महाभारत - धरमपाल बारिया Mahabharat - Hindi book by - Dharampal Bariya
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महाभारत

धरमपाल बारिया

प्रकाशक : मनोज पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :200
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5681
आईएसबीएन :81-310-0340-X

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उच्च नैतिक आदर्शों का बोध कराने वाला विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य.....

Mahabharat

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

उच्च नैतिक आदर्शों का बोध कराने वाला विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य

तपसा ब्रह्मचर्येण व्यस्य वेदं सनातनम्।
इतिहाससमिमं चक्रे पुण्यं सत्यवतीसुत:।।

सत्यवतीनंदन महर्षि व्यास ने अपनी तपस्या एवं ब्रह्मचर्य की शक्ति से सनातन वेद का विस्तार करके इस पावन पवित्र इतिहास का निर्माण किया है।
महाभारत विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य है। इसके पन्नों पर है प्राचीन भारत का इतिहास। अपने समय के सामाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक विचारों की झलक है इस महान ग्रंथ में, जिसे विद्वानों ने ‘पंचम वेद’ कह कर पुकारा है। इस महाकाव्य की प्रत्येक कथा मानवीय मन में चलने वाले उस भीषण संग्राम की ओर संकेत करती है, जिसमें भले की अक्सर अधर्म जीतता हुआ दिखाई देता हो, लेकिन आखिर में विजय धर्म की ही होती है। इसीलिए महाभारत रका संदेश ‘यतो धर्मस्ततोजय:’ है अर्थात जहां धर्म है, वहीं विजय है।

महाभारत की कथाएं बताती हैं कि भारत उस समय वैज्ञानिक प्रगति में भी किसी से पीछे न था, सर्वोत्कृष्ट था। आज का विज्ञान उन विलुप्त सूत्रों को ही मानो खोज रहा है। ‘विश्व में कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसे व्यास ने कहा न हो’, जिसने भी यह कहा है, वह अतिशयोक्ति नहीं, व्यावहारिक सत्य है। उसी का प्रमाण ही तो है यह महाकव्य।

पुराणपूर्णचंद्रेण श्रुति ज्योत्सन: प्रकाशिता:।
नृबुद्धिकैरवाणां च कृतमेतत् प्रकाशनम्।।

यह भारत पुराण पूर्ण चंद्रमा के समान है, जिससे श्रुतियों (वेदों) की चांदनी छिटकती है और मनुष्यों की बुद्धिरूपी कुमुदनी सदा के लिए खिल जाती है।

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वती व्यासं ततो जयमुदीरयेत्।।

बदरिकाश्रम निवाली प्रसिद्ध ऋषि श्री नारायण तथा नर- श्रीकृष्ण और अर्जुन, इनकी लीला प्रकट करने वाली भगवती सरस्वती और उसके वक्ता महर्षि वेदव्यास को नमस्कार कर जय (महाभारत एवं अन्य इतिहासपुराण) का पाठ करना चाहिए।

एकतश्चतुरो वेदान् भारतं चैतदेकत:।
पुरा किल सुरै: सर्वै: समेत्य तुलया धृतम्।
चतुर्भ्य: सरहस्येभ्यो वेदेभ्यो ह्याधिकं यदा।।
तदा प्रभृति लोकेऽस्मिन् महाभारतमुच्यते।
महत्वे च गुरुत्वे च ध्रियमाणं यतोऽधिकम्।।

प्राचीन काल में सब देवताओं ने इकट्ठे होकर तराजू के एक पलड़े पर चारों वेदों को और दूसरे को महाभारत पर रखा। परन्तु जब रहस्य सहित चारों वेदों की अपेक्षा यह अधिक भारी निकला, तभी से संसार में यह महाभारत के नाम से जाना जाने लगा। सत्य के तराजू पर तौलने से यह ग्रंथ महत्व, गौरव अथवा गंभीरता में वेदों से भी अधिक सिद्ध हुआ है।

1
महाराज शांतनु का गंगा से विवाह


महाभारत की कथा का प्रारंभ हस्तिनापुर के महाप्रतापी राजा शांतनु से होता है। महाराज शांतनु के पूर्वजों में महाराज भरत और उनके पिता महाराज दुष्यन्त का विशेष उल्लेख है। महाराज दुष्यन्त चक्रवर्ती राजा थे। उनके बल एवं पौरुष की मिसाल नहीं दी जा सकती। उन्होंने महर्षि विश्वामित्र एवं मेनका द्वारा उत्पन्न एवं दुष्यन्त एवं शकुंतला से उत्पन्न हुए थे भरत, जो बचपन में शेरों के साथ खेला करते थे एवं उनके मुंह में हाथ डालकर उनके दांत गिना करते थे। वे बड़े ही निडर, बलशाली एवं बुद्धिमान थे। उन्हीं के नाम पर हमारे देश का नाम ‘भारत’ पड़ा।

एक बार महाराज शांतनु शिकार खेलने के लिए वन में गए। उसी वन से होकर गंगा नही बहती थी। नदी के तट का दृश्य बड़ा ही मनोहर एवं मुग्ध कर देने वाला था। तब महाराज शांतनु ने नदी किनारे रथ रुकवाया और उतरकर वहीं टहलने लगे। अचानक उनकी दृष्टि एक सुंदर युवती पर पड़ी, जो नदी से निकलकर जल के ऊपर इस प्रकार चलने लगी मानो पृथ्वी पर चल रही हो। उसकी अद्वितीय सुंदरता एवं जल पर चलने का चमत्कार देखकर महाराज शांतनु उस पर मुग्ध हो गए और अपनी सुध-बुध खो बैठे।
वह सुंदरी चलती हुई महाराज शांतनु के निकट आई तो अधीर होकर उन्होंने पूछा, ‘‘तुम कौन हो सुंदरी और इस वन प्रदेश में अकेली क्यों घूम रही हो ?’’

‘‘आप क्यों पूछ रहे हैं ?’’ खनखनाते स्वर में स्त्री ने पूछा।
उसकी मधुर आवाज सुनकर तो राजा शांतनु और अधिक बेचैन हो उठे और बोले, ‘‘हे मधुरभाषिणी ! तुम्हें देखकर मैं अपने होश खो बैठा हूं। मैं हस्तिनापुर का शासक शांतनु हूं तथा तुमसे विवाह का इच्छुक हूं।’’
‘‘मैं आपका प्रस्ताव स्वीकार कर सकती हूं राजन, मगर मेरी दो शर्तें हैं ?’’
‘‘कैसी शर्ते देवि ? जल्दी बताओ, हमें तुम्हारी हर शर्त स्वीकार है।’’
‘‘मेरी पहली शर्त तो यह है कि आप मुझसे यह नहीं पूछेंगे कि मैं कौन हूं अथवा कहां से आई हूं। मेरी दूसरी शर्त यह है कि मैं जो कुछ भी करुंगी, आप उसे सिर्फ देखेंगे, किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेंगे। जिस दिन भी आप ने मेरी शर्तों का उल्लंघन किया, मैं उसी दिन आपको छोड़कर चली जाऊंगी।’’

ये शर्ते सुनते ही महाराज शांतनु स्तब्ध रह गए। ये शर्तें सामान्य स्थिति में उन्हें किसी भी कीमत पर स्वीकार न होतीं, किंतु इस समय उस सुंदरी के सौंदर्य ने उन पर जादू किया हुआ था, अत: दिल के हाथों मजबूर होकर उन्होंने ये दोनों शर्तें स्वीकार कर लीं और वचन दे दिया कि मैं तुम्हारी शर्तों के अनुसार कभी तुमसे कुछ नहीं पूछूंगा और न कुछ कहूंगा।
यह वचन पाकर सुंदरी उनसे विवाह के लिए राजी हो गई और वहीं दोनों ने गंधर्व (प्रेम) विवाह कर लिया।
चूंकि वह सुंदरी महाराज शांतनु को गंगा के किनारे मिली थी, इसलिए उन्होंने उसे ‘गंगा’ नाम दिया और अपने महल में ले आए। कुछ दिन तेजी से गुजर गए। इसी बीच महाराज शांतनु राज-काज की बातें भूलकर गंगा के प्यार में खोए रहे और राज-काज मंत्रियों ने संभाला। अब उन्हें गंगा के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही न था।

2


सात पुत्रों की हत्या


कुछ महा बाद महारानी गंगा ने एक पुत्र को जन्म दिया। पुत्र-जन्म की सूचना पाकर महाराज शांतनु खुशी से झूम उठे और खबर लाने वाली दासी को पुरस्कार स्वरूप अपने गले की कीमती माला देकर गंगा के महल की ओर दौड़ पड़े। मगर यह देखकर उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि महारानी नवजात शिशु को गोद में उठाए गंगा नदी की ओर जा रही हैं। उन्होंने कुछ पूछना चाहा, किन्तु तभी उन्हें गंगा की शर्त याद आ गई और खामोश होकर वे महारानी गंगा के पीछे चल दिए।

तट पर जाकर गंगा ठिठककर मुड़ी, फिर उनकी ओर देखकर धीमे से मुस्कराई। उसके बाद उसने अपने पुत्र को नदी में बहा दिया। यह देखकर महाराज शांतनु को धक्का-सा पहुंचा। रानी गंगा मुस्कराती हुई वापस लौट पड़ी। महाराज शांतनु आंखें फाड़े उसे देखते रहे, मगर वचन में बंधे होने के कारण बोले कुछ नहीं।
कुछ दिन महाराज को पुन: रानी गंगा के गर्भवती होने की सूचना मिली तो वे पुत्र के सदमे को भूल गए और मन कामना लगे कि इस बार गंगा अपने पहले भचयानक कृत्य को नहीं दोहराएगी और शीघ्र ही उनका पुत्र उनकी गोद में खेलेगा।
मगर उनकी यह कामना पूर्ण न हो सकी। पुत्र के जन्म की सूचना पाकर वे फिर गंगा के महल की ओर दौड़े तो फिर से गंगा को नदी के तट की ओर जाते देखकर सन्न रह गए। वे पागलों की तरह उसके पीछे लपके, मगर चाहकर भी उसे रोक न सके। गंगा ने इस बार भी तट पर जाकर पुत्र को नदी की गोद में डाल दिया।

महाराज शांतनु का कलेजा चाक-चाक हो गया। उनकी आँखों में क्रोध और पीड़ा के आंसू साथ-साथ दिखाई देने लगे, लेकिन वचन में बंधे होने के कारण वे कह ही क्या सकते थे।
और इसी प्रकार रानी ने महाराज शांतनु के एक-एक कर सात पुत्रों की हत्या कर दी।
राजा देखते और खून के आंसू रोते। उनकी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं मिलते। वे स्वयं को धिक्कारते, ‘कैसा राजा है तू ? एक स्त्री तेरी आंखों के सामने तेरे पुत्रों की हत्या करती है और तू मूकदर्शक बना देखता रहता है। क्या यह न्याय है ? धिक्कार है तुझ पर।’
अब महाराज शांतनु का सब्र जवाब दे गया। उन्होंने दृढ़ निश्चय कर लिया कि अपने आठवें पुत्र की हत्या वे इस प्रकार नहीं होने देंगे।

कुछ समय पश्चात रानी गंगा ने उनके आठवें पुत्र को जन्म दिया और पहले की भांति उसे लेकर गंगा तट की ओर चल दी। इस बार महाराज शांतनु घात लगाए बैठे थे। वे रानी के पीछे-पीछे तट की ओर चल दिए। फिर रानी गंगा ने ज्यों ही पुत्र को जल में बहाने के लिए हाथ आगे बढ़ाए, त्यों ही महाराज शांतनु गरजकर बोले, ‘‘बस, बस बहुत हुआ। हाथ रोक लो गंगा। क्या तुम जानती हो कि यह तुम मेरे आठवें पुत्र की हत्या करने की चेष्टा कर रही हो ? आखिर तुम चाहती क्या हो ? क्या तुम यह चाहती हो कि मेरा वंश समाप्त हो जाए और इस राज्य को कोई उत्तराधिकारी न मिले ?’’
महाराज शांतनु की गर्जना सुनकर रानी गंगा ने हाथ पीछे खींच लिए और पलटकर बोली, ‘‘आपने मुझे टोककर अपना वचन भंग कर दिया है राजन, इसलिए अब मैं आपके पास नहीं रह सकती, किन्तु जाने से पहले मैं आपको अपने कृत्य का रहस्य अवश्य बताऊंगी। राजन ! मैं स्वर्ग की गंगा हूं। एक बार आठ वसुओं से अप्रसन्न होकर महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें शाप दे दिया कि तुम पृथ्वी पर जाकर सांसारिक कष्ट भोगो।



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