मेरी वाणी गैरिक वासना - धर्मवीर भारती Meri Vani Gairik Vasna - Hindi book by - Dharamvir Bharti
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मेरी वाणी गैरिक वासना

धर्मवीर भारती

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1999
पृष्ठ :176
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5697
आईएसबीएन: 81-263-0119-8

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प्रस्तुत है धर्मवीर भारती की इकहत्तर कविताओं का संकलन...

Meri Vani Gairik Vasna

यह संचयन

इतने बड़े कवि की कविताओं की भूमिका लिखने का मुझे कतई कोई अधिकार नहीं है, इसलिए स्वयं भारती जी का ही वक्तव्य भूमिका-रूप में प्रस्तुत किया है।
आपके हाथों में यह संकलन बहुत संकोच के साथ अर्पित कर रही हूँ। संकोच इसलिए की मालूम नहीं भारतीय जी की समस्त कविताओं में से कुछ को चुनने का हक़ मुझे था भी या नहीं, नहीं मैं दिखावे के लिए विनम्र नहीं होना चाह रही। ऐसा नहीं है कि मुझे अच्छी कविता की पहचान नहीं है। संकोच इस लिए है कि भारती जी का लिखा हर शब्द मुझे बेहद प्रिय है- शायद अन्धभक्ति की सीमा तक प्रिय है। इसलिए क्या चुनना है, क्या छोड़ना है वाला विवेक पता नहीं मुझे मिल पाया है या नहीं। क्या करूँ मैं कि उनकी हर कविता में मुझे उनकी छुवन महसूस होती है, उनकी धड़कन सुनाई देती है। खुद पर क़ाबू करके जितना जैसा संचयन कर सकी हूँ-स्वीकार कीजिए। हृदय से आभारी हूँ भाई पद्मधर त्रिपाठी की, जिन्होंने बड़ी आत्मीयता से मुझे लगभग बाध्य किया इस काम में जुट जाने के लिए। वस्तुतः यह संकलन पद्मधर जी का ही स्वप्न है-मैंने तो केवल कुछ रंग भरे हैं-बस !
भारतीय जी की यशःकाया तो अमर है, किन्तु शरीरिक उम्र उनकी इकहत्तर वर्ष की थी-अतः संकलन में इकहत्तर कविताएँ ही चुनी गयी हैं।
-पुष्पा भारती

सिर्फ़ कविता ही बचा सकती है

(भूमिकावत्)

कविता, अगर वह सच्ची सम्पूर्ण कविता है, तो वह अपने में सम्पूर्ण कथ्य होती है। जो कुछ, जितना कुछ कहना हो, वह सारा का सारा कह देती है। उसके बाद कहने को बचता क्या है। सम्पूर्ण की रचना कर चुकने के बाद शब्द शेष कहाँ रहते हैं। जो कुछ कहना था कविताओं में कहा जा चुका। अब और क्या कहे कवि ?
लेकिन कुछ तो कहना ही है, इस ‘पूर्ण-सृजन’ की आड़ लेकर। मैं बचकर निकल नहीं सकता; क्योंकि पूर्ण की जो व्याख्या श्रुतियों में है वह तो यह कहती है कि ‘‘पूर्ण मदः पूर्ण मिदम् पूर्णात् पूर्णमुदच्यते, पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवावशिष्यते ! यानी पूर्णत्व में पूर्ण प्रदान कर चुकने के बाद भी पूर्ण ज्यों-का-त्यों पूर्ण बच जाता है।’’ शून्य नहीं होता, निःशेष नहीं होता।
इस संकटपूर्ण स्थिति में मेरे पास और कोई रास्ता नहीं बचता कि मैं फिर अपनी ही कविता के पास लौटूँ। जिसे मैंने रचा है, वही शायद अब मेरे लिए कोई राह रचे। मेरे ‘क्योंकि’ शीर्षक कविता की आख़िरी पक्तियाँ हैं:

इसलिए तलवार टूटी, अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएँ,
कौन दुश्मन, कौन अदने लोग
सब कुछ धुन्ध-धूमिल
किन्तु क़ायम युद्ध का संकल्प है
अपना अभी भी
क्योंकि है सपना अभी भी

यह कौन सपना है, जिसके लिए कवि न केवल युद्धरत है, बल्कि इस क़दर समर्पित है कि सब कुछ धुन्ध-धूमिल हो जाने के बाद भी, पक्ष-विपक्ष की पहचानें खो जाने के बाद भी युद्ध करते रहने के लिए संकल्पशील है ?
और यह युद्ध कैसा है ? किसके ख़िलाफ़ है ? कौन से व्यूह हैं इस युद्ध के ? इसके शस्त्रागार कहाँ हैं ? कहाँ से मिलती है इसमें लड़ते ही रहने की शक्ति ? उससे कविता का सरोकार क्या है ? कविता इस युद्ध में क्या है ? रणक्षेत्र है ? शस्त्रागार है, हथियार है ? विजय की उपलब्धि है ? या पराजय का अर्थ है ?
यह युद्ध मानव मात्र में दिनों-दिन कम होती जाती है, लुप्त होती हुई मानवीयता को बचाने का युद्ध। मानवीयता को उसकी पूर्णता में, विस्तार में, गहराई में पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए लड़ा जाने वाला युद्ध। आज अन्धी लालसा की चूहा दौड़, भौतिक समृद्धि को ही अन्तिम ध्येय को मान लेने का छद्म परितोष, इन्द्रिय सुख और अधिकार-सुख को सच्चे आन्तरिक आनन्द का पर्याय मान लेने का आत्म-छल, मानवीय रिश्तों में पारस्परिक सद्भाव, स्नेह, करुणा और मैत्री के बजाय एक-दूसरे को पराभूत उनका शोषण करने की राक्षसी वृत्ति, कुल मिलाकर मनुष्य की सारी बाहरी और अन्दरूनी ज़िन्दगी में से मनुष्यत्व को ख़त्म कर डालने का व्यापक षडयन्त्र !

इस अभूत पूर्व संकट से कविता नहीं लड़ेगी, तो और कौन लड़ेगा ? मानवीयता को मुक्त कराने के जो सपने उन्नीसवीं शताब्दी और बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में देखे गये- चाहे वे राजनीतिक ताक़तों ने हिंसक राज्य-क्रान्तियों के रूप में देखे हों, या आर्थिक चिन्तकों ने वर्ग-संघर्ष के रूप में देखे हों, या आध्यात्मिक आचार्यों ने महामानव या सुपरमैन के अवतरण के रूप में देखे हों-उन सब ने थोड़ा हौसला दिया, मगर धीरे-धीरे उन्हीं की कमज़ोरियाँ उजागर होने लगीं, पर हम फ़रेब खाते गये, और नतीजा यह हुआ कि बीसवीं शताब्दी के इस अन्तिम दशक में हम एक ऐसे अतल गह्वर की दहलीज पर आ खड़े होते हैं कि उसमें डूबे; फिर हमारा निस्तार नहीं। अगर हम बच सकते हैं तो अब कविता के हस्तक्षेप से बच सकते हैं। हमारे पास रोबोट हों, अणु अस्त्र हों, सुपर कम्पूटर हों पर अन्दर की, आत्मा की ‘गली तो चारों ओर बन्द हुई’। बचती है सिर्फ़ कविता जो बचाने की शक्ति रखती है। कविता ही वह संजीवनी है जो सुकुमार संवेदनाएँ जगाकर, अन्तर्जगत् को आलोकित कर मूर्छित मानव-मूल्यों को फिर प्रतिष्ठित कर सकती है। लक्ष्यहीन भटकन और आत्मविनाश के पथ से हटाकर मनुष्य के सहज स्वाभाविक विकास को सार्थक सोद्देश्य दिशा प्रदान कर सकती है और संकटों बिडम्बनाओं के बावजूद उसे सही दिशा में अग्रसर होने का साहस और संकल्प दे सकती है। समूह में गठित सारे मानव-समाज को भी, और पीछे छूट गये, अलग-थलग पड़े निराश व्यक्ति को भी। इस आलोक हीन क्षण में कवि ही कह सकता है-

पन्थ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला
अन्य होंगे चरण हारे
और हैं जो लौटते, दें शूल को संकल्प सारे
दुःख व्रती निर्माण-उन्मद
ये अमरता नापते पद
बाँध देंगे अंकसंसृति से तिमिर में स्वर्णवेला

आज के घनघोर अन्धकार में, सूर्य के सम्पूर्ण राहुग्रस्त हो जाने के क्षण में भी तिमिर में भी स्वर्णवेला बाँधने का ओजस्वी आश्वासन और कौन दे सकता है सिवा कवि के, सिवा निर्माण उन्मद साहित्य सर्जक के ! आप पूछ सकते हैं कि क्या यह कवि का केवल बड़बोलापन नहीं- अतिरंजित आत्मश्लाघापूर्ण झूठ-झूठ का दावा ? जिसके पास राजनेता की न शक्ति है न सत्ता, न सेनाओं के अस्त्र-शस्त्र, न काले कुबेरों की अतुल धनराशि, वह किस मुँह से इतना बड़ा दावा कर रहा है ? आपका सवाल अपनी जगह असंगत नहीं, वर्तमान स्थितियों को देखते हुए यह शंका स्वाभाविक है। पर एक बात, सिर्फ़ एक बात का जवाब दीजिए-व्यास के पास काव्य-संवेदना, जीवन-दृष्टि और शब्दशक्ति के अलावा और क्या था ? कोई राज सिंहासन था ? कोई सेना थी ? कोई ब्रह्मास्त्र था ? कोई कुबेर का स्वर्ण भण्डार था ? नहीं- उसके पास केवल कविता थी। जीवन की सुन्दर से सुन्दर और कुरूप से कुरूप-हर स्थिति को स्वीकारने की क्षमता, उसकी अतल गहराइयों में डूबकर केवल दृश्यमान यथार्थ नहीं, बल्कि अन्तनिर्हित सत्य को अवगाहने की क्षमता और अपनी अनुभूतियों को ऐसे सार्थक शब्द देने की क्षमता कि वे हज़ारों-हज़ारों साल बाद भी हमारे मर्म को स्पर्श ही नहीं करते आलोड़ित करते हैं, हममें स्वधर्म को पहचानने की शक्ति देते हैं, और सारे संकटों के बीच भी हममें मानव भविष्य के निर्माण के लिए अपना सब-कुछ होम कर देने का साहस और आस्था जगाते हैं। महाभारत में उन्होंने बताया कि हमारे सारे जीवन-मूल्य ध्वस्त हो चुके थे, अन्तिम परिणित कृष्ण द्वारा स्वेच्छामरण का वरण। -उनके अवसान के क्षण में ही द्वापर समाप्त होता है और कलियुग का अवतरण होता है। तथाकथित कलियुग में हज़ारों साल तक महाभारत के विविध प्रसंग और विशेषतः गीता प्रेरणा देती रही। उस पुराने इतिहास को हम छोड़ भी दें-तो भी हम कैसे भूल सकते हैं कि निकट अतीत में ‘स्वराज्य हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है’ की सिंहगर्जना करने वाले लोकमान्य तिलक की प्राण-पुस्तक थी गीता और ब्रिटिश कारागारों में ‘गीता रहस्य’ लिखकर वे अपने साहस को प्रदीप्त रख रके। हम कैसे भूल सकते हैं बंगाल के उन वीर क्रान्तिकारी युवकों को जिन्होंने हाथ में गीता लेकर हँसते-हँसते फाँसी का फन्दा अपने गले में डाल लिया था। हम कैसे भूल सकते हैं कि राष्ट्रीय संग्राम के एक चरम निराशाजनक दौर में गाँधी सब छोड़-छाड़कर हिमालय की एक बहुत शान्त सुन्दर घाटी कौसानी में जाकर चुपचाप गीता पढ़ते रहे, उन्हीं दिनों उन्होंने ‘गीता माता’ और ‘अनाशक्ति योग’ नामक ग्रंथ लिखे। वहाँ से अतुल आत्मबल लेकर लौटे, और सत्याग्रह का अपराजेय अहिंसात्मक संग्राम का ऐसा पांचजन्य फूँका कि जिस ब्रिटिश साम्राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता था, उससे निहत्थे लड़ते रहे, लड़ते रहे। अन्त में पूरे भारत में आत्मबल जाग उठा, देश की नियति बदल गयी और अपार शक्ति वाला उपनिवेशवाद त्राहि-त्राहि कर उठा। गाँधी ने देश की नियति बदल दी, सारे अफ्रीका और एशिया का इतिहास ही नहीं भूगोल भी बदल दिया। और कैसे भूल सकतें हैं विनोबा को। वर्षों के गीता अवगाहन के बाद गीताई या गीता-प्रवचन का सम्बल लेकर अकेले निकल पड़े पैदल सारे देश की पद-यात्रा पर, धरती के असमान वितरण को दूर कर धरती-पुत्रों से जोड़ने का अखण्ड व्रत लेकर। सच तो यह है कि यह देश जिसमें हम पैदा हुए-उसकी सीमाएँ राजवंशों ने नहीं बाँधी, एक कवि ने ही बाँधा जिसका नाम था-व्यास।

यह बात मैं नहीं कह रहा हूँ। मलयालम के महाकवि स्वर्गीय जी.शंकर कुरूप ने अपने प्रथम ज्ञानपीठ पुरस्कार में कहा था, ‘‘भारत के नाद थे-वाल्मीकि, व्यास और कालीदास। आज वह नाद कहाँ है ? कुछ लोगों को यह कहते हुए सुनता हूँ कि अँग्रेज़ी साम्राज्य के शक्तिशाली हाथों ने ही भारत को एक राष्ट्र बना डाला। मैं इससे सहमत नहीं हो सकता। असल में भारत की प्रवृत्ति को, भूगोल विज्ञान को, इतिहास और जीवन-दर्शन को, लोक-कथाओं और दन्तकथाओं को सम्मिलित कर समग्रता और एकाग्रता के साथ महाभारत की रचना करनेवाले व्यास देव ने ही अखण्ड भारत को प्राण, रूप और चेतना प्रदान की थी। कहाँ हैं वे नाद आज ?’’
सो मित्रों यह देश तो अनूठा है। मन्त्रद्रष्टा ऋषिवत् कवि का निर्वाण-अरूण यह मधुमय देश हमारा-जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा-अब अनजान क्षितिजों में खोते हुए इस देश का पुनर्निर्माण, इसकी पुनःप्रतिष्ठा भी व्यास के उत्तराधिकारियों का दायित्व है। हम उस उत्तराधिकार का निर्वाह कर सकें, कविता की अस्मिता को फिर युगनिर्माण की क्षमता दे सकें, तभी सार्थकता है सम्मानों की, अलंकरणों की, पुरस्कारों की। मैं तो बहुत छोटा हूँ, व्यास तो दूर, महादेवी, पन्त, प्रसाद और निराला के पाँवों की धूल भी नहीं पर इतना ज़रूर है कि उनके ऋण के चुकाने के लिए जिस धरती ने जन्म दिया, जिस संस्कृति ने दृष्टि और संस्कार दिये उनके प्रति पूर्ण समर्पण व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द ही हैं-कविता के शब्द। उन शब्दों का खरापन बना रहे, वे अन्तरात्मा के संकेतों पर संयोजित हों, कोई निन्दा मुझे विचलित न करे, कोई सम्मान मुझमें मिथ्या अहंकार न जगाये, अन्त तक सत्य की खोज करता रहूँ, पाये हुए सत्य को आप तक सही-सही सम्प्रेषित करता रह सकूँ, इसी का आशीर्वाद ईश्वर से माँगता हूँ। अन्त में सम्पूर्ण श्रद्धा सहित हाथ-जोड़ कर व्यास को प्रमाण करता हूँ। वे सदा असत्य से विरत कर सत्य की ओर मुझे लेते चलें-

असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्मा अमृतम् गमय !

ठण्डा लोहा

ठण्डा लोहा ! ठण्डा लोहा ! ठण्डा लोहा !
मेरी दुखती हुई रगों पर ठण्डा लोहा !
मेरी स्वप्न भरी पलकों पर
मेरे गीत-भरे होठों पर
मेरी दर्द भरी आत्मा पर
स्वप्न नहीं अब
गीत नहीं अब
दर्द नहीं अब-
एक पर्त ठण्डे लोहे की !
मैं जमकर लोहा बन जाऊँ-
हार मान लूँ-
यही शर्त ठण्डे लोहे की !

ओ मेरी आत्मा की संगिनि !
तुम्हें समर्पित मेरी साँस-साँस थी लेकिन
मेरी साँसों में यम के तीख़े नेजे-सा
कौन अड़ा है ?
ठण्डा लोहा !
मेरे और तुम्हारे सारे भोले निश्छल विश्वासों को
आज कुचलने कौन खड़ा है ?
ठण्डा लोहा !
फूलों से, सपनों से, आँसू और प्यार से
कौन बड़ा है ?
ठण्डा लोहा !
ओ मेरी आत्मा की संगिनि !
अगर ज़िन्दगी की कारा में,
कभी झटपटाकर मुझको आवाज़ लगाओ
और न कोई उत्तर पाओ
यही समझना कोई इसको धीरे-धीरे निगल चुका है,
इस बस्ती में कोई दीप जलानेवाला नहीं बचा है,
सूरज और सितारे ठण्डे
राहें सूनी
विवश हवाएँ
शीश झुकाये
खड़ी मौन हैं,
बचा कौन हैं?
ठण्डा लोहा ! ठण्डा लोहा ! ठण्डा लोहा !

तुम्हारे चरण

ये शरद के चाँद-से उजले धुले-से पाँव,
मेरी गोद में !
ये लहर पर नाचते ताजे कमल की छाँव,
मेरी गोद में !
दो बड़े मासूम बादल, देवताओं से लगाते दाँव,
मेरी गोद में !

रसमसाती धूप का ढलता पहर,
ये हवाएँ शाम की, झुक-झूमकर बरसा गयीं
रोशनी के फूल हरसिंगार-से,
प्यार घायल साँप-सा लेता लहर,
अर्चना की धूप-सी तुम गोद में लहरा गयीं
ज्यों झरे केसर तितलियों के परों की मार से,
सोनजूही की पँखुरियों से गुँथे, ये दो मदन के बान,
मेरी गोद में !
हो गये बेहोश दो नाजुक, मृदुल तूफ़ान,
मेरी गोद में !

ज्यों प्रणय की लोरियों की बाँह में,
झिलमिलाकर औ’ जलाकर तन, शमाएँ दो,
अब शलभ की गोद में आराम से सोयी हुईं
या फ़रिश्तों के परों की छाँह में
दुबकी हुई, सहमी हुई, हों पूर्णिमाएँ दो,
देवताओं के नयन के अश्रु से धोयी हुईं।
चुम्बनों की पाँखुरी के दो जवान गुलाब,
मेरी गोद में !
सात रंगों की महावर से रचे महताब,
मेरी गोद में !

ये बड़े सुकुमार, इनसे प्यार क्या ?
ये महज आराधना के वास्ते,
जिस तरह भटकी सुबह को रास्ते
हरदम बताये हैं रुपहरे शुक्र के नभ-फूल ने,
ये चरण मुझको न दें अपनी दिशाएँ भूलने !
ये खँडहरों में सिसकते, स्वर्ग के दो गान, मेरी गोद में !
रश्मि-पंखों पर अभी उतरे हुए वरदान, मेरी गोद में !

प्रार्थना की कड़ी

प्रार्थना की एक अनदेखी कड़ी
बाँध देती है
तुम्हारा मन, हमारा मन,
फिर किसी अनजान आशीर्वाद में-
डूबन
मिलती मुझे राहत बड़ी !

प्रात सद्य:स्नात
कन्धों पर बिखेरे केश
आँसुओं में ज्यों
धुला वैराग्य का सन्देश
चूमती रह-रह
बदन को अर्चना की धूप
यह सरल निष्काम
पूजा-सा तुम्हारा रूप
जी सकूँगा सौ जनम अँधियारियों में, यदि मुझे
मिलती रहे
काले तमस् की छाँह में
ज्योति की यह एक अति पावन घड़ी !
प्रार्थना की एक अनदेखी कड़ी !

चरण वे जो
लक्ष्य तक चलने नहीं पाये
वे समर्पण जो न
होठों तक कभी आये
कामनाएँ वे नहीं
जो हो सकीं पूरी-
घुटन, अकुलाहट,
विवशता, दर्द, मजबूरी-
जन्म-जन्मों की अधूरी साधना, पूर्ण होती है
किसी मधु-देवता
की बाँह में !
ज़िन्दगी में जो सदा झूठी पड़ी-
प्रार्थना की एक अनदेखी कड़ी !

उदास तुम

तुम कितनी सुन्दर लगती हो
जब तुम हो जाती हो उदास !
ज्यों किसी गुलाबी दुनिया में सूने खँडहर के आसपास
मदभरी चाँदनी जगती हो !

मुँह पर ढँक लेती हो आँचल
ज्यों डूब रहे रवि पर बादल,
या दिन-भर उड़कर थकी किरन,
सो जाती हो पाँखें समेट, आँचल में अलस उदासी बन !
दो भूले-भटके सान्ध्य-विहग, पुतली में कर लेते निवास !
तुम कितनी सुन्दर लगती हो
जब तुम हो जाती हो उदास !

खारे आँसू से धुले गाल
रूखे हलके अधखुले बाल,
बालों में अजब सुनहरापन,
झरती ज्यों रेशम की किरनें, संझा की बदरी से छन-छन !
मिसरी के होठों पर सूखी किन अरमानों की विकल प्यास !
तुम कितनी सुन्दर लगती हो
जब तुम हो जाती हो उदास !

भँवरों की पाँतें उतर-उतर
कानों में झुककर गुनगुनकर
हैं पूछ रहीं-‘क्या बात सखी ?
उन्मन पलकों की कोरों में क्यों दबी ढँकी बरसात सखी ?
चम्पई वक्ष को छूकर क्यों उड़ जाती केसर की उसाँस ?’
तुम कितनी सुन्दर लगती हो
ज्यों किसी गुलाबी दुनिया में सूने खँडहर के आसपास
मदभरी चाँदनी जगती हो !

फागुन की शाम

घाट के रस्ते
उस बँसवट से
इक पीली-सी चिड़िया
उसका कुछ अच्छा-सा नाम है !
मुझे पुकारे !
ताना मारे,
भर आएँ, आँखड़ियाँ !
उन्मन, ये फागुन की शाम है !
घाट की सीढ़ी तोड़-तोड़ कर बन-तुलसा उग आयीं
झुरमुट से छन जल पर पड़ती सूरज की परछाईं
तोतापंखी किरनों में हिलती बाँसों की टहनी
यहीं बैठ कहती थी तुमसे सब कहनी-अनकहनी

आज खा गया बछड़ा माँ की रामायन की पोथी !
अच्छा अब जाने दो मुझको घर में कितना काम है !

इस सीढ़ी पर, यहीं जहाँ पर लगी हुई है काई
फिसल पड़ी थी मैं, फिर बाँहों में कितना शरमायी !
यहीं न तुमने उस दिन तोड़ दिया था मेरा कंगन !
यहाँ न आऊँगी अब, जाने क्या करने लगता मन !

लेकिन तब तो कभी न हममें तुममें पल-भर बनती !
तुम कहते थे जिसे छाँह है, मैं कहती थी घाम है !
अब तो नींद निगोड़ी सपनों-सपनों भटकी डोले
कभी-कभी तो बड़े सकारे कोयल ऐसे बोले
ज्यों सोते में किसी विषैली नागिन ने हो काटा
मेरे सँग-सँग अकसर चौंक-चौंक उठता सन्नाटा

पर फिर भी कुछ कभी न जाहिर करती हूँ इस डर से
कहीं न कोई कह दे कुछ, ये ऋतु इतनी बदनाम है !

ये फागुन की शाम है !


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