मनुष्य का विराट रूप - आनन्द कुमार Manushya Ka Virat Roop - Hindi book by - Anand Kumar
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मनुष्य का विराट रूप

आनन्द कुमार

प्रकाशक : राजपाल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :235
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5677
आईएसबीएन :81-7028-615-8

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अपने लक्ष्य को हासिल करने और अपने सपने को साकार करने के लिए एर प्रेरणात्मक पुस्तक...

manushya ka virat roop

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रत्येक व्यक्ति में अनेक क्षमताएँ और योग्यताएँ होती हैं जिनका विकास करके मनुष्य अपना वास्तविक रूप, अपना विराट रूप पा सकता है। इन गुणों के विकास से सफलता पाना सुलभ हो जाता है। यही इस पुस्तक का विषय है, जिसे सरल भाषा और रोचक शैली में प्रस्तुत किया गया है।

 

प्रथम संस्करण की भूमिका

इस पुस्तक में आत्मपूर्णता और लोकयात्रा की सफलता के लिए मनुष्यमात्र को जिन आवश्यक विषयों की जानकारी होनी चाहिए, उनकी सार-सामग्री सरल ढंग से प्रस्तुत की गई है। इस साधारण मनुष्य में कितनी और कैसी विलक्षण क्षमता होती है सर्व- सुलभ अपने जीवन स्तर में ऊँचा उठाकर कुछ का कुछ हो सकता है, जीवन की सद्गगति का रहस्य क्या है, पुरुषार्थी को अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए विघ्न-बाधाओं के बीच से किन मार्गों पर और कैसे आगे बढ़ना चाहिए, मनुष्यता का स्वरूप और महत्त्व क्या है, किसी भी प्रकार का अधिकार कैसे मिलता है, लोकप्रियता और प्रतिष्ठा की प्राप्ति कैसे हो सकती है, आचार-विचार और सम्पूर्ण व्यक्तित्व को क्यों और कैसे निर्दोष रखना चाहिए, महापुरुषों के चरित्र से क्या सीखा जा सकता है-ऐसे अनेक प्रश्नों का प्रामाणिक एवं सन्तोषजनक उत्तर इसमें मिलेगा। साथ ही इस पुस्तक में निर्भयता, विनय, नम्रता, सुशीलता, दान, परोपकार, सेवा, और सत्संगति आदि के सम्बन्ध में बहुत सी मनोवैज्ञानिक तथा व्यावहारिक ज्ञान की बातें दी गई हैं। संक्षेप में, मैंने उन सद्गुणों पर प्रकाश डालने की चेष्टा की है जिनके द्वारा मानव जीवन सुसंस्कृत सशक्त और मर्यादित होता है। आशा है, पाठक इस पुस्तक में प्रस्तुत स्वाध्याय की सामग्री का भली भाँति उपयोग तथा उपभोग करेंगे।

 

आनन्द कुमार

 

1

मनुष्य का विराट रूप

एक मनुष्य क्या कर सकता है

 

एक सूर्य सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित कर देता है; आग की एक चिनगारी समस्त जगत् को प्रज्वलित कर सकती है; रोग का एक कीटाणु महामारी के रूप में प्रकट हो जाता है। एक परमाणु में कितनी शक्ति होती है, इसे हम आज प्रत्यक्ष देख सुन रहे हैं। हमारे प्राचीन मनीषियों ने आज से सहस्त्रों वर्ष पूर्व ही जान लिया था। कि एक-एक कण में असीम शक्ति व्याप्त है। संसार में शक्तिहीन और निरर्थक कुछ भी नहीं है। एक शून्य भी किसी संख्या के महत्त्व को दस गुणा बढ़ा देता है। आंख का छोटा तिल भी लोक को प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष तथा जीवन को प्रकाशमय या अन्धकारमय बनाने की क्षमता रखता है। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, कहते हैं कि प्रलय के अन्त में एकार्णव में एक शिशु ही शेष रहता है। वही सृष्टि का पुनर्निमाण करता है। एक छोटा-सा बीज भी एक विशाल वृक्ष को जन्म देकर एक महाकानन की सृष्टि कर सकता है।

एक मनुष्य क्या कर सकता है ? मनुष्य तो विधाता की रचना का सबसे बड़ा चमत्कार और सर्वप्रधान जीव माना जाता है। भारतवर्ष में आज तक जो सबसे बड़ा विद्वान् हुआ है, उसने बहुत सोच विचार कर यह मत प्रकट किया है:


गुह्यं ब्रह्म तदिदं ब्रवीमि
नहि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किञ्चित्।।

 

व्यास

 

अर्थात-यह भेद की बात मैं तुमको बताता हूँ कि मनुष्य से बढ़कर संसार में अन्य कुछ नहीं है। ‘अहं ब्रह्मास्मि’-मैं ही ब्रह्म हूँ-की भावना से भी यही व्यक्त होता है कि मनुष्य वास्तव में संसार का सर्वशक्तिमान् प्राणी है, अब तक मनुष्य ने जो कुछ किया है, उससे यही प्रमाणित होता है कि उसमें अद्भुत और अनन्त शक्तियाँ हैं। उसके लिए कोई पद, कोई वैभव किसी भी प्रकार की सम्पदा दुलर्भ नहीं है। अपने पुरुषार्थ से एक व्यक्ति कितना विराट् और विलक्षण हो सकता है, इसकी कोई सीमा नहीं है। लौकिक जीवन में अलौकिक शक्तियों का उपार्जन करके वह असम्भव को भी सम्भव, अलभ्य को भी सुलभ बना देता है। अनेक महापुरुषों के लोकोत्तर चरित्र से यही प्रकट होता है कि मनुष्य के लिए कुछ भी दुष्कर और दुष्प्राप्य नहीं है। वह सर्वसमर्थ है; ईश्वर का एक जीता जागता नमूना है। उसकी योग्यता का अनुमान इन बातों से लगाया जा सकता है:

(क) एक व्यक्ति राम की भाँति ईश्वरत्व प्राप्त कर सकता है-नर से नारायण होकर विश्व-वंद्य विश्वात्मा बन सकता है; अपने पौरुष पराक्रम से वह मनुष्य से देवता हो सकता है। इस नश्वर जगत् में जहाँ कुछ भी स्थिर नहीं है, विधिविधान के विपरीत वह मरकर भी सदा सर्वदा के लिए अमर रह सकता है। तत्त्वदर्शियों ने उसे अमृतपुत्र कहा ही है। कितने ही ऐसे महापुरुष हैं, जिनका अस्तित्व उनकी मृत्यु के सहस्रों वर्ष बाद भी नष्ट नहीं हुआ है। तुलसीदास मरकर भी अभी तक कण्ठ-कण्ठ से बोलते हैं और अपना लोकोपकारी कार्य भी करते हैं। हमें यह मानना चाहिए कि मनुष्य में ऐश्वर्यशाली और अविनाशी होने के तत्त्व हैं। वह अपनी महिमा के साथ अपनी आयु को भी बढ़ा सकता है, अथवा यह कहिए कि स्वयं विधाता बनकर अपने रूप में ईश्वर को जन्म दे सकता है।

(ख) एक व्यक्ति शरीर से वामन होकर भी अपने व्यक्तित्व-शक्ति-प्रभाव से विराट हो सकता है। कृ़ष्ण के विराट् रूप का यही रहस्य है कि मनुष्य का सारा संसार उसी के भीतर समाया रहता है, उसका स्वरूप उसके शरीर से कहीं अधिक विशाल और व्यापक है। वह विश्वरूप हो सकता है, अपने क्षेत्र को विस्तृत बनाकर संसार को अपने भीतर तथा बाहर छाया की भाँति रख सकता है। अमेरिका के महामान्य मनीषी एमर्सन के कथानानुसार, कोई भी महान् संस्था केवल एक व्यक्ति की विस्तारित प्रतिच्छाया मात्र होती है। एक मनुष्य अपने आप में एक संस्था बन सकता है। लोक की सद्भाभावनाओं को अपनी ओर आकर्षित करके वह चाहे तो अपने को शक्ति केन्द्र बना सकता है।

(ग) भर्तृहरि ने लिखा है जिस प्रकार तेजस्वी सूर्य सारे जगत् को प्रकाशमान कर देता है, उसी प्रकार एक ही अकेला शूरवीर सारी पृथ्वी को जीतकर वश में कर लेता है :


एकेनापि हि शूरेण पादाक्रान्तं महीतलम्।
क्रियते भास्करेणैव स्फारस्फुरितेजसा।।

 

नीतिदशक


प्राचीन काल में अनेक विश्वविजयी लोकनायक हो चुके हैं। केवल शस्त्रबल से ही नहीं, विद्या-बुद्धि से भी लोग संसार को जीत चुके हैं। बुद्ध और गाँधी की सांस्कृतिक विजय से यह सिद्ध होता है कि एक मनुष्य जन समुदाय पर विचारों से भी शासन कर सकता है। उसके आत्मबल के आगे विरोधियों का संख्याबल परास्त हो जाता है।

(घ) एक मनुष्य अपने साथ-साथ सारे देश, समाज और युग का भी उद्धार कर सकता है। अपने प्रभाव से वह चेतनाहीन प्राणियों को भी नवजीवन देने की शक्ति रखता है। एक आँख वाला हजारों अन्धों को रास्ता दिखा सकता है। संस्कृत की एक कहावत है।

 

उदयति दिसि यस्सां भानुमान् सैव पूर्वा।

 

जिधर सूर्य उदय होता है, उसी को लोग पूर्व दिशा मानते हैं। तेजस्वी पुरुष के सम्बन्ध में भी यही बात चरितार्थ होती है। जिधर वह झुकता है, उधर लोक झुक जाता है; जहाँ वह रहता है, वह साधारण स्थान भी तीर्थ बन जाता है; जहाँ वह जाता है, वह भूमि जनता के लिए स्वर्ग से भी बढ़कर हो जाती है-जहँ-जहँ रामचरन चलि जाहीं; तेहि समान अमरावति नाहीं। (मानस) उसकी महिमा से देश और काल की भी महिमा बढ़ जाती है।

(ड़) एक मनुष्य स्वयं निर्बल होकर भी प्रबल शक्ति उत्पन्न कर सकता है। एच.जी. वेल्स ने इस्लाम धर्म के प्रवर्तक की कटु आलोचना करते हुए लिखा है कि मुहम्मद के द्वारा एक ऐसी शक्ति का जन्म हुआ, जो मुहम्मद से कहीं बड़ी थी-वह शक्ति इस्लाम की शक्ति थी।
बड़े-बड़े वैज्ञानिक आविष्कारों और औद्योगिक संस्थाओं की ओर ध्यान देने से यह बात सुगमता से समझी जा सकती है कि एक व्यक्ति किस प्रकार अपने से बड़ी शक्तियों का निर्माण और संगठन कर सकता है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। अयोग्य व्यक्ति भी सुयोग्य पुत्र उत्पन्न कर लेता है।

(च) स्वर्ग की समस्त कल्पित विभूतियों को इसी शरीर से प्राप्त करके सुख- शान्ति और सम्मान के साथ जीवन व्यतीत करना केवल मनुष्य के वश की बात है। वह हर प्रकार के भव-वैभव का सम्पादन और उपभोग करके अपने जीवन काल में ही अपनी सारी कामनाएँ पूरी कर सकता है।

श्रेष्ठ पुरुषों के चरित्र से सही शिक्षा मिलती है कि मनुष्य तुच्छ जीव नहीं है; उसके भीतर भगवान् का तेज सृष्टि का सत्त्व सिद्धि का स्रोत रहता है। वह जैसा चाहे, वैसा अपने को बना सकता है; जितना ऊँचा उठना चाहे, उठ सकता है; प्रत्येक दशा में प्रत्येक दिशा में उन्नति कर सकता है।

 

कौन और कब उन्नति कर सकता है

 

लघुता त्यागकर महत्ता प्राप्त करने में ही जीवन की सफलता है। उपनिषद् के मत से महत्ता ही सुख है, लघुता में सुख नहीं है-‘यो वै भूभा तत्सुखम् नाल्पे सुखम।’ वेद का आदेश है कि प्रत्येक मनुष्य सबके नेता प्रकाश-स्वरूप भगवान की मित्रता प्राप्त करे और संसार के प्रत्येक धन को पाने की चेष्टा करे और पुष्टि के लिए पर्याप्त वस्तुएं प्राप्त करे :


विश्वो देवस्य नेतुर्मर्तो वुरीत सख्यम्।
विश्वो राय इषुध्यति द्युम्नं वृणीत पुष्यसे।।


ऋग्वेद


यही महत्ता का महामन्त्र है। उन्नति का द्वार सबके लिए नित्य खुला है। भगवान् की विभूतियाँ परलोक में नहीं, इसी लोक में सर्वसुलभ हैं। प्रत्येक ईश्वरपुत्र, चाहे वह जिस स्थिति में हो, ईश्वर की सम्पत्ति का उत्तराधिकारी है। सब प्रकार के ऐश्वर्य प्राप्त करना उसका कर्त्तव्य है। साधारण से साधारण व्यक्ति को भी आत्मोत्कर्ष के लिए निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए।
कुल-परम्परा और काल मुख्य नहीं हैं-बहुत से लोग यह सोचते हैं कि हमारे पुरखे ही बड़े-बड़े काम कर सकते थे और जिस काम को वे लोग नहीं कर पाए, उसे हम लोग स्वर्ग में भी नहीं कर सकते। यह उनकी आत्मदीनता है। स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक स्थान पर कहा है कि प्रत्येक बालक यह सन्देश लेकर इस संसार में आता है कि ईश्वर अभी मनुष्यों से हताश नहीं हुई है। प्रत्येक बालक से संसार को नई नई आशाएँ रही हैं क्योंकि कवि रवीन्द्रनाथ के ही कथनानुसार वह आदिपुरुष का नवीन संस्करण होता है।



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