चमत्कारिक पौधे - उमेश पाण्डे Chamatkarik Paudhe - Hindi book by - Umesh Pandey
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चमत्कारिक पौधे

उमेश पाण्डे

प्रकाशक : भगवती पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :132
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5657
आईएसबीएन :81-7457-215-5

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पौधे हमें जीवन के साथ-साथ स्वास्थ्य भी प्रदान करते हैं। स्वास्थ्य के लिए कुछ चमत्कारी पौधे.....

Chamatkarik Paudhe

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

1 बिच्छू का जहर शुभ मूहुर्त में निकाली गई अपार्माग की जड़ को महज दंशित व्यक्ति के प्रभावित क्षेत्र मात्र से उतर जाता है।
2 हड्डी टूट जाने पर अर्जुनवृक्ष की छाल और लहसुन को समान मात्रा में पीसकर लेपित करने से टूटी हड्डी शीघ्र जुड़ जाती है।
3. कटेरी की शुभ मुहुर्त में निकाली हुई जड़ को व्यक्ति अपने पास रखता है उसके शत्रुओं का शमन होता है।
4. उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में निकाली गई ‘‘सत्यानाशी’’ की जड़ को पास में रखने से राहू की पीड़ा शान्त होती है।
5 नीम के पेड़ का घर के वायु कोण में होना शुभ है।
6. किसी पौधे की कोई जड़ आपके घर की बरकत बढा़ सकती है।
7 पलाश के पत्तों से पुत्र की प्राप्ति की जा सकती है।
8. बीर (बैर) का बृक्ष जिस घर में होता है वहाँ अशान्ति का परम निवास रहता है।
9. चमेली के फूलों को सूँघने से नाक के अन्दर की फुन्सियाँ जल्दी ही ठीक हो जाती हैं।
10. चन्द्रमा से पीड़ित व्यक्ति चमेली के पुष्पों द्वारा लाभान्वित हो सकते हैं।
तथा ऐसे ही सैकड़ों चमत्कारिक प्रयोगों से परिपूर्ण यह ? पुस्तक आप ही के आसपास पाये जाने वाले पौधों के अत्यंत सरल औषधिक, ज्योतिषीय तांत्रिक एवं वास्तु सम्बन्धित चमत्कारों से आपका परिचय कराती है।

(पुस्तक में लिखे गये विभिन्न आयुर्वेदीक प्रयोगों को किसी योग्य वैद्य के निर्देशन में ही करें। विशेष रूप से उन प्रयोगों को जिनमें औषधि ग्रहण करने का निर्देश है।)

दो शब्द

प्रकृति में विभिन्न कृतियों में पौधों का स्थान सर्वोपरि है। सही अर्थ में तो ये प्रत्यक्ष देवता हैं जो हमें सिर्फ देते ही हैं, हमसे लेते कुछ नहीं हैं।
हर व्यक्ति जानता है कि पौधे हमारे दैनिक जीवन में कितना महत्त्व रखते हैं ? फिर भी अनेक पौधों के विशिष्ट चमत्कारिक गुणों से अधिकांश लोग अनभिज्ञ एवं अपरिचित रहते हैं। इस छोटी-सी पुस्तक में मैंने कुछ अतिसामान्य पौधों के विभिन्न आयुर्वेदिक ज्योतिषीय तथा वास्तु सम्मत सरल एवं प्रभावी प्रयोगों को शामिल किया है। उनमें से कई अनभूत हैं तो कुछ किसी सिद्ध पुरुष के द्वारा बताए हुए हैं। कुछ शास्त्र सम्मत हैं तो कुछ किसी हस्तलिखित प्राचीन पाण्डुलिपि से लिए गए हैं जिनका लाभ कोई भी व्यक्ति अवसर प्राप्त होने पर उठा सकता है। इस पुस्तक में जिन अति सामान्य पौधों का उल्लेख किया गया है उनमें से कुछ तो ऐसे हैं कि हमारे आस-पास ही हैं फिर भी हम उन्हें और उनके चमत्कारों को पहचानते नहीं है। चूँकी आप उन्हें भाषाओं में नाम और चित्र दिये गये हैं वही उनके संबंध में विस्तारभय से थोड़े से वर्णन को ही शामिल किया गया है। पुनः प्रत्येक पौधों के केवल आयुर्वेदिक, तांत्रिक, ज्योतिषीय एवं वास्तु आयामों को ही आधार बनाया गया है और उसके शेष महत्वों को लिखा गया है। मेरा विश्वास है कि पुस्तक में वर्णित तथ्यों से आप अवश्य ही लाभान्वित होगें।
अंत में, मैं हृदय से आभारी हूँ ‘भगवती पॉकेट बुक्स’ के श्री राजीव अग्रवाल जी का जिन्होंने मेरे प्रयास को मूर्तरूप देकर आपके समक्ष उपस्थित किया।

मैं, मेरे सभी शुभचिन्तकों विशेष रूप से डॉ० बसंत कुमार जोशी, श्री रवि गंगवाल, प्रो० एम० एल० गंगवाल, डॉ० सी० एम० सोलंकी, डॉ० एस० आर० उपाध्याय, श्री एस० के० जोशी, श्री ललित गोखरू एवं श्री अखिलेश का भी हृदय से आभारी हूँ जिन्होंने मुझे समय-समय पर इस कार्य में अपना अमूल्य सहयोग दिया। आपसे एक निवेदन है। मानव स्वाभाववश त्रुटियाँ रह गई हों। आप उनके लिये मुझे क्षमा करेंगे तथा पुस्तक के सम्बन्ध में अपनी राय अवश्य प्रेषित करेंगे। सच मानिये, आपके द्वारा प्रेरित एक-एक पंक्ति मेरे लिए मार्गदर्शक होगी।
धन्यवाद।

उमेश पाण्डे

अशोक


विभिन्न भाषाओं के नाम


अशोक को बंगला में अस्पाल, मराठी में अशोक, गुजराती में आसोपालव तथा देशी पीला फूलनों, सिंहली में होगाश तथा लैटिन में जोनेशिया अशोका (Jonasia Ashoka) अथवा सराका-इंडिका (Saraca Indica ) कहते हैं। इससे मिलता-जुलता एक और वृक्ष भी है जो कि आसोपालव अथवा आशापाला नाम से  पुकारा जाता है किन्तु वह अशोक वृक्ष नहीं है। उस वृक्ष का लैटिन नाम पोली-एल्थिया लांगीफोलिया (Polyalthia longifolia)  है। इस वृक्ष में अशोक वृक्ष की भाँति औषधिक गुणों का अभाव होता है।
अशोक वनस्पति जगत के मायमोसेसी (Mimosaceae)  कुल का सदस्य है

संक्षिप्त विवरण


अशोक वृक्ष के नाम से सभी परिचित हैं। यह वही वृक्ष है जिसकी छाया तले लंका में सीताजी को रखा गया था। यह एक सुंदर सुखद, छाया प्रधान वृक्ष है। इसके पत्र 18 से 20 अंगुल लम्बे तथा 3 अंगुल तक चौड़े हैं। प्रारंभ में इन पत्रों (पत्तों) का रंग ताम्रवर्ण का होता है-इसीलिए इसे ‘‘ताम्र पल्लव’’ भी कहा जाता है। इसके पुष्प गुच्छों में लगते हैं तथा पुष्प काल में पहले ये नारंगी तदुपरांत लाल रंग के हो जाते हैं। इसलिए अशोक का एक नाम ‘‘हेमपुष्प’ भी है।
अशोक के पुष्प वसंत ऋतु में खिलते हैं। पुष्पित होने पर ये मन को आनंदित करने वाले होते हैं। इसके फल लम्बे तथा जामुन के फल की तरह गोलाई लिये हुए होते हैं। पकने पर इसका रंग लाल होता है। फलों के भीतर बीज होते हैं जिसका स्वाद कसैला होता है।

औषधिक चमत्कार


अपनी सघन सुखदायिनी छाया के द्वारा इस वृक्ष ने जिस प्रकार माँ सीता के दुःख को कम किया था ठीक उसी प्रकार इस वृक्ष के कई ऐसे औषधिक उपयोग हैं जो कि स्त्रियों में होने वाली व्याधियों को काफी हद तक हरने में सक्षम हैं। दरअसल इसकी छाल में ‘‘टेनिन’’ ‘‘कैटेचिन’’ नामक रसायन पर्याप्त मात्रा में होते हैं। ये रसायन ही औषधिक महत्त्व के हैं। इसलिए औषधिक रूप में इसकी छाल का ही व्यवहार मुख्यतः होता है। अशोक से निर्मित अशोकारिष्ट नामक औषधि के गुणों से हम सभी भली-भाँति परिचित हैं।

अश्मरी रोग में-

अशोक के बीजों के 2 माशा चूर्ण को जल के साथ नित्य कुछ दिनों तक लेने से अश्मरी रोग चला जाता है।

गर्भपात रोकने हेतु-

प्रायः कई महिलाओं को गर्भाशय की कमजोरी के परिणामस्वरूप गर्भपात हो जाता है अथवा कभी-कभी महिलाओं को अधिक रक्तस्राव होता है। शास्त्रों में इसके लिए ‘‘अशोकृ-घृत’’ लेने की सलाह दी गयी है अथवा ऐसे मामले में अशोक की छाल का चूर्ण थोड़ी-सी मात्रा में गौ-दुग्ध के साथ ग्रहण करने से काफी लाभ होता है। एक खुराक 2 से 4 माशा मात्रा की होती है और इस प्रयोग को लगभग 1 सप्ताह करना पड़ता है।

मासिक धर्म गड़बड़ी में-

जिन महिलाओं को मासिक धर्म अधिक होता हो अथवा नियमित न होता हो उनके लिए भी अशोक की छाल का व्यवहार करना  हितकर होता है। इसके लिए सम्बन्धित महिला को लगभग 2 तोला मात्रा अशोक की छाल लेकर उसे दूध में उबालना चाहिए। जब दूध पर्याप्त गाढ़ा हो जाए तब छाल को पृथक कर उस दूध में भरपूर अथवा आवश्यक मात्रा में खांड मिलाकर सेवन करना चाहिए। लिए जाने वाले दूध की मात्रा 250 मिली लीटर हो।, प्रयोग 3 दिन के लिए करना चाहिए।

रक्त प्रदर में-

रक्त प्रदर में और अधिक मासिक स्राव की स्थिति में अशोक की छाल और सफेद जीरे का काढ़ा भी काफी लाभदायक है। इस काढे को बनाने के लिए छाल और सफेद जीरे की 2-2 तोला मात्रा लेकर उन्हें आधा सेर जल में उबालते है। लगभग चौथाई पानी रह जाए तब उतार कर इसे छान लेते हैं। इसमें खांड मिलाकर सुबह-सुबह ग्रहण करने से रक्त प्रदर और मासिक-स्राव की अधिकता और विकार दूर होते हैं। उक्त काढा एक बार में लगभग 2 तोला ग्रहण किया जाए तथा दिन में 3 बार इसे 4 रोज तक लें। वैसे भी गर्भाशय सम्बन्धी किसी भी विकार में थोड़ी-सी अशोक की छाल को दूध में उबाल कर पीने से बहुत लाभ होता है।

श्वेत प्रदर में-

श्वेत प्रदर की शिकार महिलाओं को अशोक की छाल दुग्ध कषाय लेना चाहिए। इस कषाय को बनाने के लिए लगभग ½ पाव, दूध और ½ पाव छाल और उसमें आधा सेर जल मिलाकर इस मिश्रण को इतना गरम करें कि सम्पूर्ण जल उड़ जाए, जल उड़ जाने के पश्चात् प्राप्त दूध की लगभग 3-3 तोला मात्रा दिन में दो बार लें। यह प्रयोग मासिक स्राव के 4 दिन पश्चात् प्रारंभ करें। इस प्रकार यह स्त्रियों के लिए अमोघ औषधि है।

तांत्रिक चमत्कार


तंत्रशास्त्रों में भी अशोक वृक्ष के कई प्रयोग वर्णित वृक्ष हैं। इनमें से 4 नीचे दिए जा रहे हैं-
(1) जिस घर के उत्तर की ओर अशोक वृक्ष लगा होता है उस में बिनबुलाए शोक नहीं आते।
(2) सोमवार के दिन शुभ मुहूर्त में अशोक के पत्तों को लाकर घर में रखने से अमन-चैन-होता है, श्री वृद्धि होती है।
(3) अशोक वृक्ष का बांदा चित्रा नक्षत्र में लाकर रखने से ऐश्वर्य वृद्धि होती है।
(4) उत्तराषाढ़ा में निकाला गया अशोक का बांदा अदृश्यीकरण हेतु होता है।

अशोक के ज्योतिषीय महत्व


(1)    अशोक के नीचे स्नान करने वाले व्यक्ति की ग्रहजनित बाधाएँ दूर हो जाती हैं।
(2)    मंदबुद्धि/ स्मृति लोप के शिकार एवं ऐसे जातक जिसकी पत्रिका में बुध ग्रह नीच का हो उनके लिए वृक्ष के नीचे स्नान करना शुभकारी होता है।

अशोक वृक्ष का वास्तु में महत्व


(1)    इस वृक्ष को घर के उत्तर में रोपित करना विशेष शुभ है।
(2)    अशोक के वृक्ष को घर में रोपण करने से घर में लगे हुए अन्य अशुभ वृक्षों का दोष समाप्त होता है।
(3)    अशोक/पाकर/पीपल/बड़ और आम्र जिस कुँज में होते हैं उसके स्वामी का शरीर एवं आर्थिक स्तर सदैव उत्तम रहता है।

केला


विभिन्न भाषाओं के नाम  


हिन्दी में केले के नाम से जाना जाने वाला यह फल असमिया में कोल, बंगला में काला, गुजराती में केला, कनन्ड़ में बाले गिड़ा, या बालेहन्नु, कोंकणी में केल, मलयालम में वझा, मराठी में कदलीद्व या केल, उड़िया में कोडोली या रोम्भा, तमिल में वझाई, तेलुगु में आसी, अंग्रेजी में बनाना (Banana)  या प्लेण्टेन (Plantain) और लैटिन में म्यूसा पैराडाइजिएका (Musa paradisica) नाम से पुकारा जाता है।
वनस्पति जगत के म्यूसेसी (Musaceae) कुल में  इसे रखा गया है।

संक्षिप्त वर्णन


केला एक बहुत ही स्वास्थ्यवर्धक व गुणकारी फल है। केले की गिनती हमारे देश के उत्तम फलों में होती है और हमारे मांगलिक कार्यों में भी विशेष स्थान दिया गया है। विदेशों में भी इसके गुणों के कारण इसे स्वर्ग का सेव और आदम की अञ्जीर नाम प्रदान किये गये हैं।
आमतौर पर लोगों की यह धारणा होती है कि जब केले खूब पक जाते हैं या पिलपिले हो जाते हैं, उनमें कीटाणु पैदा हो जाते हैं, किन्तु डॉक्टर टालरियो के अनुसार यह एक गलतफहमी है। वे कहते हैं कि जब तक केले का छिलका उसमें गूदे पर पूरी तरह चिपका होता है, तब तक खाने योग्य एवं हानिरहित हैं।
कुछ लोगों की यह धारणा भी है कि केले पचने में भारी होते हैं। दरअसल कच्चे या अधपके केलों को खाने से ऐसा होता है, क्योंकि ये आसानी से हमारे पेट में सरलता से पचने वाली शर्करा में परिवर्तित नहीं होते। फिर भी केले को खाने के बाद यदि भारीपन महसूस होता हो तो एक दो इलायची ऊपर से खाने से तुरन्त पेट में हल्कापन आ जाता है। डॉ विलियम टिबलस के अनुसार केले के छिलके काले हो जाने के पश्चात् भी खाने योग्य रहते हैं, बशर्ते उसका छिलका गूदे से चिपका हो।

केले के पौधे हरे, 10 से 12 फीट तक ऊँचे तथा काष्ठहीन होते हैं। इनके पत्र काफी बड़े-बड़े तथा पत्रवृंत मोटे एवं मांसल होते हैं। इसके पौधों में शाखाएँ नहीं होतीं तथा स्तम्भ पर्तदार होता है। केले के गूदे में 1.5 प्रतिशत प्रोटीन, लगभग 3 प्रतिशत विटामिन, 20 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट्स और बाकी ज्यादातर जल तत्व होता है। लिहाजा पके  हुये केलों को खाने से अजीर्ण नहीं होता। भारतीय ग्रन्थों में भी केला और दूध साथ-साथ खाने को पूर्ण भोजन कहा गया है। यह तथ्य इसलिये भी स्पष्ट हो जाता है कि हमारे भोजन के जो घटक केले में नहीं होते, वे दूध से प्राप्त हो जाते हैं। इस प्रकार दूध और केले खा लेने के बाद किसी भी व्यक्ति को भोजन करने की कोई आवश्यकता नहीं रहती है। यह योग एक सन्तुलित आहार का कार्य करता है।

छोटे बच्चों को कम से कम एक केला खिलाने से उनमें उत्तम विकार देखा जा सकता है। केले में कैल्शियम फास्फोरस, लोहा, ताँबा, सीसा, आयोडीन, सोडियम मैग्नीज आदि अनेक शरीरोपयोगी खनिज तत्व भी होते हैं। इस प्रकार हर दृष्टि से यह एक उत्तम फल है।

पके केले के गुण-

स्वादिष्ट, शीतल, वीर्यवर्धक, शरीर के लिए पुष्टकारक, माँस को बढ़ाने वाला, भूख, प्यास को दूर करने वाला तथा नेत्र रोग और प्रमेह नाशक है।

कच्चे केले के गुण-

शीतल, ग्राही एस्ट्रीजेन्ट्स- यानी जो अपनी क्रिया द्वारा शरीर के दोष, मल व धातु को सोख ले पाचन में भारी, रक्त, पित्त, वायु, कफ विकार तथा क्षय को दूर करने वाला होता है।

केले का औषधीय महत्त्व


(1)    वजन बढ़ाने के लिए-

एक पाव दूध के साथ रोजाना दो केलों का सेवन करने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है और शरीर का वजन बढ़ता है।

(2)    आँत सम्बन्धी रोगों में-

कई लोगों की आंतों में गड़बड़ी होने के कारण उन्हें दस्त या पेचिस की शिकायतें बनी रहती हैं। ऐसे लोगों को दो केलों का सेवन उनके (केलों के) वजन से आधे वजन के दही के साथ करना लाभकारी है।

(3)    मुँह के छालों पर-

कुछ लोगों को आये दिन मुंह के छाले हो जाते हैं। ऐसे लोगों को चाहिए कि वे गाय के दूध से निर्मित दही के साथ केला खायें। यह प्रयोग सात से दस दिन तक करना पड़ता है।

(4)    शीघ्रपतन में-

शीग्रपतन के रोगियों के लिये केला रामबाण औषधि है। इसके लिये केले को शहद के साथ खाना चाहिये। इसकी मात्रा है, एक केले के साथ एक तोला शहद। यह प्रयोग कम से कम पन्द्रह दिनों तक लगातार करें।

(5)    पेट के कीड़े मारने तथा खून शुद्ध करने के लिये-

इसके लिए केलों की जड़ के अर्क सेवन लाभदायक है। इस अर्क को बनाने के लिये लगभग एक किलो जल में 50 ग्राम केले की जड़ में डालकर इतना गर्म करें कि जल की मात्रा आधी हो जाये। इसके बाद मिश्रण को छान लें। यही छानन अर्क है। इसी अनुपात में ताजा अर्क बनायें। अर्क की दो तोला मात्रा एक बार में लें।

(6)    स्त्रियों के सोमरोग में-

स्त्रियों में पुरुषों के बहुमूत्र रोग के समान ही एक रोग होता है। इसे सोमरोग कहते हैं। इस रोग के इलाज के  लिए केले को शहद और शक्कर के साथ खाना चाहिये। दो केले के साथ एक तोला शहद और एक तोला शक्कर पर्याप्त है।

(7)    टी.बी.में-

टी.बी. यानी क्षय रोग में रोगी को पका केला देने से शरीर में शान्ति महसूस होती है और खाँसी में भी आराम मिलता है।


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