गिलिगडु - चित्रा मुदगल Gilligaddu - Hindi book by - Chitra Mudgal
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गिलिगडु

चित्रा मुदगल

प्रकाशक : सामयिक प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :144
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5656
आईएसबीएन :81-7138-041-7

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आज के बदलते जीवन मूल्यों पर आधारित उपन्यास

Giligadu - A Hindi Novel by Chitra Mudgal

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कथा जगत में अपनी धारधार कहानियों के जरिए विशिष्ट पहचान बनाने वाली कथाकार चित्रा मुद्गल ने ‘एक जमीन अपनी’ सरीखे उपन्यास से जो जमीन बनाई, उसे आवां जैसे वृहद उपन्यास से और पुख्ता ही किया। सामाजिक चेतना से लैस उनके पात्र समकालीन जटिल यथार्थ में अपनी खास जगह खुद बनाते हैं।

‘गिलिगडु’ चित्रा जी का आकार में छोटा, किंतु संवेदनशीलता में कहीं गहरा उपन्यास है। इस उपन्यास में सेवानिवृत्त बुजुर्ग लकी एकरेखीय कहानी नहीं, जीवन के रंग बहुआयामी प्रयोगों में उभर कर आए हैं। यह उपन्यास तेरह दिन की कहानी में चलते दो बुजुर्गों के जीवन का पूरा खाका ही नहीं बताता अपितु आज के बदलते जीवन मूल्यों को भी परिभाषित करता है कि कैसे नौजवान पीढ़ी अपने बुजुर्गों को घर में सम्मान न देते हुए अकेला छोड़ देती है।

यह कृति इस विश्वास को और भी गहरा करती है कि साहित्यिक मूल्यों में सामाजिक सार्थकता का महत्व हमेशा बना रहेगा। जीवन में छोटे-छोटे महायुद्धों में सहज विजय पाने के लिए रचनात्मक रास्ते की अनूठी तलाश है चित्रा मुद्गल का यह नया उपन्यास।

पठनीयता ऐसी कि शुरू करते ही बंधे चले जाएं। जीवन ऐसा कि पूरी धड़कन के साथ सामने आए और कला ऐसी कि अनायास खिल-खिल जाए। उपन्यास में रचनात्मक विश्वास ऐसा कि रचनाकार के अन्य उपन्यास भी पाठक पढ़ने को प्रेरित हो जाएं।

कुरकुरी कलफ


टॉमी को फारिगकराकर भी बाबू जसवंत सिंह नियमानुसार उसे वापस घर छोड़ने नहीं जा सके।
घर से निकलते हुए उन्हें देर हो गई। कब्ज के पुराने मरीज ठहरे। बवासीर की शिकायत इन दिनों खासी उछाल लिए हुए हैं। पेट सुबह लोटा-भर पानी पी लेने के बावजूद टुकड़ों में साफ होता है। मस्से रह-रहकर रिसते हैं।

ऐन निकलने के समय पेट में ऐंठन सी हुई। रुकना पड़ा। यों तो बाबू जसवंत सिंह ने त्रिफला में पंचस्कार के साथ कायमचूर्ण मिलाकर रखा हुआ है। ताकि तकलीफ कम हो। तकलीफ कम होती नजर नहीं आ रही। रात में फंकी लीलते हुए अलबत्ता भ्रम ढांढस बंधाए रखता है कि उनकी अगली सुबह तकलीफ रहित होगी। मगर अगली सुबह अगली के कंधों पर जिम्मा सरका निर्मम हो आंखें फेर लेती है। अब तो खून से भरा कमोड देख उन्हें घबराकर होने लगती है। ‘हिमअप’ गोलियों की मात्रा उन्होंने बिना डाक्टरी सलाह के बढ़ा ली है।
खून कुछ तो बने। कैसे भी बने। हालांकि जानते हैं कि बिना डाक्टर से पूछे उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। मजबूरी है। एक तो उनके डाक्टर-डाक्टर सक्सेना कानपुर में जो बैठे हैं।
जबर टॉमी की जबरई पर बाबू जसंवत सिंह को गुस्सा आ रहा। कमबख्त अडोल नहीं खड़ा रह सकता। धाय हाथ तुड़ात-सा सूंऽऽ सूंऽऽ जमीन सूंघ रहा है। धाय बैलाया-सा खुरों से मिट्टी खुरचने लगता है। धाय गले से अजीबोगरीब आवाजें निकालते हुए छूट भागने की मुद्रा अख्तियार कर उन्हें डराने लगता कि अब वह उन्हें घसीटे बिना नहीं मानने का। बाबू जसंवत सिंह हैं कि एक क्षण को भी वे पुलिया छोड़ इधर-उधर होने को राजी नहीं हैं।

 पुलिया छोड़ आगे बढ़ने का मतलब होगा अपने भेंट स्थल से नदारद होना। जो वह कतई नहीं होना चाहते।
यह भी जानते हैं बाबू जसवंत सिंह की फारिग होने के समय टॉमी ऐसी ही बेचैनी से गुजरता है। फारिग हो लेने के बाद भी यह छुछुआहट उनकी समझ से परे है। हो सकता है, उसका यह उजड्ड व्यवहार उसकी मर्जी के खिलाफ खड़े रहने की धौंसपट्टी हो ! अपनी जरूरत के समय हरामी ऐसा बन रहा है जैसे उसे कुछ समझने की जरूरत ही नहीं, न उसे समझ में आ रहा है कि आखिर वे उसे लिए इस पुलिया विशेष पर थूनी-सी गड़े हुए क्यों खड़े हुए हैं ?
उन्हें टॉमी को खीज के बावजूद भरियाना नहीं चाहिए। बाबू जसवंत सिंह ने स्वयं को टोका।
भले गाली उन्होंने मन ही मन दी हो, दी तो ? आदत उखड़ने की बात है। उखड़ी नहीं कि जुबान से फिसली नहीं। अंकुश समय रहते जरूरी है।
कानपुर से आते ही उन्हें इस बात से प्रसन्नता हुई थी कि चलो बेटे- बहू ने टॉमी की जिम्मेदारी सौंपकर उन्हें अपने गृहस्थी की किसी जिम्मेदारी के काबिल तो समझा। अब तो उन्हें यह भी लगने लगा है कि इस घर में वे सही अर्थो में किसी के लिए बुजुर्ग हैं तो वह केवल टॉमी है। पोते मलय-निलय के नाज-नखरे उठाने का सुख उनकी थाली का कौर नहीं।

कमबख्त कम दुष्ट नहीं। तड़के उठने के लिए लगाए गए अलार्म को सुनते ही उनसे पहले उठकर कुंकुआना शुरू कर देता है। मानो अलार्म वे अपने जगने के लिए नहीं उसे जगाने के लिए लगाकार रखते हों। कई दफे बाबू जसवंत सिंह अलसाते हुए नींद उचट जाने के बावजूद अलार्म को टिटियाने देते। लेकिन टॉमी को अलार्म बरदाश्त न होता। पंजे उचकाकर वह तिपाई पर से घड़ी नीचे गिरा देता। टॉमी की इस उद्दंडता को वे अधिक नहीं झेल पाए।
बेटे नरेंद्र से शिकायत कर उन्होंने अपनी आशंका प्रकट की। उनके कमरे में उसे न बांधा जाए। क्रोध आने पर वह उन पर भी झपट सकता है। जानवर का भरोसा ? नरेंद्र ने उनकी आपत्ति पर कोई विवाद नहीं किया। टॉमी पैसेज में बंधना शुरू हो गए। बहू सुनयना के चेहरे पर इस अप्रिय प्रसंग की नाराजगी दिनों दर्द रही मानो बाबू जसवंत सिंह ने टॉमी को आते ही घर निकाला दिलवा दिया हो। मन में आया कि तनिक मुंहफट्ट हो लें-उसका कमरा घर का सबसे बड़ा कमरा है; अपने कमरे में बांध लेने में हर्ज ?

यह भी लक्ष्य किया है बाबू जसवंत सिंह ने कि उनके समाचार सुनने से टॉमी की कट्टर दुश्मनी है। आगे चलकर मामला पकड़ में आया कि समाचारों से उसकी दुश्मनी नहीं है। भाषा से है। अंग्रेजी समाचार लगाने पर उसकी कुंकुआहट नहीं फूटती। उनके ‘आज तक’ लगाते ही भिनक शुरू हो जाती है। मुश्किल से मुख्य समाचार-भर सुन पाते हैं कि टॉमी की कुंकुआहट गुर्राहट में तब्दील होती बैठक में आतंक फैलाने लगती। बहू सुनयना से टॉमी की नाराजगी बरदाश्त न होती। दखल देती हुई उन्हें टोंकती कोई म्यूजिक चैनल लगा दीजिए न बाबू जी ! आज तक का क्या है। चौबीसों घंटे चलता ही रहता है।
रिमोट सोफे के हत्थे परटिका क्षुब्ध बाबू जसवंत सिंह उठकर अपने बालकनी वाले कमरे में आ जाते। ‘महबूब मेरे, महबूब मेरे तेरी आंखो से जरा पीने दे’ अश्लील हाव भावों से लदा फंदा गीत कानों में पिघले सीसे-सा टपकने लगता। टॉमी की मुखमुद्रा उनकी आंखों में तैर जाती। फर्श पर पसरे हुए अगली दोनों टागों पर चेहरा टिकाए वह मंत्र मुग्ध सा सुष्मिता सेन के मादक सौंदर्य में खोया हुआ है। समझ नहीं पाए, न कोई उन्हें समझा ही सकता है कि जो भाषा टॉमी को समाचारों में नहीं रुकती सुष्मिता सेन की अदाओं के साथ कैसे अच्छी लगती है ?
पहले टॉमी को फारिग कराने के बाद बाबू जसवंत सिंह सैर में भी उसे अपने साथ ही रखते थे। कर्नल स्वामी की सलाह पर ही उन्होंने तय किया और उनका कहना गलत भी नहीं है कि सैर के समय व्यक्ति को जैसी मानसिक निर्द्वंद्वता की दरकार होती है-उसके साथ संभव नहीं। ऊपर से उसकी हुड़दंगें उनकी उम्र के लिए घातक ठहरीं। टॉमी को तो उसकी जरूरत पूरी करवाकर वापस घर छोड़ देने में ही गनीमत है। खेल खिलवाड़ की उसकी इच्छा पूरी करनी हो तो घर के जवान सदस्य पहल करें। उनके वश का नहीं।
‘अरे, अरे, चोट अधिक तो नहीं आई आपको ? रुकिए, रुकिए, जल्दी न मचाएं उठने की। लीजिए हाथ पकड़िए, संकोच न कीजिए। घुटनों पर एकदम से जोर न डालें-हां, अब ठीक है, पकड़े रहिए कंधे। कोई हमारा कंधा टूटा नहीं जा रहा। हां, गुड़, सीधे साधे रहिए तो ? हूं अऽ, बांह पकड़िए और दो-चार कदम जरा चलकर दिखाइए....बढ़िया सब दुरुस्त लग रहा।"
हाथ बढ़ाकर अजनबी ने उनके कुरते के पीछे चिपकी मिट्टी और घास फूस के तिनके झाड़े। कुरता उठाकर गौर से देखा। पायजामे की रगड़ से स्पष्ट था कि कंकड़ियों ने देह के पिछले हिस्से में खरोचें दी होंगी।
इस बात से अजनबी आश्वस्त नजर आए कि अंदरूनी चोट नहीं आई है उन्हें। आई होती तो उनका चार कदम चलना दूभर होता। चोट की चिलकन कदम न भरने देती।
गले में जंजीर लटकाए दूर खड़े, आंखें मिलमिलाते तमाशा देख रहे टॉमी को देख तीली लग गई बाबू जसवंत सिंह को। जी में आया, अजनबी का लाग लिहाज छोड़ उठाएं पत्थर और पटक दें सरऊ की गरदन पर...
"कमाल करते हैं आप भी, चप्पल पहनकर कोई सैर को निकलता है ? हड्डियां तुड़वाने का शौक हो तो अलग बात है। ऊपर से दनदनाती गोली साथ लिए घूम रहे।" कटाक्ष किया अजनबी ने।
‘ठीक है, आपका तर्क अपनी जगह दुरुस्त है दोस्त, लेकिन इतना तो हो सकता है-फारिग कराकर इसे घर ले जाकर छोड़ दें ?’
‘घर दूर है ?’ अजनबी को जिज्ञासा हुई।
‘अच्छा, अच्छा, ग्लैक्सो में रहते हैं ? वो तो पास ही है। चलिए हम आपको घर छोड़ आते हैं।’ उनके इशारे को पकड़ा अजनबी ने।
हिली चूलें डराए हुए थीं। बाबू जसवंत सिंह से मना नहीं किया गया। देखकर मजा आया उन्हें कि अजनबी के हाथ में अपनी नकेल पाकर टॉमी ‘छूं’ ‘छा’ छोड़ एकदम गऊ से हो आए। लंपट।
‘आपके घर के आस-पास कोई मार्केट नहीं ? हो तो शाम को एक बढ़िया सा किरमिच का जूता पहन आइए।’
उनकी दुविधा पर कि उन्हें आस पास के बाजारों की विशेष जानकारी नहीं, न निर्माण विहार से लगे मार्केट में उन्हें जूते की कोई दुकान ही नजर आई-अजनबी ने उनसे उनके जूते का नंबर पूछा। सकुचाए हुए बाबू जसवंत सिंह ने जवाब दिया कि बहुत पहले का उनके जूते का नंबर सात है। अब नहीं पता। उनके उत्तर पर अजनबी ने जोरदार ठहाका भरा। कैसी नादानी भरी बात कर रहे हैं वे। कौन वे बढ़ता हुआ बच्चा हैं जो उनके जूते का नंबर बदल गया होगा। सात है, सात ही होगा।
अजनबी ने उत्सुकता जाहिर की कि क्या वह नियमित उसी ओर सैर के लिए आते हैं ? क्योंकि आज से पहले उन्होंने उन्हें कभी इस ओर नहीं देखा-क्यों ?
बाबू जसवंत सिंह ने सफाई दी। इस ओर वे सैर के लिए पहली दफा ही आए हैं। दरअसल टॉमी को फारिग कराने और घुमाने वे घर की बगल वाले विशाल पार्क में ही जाया करते थे। कल अचानक माली की नजर उन पर पड़ गई। उसने उन्हें टोक दिया-साहब पार्क बच्चों के खेलने के लिए है-कुत्ते बिल्लियों को टट्टी पेशाब कराने के लिए नहीं। शिकायत दर्ज कराने पर उन पर जुर्माना लग सकता है।
ग्लैक्सो की पुलिया की ढलान के निकट पहुंचकर बाबू जसवंत सिंह कृतज्ञता से भर ठिठक गए और अजनबी के हाथ से टॉमी की जंजीर लेने के आगे बढ़े। अजनबी ने परिहास किया वे घबड़ाएं नहीं। उनके घर नाश्ता-पानी करने का उनका कोई इरादा नहीं हैं। पुलिया से जुड़े ढालान का ऊबड़-खाबड़ हुलिया उन्हें आश्वस्त नहीं कर रहा कि वे उन्हें यहीं तक छोड़कर पलट लें। वे उनकी चिंता न करें। उन्हें गेट तक सुरक्षित पहुंचाए बिना वे नहीं मानने के। एक काम वे जरूर करें। उनके घर में बच्चे हैं ? बच्चे होंगे तो घर में ‘अर्निका’ अवश्य होगी। हो तो घर पहुंचते ही अर्निका की पांच-छह गोलियां तुरंत मुंह में डाल लें। तीन-चार बार दिन में अवश्य ले लें। अंदरूनी चोट शाम तक बैठ जाएगी। घर पर न हो तो किसी से कहकर मंगवा लें। ‘अर्निका-30’।
गेट के निकट पहुंचकर बाबू जसवंत सिंह की इच्छा हुई कि अजनबी को घर चलकर एक कप कॉपी पीने का न्यौता दें। लेकिन न्यौता देने का साहस नहीं जुटा। इस समय बहू सुनयना मलय-निलय को स्कूल भेजने की तैयारी में व्यस्त होगी। रसोई के भूगोल से वे सर्वथा अपरिचित हैं कि स्वयं आगे बढ़ दोनों के लिए कॉफी बना सकें। कानपुर से दिल्ली आए हुए उन्हें अरसा हो गया। घर की चौखट में दाखिल होते ही वे स्वयं को अपरिचितों की भांति प्रवेश करता हुआ अनुभव करते हैं। कैसे कहें।
‘आप किसी औपचारिकता में न पड़ें।’ अजनबी ने उनके द्वंद्व को भांप लिया। ‘बैठेंगे, किसी रोज।’
‘अब इजाजत दें। कल सुबह मिलते हैं। उसी मयूर विहार वाली पुलिया पर। ठीक सवा छह साढ़े छह के दरमियान।’
‘इस लाड़ले को घर छोड़कर ही आएं।’
‘बाय दि वे- हमें विषनू नारायण स्वामी कहते हैं-रिटार्यड कर्नल स्वामी। नोएडा में रहता हूं। छब्बीस सेक्टर में। घूमने आपकी ओर ही आता हूं। जमुना किनारे के लहलहाते खेत हमें इस ओर खींच लाते हैं। खेतों में खड़ी गन्ने की फसल की मीठी महक नोएडा में दुर्लभ हो रही।’
बाबू जसवंत सिंह का संकोच मरमराया।
‘मैं हूं रिटायर्ड सिविल इंजीनियर जसवंत सिंह। बेटे-बहू के साथ ग्लैक्सो में ही रहता हूं। आभारी हूं....’
‘बस, बस ! इसकी जरूरत नहीं दोस्त। मुझे पूरी उम्मीद है कि कल सुबह आप ठीकठाक उसी पुलिया पर मिलेंगे। आर्निका जरूर ले लें। चलूं। हाथों की गरमजोशी बाबू जसवंत सिंह के हाथों में सौप कर्नल स्वामी मुड़ लिए।
बड़ी देर तक गेट पर ठहरे हुए वे उनकी चढ़ाई चढ़ती पीठ का पीछा करते रहे, जब तक उनकी पीठ उनकी नजर से ओझल नहीं हो गई।
और इस वक्त उसी पुलिया पर खड़े हुए वे कर्नल स्वामी की प्रतीक्षा कर रहे...

जूते


टॉमी से बोरियत बरदाश्त नहीं हो रही। ऊब कर कभी वह उन पर भौंकना शुरू कर देता है, कभी सड़क की ओर मुंह करके आने-जाने वाले वाहनों पर।
पुचकारा उसे। समझाया। इतनी निभाई है तो कुछ देर और भलमनसाहट ओढ़े बैठा रहे। उनकी परेशानी पर भी तनिक गौर करे। उन्हें कैसा लग रहा। वे भी कम बेचैन नहीं हो रहे कि कर्नल स्वामी अब तक पहुंचे क्यों नहीं ? उनकी मुश्किल यह है कि वे किसी हाल पुलिया नहीं छोड़ सकते। पुलिया छोड़ने का मतलब होगा-कर्नल स्वामी को मिस करना। उनके दिखाई न देने पर कर्नल स्वामी को भ्रम हो सकता है कि आज वे सैर को नहीं निकल पाए हैं। रजाई की आंच छोड़ना आसान बात नहीं। कमजोर इच्छाशक्ति वालों के लिए तो बिलकुल नहीं। और उनके लिए यह सच नहीं है।
बाबू जसवंत सिंह को यह देख प्रसन्नता हुई कि उनकी पुचकार का टॉमी पर अपेक्षित असर हुआ, जिसकी कि उन्हें कतई उम्मीद नहीं थी। भौंकना बंद कर दिया टॉमी ने। चलो, लिहाज तो किया। पट्ठे ने सोचा होगा, लिहाज करना जरूरी है। अधिकतर ठनी रहने के बावजूद एक वही हैं जो नियमित दोनों वक्त उसे घुमाने ले जाते हैं। नथुनों में वह हरियल दूब की गंध भर पाए; खुले आसमान और पहुंच से दूर खुली धरती को भर आंख देख आंखों से चौकड़ी भर उसे नाप पाए, ऐसा सुअवसर उसे केवल उन्हीं से उपलब्ध होता है। उनकी उपेक्षा के नतीजे बुरे हो सकते हैं। लेकिन इस बात का उसे गहरा मलाल है कि उसका कोई भी मामला आंख मटौव्वल के क्षणिक सुख से आगे नहीं बढ़ पाता। लपटें भरता दिल विद्रोही होने लगता है कि बुढ्ढे के हाथ से जंजीर झटक उसे पटकनी देकर सरपट भाग ले अपनी कजरारी नयनों वाली के पीछे ! अपनी ओर नहीं देखता। हरिश्चंद्र बना बुड्ढा कम ठरकी नहीं ! उसने अकसर महसूस किया है। यूनाइटेड अपार्टमेंट्स से लगा गंधाता कचराघर कोई उसके मूतने की जगह है ? मगर हठी बुड्ढा जबरन उसे आगे न बढ़ने देता। ऐसा तभी होता जब शाम को जींस में कसी गदराई लड़कियों का खिलखिलाता, चिमगोइयां करता हुआ झुंड यूनाइटेड से निकलकर समाचार के गेट से लगे खड़े आइसक्रीम के ठेले की ओर बढ़ रहा होता है। मजबूरन उसे वहीं टांगें उठानी पड़ती हैं। उसे यह मालूम होता है कि बुड्ढा उस जगह से तब तक नहीं हिलेगा जब तलक लड़कियों का वही झुंड आइसक्रीम चाटते हुए उसकी बगल से नहीं हुजर जाएगा।
उसे काबू में रखने के लिए बुड्ढा अब मुंह से डांटने डपटने की बजाय छड़ी से काम लेने लगा है। छड़ी लिए बगैर उसे लेकर निकलता ही नहीं।
बाबू जसवंत सिंह दाहिनी ओर टकटकी लगाए हुए अचानक पुलिया से उठकर खड़े हो गए। उनके मुर्झाए चेहरे के भाव बदलने लगे। दूरऽऽ नोएडा की ओर से कुछ धुंधली आकृतियां तेजी से जॉगिंग करती हुई इस ओर आती दिखीं। उन्हें लगा कि उन आकृतियों में जो सबसे आगे चली आ रही है, उसकी चुस्ती और तीव्रता देख यही अनुमान हो रहा कि वह कर्नल स्वामी की ही है। पीछे वालों को पछाड़ती। उन्हें अनमनाहट हुई कि वे उस आकृति को साफ क्यों नहीं देख पा रहे ! उनकी दूर दृष्टि कमजोर तो नहीं हो रही ? दूसरे ही पल अपने उतावलेपन पर बाबू जसवंतसिंह मन ही मन हँसे। दृष्टि का रोना छोड़कर उन्हें धैर्य से काम लेने की जरूरत है। कर्नल स्वामी आ ही रहे हैं। मगर पल-पल स्पष्ट से स्पष्टतर होती आकृति ने उम्मीद पर पानी फेर दिया। नवंबर के आखिरी दिनों में भी कर्नल स्वामी भक्क सफेद हाफ पैंट और टी शर्ट में ही नजर आए। बढ़ी चली आ रही आकृति ने जॉगिंग सूट पहन रखा है। वह भी कुछ काला सा जो वह हर्गिज नहीं पहन सकते। बल्कि उन्होंने तो पसंद नापसंद के सोए हुए कीटाणुओं को उनमें भी जगा दिया है।
उनमें आए, परिवर्तनों को बहू सुनयना लक्ष्य कर रही थी।
पहले उनकी सैर का समय निर्धारित नहीं हुआ करता था। नींद खुली निवृत्त होकर चल दिए। अब बाकायदा रात अलार्म लगाकर रखा जाता है। टॉमी के प्रति भी उनका रवैया उपेक्षापूर्ण हो रहा। उसे लेकर निकले नहीं कि वापसी की घंटी बजी नहीं। देख रही कि घर में बंद पड़ा टॉमी रह-रह बिरझाता रहता है। घर के बाहर जाने वालों को ललक भरी दृष्टि से देख जो लय ताल में उसकी पूंछ थिरकती है कि मन कचोट उठता है। शुरुआत में बहू सुनयना ने यह सोचकर उन्हें नहीं टोका कि बाबूजी को अचानक प्रेशर महसूस हुआ होगा। लेकिन आगे उनके कार्यक्रम में बदलाव न होता देख उससे टोके बिना न रहा गया।
बाबू जसवंत सिंह को प्रतीक्षा ही थी। बल्कि उन्हें अचरज इस बात पर हो रहा था कि तलक उनकी पेशी हुई क्यों नहीं।
प्रत्युत्तर में उन्होंने बहू सुनयना के चेहरे पर ऊभ-चूभ होते कसैले भावों को अनदेखा करते हुए बेझिझक कह दिया। शायद पहली दफा।
टॉमी के साथ लंबी सैर उनके लिए मुमकिन नहीं। उसे संभालें या अपने को ? इस उम्र में वे मैरेथॉन दौड़ने से रहे !
नहीं चाहते कि बुढ़ापे में हाथ-पैर तुड़वाकर वे औरों की दयादृष्टि के मोहताज हो जाएं।
बहू सुनयना को आश्चर्य हुआ। मामूली सी बात पर उन्होंने जैसा कड़ा और कड़वा रुख अपनाया, समझ नहीं पाई कि आखिर उन्हें उसकी बाजिब बात इस कदर भन्ना क्यों गई ?...
‘गुडमार्निंग सर ! भई लगता ही नहीं कि कल आप गिरे थे ?’
दिल्ली प्रवास में पहली बार शायद उनकी हँसी छूटी।
‘साहब, वो तो आपसे मिलने का बहाना था !’
‘हा, हा, हा, हा’ कर्नल स्वामी ने जोरदार जानदार ठहाका भरा। बड़ी देर तक बाबू जसवंत सिंह ने भी उनके संग जुगलबंदी की।
हँसी रोकी गई। रुकते ही उन्होंने कहा।
‘तो अब सैर शुरू हो ?"
अचानक उनकी नजर उनके पावों की ओर गई।
बिना जूतों के सैर शुरू हो सकती है ? पुलिया पर टिकिए और उतारिए ये हवाई चप्पलें।’ पीठ पीछे लटकाए रकसैक में से उन्होंने फिनिक्स के जूतों का डिब्बा निकालकर उनकी ओर बढ़ाया-‘पहनिए।’ मैं तो भूल ही गया था।’
दरअसल मैं...’
"मालूम था, जूते की दुकान खोजने नहीं जा सकेगें। मैं ले आया, दैट्स ऑल।



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