डब्बेवाले - श्रीनिवास पंडित Dabbewale - Hindi book by - Shrinivas Pandit
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डब्बेवाले

श्रीनिवास पंडित

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :110
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5643
आईएसबीएन :81-288-1570-9

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एक स्थायी व्यावसायिक सफलता की कहानी।

Dabbewale

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

व्यवसाय नाटकीय उतार-चढ़ावों से गुजरते हैं। कुछ बच जाते हैं तो कुछ औंधे मुंह गिरते हैं। कार्पोरेट प्रमुख इसी उलझन में जकड़े हुए हैं व संगठन को लंबे समय तक बनाए रखने वाले मॉडल की तलाश में हैं।
‘डब्बेवाले’, मुंबई के, घर का पका भोजन पहुंचाने वालों की यह कहानी एक मिसाल के रूप में सामने हैं। एक 115 वर्षीय पुराना उद्यम, जिसे कम पढ़े-लिखे लोगों के दल द्वारा चलाया जाता है; उसने इस बदलाव के दौरान भी अपने-आपको कायम रखते हुए रोल-मॉडल प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक चार पात्रों के संवादों के माध्यम से सफल संगठनों की विशेषताओं; जैसे-मूल्यों, विकेंद्रित निर्णय-निर्धारण, उचित ग्राहक-सेवा आदि को सामने लाती है।
इसके अलावा पुस्तक में नेताओं व प्रबंधकों के लिए ग्रहण करने योग्य तथ्य भी दिए गए हैं, जो मूल्यों पर आधारित स्थायी सफलता पाने में सहायक होंगे।

एक स्थायी व्यावसायिक
सफलता की कहानी


मैं आपको एक व्यावसायिक सफलता की कहानी की तलाश के बारे में बताने को उत्सुक हूँ। क्योंकि मैंने इस दीर्घकालीन सफलता के बीच गहरे मूल्यों की जानकारी को जाना है। यहां मैं वही कीमती जानकारी आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे पढ़कर आप इस व्यवसाय की सफलता का आनंद ले सकेंगे।
जो संगठन दिमाग चकरा देने वाले बदलाव के पहलुओं का सामना कर रहा हो, उसके कार्यकर्त्ताओं के रचनात्मक प्रयास सफलता की कहानी के सच्चे पात्र बनते हैं।
हम सभी जानते हैं कि बदलाव की सबसे बड़ी वजह अशांति है। हम स्वयं में ही इसकी झलक पाते हैं। यह हमें अपनी समय सीमा में कार्य समाप्त करने व क्षमता बढ़ाने को विवश करता है। दुर्भाग्यवश ऐसी तेज गतिविधियाँ हमारे जीवन पर बुरा प्रभाव डालती हैं। जिसके परिणाम स्वरूप दिन-रात काम करने का यह मानसिक तनाव चैन से जीने नहीं देता।
बदलाव की यह प्रक्रिया विस्मयकारी है। हमारी सीमाएँ हमें ताकती हैं। मेरे विचार में, हमारी बदलाव पर काबू पाने की क्षमता सीमित है। एक आम आदमी के नजरिए से सवाल पैदा होता है—हममें से सफल लोग, किस प्रकार, इस बदलाव की प्रक्रिया में भी, स्थिर व संतुलित रहते हुए, परिवार के लिए जीविका कमा पाते हैं ?
इससे मुझे लाओत्से की प्रसिद्ध उक्ति याद आती है—‘‘निरंतरता की पहचान से ही निष्पक्ष नजरिया पैदा होता है।’’ इसका अर्थ है कि हमें बदलाव की इस उलझी हुई पहेली में निरंतर ‘स्थिरता’ को पहचानना चाहिए। ‘स्थिरता’ व ‘अस्थिरता’ में भेद करने के लिए हमें उन व्यवसायों व उनसे जुड़े लोगों का, जिन्होंने प्रतिवर्ष-स्थायी सफलता अर्जित की है, का अध्ययन करना आवश्यक है।
मैंने ‘थौट लीडरस’ व ‘एगजै़मप्लरी सीओज़’ के लिए समकालीन व्यावसायिक नेताओं का अपने मूल्यों के प्रति वचनबद्धता का अध्ययन किया है। अपने मूल्यों के प्रति वचनबद्धता ही उनके व्यवसाय का स्थिर तत्त्व था। उन्होंने अपने मूल्यों में स्थिर रहते हुए, अपने हुनर के अभ्यास द्वारा कीर्तिमान स्थापित किए व दूसरों को दोषी ठहराने के खेल का हिस्सा नहीं बने। ठीक इसी तरह खिलाड़ी, संत, कलाकार, संगीतकार, लेखक, मीडिया एंकर, धावक, कार्टूनिस्ट व कॉमेडियन आदि

अपने-अपने चुने गए क्षेत्रों में कड़ी मेहनत से घंटों अभ्यास करते हैं ताकि संपूर्ण योग्यता का प्रदर्शन सफलतापूर्वक कर सकें। किसी भी तरह की उपलब्धियों से जुड़े व्यक्ति अपने क्षेत्र में विशेष नए कीर्तिमान स्थापित करने की चाह में अपने हुनर व मानसिकता की धार को पैना करते रहते हैं। जब मैं सेमिनार व कांफ्रेसों में वर्गीज़ कुरीयन, सचिन तेंदुल्कर, नारायणमूर्ति, किरन मजूमदार-शॉ, अमृता पटेल, अनु आगा,, रघुनाथ माशेलकर, व डॉ. अब्दुल कलाम जैसे व्यक्तित्वों की कहानी सुनाता हूँ तो जबरदस्त प्रक्रिया सामने आती है।
लोग मुझे बताते हैं कि इन प्रेरक कहानियों के बल पर उनके जीवन में कैसे-कैसे बदलाव आए। वे ऐसे रोल-मॉडलों व उनकी सफलता की कहानियों को बड़ी ललक से पढ़ते हैं।
यह 115 साल पुराने व्यवसाय की कहानी है, जिसे 5000 कम पढ़े-लिखे लोग मिलकर चलाते हैं। यहाँ मेरे सहित चार पात्रों के संवादों द्वारा कहानी प्रस्तुत की गई है। रघुनाथ मेगड़े (रघु) (48), व गंगाराम तालेकर (गंगा) (55), मुंबई के टिफिन बॉक्स कोरियर यानि डिब्बेवाले हैं। रघु कला स्नातक है जबकि गंगा आठवीं पास है। वे गांव के सीधे-साधे कृषि समुदाय में पले-बढ़े उन्होंने स्थानीय मराठी भाषा में अपनी पढ़ाई की।

हालांकि वे ‘मराठी युक्त अंग्रेजी’ में अपने भाव आसानी से प्रकट कर देते हैं। वे बड़े जोश से अपनी कहानियाँ सुनाते हैं। फिर भी वे गप्पी नहीं हैं। जैसा कि रघु ने मुझे बताया—‘‘अंग्रेजी भाषी लोगों से मिलने के कारण हमारी बातचीत की कला में निखार आया।’’ रघु का स्वभाव थोड़ा शुष्क है जबकि गंगा का स्वभाव मस्त है।

मैं डब्बेवालों की धीमी सांस्कृतिक पर्यावरण को अच्छी तरह जानता हूँ अतः यह निरीक्षण वास्तव में काफी अद्भुत रहा कि वे किस तरह घनी आबादी वाले मुंबई की सड़कों के व्यस्त घंटों में डिब्बे ले जाते हैं।

महानगरी मुंबई के रंग-बिरंगी पोशाकों में सजे स्त्री-पुरुष व बच्चों के बीच इनकी धुंधली सफेद कमीज़, पजामा व स्काउट की तरह पहनी गई टोपी, बिल्कुल विपरीत दिखाई देती है। आप डिब्बेवालों को लगातार गाड़ियों, बसों, कारों, वैनों, ट्रकों, ऑटों, साइकिलों, ठेलों, पदयात्रियों व बर्फ लाने वाले ठेलों की मैराथन में सबसे आगे दौड़ता पाएँगे। जहाँ सारा दिन लापरवाही से सड़क क्रॉसिंग, ओवरटेकिंग, गति सीमा, भोंपू का स्वर इत्यादि कार्य ही होते रहते हैं।

यह भी एक पहेली है कि वे पिछले 115 वर्षों से किस तरह रोज-दर-रोज, सप्ताह-दर-सप्ताह, माह-दर-माह, साल-दर-साल, सारे मौसमों में अपने डिब्बों को सही समय पर पहुँचाने के लिए, अपने ठेलों को सड़क पर भगाते आ रहे हैं।
अनीता दलाल (अनीता) (40), मुंबई की एक पत्रकार तथा जानी-मानी व्यावसायिक सलाहकार हैं। पेशे के तौर पर एक व्यवसाय गृह व बहुराष्ट्रीय परामर्श संगठन में काम करने के बाद अनीता, भारत के विभिन्न हिस्सों में चल रही सामाजिक इंजीनियरिंग के नए प्रयोगों में रुचि लेने लगी।
अनीता की शैक्षिक पृष्ठभूमि काफी अच्छी है। मुंबई विश्वविद्यालय से कॉमर्स में प्रथम श्रेणी लेने के बाद उसने यू. एस. की साइराकस यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की स्नातकोत्तर डिग्री ली।

अनीता के यू.एस. संपर्क से ही भारत के सेवा क्षेत्रों से जुड़े सामाजिक व नए व्यावसायिक अवसरों की तलाश का प्रस्ताव आया। अलग-अलग विचारों के नमूने छांटते समय, उसकी तलाश उसे गंगा व रघु तक ले गई।
अनीता (अ), रघु (र) गंगा (ग) व स्वयं (श्री) की बातचीत आपको एक ऐसे साधारण व्यावसायिक नमूने के बारे में बताएगी, जो एशिया की 11 करोड़ आवादी वाली विशालतम महानगरी में शून्य वास्तविकता के आधार पर काम करता है। संवाद भी बुद्धिमत्ता व तर्क से भरपूर हैं।

इस गहरी खोजबीन के दौरान, अनीता बदलाव के इस प्रबंधन में एक नया नजरिया विकसित करती है। उसे एहसास होता कि तेजी से बढ़ती कीमतों के बीच सामाजिक रूप से महत्त्वपूर्ण व्यवसाय कैसे फलते-फूलते हैं।
आपको यह देखकर हैरानी होगी कि किस तरह एक समाज के मूल्यों में गुंथी रचनात्मकता, बुद्धिमत्ता व मार्ग दर्शन हमारे दैनिक जीवन के कार्यरूप में बदलते हैं।
रघु व गंगा ने अंग्रेजी व मराठी में जो कुछ भी कहा, मैंने उसका अंग्रेजी में अनुवाद किया। यह कहानी पढ़कर आपको आश्चर्य होगा कि किस तरह डब्बेवाले, इस प्रतियोगी दुनिया में अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं। उनके समूह ग्राहकों को सही समय पर, घर का बना भोजन पाने की संतुष्टि देता है।
पिछले एक दशक से वफादार व भरोसेमंद सेवा को दर्शकों ने भी जबरदस्त पहचान दी है। कई ऐसे मामले भी हैं, जहाँ पिछली तीन पीढ़ियाँ यही काम करती आ रही हैं। यह रिपीट आर्डर बिजनेस है जो सही समय पर माल की डिलीवरी उदाहरणीय सर्विस रिकॉर्ड पर आधारित है। डिब्बेवालों के प्रदर्शन से पता चलता है कि उन्होंने अपने अशिक्षित माता-पिता, परिवारों, आध्यात्मिक परंपराओं व स्थानीय नैतिक मूल्यों से जीने की कला सीखी है।

इस कहानी से हमें सीख मिलती हैं कि हम सब इस रूपांतरण में अपने साथ ही दौड़ रहे हैं। शक्तिशाली प्राचीन मूल्य, ठोस आधुनिक व्यवसाय का पोषण कर सकते हैं, ऐसे उपक्रम, आम ग्राहकों व माल पहुँचाने वालों की जरूरतों व मार्गों पर खरे उतरते हैं।
यह जीवंत संवाद परंपरा व आधुनिकता, मनुष्य व मशीन, पर्यावरण व तकनीक तथा उपयोग व उपभोक्तावाद के शाश्वत संघर्षों पर रोशनी डालते हैं। पाने व संतुष्ट होने की लड़ाई लगातार जारी है। डिब्बेवालों ने अपने मूल्यों में ही छिपा जीवन अमृत पा लिया है। उपलब्धि, महत्ता, धरोहर व प्रसन्नता का संगम ही उन्हें कामकाजी जीवन का संतुलन देता है।

आशा करता हूँ कि आपको इस पुस्तक को पढ़ने में आनंद आएगा। आप अपनी शारीरिक व मानसिक निपुणता को निखार कर, तकनीक बदलावों का सामना कर पाएँगे। आपको याद रखना होगा कि आप बदलाव की गति के साथ दौड़ नहीं लगा रहे। अगर आप अपने मूल्यों के साथ, बदलते समय के साथ चलेंगे तो पूर्ण संतुष्टि पाएँगे।
श्रीनिवास पंडित

आभार

मैं धन्यवाद देता हूँ :
नूतन मुंबई टिफिन बॉक्स सप्लायर्स चैरिटी ट्रस्ट के अध्यक्ष रघुनाथ मेगड़े व जनरल सैक्रेटरी गंगाराम तलेकर को सामग्री जुटाने व अपने अनुभव, हमसे बाँटने के लिए, वही अनुभव इस पुस्तक की विषय सामग्री बनी। उनकी मुस्कराहटों ने मेरी कल्पनाशीलता को उभारा, जिससे मैं उनके गहरे मूल्यों से युक्त जीवन व कार्य की विनोदपूर्ण प्रकृति को प्रस्तुत करने में समर्थ हुआ हूँ।
जयंत खेर, शरू रांगनेकर व परिमल चौधरी को पुस्तक के ड्राफ्ट में अपनी अमूल्य सलाह देने के लिए। इससे मुझे आवश्यक बदलाव लाने में मदद मिली।
चांदनी पलशेतकर को पुस्तक की सॉफ्ट कॉपी के संपादन के लिए उन सब मित्रों को, जिनके नाम अनजाने में मुझसे छूट गए हैं।

डब्बेवाले

अध्याय-1

अनीता और मैं दक्षिणी मुंबई के ताजमहल होटल में मिले, जहाँ हम ‘नेतृत्व विकास’ के एक सेमिनार में हिस्सा लेने गए थे। हम दोनों कुछ सांझे मित्र थे और उसने मेरी पुस्तकें थौट लीडरस, एगज़ैमप्लरी सीओज़ व डिजाइन योर कैरियर भी पढ़ी हुई थीं।
सेमिनार समाप्त होने पर हम समुद्री लाउंज की ओर चले गए जहाँ से भारत के आलीशान गेटवे ऑफ इंडिया का मनोरम दृश्य दिखाई दे रहा था। पर्यटकों को एलीफैंटा गुफाओं की ओर ले जातीं छोटी फैरियां (नौकाएं), चित्रित आकाश की ओझल होती सूर्य-किरणों में अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रही थीं।
अनीता ने काव्यात्मक शैली में इस वातावरण का वर्णन किया। उसके पास विद्वतापूर्ण नजरिया है, जो उसे उत्सुकतापूर्वक अच्छी बातें बाँटने की प्रेरणा देता है। इसी बातचीत के दौरान उसने रघु व गंगा से हुई भेंट के बारे में बताया।
अ. क्या आप इन डब्बेवालों व उनके अविश्वसनीय डिलीवरी रिकॉर्ड के बारे में जानते हैं ?
श्री. हाँ, मैं जानता हूँ।
अ. यह अर्धशिक्षित 5000 डब्बेवाले, 60 कि.मी. के दायरे में, 2,00,000 लोगों को, केवल 3 घंटे के भीतर घर का पका भोजन पहुँचाते हैं। हर रोज 4,00,000 बार लेन-देन होता है। कार्यस्थल व आवासीय क्षेत्र किसी बिखरे हुए चित्र की तरह फैले हुए हैं। सचमुच एक अद्भुत कहानी है।
श्री. इसमें कोई शक नहीं है।
अ. 16 मिलियन लेन-देन में मूल दर 1% है। यह एक अविश्वसनीय समय प्रबंध है। मुंबई तेजी से अपने पाँव फैलाती जा रही है। इस समय इसकी जनसंख्या 10.3 मिलियन के करीब है। फास्ट-फूड, रेस्त्रां व पटरी पर खाने-पीने का सामान बेचने वाले खोमचे भी चारों ओर फैले हुए हैं। फिर भी नूतन मुंबई टिफिन बाक्स सप्लायर्स एसोसिएशन धीरे-धीरे तरक्की कर रहा है।
श्री. तुम्हारे हिसाब से इसकी खास वजह क्या है ?
अ. घर का बना भोजन पाने की इच्छा। अगर उचित कीमत पर घर से ऑफिस तक टिफिन पहुँच जाए। अब भी ज्यादातर लोग घर के बने भोजन को ही प्राथमिकता देते हैं। दूरी, वजन या स्थान जैसी बातों को ध्यान में न रखते हुए, एक डब्बावाला ग्राहक से प्रतिमाह 200 रुपए (या 4.6 डालर) लेता है। इसके बदले में वह अपने 25-30 ग्राहकों से 5000-6000 रु. (तकरीबन 116-140 डालर) कमा लेता है। दूसरे देशों में लोगों के पास ऐसी सुविधा नहीं है। लेकिन आप किसी से भी पूछें, खासतौर पर कहीं के भी निम्न आय-वर्गीय लोग, घर का बना भोजन ही लेना पसंद करेंगे। यह इच्छा इतनी बुनियादी है कि इसमें बदलाव आ ही नहीं सकता। बाहरी भोजन की उपलब्धता व आकर्षण के बावजूद घर का पका भोजन सदैव सराहा जाता रहेगा।
श्री. तुम इस बारे में कैसे जानती हो ?
अ. हाल ही में रघु और गंगा ने जैविक भोजन पर काम कर रहे टैरा मैड्रे फाउंडेशन द्वारा आयोजित ग्लोबल कांफ्रेंस में हिस्सा लिया, जो कि इटली के ‘तुरीन’ में हुई थी। 150 देशों के शोध वैज्ञानिकों व रसोइयों ने इसमें भाग लिया। प्रत्येक व्यक्ति यही जानने को उत्सुक था कि डब्बेवाले वर्षों से घर का पका भोजन इतनी कुशलता से समय पर कैसे पहुँचा रहे हैं। रघु व गंगा नें उन्हें इस बारे में बता कर चकित कर दिया।
श्री. और क्या ?
अ. इतालवी सरकार को न केवल अपने पारंपरिक भोजन व कृषि पर गर्व है बल्कि वह ऐसे मुद्दों पर पूरा ध्यान भी देती है। उन्होंने तय किया है कि वे फसलें उगाने के लिए रासायनिक उर्वर्कों व बीजों का इस्तेमाल नहीं करेंगे।
श्री. रघु व गंगा ने काँफेंस में भाग लेने आए प्रतिनिधियों से क्या सीखा ?


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