मेरा क्या - वसीम बरेलवी Mera kya - Hindi book by - Wasim Barelvi
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मेरा क्या

वसीम बरेलवी

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :162
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5702
आईएसबीएन :9789350007945

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प्रस्तुत है गजल संग्रह...

Mera kya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मेरा महबूब शाइर ‘वसीम बरेलवी’ है। मैं उससे और उसके कलाम दोनों से मुहब्बत करता हूं। ‘वसीम’ के अशआर से मालूम होता है कि ये महबूब की परस्तिश1 में भी मुब्तिला2 रह चुके हैं। लेकिन मैं इब्तिदा3 में किसी की परस्तिश नहीं करता था। मेरे और वसीम के खयालात भौंचाल की क़ैफ़ियत रखते हैं।
वसीम के कलाम में आगही4 और शऊर5 की तहों का जायज़ा6 है और ऐसा शऊर औप आगही कैफ़ो-सुरूर7 का गुलदस्ता है। यह अकसर खदोख़ाल8 से बुलन्द होकर काइनात9 का रंगीनियों और दिलकशियों से लुत्फ हासिवल करते हैं। दरअसल शाइरी भी वही है, जो अपने वुजूद10 में हमें ज़िन्दगी की नज़दीकतर चीजों का एहसास दिलाती है। ‘वसीम’ की शाइरी एहसासे-हयात11 की एहसास अफ़जा़12 शाइरी है और इस आईने-ए-एहसास13 में दूर के अक्स नज़दीक के अक्स पर जिला कर रहे हैं, लेकिन ‘वसीम’ हर अक्स के दरम्यान14 मुस्तक़िल15 वुजूद का एहसास दिला रहे हैं।


मैं चल रहा हूं कि चलना भी एक आदत है,
ये भूल कि ये रास्ता किधर को जायेगा।


प्रोफ़ेसर रघुपतिसहाय ‘फ़िराक़’ गोरखपुरी

उर्दू शाइरों में वसीम बरेलवीं का नाम आज बुलन्दी पर है। उनके बिना उर्दू मुशाइरा मुकम्मिल नबीं माना जाता। वसीम बरेलवी ने अपनी शाइरी में नये-नये बिम्बों के माध्यम से मौजूदा समय की समस्याओं पर बड़े सहज और सरल ढंग से लिखा है। उनकी ग़ज़लें अनेक गायक गा चुके हैं और अशआर जनता में इस क़द्र मशहूर हैं कि लोग उन्हें सूक्तियों के रूप में दोहराते हुए सुने जा सकते हैं। उदाहारण के रूप में उनका यह शे’र-

अपनी सूरत से जो ज़ाहिर हैं, छुपाये कैसे।
तेरी मर्जी़ के मुताबिक़ नज़र आयें कैसे।।

या

घर की गिरती हुई दीवारें ही मुझसे अच्छी।
रास्ता चलते हुए लोग ठहर जाते हैं।।

अथवा उनका यह शे’र

जहां रहेगा, वहीं रौशनी लुटायेगा।
किसी चराग़ का अपना मकां नहीं होता।।


यह लीजिये, उसी विश्वविख्यात शाइर की हिन्दी भाषा में चिरप्रतीक्षित पहली पुस्तक, जिसे पढ़ने के बाद उनकी अगली पुस्तकों की दिल थामकर प्रतीक्षा करते रहेंगे।


उसके तेवर समझना भी आसां नहीं
बात औरों की थी, हम निगाहों में थे


मेरा क्या


वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से
मैं एतबार न करता, तो और क्या करता

मुझ से मुझ तक


लफ़्ज़ और एहसास के बीच का फ़ासिला तय करने की कोशिश का नाम ही शाईरी है। मेरे नज़दीक यही वो मक़ाम है, जहां फ़नकार आंसू को ज़बान और मुसकुराहट को इमकान1 दिया करता है, मगर ये बेनाम फ़ासिला तय करने में कभी-कभी उम्रें बीत जाती हैं और बात नहीं बनती। मैंने शाइरी को अपने हस्सासे वुजूद2 का इज़हारिया3 जाना और अपनी हद तक शे’री-ख़ुलूस4 से बेवफ़ाई नहीं की। यही मेरी कमाई है और मुझे आपके रूबरू लायी है।
ज़िन्दगी की हमाजेहती5 से आँखे चार करने में दिये की लौ की तरह हवाओं से लड़ना मेरा मुक़द्दर ज़रूर रहा, मगर कही कोई एहतजाजी6 ताक़त थी, जो मुझे संभाल रही और बिखरने से बचाये रही। मेरे शे’ऱों में ये कैफ़ियत7 तलाश करना मुश्किल नहीं होना चाहिए। फूल से बात करने, कली से हमकलाम8 होने, घटाओं के साथ पैंग बढ़ाने, भीगते मौसमों में खुल-खेलने, झरनों की मौसीक़ी9 में खो जाने और हुस्न को अपनी आँखो की अमानत जानने वाले मिज़ाज का अलमिया10 यह था जह जिन्दगी की धूप आँखों में उतरी, तो अज़ीयतों11 के लब खुल गये, मंजूर चुभने लगे और ख़्वाब अपनी बेबसीका एलान करते दिखे, बदलती मानवियतों12 के हाथों तस्वीरें बनती रहीं, बिगड़ती रहीं, लेकिन रंग एक तस्वीर में न भर पाया। क्या खोया, क्या पाया, यह तो न पूछिये, हां, इतना जरूर हैं कि हिस्सियाती13 सतह पर शकस्तोरेख़्त14 मेरे शऊर की आबयारी15 में क्या रोल अदा किया, इसका पता अब भा लगा सकेंगे। शाइरी मदद न करती, तो ज़िन्दगी के अज़ाब16 जानलेवा साबित हो सकते थे। वह तो ये कहिये कु जरिय-ए-इज़हार17 ने तवाजुन18
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1. सम्भावना
2. अस्तित्व की संवेदनशीलता
3. अभिव्यक्ति
4. काव्य की सचाई
5.बहुआयामी
6.विरोधात्मक
7. भाव
8. बातचीत करना
9. संगीत
10.विडम्बना
11.पीड़ाओं
12. अर्थों
13. भावनात्मक
14. टूट-फूट
15.पानी देना/सिंचाई करना,
16. दु:ख
17. अभिव्यक्ति का माध्यम
18. सन्तुलन।

बरक़रार रखने में मदद की और जासोज़1 धूप में इक बज़बान शजर2 कब तरह सिर उठाकर खड़े रहने का तौफीक़3 अता की।


वसीम कैसे मेरी मंज़िलें क़रीब आतीं
तमाम उम्र इरादे मेरे सफ़र में रहे


यब भी एक बड़ा सच है कि फ़नकार4 अपने अलावा सभी का दोस्त होता है, इसलिए तख़लीक़कारी5 और दुनियादारी में कभी नहीं बनती। अब रही नफ़ा और नुक्सान की बात, तो इसके पैमाने फ़नकार की दुनिया में और हैं, दुनिया दारों की दुनिया में और।
यह सब कहकर मैं अपनी फ़ितरी6 बेनियाज़ी7 और शबोरोज़8 की मस्रूफियत9 के लिये जवाज़10 जरूर तलाश कर रहा हूं, मगर हक यह है कि मुतमइन11 मैं खुद भी नहीं, फिर भला आप क्यों होने लगे ?
बहरहाल, मेरी फ़िक्री शबबेदारियों12 का यह इज़हार पेशे ख़िदमत है। शबबेदारियों के ये इज़हारिए13 अगर आपकी मतजससि14 खिलवतों15 के वज़्ज़ार16 हमसफ़र17 बन सके, तेरी खुदफ़रेबी18 बड़े कर्ब19 से बच जायेगी।

-वसीम बरेलवी

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1.शरीर को झुलसा देनेवाली
2.पेड़
3.अवसर
4.कलाकार
5.सृजन
6.स्वाभाविक
7.निर्लिप्तता
8.रात-दिन
9.व्यस्तता
10.औचित्य
11.सन्तुष्ट
12.रतजगे
13.प्रस्तुति
14. जिज्ञासामय
15.एकान्त
16.अन्त तक निबाहने वाला
17. सहयात्री
18.आत्मञ्चना
19. बेचैनी।

ज़रा-सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है



ज़रा-सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है
समन्दरों ही के लहजे में बात करता है

खुली छतों के दिये कब के बुझ गये होते
कोई तो है, जो हवाओं के पार कतरता है
शराफ़तों की यहां कोई अहमियत1 ही नहीं
किसी का न बिगाड़ों, तो कौन डरता है

यह देखना है कि सहरा2 भी है, समन्दर भी
वह मेरी तश्नालबी3 किसके नाम करता है

तुम आ गये हो, तो कुछ चांदनी-सी बातें हों
ज़मीं पे चांद कहां रोज़-रोज़ उतरता है

ज़मीं की कैसी वकालत हो, फिर नहीं चलती
जब आसमां से कोई फ़ैसला उतरता है


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1. महत्ता
2. मरुस्थल
3. प्यास

खुल के मिलने का सलीक़ा आपको आता नहीं


और मेरे पास कोई चोर दरवाज़ा नहीं

वो समझता था, उसे पाकर ही मैं रह जाऊंगा
उसको मेरी प्यास की शिद्दत1 का अन्दाज़ा नहीं
जा, दिखा दुनिया को, मुझको क्या दिखाता है, ग़रूर तू समन्दर है, तो हो, मैं तो मगर प्यासा नहीं

कोई भी दस्तक करे, आहट हो या आवाज़ दे
मेरे हाथों में मेरा घर तो है, दरवाज़ा नहीं

अपनों को अपना कहा, चाहे किसी दर्जे के हों
और अब ऐसा किया मैंने, तो शरमाया नहीं

उसकी महफ़िल में उन्हीं की रौशनी, जिनके चराग़
मैं भी कुछ होता, तो मेरा भी दिया होता नहीं

तुझसे क्या बिछड़ा, मेरी सारी हक़ीक़त2 खुल गयी
अब कोई मौसम मिले, तो मुझसे शरमाता नहीं

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1. तीव्रता
2. वास्तविकता






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