राजस्थान लोक संस्कृति और साहित्य - डी. आर. आहूजा Rajasthan Lok Sanskriti Aur Sahitya - Hindi book by - D. R. Aahuja
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राजस्थान लोक संस्कृति और साहित्य

डी. आर. आहूजा

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :163
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5756
आईएसबीएन :81-237-3883-8

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राजस्थान की एक सांस्कृतिक झाँकी...

Rajasthan lok sanskriti aur sahitya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भूमिका

वैभव, शूरवीरता, बालू, रेगिस्तान, खूबसूरत अरावली की श्रृंखला और तालाबों की भूमि है राजस्थान। ऊबड़-खाबड़ जमीन और कठिन जलवायु ने राजस्थान के लोगों को साहसी और मजबूत बना दिया है।
उनके साहस और कठोरता से निकली है राजस्थान की रंगीनी और अद्वितीय लोकगाथाएं। जिंदगी और रुमानियत के लिए प्यार, पूरे राजस्थान में देखा जा सकता है।

यह पुस्तक पहली बार सन् 1980 में प्रकाशित हुई। पाठकों द्वारा मिले प्रोस्ताहन ने मुझे बारह वर्ष बाद इसे संशोधित और परिवर्द्धित करने को प्रेरित किया है। पाठकों को राजस्थान की एक झांकी दिखाना मेरा उद्देश्य रहा है ताकि लोग हिन्दुस्तानियत की सोंधी गंध लिए अपने आप में अनूठे इस प्रदेश को स्वयं देखने के लिए आकर्षित हो सकें।
राजस्थान, जनजातियों से भरा प्रदेश है। चूंकि मरुभूमि के कारण एक स्थान पर लोगों का टिककर रहना संभव नहीं था। इस कारण लोगों में एक घुमंतू स्वभाव का जन्म हुआ और वह संस्कृति पनपी जिसमें देवी, देवताओं और स्थानीय देवों की बहुतायत थी। कुछ गीति-नृत्यों दोहों, कहावतों तथा लोककथाओं को इस पुस्तक में भी उद्धृत किया गया है।
राजस्थान की आबादी बढ़ रही है। कई स्थान भीड़-भाड़ से भरे हैं। लेकिन जहां प्रकृति की विकरालता कम नहीं हुई है वहां आबादी अब भी काफी कम है।

बहादुर राजपूतों की इस भूमि में शूरवीरता, आध्यात्मिकता समृद्ध लोकसंस्कृति और यहां तक कि अंधविश्वास भी, पूरी तरह घुलमिल गई है। इसके कुछ क्षेत्र तो अभी भी परिवर्तन से अछूते हैं और लोग पुराने युग में ही जी रहे हैं।
इस पुस्तक में मैंने राजस्थान के वैभव की केवल संक्षिप्त चर्चा की है, क्योंकि विस्तृत चर्चा के लिए स्थान उपलब्ध नहीं था।
मैं श्री राजेंद्रशंकर भट्ट, पूर्व निदेशक जन संपर्क विभाग के प्रति आभार व्यक्त करना चाहता हूं, जिन्होंने मुझे यह पुस्तक लिखने के लिए हमेशा प्रेरित किया। मैं श्री नंदकिशोर पारीक पूर्व सहनिदेशक जन संपर्क विभाग, का भी धन्यवाद ज्ञापन करना चाहता हूं, जिन्होंने इस किताब के लिए आवश्यक सामग्री जमा करने में मेरा लगातार सहयोग किया है। साथ ही मैं प्रख्यात लेखक श्री मनोहर प्रभाकर, पत्रकार श्री बी.सी. वर्मा और अन्य मित्रों के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूं जिन्होंने यह पुस्तक लिखने में मेरी मदद की है।

जनवरी, 1993

डी.आर. आहूजा



1
भौगोलिक क्षेत्र और जनजीवन



राजस्थान, अर्थात् राजपूतों का निवास-स्थान, भारतवर्ष का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है। क्षेत्रफल में यह ब्रिटेन से बड़ा है। टी.एच. हेंडले के अनुसार इसका आकार कुछ बेडौल किनारों वाले एक समचतुर्भुज-सा है। अरावली की पहाड़ियां इसे दो प्राकृतिक हिस्सों में बांटती हैं-उत्तर-पश्चिमी एवं दक्षिण पूर्वी। उत्तर-पश्चिमी भाग रेगिस्तानी एवं सूखा है, जबकि पूर्व और उत्तर पूर्व में हरियाणा और अरावली के आस-पास का इलाका कुछ अधिक उपजाऊ है। उत्तर-पश्चिमी भाग की तुलना में दक्षिण पूर्वी हिस्सा थोड़ा ऊंचा और अधिक उपजाऊ है। भौगोलिक विविधताओं से भरे इस क्षेत्र में विस्तृत पर्वत श्रृंखलाएं, जंगली क्षेत्र, बड़ी-बड़ी नदियां, उपजाऊ, पठारी जमीन और उत्कृष्ट उपजाऊ भूमि क्षेत्र पाए जाते हैं।

भूवैज्ञानिक, अरावली श्रृंखला को मोड़दार प्राचीनतम पहाड़ मानते हैं। इस श्रृंखला के कारण ही राज्य का 58 प्रतिशत हिस्सा बंजर एवं 36 प्रतिशत हिस्सा अर्द्धबंजर है।

मुंबई से राजस्थान आने वाले यात्रियों को आबू पहुंचते-पहुंचते गुजरात के हरे-भरे मैदानों एवं बाग-बगीचों की कमी स्पष्ट दिखाई देने लगती है। पहाड़ियों के पार दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान के बंजर पठारों के बीच जंगलों तेज ढलान, पर्वत श्रृंखला एवं छोटे-बड़े महल तथा किले मुकुटों की तरह लगते हैं। घाटियों के बीच के नखलिस्तानों की जमीनों के लिए गहरे कुएं और बांध जल के स्रोत हैं। भेड़-बकरियों की कतारें और ऊंटों का कारवां अपने बलिष्ठ और फक्कड़ मालिकों के साथ-साथ मस्ती में चल रहा होता है।

अपने सीधे तने सरों पर घड़े भरकर लाती, घाघरा पहने घूंघटों में छिपी शर्मीली महिलाएं किसी नृत्य-सा दृश्य उपस्थित करती हैं। उनके पीले, लाल, चटक नीले और गेरुए रंगों में रंगे रंगीले वस्त्र प्राकृतिक दृश्यों के फीकेपन को पूरा करते-से दिखते हैं।

जोधपुर की पृष्ठभूमि में खड़ी तीखी पहाड़ियां इन बंजर मैदानों में विलीन होती-सी दिखाई देती हैं जहां से नागोर का मध्ययुगीन किला एक स्तंभ-सा लगता है। इनसे आगे सुदूर उत्तर दिशा में चारों तरफ बालू ही बालू दिखाई देती है। धूप में चिलचिलाते और झंझावतों से भरे इस क्षेत्र में कहीं-कहीं पाई जाने वाली झाड़ियां, बबूल छोटे-मोटे पेड़, अपने जीवन रक्षा के लिए इक्के-दुक्के पाए जाने वाले कुओं पर ही आश्रित रहते हैं।

पश्चिमी राजस्थान बंजर में थार मरुस्थल का यही भाग जो विशाल भारतीय रेगिस्तान का एक हिस्सा है हजारों वर्षों से इंसानों से खाली रहा है। मार्च महीने के प्रारंभ से गर्म भट्ठी की तरह जलने लगने वाला यही प्रदेश महाभारत कामरु कंतर था-, मृत्यु-प्रदेश था !
दिल्ली से आने वाले यात्री के लिए राजस्थान का एकदम दूसरा चेहरा सामने आता है। राजधानी से निकलते ही अरावली की पहाड़ियां शुरू हो जाती हैं, जो अलवर पहुंचते-पहुंचते काफी सघन जाती हैं। पहाड़ियां हल्की धूसर पीली झाड़ियों से ढंकी रहती हैं। जो मानसून की पहली बारिश के साथ ही हरी-भरी हो जाती हैं। अलवर, भरतपुर और सवाई माधोपुर के जंगल बाघ, चीते, जंगली भालू, नील गाय और हिरण परिवार के अन्य भव्य और फुर्तीले जानवरों के निवास स्थल हैं।

यहां के सपाट और समतल मैदान उत्कृष्ट टोमट मिट्टी के हैं। राज्य के दक्षिणी भाग के कोटा बूंदी, चित्तौड़गढ़ और भीलवाड़ा जिलों में नदी के दोनों किनारों पर गेहूं, मक्का धान और गन्ने के खेत फैले हुए हैं। साथ-ही-साथ, घनी, आबादी वाले गांवों और शहरों के सभ्य और मस्तमौला लोग भी निवास करते हैं।
पश्चिमी राजस्थान के ठीक विपरीत पूर्वी राजस्थान में मरुभूमि जैसा कुछ भी नहीं है। राजस्थान के इस इलाके में अरावली की पहाडियों की 600 किलोमीटर लंबी दीवार है जिसका केंद्र अजमेर के पास है। राजस्थान का खूबसूरत शहर अजमेर उत्तरी भारत के मैदान इलाके के उच्चतम पठार पर अवस्थित है। माउंट आबू के पास स्थित अरावली श्रृंखला के सर्वोच्च स्थान गुरु शिखर को इस क्षेत्र की छत भी कह सकते हैं।


ऐतिहासिक पृष्ठभूमि


पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार राजस्थान का इतिहास पूर्व पाषाणकाल से प्रारंभ होता है। आज से करीब एक लाख वर्ष पहले मनुष्य मुख्यतः बनास नदी के किनारे या अरावली के उस पार की नदियों के किनारे निवास करता था। आदिम मनुष्य अपने पत्थर के औजारों की मदद से भोजन की तलाश में हमेशा एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते रहते थे, इन औजारों के कुछ नमूने बैराठ, रैध और भानगढ़ के आसपास पाए गए हैं।
अतिप्राचीनकाल में उत्तर-पश्चिमी राजस्थान वैसा बीहड़ मरुस्थल नहीं था जैसा वह आज है। इस क्षेत्र से होकर सरस्वती और दृशद्वती जैसी विशाल नदियां बहा करती थीं। इन नदी घाटियों में हड़प्पा, ‘ग्रे-वैयर’ और रंगमहल जैसी संस्कृतियां फली-फूलीं। यह वही ब्रह्मावर्त है जिसकी महती चर्चा मनु ने की है। यहां की गई खुदाइयों से खासकरकालीबंग के पास, पांच हजार साल पुरानी एक विकसित नगर सभ्यता का पता चला है। हड़प्पा, ‘ग्रे-वेयर’ और रंगमहल संस्कृतियां सैकडों किलोमीटर दक्षिण तक राजस्थान के एक बहुत बड़े इलाके में फैली हुई थीं।

इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि ईसा पूर्व चौथी सदी और उसके पहले यह क्षेत्र कई छोटे-छोटे गणराज्यों में बंटा हुआ था। इनमें से दो गणराज्य मालवा और सिवि इतने शक्तिशाली थे कि उन्होंने सिकंदर महान को पंजाब से सिंध की ओर लौटने के लिए बाध्य कर दिया था। उस समय उत्तरी बीकानेर पर एक गणराज्यीय योद्धा कबीले यौधेयत का अधिकार था। महाभारत में उल्लिखित मत्स्य पूर्वी राजस्थान और जयपुर के एक बड़े हिस्से पर शासन करते थे। जयपुर से 80 कि.मी. उत्तर में बैराठ, जो तब विराटनगर कहलाता था, उनकी राजधानी थी। इस क्षेत्र की प्राचीनता का पता अशोक के दो शिलालेखों और चौथी पांचवी सदी के बौद्ध मठ के भग्नावशेषों से भी चलता है।

भरतपुर धौलपुर और करौली उस समय सूरसेन जनपद के अंश थे जिसकी राजधानी मथुरा थी। भरतपुर के नोह नामक स्थान में अनेक उत्तर-मौर्यकालीन मूर्तियां और बर्तन खुदाई में मिले हैं। शिलालेखों से ज्ञात होता है कि कुषाणकाल तथा कुषाणोत्तर तृतीय सदी में उत्तरी एवं मध्यवर्ती राजस्थान काफी समृद्ध इलाका था। राजस्थान के प्राचीन गणराज्यों ने अपने को पुनर्स्थापित किया और वे मालवा गणराज्य के हिस्से बन गए। मालवा गणराज्य हूणों के आक्रमण के पहले काफी स्वायत्त् और समृद्ध था। अंततः छठी सदी में तोरामण के नेतृत्तव में हूणों ने इस क्षेत्र में काफी लूट-पाट मचाई और मालवा पर अधिकार जमा लिया। लेकिन फिर यशोधर्मन ने हूणों को परास्त कर दिया और दक्षिण पूर्वी राजस्थान में गुप्तवंशका प्रभाव फिर कायम हो गया। सातवीं सदी में पुराने गणराज्य धीरे-धीरे अपने को स्वतंत्र राज्यों के रूप में स्थापित करने लगे। इनमें से मौर्यों के समय में चित्तौड़ गुबिलाओं के द्वारा मेवाड़ और गुर्जरों के अधीन पश्चिमी राजस्थान का गुर्जरात्र प्रमुख राज्य थे।

लगातार होने वाले विदेशी आक्रमणों के कारण यहां एक मिली-जुली संस्कृति का विकास हो रहा था। रूढ़िवादी हिंदुओं की नजर में इस अपवित्रता को रोकने के लिए कुछ करने की आवश्यकता थी। सन् 647 में हर्ष की मृत्यु के बाद किसी मजबूत केंद्रीय शक्ति के अभाव में स्थानीय स्तर पर ही अनेक तरह की परिस्थितियों से निबटा जाता रहा। इन्हीं मजबूरियों के तहत पनपे नए स्थानीय नेतृत्व में जाति-व्यवस्था और भी कठोर हो गई।


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