तुम्हारे प्यार की पाती - शान्ता कुमार Tumhare Pyar ki Pati - Hindi book by - Shanta Kumar
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तुम्हारे प्यार की पाती

शान्ता कुमार

प्रकाशक : परमेश्वरी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :80
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5712
आईएसबीएन :978-81-88121-80

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इन कविताओं के माध्यम से जो कुछ मन में उमड़ा वही इन शब्दों में उतर आया और अब पाठकों को समर्पित है।

Tumhare Pyar Ki Pati

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


कविता लिखने को सोचकर मैंने कभी भी कविता नहीं लिखी। शायद सोचकर कविता लिखी भी नहीं जाती। कविता तो भावनाओं की धारा बनकर स्वयं ही प्रवाहित होती है। स्वयं ही लिखी जाती है।
मैं 1953 में कश्मीर आंदोलन में सत्याग्रह करके हिसार जेल में भेजा गया। हिसार की तपती गर्मी व जेल की यातनाओं से बाल मन में कुछ भावनाएँ कविता बनकर उतरती रहीं। उसके बाद लंबे 22 वर्ष बीत गए। सार्वजनिक जीवन की व्यस्तता और संघर्ष में मुझसे मेरे कवि का कोई संपर्क न हुआ। फिर 1975 में आपातकाल के समय नाहन जेल में मुझे मेरा कवि मिला। कुछ कविताएं लिखी गईं।

श्री जयप्रकाश नारायण मुंबई में अपने जीवन के अंतिम पहर में थे। कुछ दिन बाद उनका स्वर्गवास हो गया। उनका अंतिम संस्कार में पटना गया। पटना से दिल्ली लौटा। एक कविता ‘फूल लेकर आए थे’ लिखी गई। ‘धर्मयुग’ के संपादक श्री धर्मवीर भारती जी ने मुझे फोन करके उस कविता पर बधाई भेजी थी।
मैं दो बार हिमाचल प्रदेश का मुख्यमंत्री रहा और एक बार केंद्र में मंत्री रहा। विकास की सारी प्रक्रिया में ‘अंत्योदय’ का मंत्र मेरी प्रेरणा रहा। उसी संबंध में मेरी कविता अंत्योदय’ को भी श्री धर्मवीर भारती और अन्य मित्रों ने बहुत सराहा था।
इन कविताओं के माध्यम से जो कुछ मन में उमड़ा वही इन शब्दों में उतर आया और अब पाठकों को समर्पित है।

शान्ता कुमार

ये कविताएँ


कविता लिखने को सोचकर मैंने कभी भी कविता नहीं लिखी। शायद सोचकर कविता लिखी भी नहीं जाती। कविता तो भावनाओं की धारा बनकर स्वयं ही प्रवाहित होती है। स्वयं ही लिखी जाती है।
17 वर्ष की आयु में प्रभाकर की परीक्षा देने के लिए धर्मशाला गया था। डिपू बाज़ार की एक सराय के एक ही कमरे में सब छात्र रहते थे। सामने चौक पर स्ट्रीट लाइट का लंबा खंभा था, उसी के नीचे रात को पढ़कर हम परीक्षा की तैयारी करते थे।

शायद बीच में दो छुट्टियां थीं। सभी छात्र घूमने भागसूनाग गए। उस झरने को देखकर बहुत आनंद आया। वहीं बैठकर कुछ सोचने लगा। सामने से सहपाठी छात्रा लक्ष्मी आ गई। लक्ष्मी से मुझे जीवन का सबसे पहला स्नेह मिला था। मेरे पास प्रभाकर की सभी पुस्तकें नहीं थीं तो मैं उसी से कुछ पुस्तकें लेकर पढ़ाई करता था। लक्ष्मी ने पूछा, ‘‘क्या सोच रहे हो ?’’ मेरे मुँह से एकदम निकल गया, ‘‘झरने क्यों झर-झर झरते हो !’’ ‘‘अरे कविता...कविता भी लिखते हो ?’’ लक्ष्मी ने पूछा। मैंने कहा, ‘‘नहीं, कभी लिखी नहीं, पर आज कुछ हो रहा है, कुछ उतर रहा है।’’
अन्य छात्र इधर-उधर घूमते रहे और मैंने एक कागज पर अपने जीवन की पहली कविता लिखी।
मैं 1953 में कश्मीर आंदोलन में सत्याग्रह करके हिसार जेल में भेजा गया। हिसार की तपती गर्मी व जेल की यातनाओं से बाल मन में कुछ भावनाएँ कविता बनकर उतरती रहीं। उसके बाद लंबे 22 वर्ष बीत गए। सार्वजनिक जीवन की व्यस्तता और संघर्ष में मुझसे मेरे कवि का कोई संपर्क न हुआ। फिर 1975 में आपातकाल के समय नाहन जेल में मुझे मेरा कवि मिला। कुछ कविताएं लिखी गईं।

श्री जयप्रकाश नारायण मुंबई में अपने जीवन के अंतिम पहर में थे उन्हें मिला और जनता पार्टी के आपसी झगड़े का जिक्र हुआ तो उनकी आँखों से आँसू ढुलक पड़े थे। कुछ दिन बाद उनका स्वर्गवास हो गया। उनके अंतिम संस्कार में पटना गया। वहाँ वे भी फूल लेकर आए थे, जो उनके जीवन की अंतिम पीड़ा का कारण बने थे। पटना से दिल्ली लौटा। एक कविता ‘फूल लेकर आए थे’ लिखी गई। ‘धर्मयुग’ के संपादक श्री धर्मवीर भारती जी ने मुझे फोन करके उस कविता पर बधाई भेजी थी।

मैं दो बार हिमाचल प्रदेश का मुख्यमंत्री रहा और एक बार केंद्र में मंत्री रहा। विकास की सारी प्रक्रिया में ‘अंत्योदय’ का मंत्र मेरी प्रेरणा रहा। उसी संबंध में मेरी कविता अंत्योदय’ को भी श्री धर्मवीर भारती और अन्य मित्रों ने बहुत सराहा था।
मेरी ये कुछ कविताएँ भाषा-शैली और छंद की कसौटी पर नहीं आँकी जा सकतीं। मैं कवि हूँ ही नहीं। कुछ देखकर, सहकर मन में जो कुछ उमड़ा वही इन शब्दों में उतर आया...वही समर्पित है।


शान्ता कुमार


धुंध में शिमला



गुदगुदे
सफेद-सफेद
नर्म-नर्म
कुछ ठंडे
कुछ गर्म
बादलों की
अलसाई
भटकती
बलखाती
धइर आती
उधर जाती
तन-मन से टकराती
पहली-पहली अनछुई
लाज में
कुछ शरमाती
कुछ सकुचाती
उड़ती
बिखरती
धुंध में
लिपटा शिमला
लगता है
सुहाग की
मधुयामिनी की
पहली रात
के बाद के
पहले प्रभात में
गोरी की बाँहों में
लिपटा पड़ा हो कोई।


गहराइयाँ



ऊँची और ऊँची
और सबसे ऊँची
कुर्सी पर बैठने वाले सभी ऊँचे नहीं होते
नीची और नीची
और सबसे नीची
कुर्सी पर बैठने वाले सभी
नीचे भी नहीं होते
उन उँचाइयों पर बैठे दिखने वाले
सभी बड़े नहीं होते
इन नीचाइयों पर बैठे
सिमटे रहने वाले
सभी छोटे भी नहीं होते
ये ऊँची ऊँचाइयाँ
और ये नीची नीचाइयाँ
कभी नहीं नाप पाईं
और
न नाप पाएँगी
मनुष्य के अंतर्मन की गहराइयाँ।


फूल लेकर आए थे



गंगा के किनारे
बाँसघाट की रेतीली जमीन पर
एक तरफ
जन-मानस का ज्वार उमड़ा था
और दूसरी तरफ
गंगा का शांत पानी था
जयप्रकाश सो रहे थे चिरनिद्रा में
क्रांति का वह अग्रदूत
बड़ी शांति से
नींद में ही
आखिरी नींद सो गया था
वह देश को क्या दे गया ?
देश से क्या ले गया ?
जो भी था उसके पास
वह देश को दे गया
और बदले में
कभी कुछ लिया नहीं
लेने की कामना तक भी की नहीं
लाखों आँखें सजल थीं
चेहरे मुरझाए थे
सारा देश मानो
बांसघाट आ गया था
गंगा मैया की गोद में
चिता जलने से पहले
जयप्रकाश के आँसू पोंछ दिए होते

जिसने देश को सब कुछ दे दिया
उसे देश इतना भी न दे पाया
उन्हीं के सामने
उन्हीं की भावनाएँ
क्षत-विक्षत कर दीं
सपना तोड़ डाला
उन्हीं के द्वारा
यमुना तीरे
बापू की समाधि पर
जो सौगंध खाई थी
वह भी सरेआम
तोड़ डाली

गंगा के किनारे जो भीड़ जुटी थी
उसमें कुछ चेहरे अजीब लगते थे
कुछ किरकिरी-सी पैदा करते थे
जिन्होंने जयप्रकाश का तन तोड़ा
और जिन्होंने
जयप्रकाश का मन तोड़ा
वे भी फूल लेकर आए थे
और चुप शांत खड़े थे
क्या संतोष की सांस ले रहे थे ?
या पश्चाताप कर रहे थे ?

यह शायद इसी देश में हुआ
कि देश को आजाद कराने वाला
आजाद देश में
बंदी बनाया गया
देश के सबसे बड़े भक्त को
देश का दुश्मन बतलाया गया
उसने अंग्रेज़ की
जेल तोड़ डाली थी
इन्होंने जेल में ही
उसे तोड़ डाला
वह सारी उम्र कुर्सी से दूर रहा था
इन्होंने कुर्सी के लिए
उसे ही दूर कर डाला

जीते-जी उसे
कुछ न दे सका
वह भारत आज
बाँसघाट पर क्यों
आ जुटा ?

तभी तोप गरजी
गंगा का शांत जल थर्राया
आँसू ढुलके
जयप्रकाश अग्नि को सौंप दिए गए
उस निराशा व मौन में भी
कहीं कहीं जवानी सिसक रही थी
और सिसकियों से
एक सदा गूंजती थी
‘‘लोकनायक ! तुम जाओ
अंतिम प्रणाम करते हैं
तुम्हारी अधूरी साधना
हम पूरी करेंगे
तुम्हें वचन देते हैं।’’


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पटना में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के अंतिम संस्कार के अवसर पर।


अंत्योदय



मुरझाया चेहरा
झुर्रियों की लकीरों में बुझा-बुझा
निराश आँखों में गरीबी का दर्द
नंगे पाँवों में फटी काली बिवाइयाँ
मैले चिथड़ों में लिपटा
लंबी अंधेरी जिंदगी का बोझ ढोता
इंतजार की घड़ियां गिनता
यह कौन है ?

इसी के नाम पर योजनाएँ बनीं
बनकर चली गईं
हवेलियाँ आसमान को छूती रहीं
और झोंपड़ी...?
उसकी घास के तिनके
योजना के नारों की हवा में
फड़फड़ाते रहे
यह वही गरीब है
हर पाँच साल के बाद
जिसे याद किया गया
इसकी गरीबी को
सरेआम बेचा गया
और उससे जो मिला
उससे
सिंहास सँवारे गए-सजाए गए





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