विवेकानन्द - रोमां रोलां Vivekananda - Hindi book by - Romain Rolland
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जीवनी/आत्मकथा >> विवेकानन्द

विवेकानन्द

रोमां रोलां

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :123
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5742
आईएसबीएन :00000

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विश्व-विख्यात फ्रांसीसी उपन्यासकार रोमां रोलां-कृत विवेकनन्द की जीवनी का हिन्दी अनुवाद...

Vivekanand

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

महान् भारतीय सन्त एवं चिन्तक रामकृष्ण का आध्यात्मिक दाय ग्रहण करके उनके चिन्तन के बीज-कणों को सारे संसार में वितरित करने और अपना कार्य सफलतापूर्वक सम्पादित करनेवाले विवेकानन्द का जीवन निश्चय ही अत्यन्त गौरवपूर्ण एवं प्रेरणादायक है। विवेकानन्द ने अपनी यात्राओं एवं रामकृष्ण मिशन की स्थापना द्वारा पूर्व और पश्चिम के बीच निश्चय ही एक आध्यात्मिक पुल का निर्माण किया है। विश्व-विख्यात फ्रांसीसी उपन्यासकार रोमां रोलां-कृत विवेकनन्द की जीवनी का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत कराकर साहित्य अकादेमी ने एक बड़े अभाव की पूर्ति की है। विवेकानन्द के जीवन, कार्यों एवं विचारों का सम्यक् परिचय तो इसमें है ही, रामकृष्ण के जीवन एवं सिद्धान्तों को भी संक्षिप्त रूप में दे दिया गया है, जिससे इस कृति की उपयोगिता और भी बढ़ गई है।

भारतीय पाठकों के लिए


जिस उत्साह से मैंने अपना काम किया है उसके बावजूद पश्चिम के एक व्यक्ति के लिए एशिया के हजार-हजार वर्ष के चिन्तनानुभव से सम्पन्न लोगों की व्याख्या असंभव ही है और उसमें भूल होना अनिवार्य है। इन भूलों के प्रति मैं अपने भारतीय पाठकों से अनुकम्पा की प्रार्थना करता हूं। मैं केवल अपनी उस निष्ठा की ही दुहाई दे सकता हूँ जिसने मुझे जीवन के सभी रूपों में श्रद्धापूर्वक प्रवेश करने की प्रेरणा दी है।

फिर भी यह मुझे स्वीकार करना चाहिए कि पश्चिमी व्यक्ति के नाते अपने स्वतन्त्र विवेक का अणुमात्र भी मैंने उत्सर्ग नहीं किया है। मैं सभी की आस्था का सामना करता हूँ, बहुधा उससे प्रेम भी करता हूँ। पर उसे ओढ़ नहीं लेता हूँ। रामकृष्ण मेरे हृदय के अत्यन्त निकट हैं क्योंकि मुझे उनमें एक मनुष्य दीखता है, एक ‘अवतार’ नहीं जैसा कि उनके शिष्यों को। वेदान्तमत का अनुसरण करते हुए मुझे यह आवश्यक नहीं जान पड़ता कि यह स्वीकार करने के लिए कि जो दैवी है वह आत्मा में निवास करता है और आत्मा घट-घट में व्याप्त है- कि आत्मा ही ब्रह्म है- ईश्वर को एक महापुरुष की काया में बाँधना ही होगा। क्योंकि ऐसा करना अनजाने रूप में आध्यात्मिक राष्ट्रीयता का ही एक प्रकार है जिसे मैं ग्रहण नहीं कर सकता।

मुझे जो कुछ है सभी में ईश्वर दीखता है। छोटे से छोटे अणु में भी वह उतना ही सम्पूर्ण दीखता है। जितना विपुल ब्राह्मण में। तत्त्वत: कोई भेद नहीं है। शक्ति व्यापक रूप से सीमाहीन है : हम देखें तो पहचानेंगे कि एक अणु में भी जो शक्ति छिपी है एक पूरे विश्व को ध्वस्त कर सकती है। अन्तर इतना ही होता है कि किसी आत्मा में, किसी अहं में, किसी विद्युत्करण में, शक्ति अधिक घनीभूत होती है। बड़े से बड़ा व्यक्ति भी उसी सूर्य का स्पष्टतर प्रतिबिम्ब होता है जो हर ओस की बूँद में चमकता है।

इसीलिए मेरे लिए आध्यात्मिक वीर पुरुषों के और प्राचीन अथवा आधुनिक काल के असंख्य साधारण जनों के बीच वैसी खाईं बनाना संभव नहीं है जिससे श्रद्धालु जन इतने प्रसन्न होते हैं। रामकृष्ण अथवा विवेकानन्द को मैं उनकी समकालीन आध्यात्मिक सेना से उतना ही विशिष्ट मानता हूं जितना क्राइस्ट या बुद्ध को उनके युग के आध्यात्मिक प्रवृत्ति से-न उससे कम न उससे अधिक।

रोमां रोलां


भूमिका


रामकृष्ण का आध्यात्मिक दाय ग्रहण करके उनके चिन्तन के बीजकणों को सारे संसार में विचरित करने का भार उनके जिस शिष्य के कन्धों पर पड़ा वह शारीरिक और नैतिक दृष्टियों से गुरु से सर्वथा भिन्न था।

•    परमहंस का पूरा जीवन देवी माँ भगवती के चरणों में बीता था। शैशव से ही वह देवी को समर्पित हो गये थे। आत्म चेतना से भी पहले उनमें यह चेतना जाग गयी थी कि देवी उनकी अनन्य प्रेयसी हैं। यद्यपि देवी से एकात्मक होने के प्रयत्न में उन्हें वर्षों क्लेश उठाना पड़ा तथापि यह क्लेश मानो एक परीक्षा ही थी जिसके द्वारा वह अपने उस पवित्र धार्मिक प्रेम के लिए अपनी पात्रता प्रामाणित कर सके। जिस दुर्गम वन में वह भटक रहे थे उसकी असंख्य पगडंडियों का एक ही लक्ष्य था : सहस्रों चेहरों की विविधता में एक उसी देवी का वदन प्रतिबिम्बित था और जब रामकृष्ण लक्ष्य तक पहुँचे तब उन्होंने पाया कि उन्होंने देवी की मुखमुद्रा में ही इन सब विभिन्न चेहरों को पहचाना और अपनाना सीख लिया है और इस प्रकार देवी के ही रूप में वह समूचे संसार को अपना सकते हैं। उनका शेष जीवन इस विश्वव्यापी आनन्द की शान्त सम्पूर्णता में बीता जिसके उन्मेष पश्चिम के लिए बेथोवेन और शिलर ने स्वर दिया।1

•    किन्तु परमहंस ने इस आनन्द का बेध पश्चिम के सन्त्रस्त वीरनायकों की अपेक्षा अधिक गहराई से किया था। बेथोवन के लिए आनन्द केवल घर्षणशील मेघों की घटा बीच में से पार राजहंस-से अपने विशाल शुभ्र पंख फैलाये चिरन्तनत्व के मरकत सरोवर पर विहार कर रहे थे।

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1.बेथोवन की नवीं (समवेत) सिम्फ़नी की ओर संकेत है जिसका अन्त शिलर कृत आनन्द गीत के स्वरों के साथ होता है।

•    उनके श्रेष्ठ शिष्यों का भी ऐसा सौभाग्य न था कि उसकी समानता कर सकें। उनमें जो सबसे महान और समर्थ थे-विवेकानन्द- वह भी यदा-कदा तूफान में उड़ाने भरकर ही उनकी ऊँचाई तक पहुँच पाते थे। विवेकानन्द की ये उड़ाने बार-बार बेथोवन का स्मरण दिलाती हैं। सरोवर के वक्ष पर विश्राम करते समय भी उनकी नौका की पाल मानों हर झोंके से फड़फड़ा उठती थी। धरती की पीड़ा भरी पुकारें मानों भूखे सागर-पक्षियों-सी उनके आस-पास मँडराती रहती थीं। उनके सिंह हृदय में सामर्थ्य की (दुर्बलता की कभी नहीं) वासनाएँ उमड़ती रहती थीं। वह मानों मूर्तिमान तेजस थे और कर्म ही संसार को उनका सन्देश था। बेथोवन की भाँति उनके लिए कर्म ही सब गुणों का मूल था। निष्क्रियता के-जिसका जुआ पूर्व के वृषभ-स्कन्धों पर इतना भारी पड़ा रहता था ! विरोध में उन्होंने यहाँ तक कहा था कि ‘‘सबसे ऊपर यह कि बलवान बनो, पुरुषार्थ करो ! मैं उस दुष्ट का
भी सम्मान कर सकता हूँ जिसमें पौरुष और सामर्थ्य है; क्योंकि एक दिन उसका सामर्थ्य ही उसे दुष्टता छोड़ने को- बल्कि स्वार्थमय कर्म छोड़ने को- बाध्य कर देगा। और इस प्रकार अन्त में सत्य पर ले आवेगा।’’

•    विवेकानन्द का पुष्ट शरीर भी रामकृष्ण के कृश-कोमल यद्यपि सुगठित शरीर से सर्वथा भिन्न था। लम्बा डील (पाँच फुट साढ़े आठ इंच), चौड़े कन्धे छाती भरी, सुडौल पुष्ट और व्यायाम की अभ्यस्त भुजा, विवेकानन्द का रंग गेहुँआ, चेहरा भरा और भारी पलकें कमल की पंखुड़ी की परिचित उपमा की याद दिला देती थीं। उनकी नज़र के जादू से कुछ नहीं बच सकता था। उसका आकर्षण जितना दुर्निवार था उसकी विनोदशीलता अथवा करुणा भी उतनी ही व्यापिनी थी। वह समाधि में खो जाती थी और चेतना के गहनतम् स्तर में पैठकर उसे उघाड़ देती थी। किन्तु विवेकानन्द का मुख्य गुण उनका राजस भाव था। वह मानो राजा ही जन्में थे और भारत अथवा अमेरिका में जो भी उनके निकट आया वह मानो उसके सिंहासन के सामने सिर नवाने को बाध्य हो गया।


•    तीस वर्ष का यह अज्ञात नवयुवक जब सितम्बर 1813 में शिकागो में सर्व-धर्म सम्मेलन (पार्लियामेन्ट आफ रेलिजन्स) के कार्डिनल गिबंस द्वारा उद्घाटन के अवसर पर प्रकट हुआ तब उसकी भव्य आकृति के सामने और सब प्रतिनिधि भुला दिये गये। एंगेलो-सैक्सन अमेरिकी जो आरम्भ में उसके रंग के कारण एक विरोधी पूर्वाग्रह लिए हुए थे उसकी सुन्दर और बलिष्ठ देह, उसकी शालीन भंगिमा और प्रभावशाली मुद्रा, उसकी आँखों की गहरी चमक और उसके बोलना आरम्भ करने पर उसकी गंभीर वाणी के भव्य संगीत से मुग्ध हो गये। भारत के इस क्षत्रिय सन्देश वाहक की चिन्तनधारा की अमेरिका पर गहरी छाप पड़ी।

•    उनके कहीं भी दूसरे स्थान पर होने की कल्पना ही कठिन थी- जहाँ भी वह जाते उनका स्थान सर्वप्रथम ही होता। स्वयं उनके गुरु रामकृष्ण ने एक स्वप्न में अपने प्रिय शिष्य के सम्मुख अपने को किसी महर्षि के सम्मुख एक शिशु-सा देखा था। विवेकानन्द स्वयं इस सम्मान को अस्वीकार करने का प्रयत्न करते, अपनी कड़ी आलोचना करते और अपने को हीन सिद्ध करना चाहते किन्तु व्यर्थ; उन्हें देखते ही प्रत्येक व्यक्ति उन्हें नेता का, भगवान् के कृपापात्र का वरिष्ठ पद देता। हिमालय में कहीं एक अपरिचित व्यक्ति से राह में अचानक उनसे भेंट हो जाने पर विस्मय-स्तब्ध होकर पुकार उठा था, ‘‘शिव’’।
•    ऐसा जान पड़ता था कि उनके इष्ट देवता ने स्वयं अपना नाम उनके ललाट पर लिख दिया है।

 


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