वाग्दत्ता - रमाकान्त पाण्डेय Vagdatta - Hindi book by - Ramakant Pandey
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वाग्दत्ता

रमाकान्त पाण्डेय

प्रकाशक : साहित्य चन्द्रिका प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :160
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5747
आईएसबीएन :81-7932-046-4

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प्रस्तुत है उपन्यास....

Vagdatta

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


अनिंद्य सौन्दर्य से बोझिल किशोरियों का म्रसृण सान्निध्य मात्र ही किसी भी पुरुष में उत्साह भर देता है, यही नहीं वह उसमें पौरुषेय ऊष्मा का सर्जन भी कर देता है और यदि कहीं ऐसे में उसके अंग-प्रत्यंग का स्पर्श हो जाए तो उस पुरुष को उन्माद से सम्पूरित कर उर्मिल स्पन्दन प्रदान किये बिना नहीं रहता। प्राणोंर्जा सम्पन्न यावज्जीवन के सौख्यपूरित पृष्ठांकन में जब अनुरागसिक्त मन स्वयं के अन्तरतम से प्रस्फुटित हो उठता है तो यह प्रिय के अर्पित होने का अध्यवसाय नहीं करता अपितु प्रिय के प्रति समर्पित हो जाता है। वस्तुतः यह विशुद्ध आराधना ही है। कुन्तला युवराज चन्द्रगुप्त के प्रति समर्पित रहते हुए व्यजनवाहिका ही बनी रही, तो भी ध्रुव स्वामिनी ने उसे अपनी सखी बनाकर ही प्रसन्नता का अनुभव किया।

दासी पुत्र रामगुप्त के काल की तरह जब किसी शासन में शासनाध्यक्ष स्वर्ण, सुवर्णा तथा सौख्येतर सुखोपभोगों की ओर आकर्षित हो जाता है तब राज्यसत्ता की धुरी अपने आप तिर्यक होकर जन-जन को पथच्युत कर देती है, परिणामतः शासनाध्यक्ष के साथ राज्य का भी सर्वनाश अवश्यम्भावी हो जाता है, रमाकान्त पाण्डेय ‘अकेले’ ने धीरोदात्तनायकों में से अपेक्षाकृत कम चर्चित नायक कथा को प्रमाणिक रूप में कल्पनाप्रसूत ताना-बाना रचकर प्रांचल भाषा में प्रस्तुत कर एक स्तुत्य प्रयास किया है। यह कृति अपने भाषा वैभव के बल पर आचार्य चतुरसेन की ‘वैशाली की नगरवधु’  वृन्दावनलाल वर्मा की ‘मृगनयनी’ तथा भगवती प्रसाद वर्मा की ‘चित्रलेखा’ को मीलों दूर छोड़ चुकी है अतः ऐतिहासिक औपन्यासिक कृति प्रेमियों के लिए ‘वाग्दत्ता’ एक अप्रतिम एवं अमूल्य उपहार है—न केवल पठनीय अपितु संग्रहणीय भी है।

श्रीकृष्ण शर्मा

समर्पण

तपस्विनी, देवी दुल्ले को
जिनका स्नेहिल हृदय सभी के निमित्त अहर्निश खुला
रहता था

रमाकान्त पाण्डेय ‘अकेले’

द्रष्टव्य


 समय की निरंकुश सत्ता के आधीन, उसी की इच्छानुसार परिपालित होकर जिस प्रकार प्रकृति की भौगोलिक परिस्थितियाँ स्वतः परिवर्तित होती रहती हैं। निर्झर शीर्ण—सी प्रवाहिकायें हृद और नद का स्वरूप ग्रहण कर लेती हैं। भूक्षरण, भूधर और उत्तुँग श्रृंग रक्षण में बदल जाते हैं। उपसकाओं को वन और वन को मरु बनते देर नहीं लगती। मरु प्रान्तों में नगर बस जाते हैं और नगर जन-शून्य गहन गह्वर।
ठीक उसी प्रकार रंक को राव और करंक धारण कर भिक्षावृत्ति ग्रहण करते देर नहीं लगती। इसी अपरिहार्य परिवर्तनशीलता के मध्य, समय की अरल अराओं में पड़कर, गृह, ग्राम, समाज और युग स्वंय के चिह्न मिटा बैठते हैं। उनकी परम्परायें संज्ञाहीन प्रकृति नव निर्माण में व्यस्त हो जाती हैं।

जिसके फलस्वरूप नवीनतम समाज का उदय स्वतः हो चलता है और फिर वही समाज स्वयं की अन्यान्य सुविधाओं को संजोकर युग का प्रतिष्ठापन करता है। इन्हीं परिवर्तनों की ऊहापोहों में प्राकृत को अतीत के सुखों-दुःखों, सुलझाव, उलझाओं और अपनी विगत परम्पराओं के शोध की आवश्यकता पड़ती है। उसे उनका अभाव खटकने लगता है और वह अपनी वर्तमान विधाओं के परिष्करण हेतु जो कुछ अतीत से हस्तगत कर पाता है, उन्हीं को नव युग के संस्थापन का मानदण्ड मानकर, वर्तमान के माध्यम से भविष्यत् का निर्माण करता है। यही कारण है कि सहस्त्रों युगों के व्यतीत हो जाने पर भी संसार की वर्तमान पीढ़ी मानव की प्राचीन परम्पराओं, आचार, व्यवहारों की परिक्रमा करती हुई आज दृष्टिगत होती है।
अतीत से कुछ न कुछ अर्जित करते रहकर उसे सुरक्षित रखने और उसके यथेष्ट प्रचार-प्रसार की अनन्यतम विधाओं के संयुक्तीकरण का नाम ही इतिहास है।
इतिहास के अभाव में वर्तमान युग को दिशान्ध होते  क्षण भी न लगेंगे और दिशान्ध को स्वयं का पथ निर्दिष्ट करते उसका जीवन ही निःशेष हो चलेगा, फिर विकास और उन्नयन कैसा ?
अतः तम में टटोलना क्या ?

इतिहास ही वह प्रकाश स्तम्भ है जिससे जग के मग में आलोकित रहते हैं। उसी प्रभा-कुंज में नव युग सुख से विचरण करता है और आगत समाज को दिशा ज्ञान कराकर वह उसे संतुलित सुख और समृद्धि की ओर अग्रसित करता है।
‘वाग्दत्ता’ के साथ हम अपने पाठकों को सूदूर अतीत की उन कुसमित वीथियों में विहारार्थ ले चलना चाहते हैं, जहाँ रूप, स्वरूप और सौन्दर्य तथा सुषमा, ओज, प्रसाद एवं शौर्य को बाहुवल्लरियों के गुम्फन में गुम्फित किये आनन्द विभोर हो उठे हैं। जहाँ जीवन जाज्वलित हो उठा है। वही अडिग विश्वास ने भ्रम को रौंद कर शाश्वत स्नेह की अजस्रधारा में आप्लावित कर कुन्दन बना डाला है।

दुग्ध सलिला भागीरथी की प्रशान्त धारा जहाँ शोण के श्यामल जल से मिलकर स्वयं की संज्ञा ही खो देती है, वहीं उसी विस्तीर्ण प्रान्त में एक नगर था, जिसे हम पाटलिपुत्र के नाम से जानते हैं। उस समय यह नगर आज की दिल्ली से दूना और समृद्धि में चौगुना था। आज से लगभग डेढ़ पौने दो हजार वर्ष पूर्व, इसी नगर में निर्मित सुभव्य, विशाल प्रसाद में रहकर गुप्त राजवंश के सम्राटों ने भारत में सुख-शान्ति और समृद्धि के भण्डार भर दिये थे।
समय ने करवट बदली, युग स्वतः परिवर्तित हो चले और वह दिन आया जब कि पाटलिपुत्र का वह विशाल प्रसाद जर्जरित हो शोण में विलीन हो गया। यह घटना  आज से लगभग हजार-ग्यारह सौ वर्ष पूर्व की है। पाटलिपुत्र के शेष निवासियों ने थोड़ा हट-बढ़कर, जिस भू-भाग को अपना गेह बनाया, वह आज भी विद्यमान है, जिसे हम पटना कहकर पुकारते हैं।
गुप्त वंश के आदि पुरुष का नाम ‘गुप्त’ ही था। यह क्षत्रिय थे। असि इनकी निधि थी और सौर्य इनका प्रकृति प्रदत्त गुण। यह कनिष्क के सामन्त थे।

गुप्त के पुत्र का नाम था घटोत्कच। यह तत्सामयिक शक साम्राज्य के सेनापति थे। उस समय शक जाति ब्राह्मणों से बलात् क्षत्रिय बनने को आतुर थी। शक राज परिवार को तो क्षत्रियत्व हस्तगत हो चला था, किन्तु साधारण राजकर्मी अपनी क्रूरता के माध्यम से क्षत्रियत्व पाने को इस प्रकार लालायित हो उठे कि उनके अत्याचारों से ब्राह्मण त्रस्त हो चले। उन्होंने क्षत्रियों की शरण ली, किन्तु वे उनसे पहले ही रुष्ट थे अतः ब्राह्मणों की रक्षा न हो सकी।
ठीक इसी जाति-विपणन के काका रोर में पड़कर एक ब्राह्मण की रक्षा हेतु घटोत्कच ने कर्ण और सुवर्ण नामक दो शक मल्लों को मार गिराया। यह उनका स्पष्ट राजद्रोह था शकराज क्रोध से फुँकार उठे। लगा, मानों ब्राह्मण और क्षत्रिय अब इस धरती से उत्पाटित हो जायेंगे।

लिच्छिवियों ने घटोत्कच को शरण दी, साथ ही उनके पुत्र चन्द्रगुप्त प्रथम के साथ अपनी पुत्री कुमार देवी का विवाह भी कर दिया। चन्द्रगुप्त प्रथम महा मेधावी और परम पराक्रमी थे, उन्होंने अपने बाहुबल से सन् 321 ई. में मगध का सिंहासन हस्तगत कर लिया। अब चन्द्रगुप्त स्रमाट थे। उन्होंने एक विशाल सेना का संगठन किया और अल्पकाल में ही मंडला, रोहिताश्व, प्रतिष्ठान और चरणार्द्रि आदि दुर्गों से शक गढ़पतियों को दुग्ध की मक्षिका सा निकाल फेंका। साम्राज्य की सुस्थिर व्यवस्था की, फलतः राजस्व से पाटिलपुत्र का कोष भर चला।

इन्हीं चन्द्रगुप्त के पुत्र का नाम समुद्र गुप्त था। पिता की मृत्यु के पश्चात् 350 ई. में महापराक्रमी समुद्रगुप्त सिंहासनारूढ़ हुये। उन्होंने अपने साम्राज्य का समुद्र से लेकर समुद्र तक विस्तार किया। प्रतिष्ठान (झूँसी इलाहाबाद) के अजेय दुर्ग में इन्होंने जल की व्यवस्था हेतु समुद्र कूप का निर्माण करवाया जो आज भी विद्यमान है यह गुप्त राजवंश का स्वर्णिम युग था।
समुद्र गुप्त ने अपने साम्राज्य, जो कि दक्षिण में कौशल केरल, कांची, पूर्व में नेपाल तथा कामरूप, पश्चिम में नरवर, मालवा और खान देश तक फैला हुआ था, इसकी सुव्यवस्था हेतु उन क्षत्रियों को अपने गढ़ में स्थापित किया था, जिन्होंने अपना सर्वस्व देकर गुप्त साम्राज्य की अभिवृद्धि की थी।

इन क्षत्रियों में दत्तवंश, धरवंश, भीतिवंश, धवलवंश सर्वाधिक सम्मान्य थे। चन्द्रगुप्त प्रथम के पश्चात् हुये गुप्त सम्राटों की पट्टमहिषियाँ इन्ही उक्त गढ़पतियों की सुयोग्य कुमारियाँ थीं।
मण्डला दुर्ग के गढ़पति स्थाणुदत्त की पुत्री दत्त देवी समुद्रगुप्त की पट्टमहिषी थीं, जिनसे चन्द्रगुप्त द्वितीय का जन्म हुआ। रोहिताश्व दुर्ग के धरवंशीय गढ़पति रुद्रधर की एक मात्र कन्या ध्रुव देवी, चन्द्रगुप्त की पटरानी हुई।
सम्राट समुद्रगुप्त की दिग्विजय के पश्चात् उनके प्रेम अन्तःपुर की एक पंचनद देशीय दासी रूपसी से हो गया। अब तक उन्हें पट्टमहिषी दत्त देवी से कोई सन्तान की प्राप्ति न हुई थी। दासी जया से उन्हें जो पुत्र प्राप्त हुआ उसका नाम था रामगुप्त।
रामगुप्त के जन्म के तीन मास पश्चात् दत्त देवी से चन्द्रगुप्त द्वितीय का जन्म हुआ।
दिग्विजय, अश्वमेघ पराक्रम सम्राट समुद्रगुप्त ने पचास वर्षों तक निष्कण्टक राज्य किया। उनके दिवंगत होते ही दासी जया पुत्र रामगुप्त पट्टमहिषी दत्त देवी पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय में आर्य पट्ट हेतु विवाद भी हुआ, ऐसा कुछ विद्वानों का मत है। रामगुप्त सम्राट हुए, यह भी इन्हीं विद्वानों का कथन है।

किन्तु इस तथ्य को भी विद्वान नहीं स्वीकारते, उनका कहना यह है कि सम्राट समुद्रगुप्त के पश्चात् निर्विघ्न चन्गद्रगुप्त द्वितीय राजसिंहासन के स्वामी हुये।
ध्रुवा के लेखक परम विद्वान, पुरातत्त्वान्वेषी, श्री राखालदास जी वन्द्योपाध्याय और ध्रुव स्वामिनी के लेखक, सुप्रसिद्ध कवि और सर्वोत्कृष्ट नाटककार जयशंकर प्रसाद जी रामगुप्त के सिंहासनारूढ़ होने के पक्षधर हैं। अतः उक्त तथ्य को निर्मूल सिद्ध करना इतना सरल नहीं। तथ्यहीन, निराधार ऐतिहासिक घटना को जीवन्त प्रमाणित करने को उनकी लेखनी कदापि नहीं उठती। ऐसा विश्वास है।

‘वाग्दत्ता’ की कथावस्तु कुछ इन्हीं उक्त विद्वानों की रुचि से मेल खाती है। रूप लोलुपता और आत्मिक स्नेह के द्वन्द्व को पृष्ठों में संजोकर, मैं अपने पाठकों हेतु उस युग से उन्हें परिचित कराने के साथ उनके मनोरंजन की सामग्री जुटाने की युक्ति में स्वयं की उक्तियाँ विजड़ित करने को तत्पर हुआ हूँ।
अब प्रश्न उठता है कि क्या वाग्दत्ता इतिहास है अथवा इतिहास के पुष्ट वक्ष से लिपटी हुई पल्लवित, कुसमित कोई लता क्षुपिका ? जिसकी सुघड़-सलोनी, स्वर्णिमा-सी लावण्यता उससे विलग होते ही क्षीयमान हो उठेगी।
उत्तर में मेरा मात्र इतना ही निवेदन है कि इसके सुधि पाठक इसके वे तथ्य स्वीकार करें, जो स्वतः उन्हें बरबस अपनी ओर आकृष्ट कर लें। शेष में तो यह उपन्यास है ही, कल्पनाओं की पुष्ट-पुटिका।

रमाकान्त पाण्डेय ‘अकेले’
ब्रह्यावली, कालोनी

कनक कामिनी


लगभग सोलह साढ़े सोलह सौ वर्ष हुए, जब शोषण की श्यामलधारा गंगा के स्वेत-स्वच्छ प्रवाह में पड़कर विलीन हो जाती थी, मानो जगती का पंकिल संगम पाप, शनैः-शनैः पुण्य में पड़कर पुण्यप्रभ हो उठा हो। यहीं शोण और भगीरथी के संगम पर स्वेत-श्याम, मर्मरीय दुर्ग था, दृढ़तर और अजेय, चार तोरणों से युक्त, सुदृढ़ काष्ठमयी प्रकार से आवृत।
इसी दुर्ग के त्रिकोणीय पार्श्वों में सुसम्पन्न विशाल नगर था, पन्द्रह हाथ चौड़े, उत्तुंग श्रृंगवत प्रकारों से समावृत्त। दुर्ग और नगर जल पूर्ण गम्भीर परिखाओं से सुरक्षित था। सभ्यता, सम्पन्नता यहाँ बिखरी पड़ी थी,। रौप्य, रत्न, स्वर्ण यहाँ के पण्यों में माटी के मोल बिकते थे। यहाँ के धनि, वणिक और श्रेणी निरालसी और उद्यमी थे। सुदूर देशों तक जलपोत आकर यहाँ के भण्डार भर जाते और द्रम्म-दीनारों से बोझिल अपने पोत लेकर सुरक्षित अपने देश लौट जाते। नगर निवासी स्वच्छन्ता पूर्वक, सुख से जीवन यापन कर रहे थे। तब इसी नगर को पाटिपुत्र कहते थे। किन्तु अब इसके चिन्ह भी अवशेष नहीं। समय की अदृश्य-सी अबाध क्रीड़ा के फलस्वरूप परमेश्वरी प्रकृति नित्य ही ऐसे परिवर्तनों का सृजन और उत्पादन किया ही करती है फिर आश्चर्य ही क्या ?

जब से परमेश्वर परम भट्टारक पादीय, राज राजेश्वर, सम्राट समुद्रगुप्त दिग्विजय करके पाटलिपुत्र लौटे हैं, तब से यहाँ नित महोत्सव मनाये जा रहे हैं। गढ़पतियों, सेनानायकों और बलाधिकृतियों के अभी सम्मानोत्सव होने की तिथि निश्चित नहीं हो पायी है, तभी अब तक ससैन्य सभी पाटलिपुत्र में ही अवस्थित है। नगर मंगल कलशों से युक्त तोरणों से सजाया गया है। भिक्षु, श्रमणों और स्थविरों तथा साधु-सन्तों, ब्राह्मणों के निमित्त पट्टमहादेवी ने दानपुण्य हेतु अन्न, वस्त्र तथा रौप्य-रत्नों के भण्डार खोल दिये हैं। आगत अतिथियों, साम्राज्य के शुभेच्छियों से नगर की पंथ शालायें तक भरी पड़ी हैं। भण्डारे चल रहे हैं।



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