मजाज और उनकी शायरी - प्रकाश पंडित Majaz Aur Unaki Shayari - Hindi book by - Prakash pandit
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मजाज और उनकी शायरी

प्रकाश पंडित

प्रकाशक : राजपाल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :128
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5676
आईएसबीएन :9789350643846

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प्रस्तुत है मजाज की जिन्दगी, उनकी बेहतरीन शायरी, नज्में, गजले और शेर...

Majaj aur Unki shayari

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

उर्दू के लोकप्रिय शायर

वर्षों पहले नागरी लिपि में उर्दू की चुनी हुई शायरी के संकलन प्रकाशित कर राजपाल एण्ड सन्ज़ ने पुस्तक प्रकाशन की दुनिया में एक नया कदम उठाया था। उर्दू लिपी ने जानने वाले लेकिन शायरी को पसंद करने वाले अनगिनत लोगों के लिए यह एक बड़ी नियामत साबित हुआ और सभी ने इससे बहुत लाभ उठाया।
ज्यादा तक संकलन उर्दू के सुप्रसिद्ध सम्पादक प्रकाश पंडित ने किये हैं। उन्होंने शायर के सम्पूर्ण लेखन से चयन किया है और कठिन शब्दों के अर्थ साथ ही दे दिये हैं। इसी के साथ, शायर के जीवन और कार्य पर-जिनमें से समकालीन उनके परिचित ही थे। बहुत रोचक और चुटीली भूमिकाएं लिखी हैं। ये बोलती तस्वीरें हैं जो सोने में सुहागे का काम करती हैं।

 

मजाज़

 

‘‘मजाज़ उर्दू शायरी का कीट्स था।’’
‘‘मजाज़ वास्तविक अर्थों में प्रगतिशील शायर था।’’
‘‘मजाज़ अच्छा शायर और घटिया शराबी था।’’
‘‘मजाज़ नीम पागल लेकिन निष्कपट व्यक्ति था।’’
ये मशहूर उर्दू शायर मजाज़ की कुछ विशेषताएं हैं जिन्हें उनको जानने और मिलन वालों ने कहा है।

 

मजाज़

 

 

‘‘ ‘मजाज़’ उर्दू शायरी का कीट्स1 है।’’
‘‘ ‘मजाज़’ शराबी है।’’
‘‘ ‘मजाज़’ बड़ा रसिक और चुटकुलेबाज़ है।’’
‘‘ ‘मजाज़’ के नाम पर गर्ल्स कालिज अलीगढ़ में लाटरियां डाली जाती थीं कि ‘मजाज़’ किसके हिस्से में पड़ता है। उसकी कविताएं तकियों के नीचटे छुपाकतर आंसुओं से सींची जाती थीं और कुंवारियां अपने भावी बेटों का नाम उसके नाम पर रखने की क़समें खाती थीं।’’

‘‘ ‘मजाज़’ के जीवन की सबसे बड़ी ट्रेजिडी औरत है।’’
‘‘मजाज़’ से मिलने से पूर्व मैं ‘मजाज़’ के बारे में तरह-तरह की बातें सुना और पढ़ा करता था और उसका रंगारंग चित्र मैंने उसकी रचनाओं में भी देखा था, विशेष रूप से उसकी नज़्म ‘आवारा’ में तो मैंने उसे साक्षात् रूप से देख लिया था। जगमगाती, जागती सड़कों पर आवारा फिरने वाला शायर ! जिसे रात हंस-हंसकर एक और मैख़ाने और प्रेमिका के काशाने (घर) में चलने को कहती है तो दूसरी ओर सुनसान वीराने को। जों प्रेम की असफलता और संसार के तिरस्सकार का शिकार है। जिसके दिल में बेकार जीवन की उदासी भी है और भी प्रबल हो उठी।
यह इच्छा बहुत बाद 1948 ई. में पूरी हुई जब देश के बंटबारे के बाद मैं लाहौर से दिल्ली में आ बसा था और मैंने और ‘साहिर’
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1.विश्व-विख्यात अंग्रेज रोमांटिक कवि

लुधियानवी ने उर्दू की प्रसिद्ध पत्रिका ‘शाहराह’ की नींव डाली थी। ‘मजाज़’ से मेरी मुलाक़ात बड़े नाटकीय ढंग से हुई। रात के दस-ग्यारह का समय होगा। मैं और ‘साहिर’ नया मुहल्ला, पुल बंगष के एक मकान में घुसने की कोशिश कर रहे थे। मुहल्ला मुसलमानों का था और शहर का वातावरण मुसलमानों के ख़िलाफ़। अर्थात्, एक चीज़ मेरे ख़िलाफ़ भी और दूसरी ‘साहिर’ के। इसलिए हम चाहते थे कि बड़े यत्नों से हाथ आए उस मकान पर हमारे कब्जे की किसी को कानोंकान ख़बर न हो। ‘साहिर’ चुपके-चुपके सामान ढो रहा था और मैं मुहल्ले के बाहर सड़के के किनारे सामान की रखवाली कर रहा था कि एकाएक एक दुबला-पतला व्यक्ति अपने शरीर की हड्डियों के ढांचे पर शेरवानी मढ़े बुरी तरह लड़खड़ाता और बड़बड़ाता मेरे सामने आ खड़ा हुआ।

‘‘अख़्तर शीरानी1 मर गया-हाय अख़्तर’ ! तू उर्दू का बहुत बड़ा शायर था-बहुत बड़ा !’’
वह बार-बार यही वाक्य दोहरा रहा था। हाथों से शून्य में उल्टी-सीधी रेखाएं बना रहा था और साथ-साथ अपने मेज़बान को कोसे जा रहा था जिसने घर में शराब होने पर भी से और शराब पीने को न दी थी और अपनी मोटर में बिठाकर रेलवे पुल के पास छोड़ दिया था। ज़ाहिर है कि इस ऊटपटांग-सी मुसीबत से मैं एकदम बौखला गया। मैं नहीं कह सकता कि उस समय उस व्यक्ति से मैं किस तरह पेश आता कि ठीक उसी समय कहीं से ‘जोश’ मलीहाबादी निकल आए और मुझे पहचानकर बोले, ‘‘इसे संभालो, प्रकाश ! ‘मजाज़’ है।’’

‘मजाज़’ को संभालने की बजाय उस समय आवश्यकता यद्यपि अपने-आपको संभालने की थी लेकिन ‘मजाज़’ का नाम सुनते ही मैं एकदम चौंक पड़ा और दूसरे ही क्षण सब कुछ भुलाते हुए मैं इस प्रकार उससे लिपट गया मानो वर्षों पुरानी मुलाक़ात हो।
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1.उर्दू का एक प्रसिद्ध रोमांटिक शायर

‘मजाज़’ से, जैसा कि प्रत्यक्ष है, उस समय मेरी वर्षों पुरानी मुलाक़ात न थी, लेकिन आज अट्ठाइस वर्ष बाद ये पंक्तियां लिखते समय मैं कह सकता हूं कि मैंने ‘मजाज़’ को हर रंग में देखा है। होश में, बेहोशी में। शराब के लिए भटकते हुए और शराब पीकर भटरते हुए। बड़ी मौने अवस्था में और बुरी तरह चहकते हुए। अपने जीवन की निराशाओं और विफलताओं पर दुखी होते हुए और अपने जी की निराशाओं और विफलताओं का मज़ाक उड़ाते हुए। सोते-जागते, उठते-बैठते, चलते-फिरते, ‘मजाज़’ को मैंने खूब-खूब देखा है। उसकी शायरी और व्यक्तित्व पर लिखा गया लगभग हर शब्द पढ़ा है। उसके मित्रों और सगे संबंधियों से मिला हूं और दो-चार बार मुझे उसके आतिथ्य का सौभाग्य भी प्राप्त हो चुका है। यों अपने-आपको मैंने उन लोगों में से समझता हूं जिन्हें ‘मजाज़’ और उसकी शायरी पर किंचित् विश्वास के साथ कुछ लिखने का अधिकार पहुंचता है।

‘मजाज़’ उन दिनों लगभग एक महीना हमारे साथ रहा। उसकी अंधाधुंध शराबनोशी के बारे में मैं पहले से सुन चुका था, और पहली मुलाक़ात में मुझे इसका तजुर्बा भी हो गया था, लेकिन इस एक महीने में मुझे अनुभव हुआ कि ‘मजाज़’ शराब को नहीं पीता, शराब बड़ी बेदर्दी से ‘मजाज़’ को पीती जा रही है। और यह अनुभव 1951-52 ई. में और भी उग्र हो उठा जब मेरे चांदनी चौक वाले मकान में ‘मजाज़’ लगातार कई महीने मेरे साथ रहा। इस बार ‘मजाज़’ को मैं उर्दू बाज़ार की एक पुस्तकों की दुकान पर से अर्धमृतावस्था में उठाकर लाया था। और मैंने निश्चय किया था कि जहां तक संभव होगा उसे शराब नहीं पीने दूंगा। लेकिन अफ़सोस ! मेरे सभी प्रयत्न बेकार गए। खाट छोड़ते ही ‘मजाज़’ ने फिर से पीनी शुरू कर दी-इस बुरी तरह की जीवन में तीसरी बार उस पर नर्वस ब्रेकडाउन का आक्रमण हुआ। उन दिनों उसने दिल्ली में ऐसी ख़ाक छानी, काम-वासना के ऐसे तमाशे दिखाए कि विश्वास नहीं होता था कि यही वह ‘मजाज़’ है जो होश की हालत में किसी मामूली-से छिछोरेपन को भी गुनाह का दर्जा देता था। जिसे हर समय छोटे-बड़े का लिहाज़ रहता था और जो इतना शर्मीला-लजीजा था कि स्त्रियों के सामने उसकी नज़रें तक न उठती थीं। उन दिनों ‘मजाज़’ को देखकर ‘पथभ्रष्ट महानता’ का ख़याल आता था। और शायद उसने ठीक ही कहा था कि :

 

मेरी बर्बादियों का हमनशीनो
तुम्हें क्या, खुद मुझे भी ग़म नहीं है1

 

यों तो ‘मजाज़’ को शुरू से रतजगे की बीमारी थी और इसी कारण घर के लोगों ने उसका नाम ‘जग्गन’ रख छोड़ा था, लेकिन उन दिनों शराब की तंद्रा के अतिरिक्त ‘मजाज़’ को बिलकुल निद्रा न आती थी। अक्सर रात के डेढ़-दो बजे घर पहुंचता या पहुंचाया जाता। दरवाज़ा खोलने और उसे उसके कमरे में पहुंचाकर खाना खिलाने की मैंने नौकर को ताकीद कर रखी थी। लेकिन ‘मजाज़’ पर उस समय किसी से बातें करने का मूड़ सवार होता था; अतएव दरवाज़ा खुलते ही वह सीधा हमारे सोने के कमरे की ओर लपकता। सोने के कमरे का दरवाज़ा चूंकि
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1.इसमें सन्देह नहीं कि ‘मजाज़’ के जीवन में जितनी कटुताएं थीं वह स्वयं ही उन सबका जन्मदाता था, लेकिन वह सदैव अपनी उन कटुताओं से खेला और उन्हीं से अपने लिए रस भी निचोड़ता रहा। आश्चर्य होता है कि ऐसा दुःख-भरा जीवन व्यतीत करने पर भी उसने कभी अपनी स्वाभाविक प्रफुलल्लता और चुटकुलेबाज़ी को हाथ से न जाने दिया था।
एक बार बेतकल्लुफ़ मित्रों की एक महफ़िल में एक ऐसे मित्र आए जिनकी पत्नी का हाल ही में देहान्त हो गया था और वे बहुत ही उदास थे। सभी मित्र उन्हें धीरज धरने को कहने लगे। एक मित्र ने तजवीज़ रखी कि दूसरी शादी तो आप करेंगे ही। जल्दी क्यों नहीं कर लेते ताकि यह हम गलत हो जाए। उन महाशय ने बड़ी गम्भीरता से कहा कि जी हां, शादी तो मैं ज़रूर करूंगा। लेकिन चाहता हूं कि किसी बेवा से करूं। यह सुनना था कि ‘मजाज़’ ने बड़ी सहृदयता प्रकट करने हुए तुरन्त कहा, ‘‘भाई साहब, आप शादी कर लीजिए, वह बेचारी खुद ही बेवा हो जाएगी।’’
अब कौन था जो इस भरपूर वाक्य से आनन्दित हुए बिना रह सकता। स्वयं वह मित्र भी खिलखिला पड़े।–और वह मित्र थे उर्दू के प्रसिद्ध शायर स्वर्गीय ‘रविश’ सिद्दीक़ी।
इसी प्रकार एक साहित्य-सभा में भाषण देते हुए जब सरदार जाफ़री ने ‘इक़बाल’ की शायरी के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए उसे ध्वंसशील तथा प्रतिक्रियावादी कह दिया तो श्रोताओं में से ‘इक़बाल’ के किसी श्रद्धालु ने चिल्लाकर कहा, ‘आअपनी यह बकवाद बन्द कीजिए। आपकी इस बकवास से ‘इक़बाल’ की रूह को सदमा पहुंच रहा है।’’
सभा में शायद गड़बड़ हो जाती, लेकिन मजाज़’ ने तुरन्त उठकर माइक्रोफ़ोन हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘जनाब ! सदमा तो आपकी रूह को पहुंच रहा है, जिसे आप ग़लती से ‘इक़बाल’ की रूह समझ रहे हैं।’’

और यों पूरी सभा क़हक़हा लगा उठी।
यह तो खैर महफ़िलों और सभाओं की बातें हैं, ‘मजाज़’ रास्ता चलते हुए भी फुलझड़ियों छोड़ता जाता था। एक बार एक तांगे को रोककर, तांगे वाले से बोला, ‘‘क्यों मियां कचहरी जाओगे ?’’
तांगे वाले ने सवारी मिलने की आशा से प्रसन्न होकर उत्तर दिया, ‘‘जाएंगे साब।’’
‘‘तो जाओ,’’ ‘मजाज़’ ने कहा और अपने रास्ते पर हो लिया।

भीतर से बन्द होता था, इसलिए वह बाहर से ही चिल्लाकर पुकारता, ‘‘हद है प्रकाश, अभी से सो गए !’’
और यह पुकार सुबह चार-पांच बजे फिर सुनाई देती, ‘‘हद है प्रकाश, अभी तक सो रहे हो !’’
शराबनोशी पर मेरी लगाई हुई पाबन्दियों से छुटकारा पाने के ‘मजाज़’ ने यह तरीका ढूंढ़ निकाला था कि रात वह मेरे सोते में घर आता था और सुबह मेरे सोते में ही घर से निकल जाता था, और कभी-कभी तो कई-कई दिन तक सिवाय अ़सोसनाक ख़बरों के उसका कुछ अता-पता न मिलता था। उसे जानने वाले और उसे चाहने वाले उससे कन्नी काटते, लेकिन ‘मजाज़’ को इसका कुछ एहसास न होता। कपड़े मैले हैं या फट गए, उसकी भी चिन्ता न थी।

 कितने दिन से अन्न नाम की कोई चीज़ पेट में नहीं गई, इस ओर ध्यान देने की शायद फुर्सत ही न थी। यदि कोई धुन थी तो बस यही कि कहां से, कब और कितनी मात्रा में शराब मिल सकती है ! दिन-रात निरन्तर शराबनोशी का परिणाम नर्वस ब्रेकडाउन के सिवा और क्या हो सकता था जो हुआ। किसी प्रकार पकड़-धकड़ कर रांची मैण्टल हस्पताल में पहुंचाया, लेकिन स्वस्थ होते ही यह सिलसिला फिर से शुरू हो गया; और यह सिलसिला 6 दिसम्बर, 1955 ई. को बलरामपुर हस्पताल, लखनऊ में उस समय समाप्त हुआ जब कुछ मित्रों के साथ ‘मजाज़’ ने नियमानुसार बुरी तरह शराब पी। मित्र तो अपने-अपने घरों को सिधार गए लेकिन ‘मजाज़’ रात-भर की नस फट गई।

हमारा देश चूंकि मृतृ-पूजक है इसलिए ‘मजाज़’ की मृत्यु पर अनगिनत लेख लिखए गए। शोक-सभाएं हुईं। पत्र-पत्रिकाओं के विशेषांक निकले और उन लोगों ने भी बड़ा शोक मनाया जो उसकी ज़बान से उसका कलाम और चलते हुए फ़िकरे सुनने के लिए उसे शराब के रूप में ज़हर पिलाया करते थे। मुझे दिल्ली की ऐसी कई महफिलें याद है जहां उच्च वर्ग की सुन्दर तथा भद्र महिलाओं का झुरमुट होता था; यहां ‘मजाज़’ को ताबड़तोड़ पैग किए जाते थे और उससे ताबड़तोड़ नज़्में और ग़ज़लें सुनी जाती थीं। लेकिन मेज़बान देखते कि ‘मजाज़’ का सांस फूल गया है, अब उससे और कुछ न सुनाया जाएगा, या वह अपने आपे में नहीं रहा तो वे उसे अपने ड्राइवर के हवाले कर देते थे कि उसे उसके निवास-स्थान पर छोड़ आए; या अगर यह प्रबंध नहीं होता था तो अपने बंगले के किसी सर्वेट क्वार्टर में बन्द करके बाहर से ताला डाल देते थे।
‘मजाज़’ की ऐसी शराबनोशी के लिए मैं ‘मजाज़’ को निर्दोष नहीं समझता, लेकिन उसकी ऐसी दयनीय मृत्यु के सम्बन्ध में मैं उन कृपालुओं को बराबर का दोषी समझता हूं जिन्होंने ‘मजाज़’ की ज़िन्दगी के हालात से वाकिफ़ होते हुए भी उसे पकड़-पकड़कर शराब पिलाई।

‘मजाज़’ की ज़िन्दगी के हालात बड़े दुःखद थे। कभी पूरी अलीगढ़ यूनिवर्सिटी, जहां से उसने बी.ए. किया था, उस पर जान देती थी। गर्ल्स कालिज में हर ज़बान पर उसका नाम था। उसकी आंखें कितनी सुन्दर हैं ! उसका क़द कितना अच्छा है। वह क्या करता है ? कहां रहता हैं ? किसी से प्रेम तो नहीं करता-ये लड़कियों के प्रिय विषय थे और वे अपने क़हक़हों, चूड़ियों की खनखनाहटों और उड़ते हुए दुपट्टों की लहरियों में उसके शे’र गुनगुनाया करती थीं। लेकिन लड़कियों का वही चहेता शायर जब 1936 ई. में रेडियो की ओर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका आवाज़’ का सम्पादक बनकर दिल्ली आया तो एक लड़की के ही कारण उसने दिल पर ऐसा घाव खाया जो जीवन-भर अच्छा न हो सका। एक वर्ष बाद ही नौकरी छोड़कर जब वह अपने शहर लखनऊ को लौटा तो उसके सम्बन्धियों के कथनानुसार वह प्रेम की ज्वाला में बुरी तरह फुंक रहा था और उसने बेतहाशा, पीनी शुरू कर कर दी थी। इसी सिलसिले में 1940 ई. में उस पर नर्वस ब्रेकडाउन का पहला आक्रमण हुआ और यह रट लगी कि फ़लां लड़की मुझसे शादी करना चाहती है लेकिन रक़ीब (प्रतिद्वन्द्वी) ज़हर देने की फ़िक्र में हैं। यहां यह बताना बेमौका न होगा कि ‘मजाज़’ ने दिल्ली के एक उच्च घराने की अत्यन्त सुन्दर और इकलौती लड़की से प्रेम किया था, लेकिन उसके विवाहिता होने के कारण यह बेल मंढ़े न चढ़ सकी और उसने यह कहते हुए दिल्ली से विदा ली थी कि:

 

रुख़्सत ऐ दिल्ली ! तेरी महफ़िल से अब जाता हूं मैं
नौहागर1 जाता हूं मैं, नाला-ब-लब2 जाता हूं मैं

 

उपचार-चिकित्सा से मानसिक दशा सुधरी तो माता-पिता ने हृदय के घाव का इलाज करना चाहा। लड़की ! कोई-सी लड़की जो उसके
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1.विलाप करते हुए2.होंठों पर आर्तनाद लिए हुए

जीवन का सहारा बन सके जो, उसके सिरते हुए नासूर पर मरहम रख सके ! लेकिन वही लोग, जिन्हें कभी मजाज़’ को अपना दामाद बनाने की बड़ी अभिलाषाएं थीं, अवगुण गिनवाने लगे; और लड़कियों को तो जैसे अब ‘मजाज़’ से भय लगने लगा था।

‘मजाज़’ ने सामान्य जीवन व्यतीत करने का निश्चय किया। कुछ दिनों तक ‘बम्बई इन्फ़र्मेशन’ में काम करता रहा। वहाँ से लौटा तो लखनऊ विश्वविद्यालय में एल-एल. बी में दाख़िला ले लिया। उन्हीं दिनों ‘सिब्तेसहन’ और ‘सरदार जाफ़री’ के साथ ‘नया अदब’ नाम से एक प्रगतिशील पत्रिका निकाली और फिर हार्डिग लाइब्रेरी, दिल्ली में असिस्टेंट लाइब्रेरियन की हैसियत से काम करने लगा। लेकिन उसी ज़माने में, उसकी छोटी बहन ‘हमीदा सालिम’ के कथनानुसार चोट पर एक और चोट पड़ी। घर वालों ने किसी प्रकार एक नाता तय किया और ‘मजाज़’ ने शायद आत्म-समर्पण में सुख अथवा मुक्ति पाने के विचार से ह़ामी भी भर दी, लेकिन जब वर-दिखव्वे के तौर पर वह अपने ससुर की सेवा में उपस्थित हुआ तो हज़ारों रुपया मासिक कमाने वाले सरकारी पदाधिकारी को डेढ़ सौ रुपल्ली मासिक पाने वाले असिस्टेंट लाइब्रेरियन में कोई आकर्षण नज़र न आया।

यहां एक बार फिर धन की जीत और कला की हार हुई। शायर ने एक बार दिल की आवाज़ पर क़दम उठाए थे और मुंह के बल गिरा था। अब के अक़्ल पर भरोसा किया था, फूंक-फूंककर क़दम रखा था, लेकिन फिर ठोकर खा गया और खिसियाकर रो पड़ा और 1954 ई. में उस पर पागलपन का दूसरा हमला हुआ।

अब वह स्वयं ही अपनी महानता के राग अलापता था। शायरों के नामों की सूची तैयार करता था और ‘ग़ालिब’ और इक़बाल’ के नाम के बाद अपना नाम लिखकर सूची समाप्त कर देता था। डॉक्टरों के भरसक प्रयत्नों तथा घर वालों की जानतोड़ सेवा-शुश्रूषा से किसी प्रकार स्वास्थ्य लाभ हो गया पर जीवन का ढर्रा न बदल सका। निरन्तर बेकारी और एकाकीपन का साथ रहा। शराबनोशी बढ़ती गई। जीवन की कटुताएं बढ़ती गईं और वह उन कटुताओं को शराब में डुबोने का असफल प्रयत्न करते-करते स्वयं ही शराब में डूब गया।

आधुनिक उर्दू शायरी का यह प्रिय दयनीय शायर सन् 1909 ई. में अवध के एक प्रसिद्ध क़सबे रदौली में पैदा हुआ। पिता सिराजुलहक़ रदौली के पहले व्यक्ति थे ‘जिन्होंने ज़मींदार होते हुए भी उच्च शिक्षा प्राप्त की और ज़मींदारी पर सरकारी नौकरी को प्राथमिकता दी। यों असरारुल हक़ (मजाज़’ का पालन-पोषण उस उभरते हुए घराने में हुआ जो एक ओर जीवन के पुराने मूल्यों को छाती से लगाए हुए था और दूसरी ओर नए मूल्यों को भी अपना रहा था1। बचपन में, जैसाकि उसकी बहन ‘हमीदा’ ने एक जगह लिखा है, ‘मजाज़’ बड़े सरल स्वभाव तथा विमल हृदय का व्यक्ति था। जागीरी वातावरण में स्वामित्व की भावना बच्चे को मां के दूध के साथ मिलती है लेकिन वह हमेशा निर्लिप्त तथा निःस्वार्थ रहा। दूसरों की चीज़ को अपने प्रयोग में लाना और अपनी चीज़ दूसरों को दे देना उसकी आदत रही। इसके अतिरिक्त वह शुरू से ही सौन्दर्य-प्रिय भी था। कुटुम्ब में कोई सुन्दर स्त्री देख लेता तो घंटों उसके पास बैठा रहता। खेल-कूद, खाने-पीने किसी चींज़ की सुध न रहती। प्रारम्भिक शिक्षा लखनऊ के अमीनाबाद हाई स्कूल में प्राप्त कर जब वह आगरा के सेंट जोन्स कालिज में दाखिल हुआ तो कालिज में मुईन अहसन ‘जज़्बी’ और पड़ोस में ‘फ़ानी’ ऐसे शायरों की संगत मिली और यहीं से ‘मजाज़’ की उस ज्योतिर्मय शायरी का प्रादुर्भाव हुआ जिसकी चमक आगरा, अलीगढ़ और दिल्ली से होती हुई समस्त भारत में फैल गई।
‘मजाज़’ की शायरी का आरम्भ बिलकुल परम्परागत ढंग से हुआ
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1.इस विशेषता की झलक ‘मजाज़’ के व्यक्तित्व में भी थी और शायरी में भी। उसका पूरा कलाम ‘पुरानी बोतलों में नई शराब’ का साक्षी है।

और उसने उर्दू शायरी के मिजाज़ का सदैव ख़याल रखा। ऊपर मैं कह चुका हूं कि ‘मजाज़’ को ‘अख़्तर’ शीरानी की मृत्यु का बड़ा शोक था और मदहोशी की हालत में भी वह उसे उर्दू का बहुत बड़ा शायर कह रहा था। वास्तविकता यह है कि ‘अख़्तर’ शीरानी और ‘मजाज़’ की शायरी की पृष्ठभूमि एक-सी है। मूल रूप से दोनों रोमांटिक और संगीत-धर्मी शायर हैं। वहां भी बेकार जीवन की खिन्नता है और यहां भी। वहां भी शराब है और यहां भी। वहां भी कोई-न-कोई ‘सलमा’ या ‘अज़रा’ है और यहां भी कोई ‘ज़ोहरा-जबीं’। वहां भी ग़ालिब’, ‘मोमिन’, ‘हाफिज़’ और ‘खय्याम’ के स्वरों की गूंज है और यहां भी। लेकिन आगे चलकर जो चीज़ ‘मजाज’ को ‘अख़्तर शीरानी से अलग करती है, वह है ‘मजाज़’ का सुलझा हुआ बोध या विवेक। ख़ालिस इश्क़िया शायरी करते हुए भी वह अपने जीवन तथा जन-साधारण के जीवन के प्रभावों तथा प्रकृतियों को विस्मृत नहीं करता। हुस्नों-इश्क़ का एक अलग संसार बसाने की बजाय वह हुस्नों-इश्क़ पर लगे सामाजिक प्रतिबन्धों के प्रति अपना रोष प्रकट करता है। आसमानी हूरों की ओर देखने की बजाय उसकी नज़र रास्ते के गंदे लेकिन हृदयाकर्षक सौन्दर्य पर पड़ती है और इन दृश्यों के प्रेक्षण के बाद वह जन-साधारण की तरह जीवन के दुःख-दर्द के बारे में सोचता है और फिर कलात्मक निखार के साथ जो शे’र कहता है तो उसमें केवल किसी ‘ज़ोहरा-जबीं’ से प्रेम ही नहीं होता, विद्रोह की झलक भी होती है। यह विद्रोह कभी वह वर्तमान जीवन-व्यवस्था से करता है, कभी साम्राज्य से; और जीवन की वंचनाओं के वशीभूत कभी-कभी इतना कटु हो जाता है कि अपनी जोहरा-जबीनों के रंगमहलों तक को छिन्न-भिन्न कर देना चाहता है।

शायद इसीलिए ‘मजाज़’ की शायरी की विवेचना करते हुए उर्दू के प्रसिद्ध शायर स्वर्गीय ‘असर’ लखनवी ने एक बार लिखा था कि ‘‘उर्दू में एक कीट्स पैदा हुआ था लेकिन इन्क़िलाबी भेड़िए उसे उठा ले गए।’’

‘मजाज़’ को इन्क़िलाबी भेड़िए (प्रगतिशील लेखक) उठा ले गए या वह स्वयं मिमियाती हुई भेड़ों के रेवड़ से निकल आया, इस बहस की यहां गुंजाइश नहीं है। लेकिन इस वास्तविकता से उर्दू साहित्य का कोई पाठक इनकार नहीं कर सकता कि ‘मजाज’ ने जिस दृष्टि से व्यक्तिगत दुःखों को सामाजिक पृष्ठभूमि में देखा और जांचा और यथार्थ और रोमांस का संगम तलाश किया, और उसके यहां रस और चिन्तन का जो सुन्दर समन्वय मिलता है, वह उसकी कवित्व-शक्ति के अतिरिक्त इस बात का भी द्योतक है कि कोई साहित्यकार केवल शून्य में जीवन व्यतीत नहीं कर सकता और न ही अपनी कल्पना के पंखों पर उड़कर अधिक देर तक किसी कृत्रिम स्वर्ग में जीवित रह सकता है।

1935 ई. में जबकि ‘मजाज़’ को शे’र कहते अभी केवल पांच वर्ष हुए थे और भारत में अभी ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की नींव भी नहीं पड़ी थी, ‘मजाज़’ ने इन शब्दों में अपना परिचय दिया था :



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