Bharatvarsh - Hindi book by - Sitakant Mahapatra - भारतवर्ष - सीताकान्त महापात्र
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भारतवर्ष

सीताकान्त महापात्र

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :64
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5675
आईएसबीएन :81-263-1167-3

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यह छोटी-सी किताब ‘भारतवर्ष’ संगम-स्थली है स्मृति, सत्ता और भविष्य के स्त्रोत की।

Bharatvarsh - A hindi Book by Sitakant Mahapatra

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

यह छोटी-सी किताब ‘भारतवर्ष’ संगम-स्थली है स्मृति, सत्ता और भविष्य के स्त्रोत की। एक देश जिसके ध्यानमग्न असीम सपने में जड़ी हुई हैं अनगिनत स्मृतियाँ; मेरे कुछ कलाकार मित्रों का योगदान; और शब्दों के काँपते हाथों से उस सपने को एक रूप प्रदान करने का मेरा यत्किंचित् प्रयास।

कालातीत, प्राचीन सभ्यता की यह अमरभूमि है। इसकी जन्म-कुण्डली समय के प्रारम्भ से भी बहुत पहले की है। अक्लान्त पैरों से चलते-चलते वह आ पहुँची है इतनी दूर: भूतत्त्व से, पुरातत्त्व से, इतिहास से हमारे समय तक।
इसकी स्मृतियों में उत्कीर्ण हैं असंख्य उपाख्यान। आदिगन्त पसरी समतल भूमि पर चरैवेति चरैवेति गाते हुए चले जा रहे मनुष्य का जुलूस। पत्थर की गुफाओं में, कल-कल करते नदी-तट पर सामगान का हृदयस्पर्शी स्वर। इसने याद रखा है बोधिद्रुम को, रक्तरंजित तलवार के वार से हुई अनगिनत मृत्युओं को, छप्पर उघड़े घर में भूखे पेट जीवन के आवाहन को, शान्त पर्वत के सीने पर ध्यानमग्न ऋषियों को। याद रखा है सारा स्नेह, सारी शत्रुता, सारी रुलाई, सारी मुस्कानों को; सारी शून्यताओं और परिपूर्णताओं को।

जब से मैंने होश सँभाला है, मैं उसे चाहने लगा हूँ। उसकी महकती माटी, जिस पर झरते रहे हैं तारे। वही माटी, जिसकी छाती पर हवा ने झूला झुलाया है शस्यश्यामल क्षेत्र को; मौसमी बादलों ने जिसे गहरे तक जोड़ दिया है आसमान के साथ। मैं जीता रहा हूँ उसी के स्वर्ग में। मरता रहा हूँ उसी के नर्क में। वह मेरी सबसे घनिष्ठ प्रियतमा है, सबसे अन्तरंग शत्रु है।...
नौ सर्गों में उसी की बात कहने का यह एक छोटा-सा प्रयास है। स्मृतिलिपि है लम्बे समय की; असंख्य आशा और हताशा की; स्वप्न और स्वप्नभंग की, अनन्त क्रोध की, क्षोभ की, निर्वाक् क्षणों की।
-सीताकान्त महापात्र

प्रथम सर्ग

मंगलाचरण

कहा था माँ ने
सबकुछ पवित्र है हमारे लिए इस मिट्टी का
देवदार का हर पत्ता; हर रेतीला विस्तार तट का
सारा कोहरा घने वन का
सारी उपत्यकाएँ, गुनगुनाते सारे पतंगे
देवोपम हैं स्मृतियों में हमारे लोगों की।

-कागज-पत्रों में अमेरिकी सरकार को अपना इलाका
हस्तान्तर करते समय चीफ़ ऑफ सिएटल की उक्ति
(उद्धरणः भाई इगल, बहन आकाश)

एक

युग युगान्तर का है यह इत्तिवृत्त :
शुभ्र प्रकाश की दीप्त मुद्रा राह दिखाती
घुप्प अँधेरे से ज्योति-वलय की ओर
अवरूद्ध चेतना की गुफा से
खुलते जाते लुभावने दिगन्त की ओर।

थामकर हाथ उसका ही हमने
बढ़ाया है एक-एक डग
चमड़ी जलाते तप्त रेगिस्तान से
पहली वासन्ती हवा के
थरथराते हाथ का स्पर्श करने।

अनन्त यात्रा है यह
यात्रा-एक ऐसी घनी अलौकिकता की ओर
मामूली-सी मुद्रा तक जिसकी
समझ नहीं आती कभी-कभी;
फिर दिलासा देती है,
परछाईं-सी लगी रहती है साथ-साथ
हर मुद्रा प्रतिश्रुति की
अर्थ के बोझ से अवनत
फलती है पेड़ों की तरह
झुक आये बादलों की तरह।

सबकुछ समझ जाने के बाद हम
करते हैं हस्ताक्षर प्रस्तावित शान्ति समझौतों पर:
शान्ति समझौता हत्यारे और मृतक का;
तलवार से झरती रक्तधार और प्रणव ध्वनि का:
इस पृथ्वी की अनभूली खुशियों
और स्वर्गलोक की अप्सराओं का;
रौरव नर्क और वैकुण्ठ का
हलाहल और अमृत का
भूख से मृत्यु और गंगा किनारे स्वैच्छिक मृत्यु का
सामवेद गान और हुंकार का।

कभी-कभी दिख जाते हैं
आश्रम और निर्जन पर्णकुटी
गाँव-गाँव, बस्ती-बस्ती, भीड़ भरे शहर से
झोपड़ियों की दीवारें और टाट के घर
ढेरों विलास-सदन पाँच सितारा होटलों के
सब अपनी-अपनी जगह;
पर कभी अनिवार्य बवण्डर में
खो जाते हैं सब;
इतिहास दारूण दु:स्वप्न बनकर राहुग्रस्त हो जाता है
जैसे हो हमारी वही आदि यात्रा
वही अलौकिकता, वे ही शान्ति समझौते
झूठे हैं सब निपट झूठे
उतर आना होगा पुनः
आलोक से घने अँधेरे में।
सामने हैं अन्धकार की अनेक सीढ़ियाँ।

क्षणिक है वह दुर्गति, वह अँधेरा
फिर से वापसी आरम्भ की ओर,
आरम्भ से आरम्भ की ओर,
जंगल और मेघ की लुकाछिपी
नदी की लहरों और सामगान की जुगलबन्दी।

अरी मैया, ए भारत माँ, जननी रे
उतने में ही मिल जाते हैं
सभी बच्चों को खिलौने
समय को उपकथा, बूढ़ों को सपने
चातक को बारिश की बूँद
सारी शरारती, मासूम चिड़ियों को
आकाश और गीत
मिल जाता है सभी बिरहियों को
अपना-अपना मीत।

थामकर हाथ एक-दूसरे का
फिर निकल पड़ते हैं बाहर
पंक और नक्षत्रमाला;
शिकार और शिकार
संगीत और श्लोक पढ़ रहे होते हैं;
जहाँ रहें सब, रहें आनन्द से।
सार्थकता है सबकी अपनी-अपनी
सृजन की इस पुण्यभूमि पर।

तुम हो मेरी इहकाल, परकाल
हताशा मेरे दीर्घश्वास में
संगीत और चाँदनी में
घिरे हुए अँधेरे की महकती भूमि में
वर्षा से नहायी, सूर्य से तपी
मलय पवन और कोयल के पंचम से उद्दीप्त
यन्त्रणा से शान्ति
शीतल पवन से सदा पुलकित
सदा मुखारित निर्जन महाशून्य से।

तुम हो मेरी अन्तरंग शत्रु
विमुग्ध प्रेमिका।
सुप्त पत्थर के हृदय में बजता
संगीत सुनती हो
असंख्य लोगों की हताशा और सपनों से
इतिहास बुनती हो
इतिहास बुनती हो अन्नत।

दो

आँखें खुली हैं
पर सोता रहा हूँ गहरी नींद में
इन तमाम दिनों में
देश नहीं काल नहीं
कालातीत है वह सपना
सपना, जो हमारे अनुराग को
और भी साकार और सघन करता है,
हमें और हमारी भ्रान्तियों को
और भी वास्तविक बनाता है;
हमसे अनजाने किस सम्मोह से,
जिससे की महमह माटी पर तारे झरते हैं।

किसी नक्शे, ताड़पत्र या भूर्जपत्र और ताम्रपत्र में
सम्भव नहीं आँकना तस्वीर सहज ही।
घिस-घिसकर भी मिटा नहीं पाती
वह अदृश्य सीमारेखा, उसके खूँखार राक्षस।

रूप उसका बखान करते-करते हार गये
कोटि-कोटि चित्रकार, वास्तुकार और कविकुल।
ऐसी भी कोई राह नहीं जिससे होकर
पहुँच सकें चलते-चलते गोपनीय मन्दिर में उसके।

जन्म-जन्मान्तर से देखता रहा हूँ मैं वह सपना
आँखें खोले अपलक
गहरी नींद में।
अन्त में बन गया मैं भी
एक नन्हा अविभाज्य अंग उसी सपने का।
देखा है उसने मेरा प्रारम्भ
सुनी है मेरी कुआँ-कुआँ रोने की आवाज़
समय आने पर देखेगा वह मेरा अन्तिम दिन भी
जैसे की देखे हैं उसने प्रारम्भ और अन्त
नचिकेता, अकबर, सिकन्दर
और उद्दालक, याज्ञवल्क्य, शुक्र और सौनक मुनि
जुलूस सम्राट और मन्त्री एवं पार्षदों के।

तीन

देखो तो कभी-कभी लगता है
वह मेरी दादी माँ है
लाड़ से सहला रही है मुझे बड़े जतन से
बप्पा से छड़ी खाकर रोते बच्चे को
या चाँदनी रात में बैठकर
नये प्यार को याद करते प्रेमी को
प्रतिपदा के चाँद-सी नन्ही मुस्कान
अब भी चिपकी हुई है पोपले मुँह में उसके।

और कभी लगता है माँ जैसी
खाने की थाली के पास बैठी है मक्खियाँ उड़ाती
कान्हा के गायों की वापसी की राह तकती
राह तकती है स्कूल या दफ्तर से लौटने की
भाँति-भाँति के अन्न और व्यंजन बनाये
तरह-तरह की सुगन्ध थालियों में सजाये।

देश नहीं है इतिहास, भूगोल की वस्तु
भू-तत्त्व से पुरातत्त्व तक, पर्त-दर-पर्त परम्परा नहीं
बर्फ की चादर से ढकी चोटी नहीं
गुफा नहीं ध्यानमग्न ऋषियों-मुनियों की
सूफीआना गीत, नमाज़ में डूबी पवित्र आत्मा नहीं
रेत और मृगतृष्णा ओढ़े सोया रेगिस्तान नहीं
ना ही है वह महानदी, ना गोदावरी ना सिन्धु या कवेरी।

बना है वह इन सारे उपादानों से
पर और भी कुछ अबूझ, अवर्णनीय
गूढ़ और गोपनीय वस्तु झलकती है उसकी आत्मा में
जिसे नहीं समझ पाता पूरी तरह, सपने-सा लगता है
देखे हुए लम्बे सपने-सा
मानो वह चिरकाल झरता
स्वर है सुमधुर शहनाई का
सारी हँसी-रूलाई, आह्लाद-विषाद लिये
नदी किनारे मन्थर हवा में
मन को छूती लहर है बाँसुरी की,
अद्भुत उर्वर मिट्टी
और फसल के कोरस में बारिश है ठिठुरते बादलों की।

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