वे दिन वे लोग - ए. हमीद Ve Din Ve Log - Hindi book by - A. Hameed
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वे दिन वे लोग

ए. हमीद

प्रकाशक : एच के बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :80
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5751
आईएसबीएन :81-86504-34-6

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इन कहानियों के माध्यम से कहानीकार ने अपने अनुभवों के आधार पर सामाजिक परिदृश्य का चित्रण किया है। अपने तात्कालिक परिवेश में व्याप्त विरूपताओं को उजागर करने में लेखक सफल रहा है।

Ve Din Ve Log

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘वे दिन वे लोग’ कथा-संग्रह उर्दू के विख्यात कहानीकार ए. हमीद की लम्बी कहानियों का हिन्दी-अनुवाद है। ए. हमीद की अधिकतर रचनाएँ आत्मकथ्यात्मक शैली में होते हुए भी अपने इर्द-गिर्द के माहौल में घटित अच्छाइयों-बुराइयों को व्यक्त करने में सक्षम रहती हैं। इन कहानियों के माध्यम से कहानीकार ने अपने अनुभवों के आधार पर सामाजिक परिदृश्य का चित्रण किया है। अपने तात्कालिक परिवेश में व्याप्त विरूपताओं को उजागर करने में लेखक सफल रहा है। चारों कहानियों के कथ्य का धरातल भिन्न-भिन्न होते हुए भी अपनी बात कहने में सशक्त बन पड़ा है और पाठकों के मन को छूने में कामयाब भी। विश्वास है, सुधी पाठक इस पुस्तक को उपादेय पाएँगे और संग्रहणीय भी।

पूर्वकथन

उर्दू के मशहूर कहानीकार ए. हमीद ख्वाजा अहमद अब्बास, कृश्न चन्दर, अहमद नदीम क़ासमी, जीलानी बानो, सज्जाद ज़हीर, राजिन्दर सिंह बेदी, रज़िया फ़सीह अहमद इत्यादि कथाकारों की पीढ़ी के कथाकार हैं। इनके अनेक उपन्यास एवं कहानी-संग्रह हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित होकर प्रकाशित हो चुके हैं।
ए. हमीद के लेखन की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह है कि वे कथावस्तु को आत्मकथ्यात्मक शैली में कहते हुए आसपास के परिवेश को, परिदृश्य को, परिप्रेक्ष्य को बड़ी खूबी से प्रस्तुत कर जाते हैं। वे अपनी बात के बहाने दूसरे पात्रों का चरित्र-चित्रण बहुत ही अच्छी प्रकार करते हैं और समाज में फैली कुरीतियों, विसंगतियों का पर्दा फ़ाश करने में कामयाब हो जाते हैं। इनके संवाद वर्णन-शैली, शब्दचयन प्रस्तुत पाठकों को हमेशा अपनी ओर आकर्षित करती रही है। कथाकार की हमेशा यह कोशिश रही है कि भाषा की दुरूहता से बचकर अपनी बात को सहज, सरल और मुहावरेदार ज़बान में पेश किया जाए और इसमें वे सदा कामयाब भी रहे हैं।

प्रस्तुत संकलन में ए. हमीद की जिन चार कहानियों का हिन्दी-अनुवाद दिया गया है, वे हैं-वे दिन वे लोग, माँ का दिल, रावण के मुल्क में तथा अन्तिम पड़ाव। चूँकि लेखक का काफ़ी समय फ़िल्म नगरी बम्बई (मुम्बई) में बीता है अतः पहली कहानी के कथानक का आधार भी मुम्बई के वातावरण का, वहाँ के नाना स्थानों का, वहाँ के वासियों के स्वभाव का, रहन-सहन का आँखों-देखा वर्णन इस कहानी में पढ़ने को मिलेगा। इस कथा में जहाँ लेखक अपने बचपन, अपने पारिवारिक परिवेश की बात करता है; वहीं समय पर बीती हुई अच्छी-बुरी बातों का भी मार्मिक लेखा-जोखा पेश करता है। कहानी लम्बी होते हुए भी अत्यन्त रोचक और पठनीय बन पड़ी है।  
दूसरी कहानी ‘माँ का दिल’ में लेखक एक खास मुद्दे को लेकर चला है जो धर्म के प्रति आस्था और माँ के प्रति श्रद्धा का द्योतक है। इस कहानी में अंग्रेजों और जापानियों के ऐतिहासिक युद्ध के माध्यम से लेखक ने उन हालात से जन्मे प्रभाव को प्रस्तुत किया है और बुराइयों, बादियों तथा अधार्मिक कृत्यों से स्वयं को बचाये रखने का मानव को सन्देश भी दिया है।
‘रावण के मुल्क में’-इस तीसरी कहानी के माध्यम से लेखक ने श्रीलंका की ज़मीन, वहाँ की प्राकृतिक सम्पदा, वहाँ के रहन-सहन, वहाँ की संस्कृति-सभ्यता..... इत्यादि को बहुत ही सुन्दर ढंग से पेश किया है। बौद्ध धर्म की स्थली, श्रीलंका की स्थिति से अवगत कराते हुए लेखक ने व्यंग्यात्मक ढंग से उसमें आई कमियों की ओर भी संकेत किया।
चौथी कहानी पूर्व कहानियों से अपेक्षाकृत छोटी कहानी है-अन्तिम पड़ाव, जिसमें शहर और गाँव की संस्कृति में होनेवाले अन्तर की ओर इशारा किया गया है।
इन कहानियों का सरल, सहज और सरस शैली में हिन्दी-अनुवाद किया है प्रसिद्ध अनुवाद श्री सुरजीत ने जिन्हें हाल ही में पंजाबी अकादमी, दिल्ली ने सम्मानित किया है।  
-डॉ. ‘दरवेश’ भारती

वे दिन वे लोग

बम्बई सेन्ट्रल। इतना बड़ा स्टेशन। लोहे के गार्डरों की बुलन्द छतें। दूधिया टाइलों-वाली ऊँची दीवारें। पत्थरों से बने दैत्याकार साफ-सुथरे चमकीले, आलीशान प्लेटफार्म, दरवाजों पर जगमगाती हुई सुर्ख और सब्ज रोशनियाँ। छक-छक, फक-फक के साथ शंट करते इंजन। ग्यारह नम्बर प्लेटफार्म पर अभी आकर रुकी फ्रंटियर मेल और उससे उतरते हुए मुसाफिरों की धक्का-मुक्की। कुलियों का शोर। सामान से लदे हुए लोहे के ठेलों की गड़गड़ाहट। मालगाड़ी के डिब्बे से गिराई जानेवाली बोरियों और बन्द पेटियों के धमाके। तीसरे दर्जों से जिद्दी बच्चों को घसीटकर निकालती हुई माँए। अपने आदमियों को पुकारती हुई मथुरा, झांसी और उज्जैन की ग्वालिनें। मेजबानों को ढूँढ़ती हुई आँखें और मेहमानों को ढूढ़ते हुए मेजबान। लाल काली साड़ियों से सीना और चौड़े कूल्हे ढाँपे मुसम्बी बेचने वाली खुरदरी, साँवली और तीखी मरहठनें और उनके गहरे स्याह बालों से उठती हुई नारियल के तेल की गन्ध और बरसात की भीगी-भीगी, नमदार, सीली फिजा....जैसे फ्रंटियर मेल प्लेटफार्म की बजाय किसी सीलन-भरी गुफा में आ रुकी हो, जिसकी पथरीली छत की दराजों से पानी की बूँदे टपक रही हों। उसी प्लेटफार्मे पर एक खम्भे के पास लोहे की एक पेटी के ऊपर एक लड़का बैठा यह सबकुछ ताज्जुब और तन्मयता से देख रहा था। लगता था कि वह उस धक्का-मुक्की से बहुत दूर, समुन्दर के किनारे किसी तनहा चट्टान पर बैठा उन मेहरबान चेहरों को याद कर रहा था। वह परदेशी लड़का थोड़ी देर पहले फ्रन्टियर मेल से एक थर्ड क्लास कम्पार्टमेंट से उतरा था और चमड़े की एक छोटी-सी अटैची गोद में उठाए औंधी पड़ी हुई है पेटी पर आकर बैठ गया था। उसकी उम्र चौदह-पन्द्रह के आसपास थी। रंग सफेदी लिए हुए गेहुँआ, कद लम्बा। दुबला-पतला, मगर ढाँचा चौड़ा और हाथ-पाँव मजबूत। चेहरा गोल और उस पर बदरंगी-सी दिलकश उदासी झलकती थी। उन आँखों में बम्बई पहुँचने की खुशी थी। साथ ही घर से बिछुड़ने का अहसास और इतने बड़े शहर में अपने-आप को अकेला और बेसहारा पाने का सहमा हुआ गम भी था। उसने मैली-सी कमीज पर कोट और पायजामा पहन रखा था। पांव में चप्पल थी। उसके लम्बे बालों में इंजन की राख और उड़े हुए कोयले की बारीक किरचियाँ फँसी हुई थीं। चेहरे पर धुँए की कालिख का गुबार और पिछली दो रात सो न पाने के कारण नींद की थकान। यह लड़का अचैटी गोद में लिये चुपचाप बैठा प्लेटफार्म पर भरे हुए मेले को ताक रहा था और उसमें काफी दिलचस्पी ले रहा था। एक पल के लिए वह भूल गया था कि वह कहाँ से आया है और उसे कहाँ जाना था। उसके सामने फर्स्ट क्लास से निकली हुई लाल कुप्पा लंगडी मेम कुत्ते की जंजीर थामे समान का ढेर गिन रही थी और कुत्ता दुम हिलाते हुए भूंक रहा था। करीब ही सफेद वरदी और काली टोपीवाला एक टी.टी खड़ा था और पूरे खुले कागज पर लिख रहा था। दूसरे दर्जे के आगे एक मोटा-भद्दा लाला बार-बार सामान के इर्द-गिर्द घूम रहा था ‘‘अपने पोटली कहां है रे ?’’
उसकी मोटी ललाइन आधा दर्जन बच्चों को संभाल रही थी। उनमें से कोई रो रहा था, कोई जिद कर रहा था, कोई लंगड़ी मेम के कुत्ते से डर रहा था और कोई दूसरी तरफ भागने का जतन कर रहा था। एक बीमार-सी बच्ची टोकरे से शरीफा का फल निकालकर खा रही थी। इंटर क्लास के दरवाजे में एक दोपली किश्तीनुमा टोपी और फूले हुए अंगरखा-वाले बुजुर्ग कल्ले में गिलौरी जमाने के बाद मखमली पोटली से सुपारियाँ निकाल रहे थे। साथ ही निचला होंठ ऊपर उठाए अपने बेटे को हिदायतें दे रहे थे।
तीसरे दर्जों का सामान खिड़कियों और दरवाजों में से मुरदा लाशों की तरह बाहर फेंका जा रहा था। पुलिस के दो सिपाही एक मारवाड़ी सेठ का बिस्तर खुलवाकर एक-एक सामान को ठोंक-बजा कर परख रहे थे। तीन सूदखोर पठान नसवार लेते, थूकते ज़ोर-ज़ोर से बातें करते चले आ रहे थे एक पठान दूर से किसी लाला जी को देखकर चिंघाड़ने लगा, ‘‘ओ सेट बाई ! तू कैसा है, कारोबार कैसा है ?’’
लाला जी के हाथ से काँसे की गड़वी छूटकर लुढक गयी। उन्होंने गड़वी फर्श़ पर छोड़ वहीं से दोनों हाथ जोड़कर प्रमाण किया-‘‘बड़ा राजी खुश हूँ मराज.....’’ एक टिकट चेकर किसी बेटिकट मुसाफिर को हँकाए लिए चला जा रहा था। मुसाफिर दबी जुबान से मिनन्तें कर रहा था। टिकट चेकर एक ही बात कहे जा रहा था, ‘‘कलानोर का वासी हूँ। बेटिकट मुसाफिर को तो सूँघ लेता हूँ।’’
अब प्लेटफार्म की भीड़ छँट गई थी और शोरगुल मद्धिम पड़ गया था। लगभग सभी मुसाफिर अपना-अपना सामान लेकर बाहर जा चुके थे। प्लेटफार्म उजड़-सा गया था। थोड़ी देर पहले जो गहमागहमी थी, अब नहीं थी। फ्रन्टियर मेल के खाली डिब्बों की अस्थायी सफाई हो रही थी। सफाई कर्मचारी पहले और दूसरे दर्जें के डिब्बों में सीटों की अस्थायी सफाई हो रही थी सफाई कर्मचारी पहले और दूसरे दर्जे के डिब्बों में सीटों की छानबीन कर रहे थे शायद कोई गिरी-पड़ी कीमती चीज उनके हाथ आ जाए और किस्मत जाग उठे। लेकिन इन डिब्बों में बुझे हुए सिगरटों, तुड़े-मुड़े कागजों और चबाई हुई हड्डियों के अलावा और कुछ नहीं था। प्लेटफार्म पर बड़े-बड़े ठेलों में वजनी पेटियाँ लादी जा रही थीं। खोमचे-वाले, चाय-वाले रवाना हो चुके थे। साथ-वाले प्लेटफार्म पर कुछ पारसी, मराठा और बम्बई के बाबू लोग छतरियाँ कन्धों पर लटकाए अन्धेरी, दादर और परेल जानेवाली लोकल ट्रेन का इन्तजार कर रहे थे।
 वह परदेसी लड़का अभी तक उसी जगह बैठा न जाने क्या सोच रहा था। उसे कुछ सर्दी महसूस होने लगी थी। उसने कोट के बटन बन्द कर लिये और सिकुड़कर इकट्ठा गठरी बन गया। लोहे की बड़ी-बड़ी ढलवाँ छतों पर अब बारिश की धीमी-धीमी गुनगुनाहट सुनाई देने लगी थी। वह पहली बार बम्बई आया था। अगर उसे मालूम होता कि बम्बई में बड़ी लम्बी झाँड़ियाँ लगती हैं, तो वह अपनी गर्म चादर जरूर साथ ले आता, लेकिन वह तो बम्बई की हर बात से अनजान था। वह तो घर से स्कूल पढ़ने आया था कि सीधा स्टेशन पर आ गया। बीच में कहीं थोड़ी देर के लिए रुका था और वहाँ निकलते ही फिर-से बरसात शुरू हो गयी थी।
बादलों की वजह से स्टेशन के अन्दर सुबह के वक्त ही शाम जैसा शमा बँध रहा था, इसलिए यहाँ-वहाँ तेज रोशनियों वाली बत्तियाँ जगमगा रही थीं। एकाएक लोहे की पेटी पर बैठे हुए लड़के को शदीद तनहाई का अहसास हुआ और इससे पहले कि वह रो पड़े अटैची उठाई और गेट की तरफ चल पड़ा। वैसे भी चौकीदार और पुलिस उसे संदिग्ध नजरों से घूर रहा था।

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