो उसकी रोशनी चारों ओर फैलती है तब हमें रोशनी तो दिखायी देती है लेकिन उसके पीछे की बिजली (इलेक्ट्रिकसिटी) दिखायी नहीं देती। इस तरह हर फल के पीछे कोई न कोई कर्म (कारण) होता ही है। कर्म के बिना फल नहीं हो सकता।

।।4.कर्म और बंधन का संबंध।।

हर स्थिति मैं कौन से कर्म होने चाहिए, यह समझ अगर इंसान के पास हो तो उसके कर्म बंधन नहीं बनते (बँधते)। फिर हर परिस्थिति में उसके द्वारा तेज, ताजा और फ्रेश प्रतिसाद (कर्म) ही निकलेगा। आज तक इंसान से पुरानी प्रोग्रामिंग (निर्धारित ढाँचे) के अनुसार ही कर्म होता आया है। कोई घटना हो गई तो बेहोशी में वह पुरानी प्रतिक्रिया ही करता है। इसी को कर्म बंधन कहा गया है। बंधनों में बंधा हुआ इंसान कब, कौन सा प्रतिसाद दे सकता है यह उसके संस्कार, वृत्तियाँ और गलत आदतों को देखकर बताया जा सकता है। अगर किसी ने उसे उंगली दी तो वह तुरंत क्रोधित होता है और किसी ने उसकी तारीफ की तो वह तुरंत खुश होता है। इसका अर्थ है बंधनों में बंधा हुआ इंसान एक मशीन की तरह काम करता है, जिसमें उसे कुछ सोचने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

।।5. कर्म बंधन का चक्रव्यूह।।

पहले कर्म के फल आते हैं, फिर उस फल से वैसे कर्म होते हैं। बाद में फिर उसके फल आते हैं। इस तरह इंसान बंधन में, गोलाई में, चक्र में बँधता जाता है, कर्म-बंधन, जन्म-मरण के चक्र में घूमता रहता है। लोग कर्म-बंधन के चक्रव्यूह को समझ नहीं पाते इसलिए कर्म के फल में उलझ जाते हैं।

।।6. फल का ज्ञान और कर्म का महत्त्व।।

कर्म बीज है। आप अपने जीवन में कौन से बीज डाल रहे हैं ? जो बीज आप बोयेंगे उन्हीं के पेड़ और फल आयेंगे। इसका अर्थ हर कर्म का फल आता है। कर्म और फल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यह बात समझते हुए जाँचें कि आप अपने जीवन में कहीं गलत बीज तो नहीं डाल रहे हैं ? फल का यह विज्ञान समझने के लिए नीचे दिए गये उदाहरण पर मनन करें।

किसी इंसान ने जमीन में एक बीज डाला तो उसका पौधा बाहर दिखायी देने के लिए 365 दिन यानी एक साल लगेगा। यदि आप रोज एक बीज जमीन में साल भर डालते रहेंगे तो एक साल के बाद पहले बीज का पौधा दूसरे साल के पहले दिन पर बाहर आयेगा। उसके बाद हर रोज एक पौधा बाहर आएगा क्योंकि आपने पहले ही निरंतरता से हर रोज एक-एक करके 365 बीज बोये हैं। इसका अर्थ यह है कि आपने पहले से ही जो बीज बोये हैं, उनका असर दूसरे साल में दिखायी दिया। इसी तरह आप जो बीज डालते हैं (कर्म करते) हैं, उनका असर आपको तुरंत दिखायी नहीं देता। आपका कोई भी विचार, वाणी और क्रिया बेकार नहीं जाती बल्कि उसका फल आपको मिलता ही है।
हमारे द्वारा कहे गये शब्द, बुद्धि से निकली हुई कल्पनाएँ और चित्र हकीकत में परिवर्तित होते हैं, वे भी बेकार नहीं जाते। हर प्रतिसाद का रूप देर-सवेर दिखायी देता है। जैसे ही पहले बीज का पौधा (फल) आपको अपने जीवन में दिखायी दे तो समझें कि तीसरा फल भी तैयार है। अपने आपको थोड़ा समय दें और अपनी तरफ से डाले गए बीजों का फल आने तक अच्छे विचार, वाणी और क्रियाएँ होश के साथ करते रहें। ऐसा करने से आपको हमेशा खुशी और सफलता मिलती रहेगी।

।।7.हर कर्म का फल मिलता है।।

कर्म सिद्धांत के अनुसार हर कर्म का फल मिलता है। कर्म का फल आना तुरंत शुरू होता है लेकिन वह अदृश्य होता है। फल को इंसान तक पहुँचने में जो समय लगता है, वह पता न होने की वजह से इंसान कर्म बंद कर देता है। कर्म सिद्धांत जानने वाला अपना कर्म बंद नहीं करता, जिससे वह कर्म न करने के बुरे फल से बच जाता है। ये सारी बातें समझने के लिए नीचे दिये गये उदाहरण पर गहराई से मनन करें।
एक इंसान अपने घर से दूर बैंगलोर में प्रशिक्षण के सिलसिले में 30 दिनों के लिए गया था। वहाँ पर उसके साथ कई लोग रहते थे। हर रोज उनमें से किसी न किसी इंसान का खत आता था और वह इंसान बहुत खुश होता था। शुरुआत में इस इंसान का कोई खत नहीं आया। इस तरह उसके 15 दिन गुजर गये। 15 दिनों के बाद देखा गया कि उस इंसान को रोज पत्र आने लगे। वहाँ पर उपस्थित अन्य लोगों को आश्चर्य हुआ कि इस इंसान के लिये पहले तो खत नहीं आते थे, अब हर रोज पत्र कैसे आते हैं ? उन लोगों ने इस बात का रहस्य जानने के लिए उस इंसान से पूछा, ‘‘हर रोज आपके खत कैसे आते हैं ? रोज आपको कौन खत लिखता है ? क्या आप कोई बड़े आदमी हैं ?’’ इस सवाल के जवाब में उस इंसान ने रहस्य खोला, उसने कहा, ‘‘शुरुआत के 15 दिन मैं रोज अपने एक-एक रिश्तेदार को खत लिखता रहा, जैसे ही उन्हें मेरे खत मिले हर एक ने उस खत का जवाब देना शुरू किया। इस तरह 15 दिनों के बाद हर रोज मेरे पास किसी न किसी रिश्तेदार का खत पहुँच रहा है यही है लेटर्स का रहस्य।’’ इस उदाहरण पर मनन करते हुए आप समझ गये होंगे कि जो कर्म किया जाता है, उसका फल कुछ दिनों बाद हमें मिलता है। ‘कर्म का फल’ पुस्तक के आगे बताया गया है। इस वक्त आप यही समझें कि कर्म का फल कैसे बढ़कर मिलता है


लोगों की राय

No reviews for this book