प्यास को पहचानो - महाराजी Pyas Ko Pahchano - Hindi book by - Maharaji
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प्यास को पहचानो

महाराजी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :127
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5650
आईएसबीएन :81-288-1668-1

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अपने अन्दर की प्यास को कैसे बुझाएं...

Pyas Ko Pahchano

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अगर हमारे अंदर प्यास है, अपने जीवन को सफल करना चाहते हैं तो उस प्यास को पहचानना जरूरी है। प्यास नहीं है तो क्या बचेगा ? यही जीवन है, दोबारा नहीं मिलेगा, जो कुछ करना है, अब कर लो। यही समय है।

हमारे चिंतन और चेतना के प्रतीक

दुनिया में मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो सोचता भी है और अपनी सोच को अभिव्यक्त भी करता है। प्रकृति ने विश्व-रचना के समय मनुष्य को यह श्रेष्ठता क्यों दी, विचारणीय है। सोच और अभिव्यक्ति, इन प्रक्रियाओं के ही कारण मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है और वह विश्व-नियंता बन गया है
चिंतन ने जहाँ स्वस्थ और सक्रिय भूमिका निभाई है, वहीं उसने व्यक्ति को भ्रम में भी डाल दिया है—न जाने कब, कौन-सी छोटी बात है जो बड़ी हो जाए और परिणामों की भूमिका में महत्त्व पा ले। उससे एक बात और हुई है कि चिंतन ने मनुष्य को खोजने की प्रक्रिया में डाल दिया है। चिंतन की चेतना जितनी बलवती होगी परिणाम उतने ही गहरे होंगे। इससे प्रतिद्वंद्वता को जन्म मिलता है और इस विशेषण ने आगे के सारे रास्ते खोल दिए हैं अथवा अवरुद्ध किए हैं। चिंतन बहुआयामी है।

पिछली तीन पुस्तकों में पाठकों को प्रेम रावत अथवा महाराजी के विचार पढ़ने को मिले हैं। उन विचारों को यदि विश्व चिंतनधारा पर रखकर देखा जाए तो वे अलग और स्पष्ट खड़े दिखायी देंगे। वे पाठकों को अपनी पहचान बनाने में एक बड़ी भूमिका प्रस्तुत करते हैं। इस कृति में सत्य ज्ञान, प्रेम, भक्ति आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर महाराजी की अपनी दृष्टि है। अपने को स्पष्ट करते हुए उन्होंने एक उद्धरण प्रस्तुत किया है :

ज्ञान बिना नर सोहहिं ऐसे।
लवण बिना भव व्यंजन जैसे।।

ज्ञान अंततः प्रेम को जन्म देता है और प्रेम के बिना जीवन अर्थहीन लगने लगता है। इसी का परिणाम है कि ज्ञान और प्रेम की बात करते ही विचार सामने आता है कि इसका मूल तंत्र कहां है। स्पष्ट है, यह तंत्र मंदिर है जो आस्था और विश्वास का परिचायक है। यह मंदिर बाहर खोजना व्यर्थ है, वह हमारे भीतर है। आवश्यकता उसको पहचानने की है। प्रेम का रास्ता कई मार्ग संकेतों की मांग करता है और महाराजी ने मजबूत संकेत देकर पाठकों तथा श्रोताओं को इसे सहज ही पाने का रास्ता सामने रख दिया है।
यह सहज रास्ता सत्य का है। सही पहचान आस्था से होती है और आस्था सत्य के बिना मजबूत नहीं हो सकती। बहुत पहले मैंने पढ़ा था एक महापुरुष का जीवन और उससे सारी कठिनाइयां अपने आप दूर हो गयी थीं—मस्तिष्क साफ और खुला हो तो कठिनाई कहां से आएगी :

सूनी सूखी दीवार में
झांककर देखा मैंने
शून्य का घेरा था,
भीतर प्रवेश किया वहीं
देखा मैंने जागृत था
जीवन का मूल तत्त्व
नहीं वहां किसी का डर था।

प्रस्तुत पुस्तक में अन्य कृतियों की तरह अनेक प्रसंग मिलेंगे, नए तथ्य मिलेंगे और सोच के द्वार खुल जाएंगे। एक बार सोच के द्वार खुल गए तो उससे बड़ी उपलब्धि नहीं हो सकती है। विद्वान, वक्ता और चिंतक प्रेम रावत उन द्वारों को खोलने में कुशल हैं और सिद्धहस्त भी। यही कारण है कि एक बार जो उनसे मिला और जिसने समझने की कोशिश की वह फिर उनसे दूर नहीं भाग सकता। उनका हर शब्द एक साहित्य होता है
और बार-बार पास आने तथा समझने के लिए प्रेरित करता है। अन्य कृतियों की तरह उनकी यह कृति भी पाठकों के लिए ज्ञान सम्पदा होगी और समझने—सोचने के लिए बाध्य करेगी। यही तो सिद्धि है। सिद्धि हर आदमी को नहीं मिलती। वह उसी को मिलती है जो खुले हृदय से जाता है और उतने ही खुले हृदय से पैठ करता है। वह लुटेरा है और हमारे सदचिंतन को लुटेरा ही तो चाहिए। तो आइए, महाराजी के गम्भीर विचारों में प्रवेश कर हम जितना लूट सकते हैं, लूटने की कोशिश करें और जीवन को धन्य बनाएं।

राजेन्द्र अवस्थी
लेखक, सम्पादक व दार्शनिक

भड़े भाग मानुष तनु पावा


इस जीवन में कुछ ऐसे मौके होते हैं कि जितना भी प्रयत्न किया जाए, वे दोबारा नहीं आते। एक तो यह जीवन ऐसा है कि दोबारा मिलना बहुत मुश्किल है। यह जीवन, यह समय बार-बार नहीं आता। कई लोग समझते हैं या समझाने की कोशिश करते हैं कि हो सकता है कि दोबारा मिले परंतु यह जीवन, यह घड़ी, यह समय मनुष्य को बार-बार नहीं मिलेगा। इसीलिए कहा, ‘‘बड़े भाग मानुष तनु पावा।’’
यह बड़े भाग्य से मिला है। इस समय जो हमको सत्संग सुनने का मौका मिला है हृदय को जो आनंद आ रहा है, वह भी बार-बार नहीं मिलता। ऐसा समय, ऐसी घड़ी जिसमें मनुष्य अपने आपको ऐसी जगह ले आए, जहाँ सत्य की चर्चा हो, बड़ी दुर्लभ है।
लोग बड़ी-बड़ी मीटिंगों में इकट्ठा होते हैं। इस संसार में पता नहीं किस–किस चीज की चर्चा होती है पर सत्य की चर्चा बड़ी दुर्लभ है मार्ग बताने वाले लोगों की कमी नहीं है, जो कहते हैं कि इस रास्ते पर चलना चाहिए, इस दिशा में जाना चाहिए। यह करना चाहिए, वह करना चाहिए, वहां ढूंढ़ना चाहिए, परंतु वह चर्चा कि तुम्हारे अंदर, हर एक मनुष्य के अंदर वह चीज विराजमान है जो सत्य है, उसके बारे में, उस आनंद के बारे में, उस असली सच्चिदानंद के बारे में कुछ कहना, कुछ सुनना हृदय को तसल्ली देता है,
 हृदय में आनंद पैदा करता है। मनुष्य अपनी जिंदगी के अंदर इतना उलझ जाता है। एक भजन भी है, जिसमें कहा है कि मकड़ी ही अपना जाला बनाती है और स्वयं अपने जाले में ही फंस जाती है। उसका ही बनाया हुआ जाल उसी को पकड़ लेता है। जितना वह उसमें से निकलने की कोशिश करती है, वह उतना ही ज्यादा उसमें फंसती चली जाती है।
मनुष्य के साथ भी यही बात है। वह सुख पाने की जितनी भी कोशिश करता है, उतना ही वह जाल में फंसता चला जाता है। सोचने की बात है कि मनुष्य को सुख क्यों चाहिए ? मनुष्य को आनंद क्यों चाहिए ? क्या यह बात किसी ने हमको सिखाई है ? किसी ने हमको बताई है ? या यह बात हम सुख और सच्चे आनंद की तलाश करें और सच्चे आनंद तक पहुंचें, क्या यह बात हम सबके हृदय में पहले से नहीं है ?
एक छोटा बच्चा, जिसको भाषा का ज्ञान नहीं है, जिसको शब्दों का ज्ञान नहीं, जिसको यह नहीं मालूम की रात क्या है, दिन क्या है, वह रोता है। जब उस बच्चे को किसी चीज की जरूरत होती है तो वह रोता है। जब वह जरूरत पूरी हो जाती है तो शांत हो जाता है। शांत होना हमारी प्रकृति है। शांत होना हमारा स्वभाव है।
 जब कोई चीज पूरी नहीं हो रही है या कोई चीज तकलीफ़ दे रही है, तब रोना भी हमारा स्वभाव है। परंतु जैसे ही वह चीज पूरी हो जाती है, फिर मनुष्य शांत हो जाता है। जैसे बड़ा तालाब हो, हवा बहे। हवा बहने के कारण उस तालाब में लहरें आने लगती हैं। हवा जितनी तेज बहती है, उतनी ही लहरें बड़ी-बड़ी होती चली जाती हैं। परंतु जब वह रुक जाती है तो फिर तालाब शांत हो जाता है। शांत हो जाना हमारा स्वभाव है। इससे हम बच नहीं सकते। हम इस स्वभाव को बदलने की कोशिश करें, तो भी यह संभव नहीं है।

जब हृदय की तृप्ति हो जाती है, तब मनुष्य भी शांत हो जाता है और जब किसी चीज का अभाव अंदर महसूस होता है तो मनुष्य अशांत रहता है। यह समझो कि अपनी जिंदगी के अंदर जब तक वह उस अभाव को पूरा नहीं कर लेता, तब तक वह शांत नहीं हो सकता।

यह असत्य है कि चेतना होते हुए भी मनुष्य अचेत नहीं रह सकता। जागते हुए भी सोया रहे, यह सम्भव नहीं है। जीते हुए भी मरा हुआ हो, संभव नहीं है। चेतना है तो हम अचेत नहीं रह सकते। सत्य और असत्य के बीच में जो लाइन है, जो जगह है, वह बहुत पतली है। जब मनुष्य अपने को छोड़कर बाहर की तरफ सत्य की खोज करना शुरू करेगा तो उसको कभी सत्य नहीं मिल सकता है। मैं एक उदाहरण देता हूं। मेरी घड़ी मेरी कलाई पर बंधी है। मैं इस घड़ी में समय देखना चाहता हूँ तो मुझे घड़ी को देखना पड़ेगा। अगर इस घड़ी को मैं कुर्सी के नीचे खोजूं या जेब में खोजूं तो क्या वह कभी मिलेगी ? चाहे कितना भी दृढ़ विश्वास हो, यह संभव नहीं है  !
एक मजेदार उदाहरण है। एक बार एक औरत ने अपने लड़के से कहा, ‘‘तू ये दस पैसे ले और दस पैसे का तेल ले आ।’’ उसको गिलास दिया। गिलास के नीचे कन्नी थी। लड़का मंदबुद्धि का था। वह तेली के पास गया। तेली को दस पैसे दिए और कहा, ‘‘दस पैसे का तेल इस गिलास में डाल देना।’’ दस पैसे का तेल उसने नापा और गिलास में डाल दिया। अब वह लड़के से बोलता है, ‘‘जो तुमने दस पैसे का तेल खरीदा, ये पूरा गिलास भर गया, अभी इतना तेल और है, इसको कहां रखूं, कहां डालूं ? कैसे ले जाएगा ?’’
लड़के को मालूम था कि गिलास के नीचे कन्नी है। उसने गिलास को उलटा किया और कहा, ‘‘यहां डाल दे !’’ तेली ने वहां डाल दिया। अब वह गिलास को उल्टा किए हुए बड़े गर्व के साथ अपनी मां के पास गया। मां ने कहा, ‘‘तेल ले आया ?’’ कहा, ‘‘हाँ ले आया।’’ देखा मां ने तो सिर्फ गिलास के नीचे की कन्नी भरी हुई थी ! कहा, ‘‘बेवकूफ, दस पैसे का इतना तेल ही लाया।’’ उसने गिलास पलट कर कहा, ‘‘नहीं मां, बाकी तेल यहां रखा है !’’ मतलब, वह तेल न उसने इधर रखा, न उधर रखा और सारा तेल खो दिया।
जीवन में चमत्कार होता है। लोग चमत्कार ढूंढने के लिए जगह-जगह जाते हैं। चमत्कार ! क्या चमत्कार—पानी पर चलो। जब हमारा रास्ता पानी के ऊपर से जाता ही नहीं है, तो हम क्यों पानी पर चलें पानी के ऊपर ? सबसे बड़ा चमत्कार कहां हो रहा है ? कभी सोचा ? लोग अपने घर में बैठकर कहते हैं, ‘‘भगवान अगर तू मौजूद है, अगर तू है तो मुझको कोई अपनी निशानी दे।’’ तुमने कभी अपनी जिंदगी के अंदर श्वास लिया है ?
एक-एक श्वास, जिसके लिए कुछ करना नहीं पड़ता है। अपने आप आता है। अपने आप जाता है। क्या यह सबसे बड़ा चमत्कार नहीं है कि किसी से कोई चीज आई और जीवन दान दे गई ? बिना मांगे, बिना कुछ कहे, जीवन दान देकर चली भी गई और फिर आई और निरंतर आती रहती है।
श्वास की कीमत तब तक कोई नहीं जानता जब तक यह श्वास रुकने न लगे। जब रुकने लगता है तब आदमी बोलता है, ‘‘अरे, एक और !’’ सबसे बड़ा चमत्कार है यह ! सबसे बड़ा चमत्कार—जो रात में, जब सोये हुए हों तब भी चल रहा है ! परंतु क्या हम कभी अपनी जिंदगी के अंदर अपने इस चमत्कारी श्वास के लिए भी समय निकालते हैं ? हमको दुनिया भर की बातों से फुरसत नहीं है। अगर फुरसत होती भी तो अपने अंदर इस चमत्कार का अहसास करता। मैं भी अपने अंदर उस चीज को महसूस करने की कोशिश करता जो सचमुच में मेरे अधीन नहीं है, बल्कि मैं उसके अधीन हूं। श्वास मेरे अधीन नहीं है।
अगर श्वास मनुष्य के अधीन होता तो पता नहीं कब का मर जाता मनुष्य। भूल जाता उसे लेना ! परंतु स्वयं श्वास के अधीन जरूर है। यह सबसे बड़ा चमत्कार अंदर चल रहा है। कभी हमने समझने की कोशिश नहीं की।

इन आँखों से दुनिया भर की चीजों को देखने के लिए मनुष्य लालयित होता है, ‘‘मैं पहाड़ पर जाऊंगा। मैं समुद्र को देखूंगा। मैं ताजमहल देखने के लिए जाऊंगा।’’ और जो अंदर का दृश्य है, वह भी कभी देखने की कोशिश की ? समय निकल जाएगा ?। मिट्टी, मिट्टी में मिल जाएगी। तभी तो, जब बैंड बाजा बजता है तो लोग सुनने के लिए बाहर निकल आते हैं, ‘‘अरे ! वह क्या हो रहा है ?’’ और एक दिन आएगा जब बैंड बाजा बजेगा, पर तुम उठ भी नहीं सकोगे। मनुष्य में नम्रता नहीं रही। अभिमान ज्यादा भर गया। परंतु जिस दिन यमराज आएगा उस दिन वह सारा अभिमान टूट जाएगा। यह नियम मेरा बनाया हुआ नहीं है। यह नियम सबके लिए एक ही है।

एक वैद्य था। उसको लगा कि उसका समय नजदीक आ रहा है। उसने ठीक अपने जैसे तीन पुतले बनाए। जब समय बहुत ही नजदीक आ गया तो उसने तीनों पुतले लिटा दिए और अपने आप भी वहीं लेट गया। मृत्यु आई। मृत्यु को आदेश था कि एक को ले जाना है, चार को नहीं। एक का नंबर है। मृत्यु ने देखा कि वहां तो चार लेटे हुए हैं। चारों हू-ब-हू एक जैसे। मृत्यु चक्कर में पड़ी कि एक को ही ले जाना है ? असली कौन है, नकली कौन है ? नकली को तो ले जा नहीं सकते। ले जाना असली को है।
 परंतु ये इसने इतने अच्छे तरीके से बनाए हुए हैं कि यह पता लगाना मुश्किल है कि कौन असली है और कौन नकली है ? तब उसको मनुष्य की प्रकृति के बारे में मनुष्य के स्वभाव के बारे में एक बात समझ में आई। मृत्यु बोलती है, ‘‘वैद्यराज जी, आपने बहुत ही कमाल किया ! ऐसा कमाल किया कि मैं भी अचम्भे में पड़ गई। मुझे नहीं मालूम कि आप कौन हैं ? असली कौन है और नकली कौन है ? इस बात की मैं आपको बधाई देती हूं। कमाल का काम किया, पर आप एक बात भूल गए !’’
अब बैद्य बेचारा चुपचाप लेटा हुआ था। जब मृत्यु ने कहा, ‘‘बधाई हो और बड़ा अच्छा काम किया है।’’ तो अंदर से खुश हो गया कि मैंने तो मृत्यु को भी धोखा दे दिया। लेटा हुआ, अंदर ही अंदर अपने ऊपर खूब गर्व कर रहा है, पर जैसे ही मृत्यु ने कहा, ‘‘आप एक चीज भूल गए, ‘‘तो उससे रहा नहीं गया कि क्या भूल गया ? मैं तो कुछ भी नहीं भूला। मैं कैसे भूल सकता हूं ? मैं इतना बड़ा वैद्य हूं, मैं कैसे भूल सकता हूं ? मैं तो मृत्यु को भी धोखा देने वाला हूं, मैं क्या भूल गया ? कुछ भूल गया तो क्या भूल गया ?
मृत्यु ने फिर कहा, ‘‘कमाल का काम किया है, पर वैद्यराज जी, आप एक बात भूल गए।’’
धीरे-धीरे उसको सनक चढ़ी कि मैं क्या भूल गया ? पहली बार तो वह लेटा रहा। हिला नहीं। उसको मालूम था कि अगर मैं थोड़ा-सा भी हिलूंगा तो गड़बड़ होगी। चुपचाप लेटा रहा।
फिर तीसरी बार मृत्यु ने कहा, ‘‘काम तो कमाल का किया है, पर एक बात आप भूल गए।’’ तब वैद्य से रहा नहीं गया। लेटा-लेटा ही बोलता है ‘क्या ?’ मृत्यु ने कहा, ‘‘बस यही। यही भूल गया तू। चल !’’
हमको भी अपने ऊपर, अपने सारे किए हुए घमंड है. पर एक बात हम भूल गए। भूल गए कि एक दिन जाना है। यह सब रहेगा नहीं। यह बात भूल गए कि यह जो मौका हमें मिला है, यह बार-बार नहीं मिलता है। भजन है,


फेर न मिलेगा बंदे, मानुष जनम फेर न मिले।


यह बार-बार नहीं मिलता। अब समय है कि मनुष्य इस जीवन का पूरा-पूरा लाभ उठाए। अब समय है कि उस चीज को पकड़े। अब समय है कि उस चमत्कार को देखना शुरू करे, जो चमत्कार उसके अंदर रखा हुआ है, इसको समझना शुरू करे। अपने हृदय की प्यास को बुझाए, ताकि दोबारा उसके जीवन में शांति आ सके। अशांति से बचे और उस शांत जगह में प्रवेश करे जहां आनंद ही आनंद है।
सत्, चित और आनंद—सच्चिदानंद। पर ‘सच्चिदानंद’ है कहाँ ? आकाश की तरफ ? नहीं। यहां हृदय में है वह सच्चिदानंद। चेतना हृदय में है। सत्य हृदय में है और आनंद का अनुभव भी हृदय में ही हो सकता है।
हमने देखा है—लोग स्वर्ग का फोटो बनाते हैं। स्वर्ग की फोटो एक बार हमने भी देखी, किसी ने कल्पना से बनाई हुई थी। उसमें दोनों तरफ लड्डू ही लड्डू रखे हुए हैं। ‘‘मैं पूछता हूं, ‘‘किसको बेवकूफ बना रहे हो ? जब दाँत यहीं रह गए तो लड्डू खाओगे कैसे ?’’ सोचने की बात है। फल सूखे हुए हैं, सेब रखे हुए हैं। अब तुम मेरा विश्वास नहीं करते हो तो किसी मुर्दें को फूंकने के लिए ले जा रहे हो तो मूंह खोल कर देख लो। दांत वहीं हैं। लेकिन अगर वह दांत अपने साथ नहीं ले गया तो सेब कैसे खाएगा। जितने बुजुर्ग लोग हैं, जिनके नकली दांत हैं, उन सबको मालूम है कि सेब खाने के लिए दांत चाहिए। तो दांत सबके यहीं रह जाएंगे। स्वर्ग में बढ़िया-बढ़िया चीजें बना रखी हैं कल्पना की। मुर्दे को खोलकर देख लो, आंखें यहीं रखी हुई हैं ! जब आंखें यहीं रखी हुई हैं तो वह वहां देखेगा कैसे ? किस खाल से गरम और ठंडे का अनुभव होता है, वह तो यहीं रह जाएगी।
तुम समझते हो, तुम्हारी आत्मा को लड्डू की जरूरत है ? जब गर्मी लगती है, क्या तुम्हारी आत्मा को गर्मी लगती है ? जब पसीना आता है, क्या तुम्हारी आत्मा को पसीना आता है ? जब तुम्हारी आत्मा को पसीना आता है तो किस रुमाल से अपनी आत्मा का पसीना पोंछोगे ? सोचने की बात है। जो चीज यहां रह गई, वह तो यहां रह गई। जिस चीज से आदमी दर्शन कर सकता है, जिस चीज से आदमी सुन सकता है, जिस चीज से आदमी अनुभव कर सकता है, वह तो यहां रह गई।

   


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