जिन्दगी - गुरुदत्त Jindagi - Hindi book by - Gurudutt
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जिन्दगी

गुरुदत्त

प्रकाशक : परम्परा बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :175
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5642
आईएसबीएन :978-81-904864-8

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प्रस्तुत है गुरुदत्त के महत्त्वपूर्ण उपन्यासों में एक जिंन्दगी....

Jindagi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

8 दिसम्बर, 1894 को लाहौर (अब पाकिस्तान) में जन्में श्री गुरुदत्त हिन्दी साहित्य के एक देदीप्यमान नक्षत्र थे। वह उपन्यास-जगत् के बेताज बादशाह थे। अपनी अनूठी साधना के बल पर उन्होंने लगभग दो सौ से अधिक उपन्यासों की रचना की और भारतीय संस्कृति का सरल एवं बोधगम्य भाषा में विवेचन किया। साहित्य के माध्यम से वेद-ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने का उनका प्रयास निस्सन्देह सराहनीय रहा है।
श्री गुरुदत्त के साहित्य को पढ़कर भारत की कोटि-कोटि जनता ने सम्मान का जीवन जीना सीखा है।

उनके सभी उपन्यासों के कथानक अत्यन्त रोचक, भाषा अत्यन्त सरल और उद्देश्य केवल मनोरंजन ही नहीं, अपितु जन-शिक्षा भी है। राष्ट्रसंघ के साहित्य-संस्कृति संगठन ‘यूनेस्को’ के अनुसार श्री गुरुदत्त हिन्दी भाषा के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले लेखक थे।

प्रस्तुत है, उनके महत्त्वपूर्ण उपन्यास ‘ज़िदगी’ का शुद्ध एवं प्रामाणिक संस्करण, जिसे अधिकारी सम्पादकों के कुशल निर्देशन में तैयार किया गया है।

1.


गोपीचन्द्र जब धनवान् हुआ, तो गोपीशाह कहलाने लगा।
विवाह के समय गोपी आढ़त की एक दुकान पर मुनीमी करता था। उसे दस रुपये महीना वेतन मिलता था और दुकान पर प्रात: आठ बजे से रात आठ बजे तक काम करना पड़ता था। मध्याह्न के भोजन के लिए उसकी मां कभी दो परांठे मूली वाले और कभी चने की दाल वाले बनाकर एक पोटली में बांधकर उसे दे देती थी। मध्याह्न एक बजे अपनी दुकान के मालिक से एक अधेला लेकर वह पड़ोस के हलवाई से दही ख़रीदकर उसमें नमक-मिर्च डालकर परांठे खा लिया करता था।
मध्याह्न के उपरान्त रात को ही भोजन होता था। माँ दुकान से पुत्र के लौट आने पर साग और रोटियां बना देती थी। मां-बेटे दोनों खाकर और ठण्डा पानी पीकर सो जाया करते थे।
इस अवस्था में भी, मुहल्ले के ही एक व्यक्ति महेशचन्द्र ने अपनी लड़की धनवती का उद्धार करने के लिए गोपीचन्द्र की मां से कहा, ‘‘बहिन फूलां ! लड़के का विवाह कब करोगी ?’’
गोपीचन्द्र की मां फूलांरानी जानती थी कि लड़की धनवती की मां जीवित नहीं है। इसी कारण उसने महेशचन्द्र को उत्तर देने के स्थान पर उससे ही पूछ लिया, ‘‘भैया ! धनवती सयानी हो गयी है। उसके विवाह की बात पर विचार करो। लड़के अविवाहित भी रहें, तो काम चल जाता है।’’
‘‘कैसे चल जाता है ?’’ महेश का प्रश्न था।
‘‘गोपी बता रहा था कि शाहआलमी दरवाज़े के बाहर एक ढ़ाबा है। वहां दो पैसे में बड़ी-सी एक रोटी और मुफ़्त में दाल मिल जाती है। वह कहता था कि एक आने में पेट ठसाठस भर जाता है। जब मैं नहीं रहूंगी, तो उसकी रोटी-पानी का प्रबंध वहां से हो जाया करेगा। परन्तु भैया ! लड़की की बात दूसरी है।’’
‘बात दूसरी है’ का अर्थ महेशचन्द्र समझता था। इसलिए बात समाप्त करने के लिए बोला, ‘‘उसी की बात तो कह रहा हूं। यदि तुम मानो, तो कल शिवालय में बैठकर शकुन दे दूं।’’
‘‘तो यह बात है ? परन्तु भैया ! देख लो, यहां गोपी के पिता तो हैं नहीं, और घर में जो कुछ पूंजी थी, सब धीरे-धीरे समाप्त हो चुकी है। गोपी के लाला को मैंने कहा था कि दो प्राणियों का निर्वाह दस रुपये में नहीं होगा। इस पर उसने कह दिया कि गोपी को कहो कि किसी अन्य स्थान पर काम ढूंढ़ ले। हमारी दुकान पर तो इससे अधिक की गुंजाइश नहीं है। किसी दूसरी जगह तो यह भी नहीं मिलेगा।’’
महेश ने कह दिया, ‘‘बहिन ! सब अपना-अपना भाग्य लेते हैं। मैं कमेटी-घर में चपरासी का काम करता हूं और बारह रुपये महीना वेतन मिलता है। निर्वाह हो ही जाता है। घर में पिता का छोड़ा हुआ कुछ है। उससे सर्दी-गरमी निकल जाती है, परन्तु पण्डित रामजीलाल कहते थे कि भाग्य का सूर्य जब उदय होगा, तो फिर कोई बादल उसे ढांप नहीं सकेगा।’’
बात फूलांरानी की समझ में आ गयी। वह बोली, ‘‘भैया ! तनिक भीतर आओ और हमारे घर की अवस्था देख लो। यदि लड़की के रहने योग्य समझो, तो उसे भेज दो। मैं भी समय निकालकर दो-तीन पैसे नित्य का काम कर लेती हूं। वह भी मेरे साथ काम कर लिया करेगी।’’
महेश फूलांरानी के घर में गया। घर सर्वथा साफ़-सुथरा, धो-पोंछकर रखा हुआ था, परन्तु कमरे ख़ाली थे। एक कमरे में दो चारपाइयां थीं। उन पर बिछाने के लिए दरियां ही थीं। दो मोटे-मोटे तकिये थे। एक कमरे में कुशा का एक आसन रखा था और उसके सामने एक चौकी पर माला पड़ी थी। तीसरे कमरे में घर का टूटा-फूटा सामान रखा था। एक सन्दूक़ था, जिसमें मां-बेटे के पहनने के कपड़े थे। इस कमरे की दीवार में एक छोटी-सी अलमारी थी। फूलांरानी ने उस अलमारी को खोला, उसमें से एक सन्दूक़ची निकाली और उसे खोलकर महेश को दिखा दिया। एक पतली-सी सोने की ज़ंजीर थी, सोने की दो पतली-पतली चूड़ियां थीं और चांदी की दो पाज़ेब थी,।
फूलांरानी ने कहा, ‘‘भैया ! बस, यह पूंजी है। अब चाहो, तो कल शकुन ले आ आना। कल त्रयोदशी है और लोग कहते हैं कि यह शुभ दिन होता है।’’
महेशचन्द्र मकान के बाहर आया और दरवाज़े में खड़ी फूलांरानी को कहने लगा, ‘‘मैं समझता हूँ कि तुम्हारे घर में स्थान तो है और अच्छा साफ़-सुथरा है। रहने वाली बाक़ी अपने-आप समझ लेगी।’’
परिणामस्वरूप गोपीचन्द्र का विवाह हो गया।
गोपीचन्द्र समझ नहीं सका कि धनवती के पिता ने क्या देखा, जो लड़की को उसके हवाले कर दिया। इस पर भी वह प्रसन्न था।
विवाह के बाद गोपी बहू को लेकर अपने घर में आया, तो मां ने लोटे में जल से बहू के सिर पर वार कर पी लिया और कहा, ‘‘बेटी ! सौभाग्यवान् होओ, फूलो-फलो। भगवान् सबका मालिक है।’’
गोपीचन्द्र मुसकरा रहा था। वह कमरा, जिसमें टूटा-फूटा सामान और एक सन्दूक़ पड़ा था, गोपी और उसकी पत्नी को सोने के लिए मिल गया।
गोपी ने अपने लाला से विवाह के लिए कुछ ऋण मांगा था। लाला गोपी के विवाह की बात सुनकर हंस पड़ा था। गोपी समझा कि लाला को उसके विवाह का विश्वास नहीं आया। उसने पूछा, ‘‘लालाजी ! हंसे क्यों हैं ?’’
‘‘तेरा श्वसुर कौन है ?’’ लालाजी ने मुसकराकर पूछा।
‘‘हमारे मुहल्ले में ही रहते हैं। उनकी लड़की अच्छी और सुन्दर है। मैंने देखी है।’’
‘‘तो पसन्द है ?’’
‘‘लालाजी ! वह लड़की है। कौन मूर्ख है, जो लड़की को पसन्द न करेगा ?’’
‘‘और तुम अपने को बुद्धिमान मानते हो ?’’
गोपीचन्द्र इस समय उन्नीस वर्ष का कुमार था। वह कुछ विचार कर बोला, ‘‘जी ! मेरी बुद्धि में यह आता है कि ठीक ही हो रहा है।’’
‘‘तब ठीक है। देखो, मैं तुम्हें ऋण में एक पैसा भी नहीं दूंगा। हां, मैं तुम्हारे विवाह पर सहायता के रूप में एक सौ रुपये दे सकूंगा।’’
‘‘सच ?’’ गोपीचन्द्र के मुख से निकल गया।
‘‘हां !’’
‘‘तो लालाजी ! दे दीजिये। मेरा विवाह अगली पूर्णिमा को शिवालय में होने वाला है।’’
‘‘ठीक है। आज सायंकाल घर जाते समय रुपये लेते जाना।’’
विवाह पर गोपी की मां ने बहू और लड़के के वस्त्रों पर पच्चीस रुपये व्यय कर दिये। घर की चूड़ियां, चेन और पाज़ेब सुनार से धुलवाकर बहू को पहनने के लिए दे दीं। पांच रुपये की मिठाई ली और विश्व-मन्दिर में विवाह पर आने वालों में बांट दी।
पांच रुपये पण्डितजी को दक्षिणा देनी पड़ी। सब दे-दिलाकर फूलांरानी को मिले एक सौ रुपयों में से इक्यावन रुपये बचे थे।
रात जब पति-पत्नी अपने सोने के कमरे में जाने लगे, तो मां ने लड़की की झोली में इक्यावन रुपये डालकर कहा, ‘‘भगवान् इसमें बरकत करेगा।’’
रात को लड़का-लड़की आनन्द से सोये, परन्तु दिन निकलते ही पत्नी ने पूछ लिया, ‘‘सुना है, आपको दस रुपये वेतन मिलता है ?’’
‘‘हां !’’
‘‘इससे निर्वाह कैसे होता होगा ?’’
‘‘यह मां से पूछना। मैंने शिव-मन्दिर में बंटने वाली मिठाई कई वर्ष के बाद खायी है।’’
लड़की विचार करती रही। उसे एक बात स्मरण थी कि उसके पिता के पास कभी रुपये बच जाते, तो वह उन्हें ब्याज पर चढ़ा देता था और उस पर एक पैसा प्रतिदिन हिसाब से ब्याज मिल जाता था।
इस बात को स्मरण कर धनवती ने पति से कहा, ‘‘आपकी मां ने मेरी झोली में इक्यावन रुपये डाले हैं। मेरी राय है कि इन्हें किसी को उधार दे दें, तो इन पर ब्याज मिल जायेगा।’’
‘‘कौन उधार लेगा ?’’
‘‘जिसे रुपयों की आवश्यकता होगी।’’
गोपीचन्द्र ने दुकान पर हुण्डी-पर्चा होते देखा था। लाला भी कभी फ़सल के दिनों में हुण्डी पर बाज़ार से ऋण लेता था और फिर उस पर ब्याज देता था।
परन्तु उसने पूछा, ‘‘इन पचास रुपयों का क्या मिलेगा ?’’
‘‘आप मुझ पर छोड़िये। मैं पिताजी से बात कर इसका प्रबंध करूंगी।’’
और यह काम हो गया। महेश ने अपने एक साथी चपरासी को पचास रुपये ऋण में दिलवा दिये और उसकी बहू के पांच तोले सोने के कड़े गिरवी रखवा दिये। पांच रुपये ब्याज के पहले ही निकालकर लड़की को सोने के कड़ों के साथ दे दिये।
गोपीचन्द्र का यह पहला व्यापार था और उसने देखा कि बहुत अच्छा काम है। उसने सोने के कड़े और पांच रुपये अलमारी में पड़े आभूषणों के साथ रख दिये।
फिर एक दिन धनवती का पिता महेश अपनी लड़की से मिलने आया है और चांदी की एक हसली लड़की के पास गिरवी रखने लगा।
धनवती ने पूछा, ‘‘पिताजी ! यह किसकी है ?’’
‘‘ब्रजलाल की है। वह बीवी की हसली चुराकर लाया था और पांच रुपये मांग रहा था। मेरे पास नहीं थे। तुम्हारे पास तो हैं। तुम्हें पचास रुपये का ब्याज दिलवाया था। वह तुम इसे दे दो।’’
धनवती भीतर गयी और अलमारी से पांच रुपये निकाल लायी। महेश ने ब्रजलाल को दो पैसे महीना प्रति रुपये के ब्याज पर एक महीने के ब्याज के दस पैसे निकालकर दे दिये और हसली के साथ एक काग़ज़ पर ब्रजलाल का नाम लिखकर लड़की से कहा, ‘‘इस कागज़ को इसके साथ बांधकर रख छोड़ो। जब ब्रजलाल रुपये देने आयेगा, तो रुपये लेकर हसली उसे वापस कर देना।’’
ब्रजलाल तो हसली लेने नहीं आया, परन्तु गोपी एक अन्य समाचार लाया। उसने बताया, ‘‘मेरे लाला ने मेरे नाम पर चीनी के एक सौ बोरे ख़रीदे हैं। उनका विचार यह है कि इससे लाभ होगा।’’
‘‘यदि लाभ न हुआ, तो ?’’ धनवती ने पूछ लिया।
‘‘तो....तो...’’ गोपीचन्द्र उत्तर नहीं दे सका।
‘‘मैं परमात्मा से प्रार्थना करूंगी कि लाभ हो।’’ धनवती ने कहा।
‘‘और वह तुम्हारी बात मान लेगा ! नहीं मानेगा, तो क्या करोगी ?’’
‘‘कुछ नहीं।’’
‘‘हां। मैंने एक बार लालाजी से दस रुपये मांगे थे। लाला ने पूछा, ‘‘यदि न दूं, तो क्या करोगे ?’’
‘‘मैंने कहा, कुछ नहीं। मैं क्या कर सकता हूं ? इस पर लालाजी ने कहा, ‘‘तो जाओ, रुपये नहीं मिलेंगे।’’
धनवती ने कहा, ‘‘पर मैंने सुना है कि इसी लाला ने आपके विवाह के लिए आपको एक सौ रुपये दिये थे ?’’
‘‘हां, मैंने एक दिन पूछा था कि उस दिन आप दो रुपये उधार नहीं दे रहे थे और विवाह पर फोकट में एक सौ रुपये दे दिये हैं।’’
‘‘इस पर लालाजी ने कहा था कि तुमने ऋण मांगा था। ऋण तुम लौटा नहीं सकते, मैं जानता हूं, इसलिए नहीं दिये थे, परन्तु विवाह पर सौ रुपये परमात्मा के नाम पर दे दिये हैं। वह लौटा देगा। वह बहुत धनी है। उसे मघवन कहते हैं। उसे दिया हुआ सब वापस मिल जाता है।’’
‘‘तो परमात्मा से मांग लेना चाहिए ?’’ धनवती ने पूछ लिया।
‘‘हां, कहते हैं, वह देता है। यदि नहीं देगा, तो जो कुछ है, वह तो हमारे पास ही रहेगा। इस कारण मांगने में हानि नहीं।’’
और धनवती के विवाह के छह महीने उपरान्त परमात्मा ने दिया। गोपीचन्द्र ने मां और पत्नी को बताया, ‘‘लालाजी ने एक सौ बोरी चीनी मेरे नाम पर ख़रीदी थी। अब चीनी का दाम बढ़ गया है। प्रति बोरी पांच रुपये लाभ हुआ है और लाभ के पांच सौ रुपये लालाजी ने मुझे दिये हैं।’’
धनवती और गोपी की मां आश्चर्य से गोपी का मुंह देखती रह गयीं। फिर मां ने पूछा, ‘‘तो तुमने लालाजी से कुछ कहा ?’’
‘‘कुछ नहीं। केवल उनके चरण स्पर्श कर पायलागूं कह दी है और वह बहुत प्रसन्न हैं। कह रह थे कि इनसे पत्नी के लिए कर्णफूल और चूड़ियां ला दूं।’’
‘‘ठीक है।’’ मां ने कहा।
इस पर पत्नी ने कहा, ‘‘पांच सौ की चूड़ियां नहीं आयेंगी। वह तो, सौ-सवा सौ में चार बन जायेंगी और शेष का क्या करेंगे ?’’
इस पर मां और पुत्र धनवती का मुंह देखने लगे। धनवती ने कहा, ‘‘शेष मुझे दे दीजिये। मैं उनको ब्याज पर चढ़ाऊंगी।’’
अगले दिन गोपीचन्द्र पत्नी के लिए चार चूड़ियां एक सौ बीस रुपये की ले आया और शेष पौने चार सौ रुपये उसने पत्नी को दे दिये। पांच रुपये की वह मिठाई लाया, जो मुहल्ले में तथा संबंधियों में बांटी गयी।

बस, गोपीचन्द्र के धनवान होने का मार्ग खुल गया। इसके पचास वर्ष उपरान्त की यह कथा है।

गोपीचन्द्र अब गोपीशाह कहलाता था। नगर में उसके दस मकान थे, जिनका भाढ़ा साढ़े तीन सौ रुपये महीना आता था। वह रुपया ब्याज पर देने का कारोबार करता था। उसकी तिजोरी में कितना रुपया था और कितने के आभूषण उसके पास गिरवी रखे हुए थे, किसी को पता नहीं था। यह जानकारी केवल गोपीशाह को और उसके छोटे लड़के कृष्ण को ही थी।

गोपीशाह ने अपनी पहली लड़की परमेश्वरी का विवाह रेलवे के स्टेशन मास्टर के साथ किया था। वह घर पर सम्पन्न और सुखी थी। उसके भी दो बच्चे थे। वह नगर के बाहर एक खुले मकान में रहती थी। गोपीशाह की दूसरी लड़की राधा नगर के एक धनी के पुत्र से विवाही गयी थी और वह भी अपने घर में सुखी थी।
गोपीशाह के चार पुत्र थे- उत्तरचन्द, ज्ञानचन्द, रामचन्द और कृष्णचन्द। तीन बड़े पुत्रों के विवाह कर चुके थे और सबसे छोटा कृष्णचन्द अब इक्कीस वर्ष से ऊपर हो चुका था।
कृष्णचन्द एम.ए. में पढ़ता था और अपने पिता के साहूकार के काम में हाथ बंटाता था। इस पर भी वह साधु स्वभाव का हो गया था। एक बार वह एक स्वामी रामकृष्ण के सम्पर्क में आया, तो विचार बना बैठा कि विवाह नहीं करेगा।
कृष्णचन्द के एक सहपाठी मित्र के बड़े भाई थे सुन्दरदास। उनके घर पर ही स्वामी रामकृष्ण से कृष्णचन्द की भेंट हुई थी।
कृष्णचन्द अपने मित्र से मिलने उसके घर निस्बत रोड पर गया हुआ था। उस दिन स्वामीजी वहां आये हुए थे और उनके कई भक्त उनके दर्शनों के लिए वहां आ रहे थे।
कृष्णचन्द भी उनके दर्शन करने उनके कमरे में जा पहुंचा, जहां वह ठहरे हुए थे।
सुन्दरदास ने स्वामीजी को कृष्णचन्द का परिचय दिया- ‘‘यह हैं गोपीशाह के पुत्र कृष्णचन्द। इस समय एम.ए. की परीक्षा देकर परिणाम की प्रतीक्षा में हैं।’’
स्वामीजी ने पूछ लिया, ‘‘पर्चे कैसे किये हैं ?’’
‘‘जी, अपने विचार से बहुत अच्छे किये हैं। प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने की आशा कर रहा हूं।’’
‘‘और तब क्या करोगे ?’’ स्वामीजी का प्रश्न था।
‘‘जो कुछ मुझे करना है, वह तो अब भी कर रहा हूं। पिताजी के कारोबार में सहायता करता हूं।’’
‘‘वह क्या कारोबार करते हैं ?’’
उनके काम के कई रूप हैं। एक काम है साहूकार का। वह रुपया ब्याज पर चढ़ाते हैं। कम्पनियों के हिस्से ख़रीदते तथा बेचते हैं। हुण्डी-पर्चे पर ऋण देते हैं और लोगों की वस्तुएं गिरवी रखकर उस पर भी ऋण देते हैं।
‘‘पर इस प्रकार की आय हराम की होती है।’’ स्वामीजी के मुख से निकल गया।
‘‘हराम की का क्या मतलब है ?’’
‘‘जो उचित न हो, जो बिना परिश्रम के प्राप्त हो।’’
‘‘स्वामीजी ! क्या परिश्रम के बिना आय हराम की होती है।’’
‘‘हां, धन परिश्रम का रूप है। जो बिना परिश्रम के प्राप्त हो, वह पाप है।’’
‘‘तब तो मेरे बड़े भाई उत्तमचन्द बहुत धर्मात्मा हैं।’’ कृष्णचन्द ने मुसकराकर कहा, ‘‘वह रेलवे के दफ़्तर में एक क्लर्क हैं। घर से नौ बजे जाते हैं और सायंकाल आठ बजे वहां से लौटते हैं। जब आते हैं, तो बहुत थके होते हैं। रोटी खाते-खाते ऊंघने लगते हैं।’’
‘‘क्या वेतन मिलता है उनको ?’’
‘‘लगभग चालीस रुपये है।’’
स्वामीजी ने कुछ विचार किया और कहा, ‘‘वेतन तो कम है, परन्तु फिर भी ईमानदार की आय है। ईमानदारी स्वर्ग का द्वार है।’’
‘‘वह कहां है ?’’
‘‘है तो यहीं, पृथ्वी पर, सब स्थानों पर।’’
स्वामीजी से कुछ अधिक बात नहीं हुई, परन्तु कृष्णचन्द के मस्तिष्क में हलचल मच गयी। वह इस बीजरूप बात पर विचार करता रहा। यह बीज अंकुर बना और फिर अंकुर से पौधा बन गया।

जब परीक्षा-फल निकला, तो कृष्णचन्द इतिहास के विषय में प्रान्त-भर में प्रथम रहा। प्रान्त में उन दिनों एक ही विश्वविद्यालय था और एम.ए. तक पढ़ाई कराने वाले दो ही कॉलेज थे। इस वर्ष पांच लड़के परीक्षा में बैठे थे और चार उत्तीर्ण हुए विद्यार्थियों में कृष्णचन्द प्रथम रहा था।

कृष्णचन्द के प्रोफ़ेसर ने उसे राय दी कि वह ट्रेनिंग कॉलेज में भर्ती हो जाये। ट्रेनिंग के बाद उसे किसी अच्छे स्कूल में सेवा-कार्य मिल जायेगा। उन दिनों प्रान्त में चालीस के लगभग हाई स्कूल थे। पंज़ाब के प्रत्येक जिले में एक-एक सरकारी स्कूल तो था ही, साथ ही कुछ प्राइवेट स्कूल और इस्लामिया स्कूल भी थे। लाहौर में चार स्कूल थे।
इस कारण प्रोफ़ेसर साहब की राय कृष्णचन्द को पसन्द आ गयी। वह सेवा-कार्य करने के लिए अपने मन को तैयार करने लगा।
परीक्षा-फल के जानने में रुचि कृष्णचन्द के सबसे बड़े भाई उत्तमचन्द की थी। वह स्वयं दसवीं श्रेणी की परीक्षा उत्तीर्ण कर रेलवे के दफ़्तर में नौकरी पा गया था।
अत: परीक्षा-फल घोषित होने के दिन उत्तमचन्द ने कृष्णचन्द से पूछ लिया, ‘‘सुना है, तुम पास हो गये हो ?’’
‘‘जी ! किससे सुना है ?’’
‘‘मां से।’’
‘‘हां, मैंने पिताजी से कहा था कि आज सब का मुंह मीठा करायें; क्योंकि मैं एम. ए. की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया हूं। इस पर पिता ने मुझे चार आने दिये और कहा जाओ ‘‘लाला भइया’ की दुकान से गुड़ के सेम ले आओ। मैं लाया था और सबको बांटने के लिए मैंने मां को दिये थे।’’
‘‘हां, मां ने ही रोटी खाते हुए दिये हैं और बताया है कि तुम एम.ए. में पास हो गये हो।’’

उत्तमचन्द इस समय बात करता हुआ नींद अनुभव कर रहा था। इसलिए वह अपने कमरे में जाकर सो गया।

गोपीशाह की एक बड़ी-सी हवेली थी। उसमें दस कमरे थे। रसोईघर, खाना खाने का कमरा और बैठक सब पृथक्-पृथक् थे। चारों भाईयों को सोने के कमरे मिले हुए थे। मकान के नीचे एक तहख़ाना था। उसमें घर की सम्पत्ति रहती थी। तहख़ाने की चाबी पिता अथवा कृष्णचन्द के पास ही रहती थी। कभी मां धनवती को अपने तथा बहुओं के आभूषण रखने अथवा निकालने होते थे, तो कृष्णचन्द को कहती और वह तहख़ाने का दरवाज़ा खोलकर मां को वहां ले जाता था और फिर काम हो जाने पर मां को बाहर कर तहख़ाने को ताला लगा दिया करता था।
आज, भोजन के उपरान्त कृष्ण पिता के सोने के कमरे में आया, तो उत्तमचन्द के अतिरिक्त दोनों भाई, ज्ञानचन्द और रामचन्द तथा उनकी पत्नियां और मां वहां पहले से ही बैठी हुई थीं। कृष्णचन्द की छोटी बहिन राधा भी मां के घर आयी हुई थी। वह भी वहां बैठी थी।
सबको बैठा देख कृष्णचन्द विचार कर रहा था कि उसकी पढ़ाई समाप्त होने पर खाये सेम की चर्चा करने वहां बैठे हैं। इस विषय में वह कुछ कहना चाहता था। अत: उसने वहां कमरे में बैठते ही कहा, ‘‘पिताजी ! सेम बहुत मीठे थे, परन्तु आजकल लोग मोतीचूर के लड्डू तथा गुलभिस्त खाने की इच्छा करते हैं।’’
गोपीशाह ने कहा, ‘‘लोग तो बहुत कुछ इच्छा करने लगे हैं और देखो, राधा भी एक इच्छा करती हुई आयी है।’’
‘‘राधा बहिन ! क्या इच्छा कर रही हो ?’’
‘‘भैया ! तुम्हारे पास होने की खुशी में तो सेम ही से प्रसन्न हूं, परन्तु तुम्हारे विवाह पर तो बालूशाही खाऊंगी।’’
‘‘विवाह के पहले अथवा पीछे ?’’ कृष्ण ने पूछ लिया।
‘‘विवाह के पहले।’’
‘‘दादा उत्तमचन्द के विवाह पर क्या खाया था ?’’ कृष्ण ने पूछ लिया।
राधा ने कहा, ‘‘विवाह के समय मैं दूसरी श्रेणी में पढ़ती थी। दादा दसवीं श्रेणी थर्ड डिवीज़न में पास कर सके थे। उस समय मैं छह वर्ष की थी। मुझे अब याद नहीं, क्या खाया था। इतना याद है कि दादा की बरात के आगे-आगे आतिशबाज़ी खूब चली थी।’’
‘‘पर बहिन ! मैं अभी विवाह नहीं करूंगा ?’’
पिता ने पूछ लिया, ‘‘क्यों ?’’
‘‘मैं पहले कुछ काम-धन्धा कर लूं, तब विवाह की सोचूंगा।’’
‘‘वह तो तुम कर रही हो।’’
‘‘क्या करता हूं ?’’
‘‘साहूकारे के काम में मेरी सहायता करते हो।’’
‘‘यह भी कोई काम है ?’’
‘‘कितने घण्टे नित्य काम करना पड़ता है ?’’
अब कृष्ण मन में विचार करने लगा। कॉलेज की पढ़ाई के दिनों में भी वह तीन घण्टे नित्य काम करता था और अब परीक्षा के उपरान्त उसे बैंक तथा अन्य कहीं पर भी जाना पड़ता था और परीक्षा के उपरान्त उसे बैंक तथा अन्य कहीं पर भी जाना पड़ता था, तो लगभग चार-पाँच घण्टे लग ही जाते थे। कृष्ण ने बताया, ‘‘पिताजी ! यह तो एक क्लर्क तथा चपरासी का काम है। मैं प्रोफ़ेसर अथवा मास्टर बनूंगा।’’
‘‘उसमें कितने घण्टे नित्य काम करना पड़ेगा ?’’
‘‘यदि मास्टर बना, तो पांच घंटे नित्य और कहीं प्रोफ़ेसर बन गया, तो तीन घण्टे नित्य।’’
‘‘और वेतन क्या मिलेगा ?’’ पिता का प्रश्न था।
‘‘मास्टर बना, तो साठ रुपये महीना और प्रोफ़ेसर बना, तो सवा सौ रुपये महीना।’’
‘‘और यहां जानते हो, तुम्हारा कितना वेतन है ?’’
‘‘कितना है ?’’
‘‘पांच सौ रुपये महीना।’’
कृष्णचन्द्र ने कोट की जेब उलटकर दिखा दी और कहा, ‘‘इसमें तो एक फूटा पैसा भी नहीं ?’’
‘‘क्या जेब में रखने पर ही वेतन का पता चलता है।’’
‘‘पिताजी ! और किस प्रकार पता चलता है ?’’
‘‘तिजोरी में जमा होने पर। कभी बड़े भाई उत्तम से पूछा है कि उसकी तिजोरी में जमा है ?



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