लोगों की राय

पौराणिक >> श्री राम

श्री राम

गुरुदत्त

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :144
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5769
आईएसबीएन :00000

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

201 पाठक हैं

प्रस्तुत है गुरुदत्त का राम पर आधारित उपन्यास.....

Shriram

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

यह उपन्यास राम पर आधारित है। बिल्कुल नया है और अनूठा और लेखक हैं प्रसिद्ध कथाकार श्री गुरुदत्त।
रावण कौन था ? राक्षस कौन थे ? राम को उनका वध क्यों करना पड़ा ? क्या केवल इसलिये कि रावण ने सीता का अपहरण किया था ?
इस विषय पर एक अनुपम उपन्यास।

 

श्री राम
:1:

क्या राम ईश्वर का अवतार थे ?
क्या राम एक महापुरुष थे ?
हम कुछ भी मानें, इतना अवश्य है कि राम ने अपने जीवन में वह कार्य किया जो एक महान् आत्मा ही कर सकता है।
राम ने क्या किया ?
यह तो हम जानते हैं कि उन्होंने दुष्ट राक्षसों का वध किया। उन्होंने राक्षसों के राजा रावण का वध किया ?
क्या राक्षस दुष्ट थे ? क्या रावण इतना बुरा व्यक्ति था कि उसका वध करना पड़ा ?
रावण कौन था ? राक्षस कौन थे ?

कहते हैं कि लाखों वर्ष पूर्व पृथ्वी पर प्रलय आई थी और सम्पूर्ण पृथ्वी जल में डूब गई थी। सब कुछ नष्ट हो गया था। केवल कुछ भाग, जो बहुत ऊँचे थे, जल से बाहर थे और वहाँ कुछ लोग बच गये थे। इनमें देवलोक भी था। शायद यह वह क्षेत्र था जिसे आजकल तिब्बत कहते हैं।
देवलोक का राजा इन्द्र था। देवताओं का पितामह ब्रह्मा था। देवलोक में सुख था, शान्ति थी। लोग परिश्रम करते थे और उन्नति करते थे।

परन्तु सब लोग एक समान योग्य नहीं थे। कुछ ऐसे थे  जो कम योग्य थे तथा उनको उन्नति करने का अवसर नहीं मिलता था। इस कारण वे दुःखी हो गये। वे पितामह ब्रह्मा के पास गये और बोले, ‘‘भगवान्, हम क्या करें ? हमें उन्नति करने का अवसर नहीं मिलता।’’
ब्रह्मा ने देखा कि देवलोक की संख्या बढ़ गई है और सब लोगों के लिए यहाँ पर्याप्त काम नहीं है। उसने कहा, ‘‘दक्षिण में कुछ द्वीप जल से बाहर निकल आये हैं। तुम वहाँ जाओ। परिश्रम करो और सुख भोगो !’’
उन लोगों ने कहा, ‘‘ठीक है भगवान ! हम वहाँ जाएँगे। उन द्वीपों की रक्षा करेंगे।’’ उनका आशय था कि उन द्वीपों पर अधिकार कर, बाहरी आक्रमण से उनकी रक्षा करेंगे। अपनी भी रक्षा करेंगे।

ये लोग उन द्वीपों के रक्षक बने और इसी कारण उनका नाम रक्षस पड़ा। राक्षस कोई बुरा शब्द नहीं माना जाता था। न ही राक्षस का मतलब यह है कि उनके बड़े-बड़े दाँत थे और वे बड़े डरावने थे। बाद में जाकर, जब वे बुरे काम करने लगे, यहाँ तक कि मनुष्य का माँस खाने लगे, तब उनकी शक्लें बेडौल हो गईं और उनके दाँत आगे से बाहर निकलने लगे।
उन द्वीपों में रहते हुए उन्हें सहस्रों वर्ष व्यतीत हो गये।

इन राक्षसों का एक राजा-हुआ विद्युत्केश। उसकी रानी थी सालकटङ्क्टा। सालकटङ्क्टा भोग-विलास में लीन रहती थी तथा किसी की परवाह नहीं करती थी। जो भी उसके भोग-विलास में बाधा डालता था उसे मरवा डालती थी।
इसी कराण जब उसका एक लड़का हुआ, उसने उसे मरवाने का यत्न किया। बच्चे का पालन-पोषण उसे झंझट प्रतीत हुआ। उसने अपने सेवकों को उसे जंगल में छोड़ आने के लिए कहा।
सेवक उसे ले गये और मन्दराचल पर्वत के शिखर पर छोड़ आये। उनका आशय था कि यहाँ चील, कौंए आकर उसे खा जाएँगे। वे स्वयं उसकी हत्या करना नहीं चाहते थे।

परन्तु उसी समय कैलाश के राजा शंकर और पार्वती अपने विमान में बैठे हुए भ्रमण कर रहे थे। उन्होंने एक छोटे से बच्चे को जमीन पर पड़े रोते देखा तो विमान को नीचे भूमि पर ले आये। उस बालक को पार्वती ने उठा लिया। वे उसे अपने निवास-स्थान कैलाश पर्वत पर ले गये। पार्वती ने बालक का पालन-पोषण किया और जब वह बड़ा हुआ तो उसे यह बताकर कि तुम विद्युतकेश के पुत्र हो, उसे अपने पास से एक विमान दिया और वापस भेज दया। इस बालक का नाम उन्होंने सुकेश रखा था।

सुकेश बहुत बलशाली था। बुद्धिमान भी था परन्तु स्वयं को भगवान् शंकर का पालित होने के कारण तथा अपने पास विमान रखने के कारण उसमें अभिमान आ गया।
सुकेश के तीन पुत्र उत्पन्न हुए—माल्यवान, माली और सुमाली। तीनों बड़े बलवान् थे। उन्होंने घोर तपस्या की और शस्त्रों का अभ्यास किया। इस प्रकार वे स्वयं को अतिश्रेष्ठ व्यक्ति मानने लगे। उनमें अहंकार आ गया।

अब उन्होंने दूसरे लोगों को तंग करना आरम्भ कर दिया। अपने देश से बाहर निकल दूसरे देशों पर आक्रमण करना आरम्भ कर दिया। एक समय आया कि देवता, दानव, दैत्य, गन्धर्व इत्यादि सब की सब जातियाँ इन तीन भाइयों के अत्याचार से त्राहि-त्राहि कर उठीं। कोई उनकी रक्षा नहीं कर सका। वास्तव में सब जानते थे कि इनके पिता सुकेश शंकर के प्रिय हैं और यदि उन्होंने इन भाइयों से युद्ध किया तो शंकर उनके विरुद्ध हो जाएँगे।
सब लोग मिल कर विचार करने लगे कि क्या करें। यह निश्चय किया कि शंकर के पास चला जाये और उनसे कहा जाये कि सुकेश को सन्मार्ग दिखायें।

सब लोग शंकर के पास गये, परन्तु शंकर ने कहा, ‘सुकेश पार्वती का प्रिय है, मैं उसे कुछ नहीं कह सकता।’’
सब लोग पार्वती के पास पहुँचे, परन्तु पार्वती को जब पता चला कि लोग सुकेश के विरुद्ध शिकायत लेकर आये हैं तो उन्होंने उनसे मिलने से ही इन्कार कर दिया।
सब लोग परेशान हो उठे। वे पुनः शंकर के पास पहुँचे और बोले, ‘‘भगवन्, पार्वतीजी तो हमसे मिलती ही नहीं। अब आप ही बताइये हम क्या करेंगें।’’
सब लोग विष्णु के पास पहुँचे। विष्णु देवलोक के राजा इन्द्र का छोटा भाई था और बहुत बलवान था। उसके पास कई दिव्यास्त्र थे। इनमें सुदर्शन चक्र भी था। सुदर्शन चक्र जिस पर छोड़ जाता था उसको मारकर स्वयं ही चलाने वाले के पास लौट आता था।

जब दुःखी लोगों ने अपनी कथा सुनाई तो विष्णु बोले, ‘‘शंकर ठीक कहते हैं कि वह तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकते। पार्वती जी सुकेश को बहुत प्यार करती हैं और सुकेश के पुत्रों को भी प्यार करती हैं। मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा।’’
इस प्रकार विष्णु ने राक्षसों पर आक्रमण की घोषणा कर दी।
जब राक्षसों ने विष्णु की घोषणा सुनी तो वे हँस पड़े। वे जानते थे कि जब तक माल्यवान और सुमाली उनके साथ हैं कोई उनको हरा नहीं सकता। उन्होंने विष्णु के आक्रमण की प्रतीक्षा नहीं की। वे स्वयं विष्णुलोक पर आक्रमण करने चल पड़े। विष्णु भी अपने दिव्यास्त्र ले राक्षसों से लड़ने निकल आये।
राक्षस संख्या में बहुत अधिक थे, परन्तु जब विष्णु ने दिव्यास्त्र चलाने शुरू किये तो गाजर-मूली की तरह राक्षसों के शरीर कटने लगे। उनकी इतनी अधिक हत्या हुई कि पर्वत के समान ऊँचे-ऊँचे उनके शवों के ढेर-के-ढेर लग गये। राक्षस घबराकर दक्षिण की ओर भाग खड़े हुए और अपनी लंका नगरी में घुस गये।
विष्णु ने यहीं पर बस नहीं किया। वह जानता था कि जब तक राक्षस लंका में रहेंगे, वे बाहर पुनः निकल लोगों को तंग करेंगे। यह उनका स्वभाव बन चुका था कि भले लोगों को मारकर उनका माँस खाएँ। इस कारण उसने लंकापुरी पर आक्रमण कर दिया।

लंकापुरी अजय मानी जाती थी। इस कारण राक्षस समझते थे कि यहाँ वे विष्णु को परास्त कर सकेंगे। परंतु यहाँ विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र निकाल लिया। माली इस युद्ध में मारा गया। उसे मरा देख सभी बचे-खुचे राक्षस लंकापुरी छोड़कर पाताल लोक को भाग गये। इस प्रकार लंका जन-शून्य हो गई।
लंका जब खाली हुई तो इन्द्र ने महर्षि पुलस्त्य के पौत्र वैश्रवण को दक्षिण का लोकपाल नियुक्त कर दिया। महर्षि पुलस्त्य अति ओजमय तथा अत्यन्त ज्ञानवान थे। उनका पुत्र विश्रवा और पौत्र वैश्रवण भी अति बलवान, तेजोमय तथा ज्ञानवान थे। वैश्रवण बाद में कुबेर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

 

: 2 :

 

 

पाताल देश जंगल-ही-जंगल था। वहाँ पशु-पक्षी भी बहुत कम थे। वनस्पतियाँ सर्वथा नवीन प्रकार की थी। राक्षस नहीं जानते थे कि क्या खाया जाये और क्या न खाया जाये ?
माल्यवान, सुमाली और माली तीनों भाइयों में से सुमाली ही जीवित बचा था। उसका परिवार भी सुदर्शन-चक्र की अग्नि में भस्म हो गया था। कुछ राक्षस अपनी पत्नियों को बचाकर ले जा सकते थे। सुमाली ने अपने लिये कुटिया बनाई और एक कन्या से विवाह कर नये परिवार की सृष्टि आरम्भ कर दी। कालान्तर में उसके एक लड़की हुई।
सुमाली अपने पिता का विमान बचाकर ला सका था। इस विमान में बैठकर वह इस नये देश का सर्वक्षण कर अपने सजातियों को बसाने में सफल हुआ था। उसने यह पता कर लिया था कि कहाँ-कहाँ फलों वाले वृक्ष हैं, कहाँ भूमि कृषि योग्य है और कहाँ पीने योग्य जल मिल सकता है।

प्रथम पृष्ठ

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book