स्वेतांबरा - नरेन्द्र राजगुरु Swetambara - Hindi book by - Narendra Rajguru
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उपन्यास >> स्वेतांबरा

स्वेतांबरा

नरेन्द्र राजगुरु

प्रकाशक : हिन्दी बुक सेन्टर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :196
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5777
आईएसबीएन :81-85244-65-0

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देवदासी प्रथा पर एक सटीक निशाने के लिए लिखा गया उपन्यास

Svetambara

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

आप ही से : अपनी बात

स्वेतांबरा लिखने की प्रेरणा ने मुझे दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर कर दिया। लेखक के रूप में नहीं बल्कि एक आम आदमी बनकर मैंने पूरे महाराष्ट्र व गुजरात की अच्छी व टूटी-सड़कें नापीं। इन्हीं स्थानों से मुझे लिखने को बहुत कुछ मिला। सत्यता से परे हटकर मैंने कल्पनाओं का सहारा भी लिया और मेरी लेखिनी को संबल भी मिले। उसके लिए मैं कीचड़ में लिपटे बच्चों और फटे व गन्दे कपड़ों में लिपटीं युवा व वृद्ध भिखारिनों से भी मिला। एक नामी शहर की वृद्ध भिखारिन ने तो मुझे यहाँ तक कह दिया कि आप मुझ पर भी एक कहानी लिखो। मैंने उसके जीवन की बातें सुनीं और मन में उतार लीं। स्वेता की तलाश में मैंने गणिकाओं के दरवाजे भी खटखटाये। वहाँ लिखने लायक तो मुझे कुछ नहीं मिला, लेकिन उनके हालातों पर दो आँसू जरूर बहाने को मिला। उनके दु:खों का अम्बार इतना बड़ा है कि वह कागज़ के पन्नों पर उतारना कठिन है। शासकों से भी मिला, तो शासन चलाने वालों से मिला। कुछ ने तो सहानुभीति दिखाई तो दो-चार लोगों ने मुझ पर फब्तियाँ भी कसीं। वह सब मैंने सहन किया।

पैसा न होने की वजह से बिना टिकट यात्रा भी करनी पड़ी, ऐसा सभी बाधाओं को पार कर लिया और सभी कष्टों को सहन करते हुए आगे बढ़ता गया। बिहार में वैशाली, उत्तर प्रदेश में लखनऊ, बनारस और दिल्ली से राजस्थान भी गया। उन्हीं जगहों पर मुझे स्वेतांबरा के टेढ़े-मेढ़े कदमों के पदचाप मिले। उन्हें मैंने आत्मीयता से संजोया और कलमबद्ध किया। स्वेतांबरा में मैंने उन्हीं मैले कदमों को स्थान दिया है। मेरी लेखिनी के सिलसिलों को कुछ साथियों ने अपने कथानक से भटकने की संज्ञा भी दी, लेकिन मैंने अपने उद्देश्य को डिगने नहीं दिया....और लिखता ही गया। स्वेतांबरा की दुविधाओं के साथ देवदासी प्रथा पर मैंने सटीक निशाना साधा। देवदासी प्रथा की रोक पर मेरे चरित्रों ने अपना सब कुछ होम दिया। अब आगे क्या करना है, यह तो समाज व शासन का दायित्व है। आर्थिक परिस्थितियों के कारण कुछ समय के लिए मुझे अपनी कथा को रोक देना पड़ा। एक अनजानी देवदासी को उसकी भनक क्यों और कैसे लगी यह तो मैं नहीं जानता। लेकिन मद्रास व दिल्ली से उसके बराबर फोन आते रहे और वही मेरी नयी प्रेरणा बनी, मेरे कथानक को आगे खिसकाने के लिए। वर्ष भर के अथक प्रयासों और अपनी देह के हुए टुकड़ों-टुकड़ों को जोड़कर ही इसे आज पूरी कर आपके सामने रखने की हिम्मत जुटा पाया हूँ।

वर्ष भर के अन्तराल में पूरे कथानक पर कुछ रुकावटें आईं, उनका असर कहानी पर अवश्य ही पड़ा है। इस कथा के कुछ अंश खंडित भी हुए हों, तो उन सब का जिम्मेदार मैं नहीं मेरी परिस्थितियाँ ही हैं। परिस्थितियों का कायल मैं अपने पाठकों से क्षमाप्रार्थी हूँ। मैंने अपने पात्रों और स्थानों का चयन सोच-समझ कर नहीं किया। जहाँ गया मैं वहीं का हो गया और उसी आधार पर पात्रों के नामों का उल्लेख किया गया है। मेरे स्थानों व पात्रों के चयन में किसी के प्रति द्वेष व अहितकर विचार नहीं थे। मैंने शुद्ध विचारधारा का सहारा लिया है। किसी वर्ग विशेष, व्यक्ति विशेष की विचारधारा का न तो सहारा लिया है और न उन्हें कुंठित ही किया है। एक आत्मसम्मान की बात तो यह है कि कथानक मैंने अपनी आत्मा के सुख के लिए नहीं लिखा या अपनी लेखिनी को जीवित रखने के लिए नहीं लिखा है। मेरे लेखक मन की यही भाषा है और मेरी लेखिनी के बदले भावों को वह लिपिबद्ध करती हुई किसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु आम-समाज के कीचड़ से सने रास्तों से धीरे-धीरे आगे ही चलती गई। मैं नहीं जानता कि मैंने क्या लिखा है और आप किस परिवेश में पढ़ेंगे, यह आपका अपना फैसला है।

मैं नहीं जानता कि मेरी अब तक प्रकाशित पुस्तकों के कितने पाठक हैं, पर मेरे प्रकाशक के द्वारा या सीधे आए पत्रों से यही जान पाया हूँ कि मेरे पाठक मुझसे मिलना चाहते हैं क्यों यह मैं नहीं जानता। लेकिन उनके पत्रों से एक बात स्पष्ट है कि मेरे पाठक मेरी कहानियों के पात्रों को आत्मसात् करना चाहते हैं और करते भी हैं। मेरे पात्रों से तो मैं नहीं मिल सकता, लेकिन अवसर मिला तो कभी-न-कभी मेरी मुलाकात आप से तो हो जायेगी।
पाठकों से मेरी अपील है कि आज आप स्वेतांबरा को पढ़ें और इस संदर्भ में आपकी जानकारी में आई कुछ अनकही कहानियाँ मुझ तक भेजें, तो मैं भी उनका स्वागत करूंगा। धन्यवाद

नरेन्द्र राजगुरु

पुनश्च:


मैं, मेरे प्रकाशक श्री अनिल वर्मा, निदेशक हिन्दी बुक सेन्टर, दिल्ली, का तहे दिल से आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने अपनी व्यस्तता को किनारे करते हुए मेरी नवीन पुस्तकों को अपने प्रकाशन में समुचित स्थान देकर मेरा लेखक बनने में सहयोग दिया।
मैं, अपने लेखन कार्य में टंकण सुविधा प्रदान करने हेतु हिन्दुस्तान कम्प्यूटर्स, अजमेर के श्री हरीश सोनी की भी प्रशंसा करता हूँ जिनके अथक प्रयास से अपनी टंकण कला में मेरे व प्रकाशक के काम को काफी संबल दिया, वरना मेरी हस्तलिखित इस लंबी कहानी को आप तक लाने में उसकी समयावधि और लम्बी हो जाती है।
मैं अपनी पत्नी श्रीमती प्रतिभा राजगुरु का भी आभारी हूँ, जिनके मार्गदर्शन और सहयोग से इतनी पुस्तकें लिख पाया।

स्वेतांबरा


कोल्हार के पास शामली गाँव के विठोबा मंदिर के लाल पत्थरों से सजे आंगन में यही करीब दस-बारह कन्याएं स्वेत-धवल वस्त्रों में लिपटी बालिकाओं का खेल फुगड़ी खेल रही थीं। धवल परकर और स्वेत चोली पहने ये कन्याएं विठोबा के सामने इस प्रकार अठखेलियां कर रहीं थीं, मानों वे अपने स्वामी और आराध्य को मानने हेतु अपने कच्चे अंग-प्रत्यंगों का प्रलोभल देकर उन्हें खुश करने की कोशिश कर रही हों। लाल-पत्थरों के फर्श पर खेलती उन कन्याओं के झुंड को देख स्वयं ब्रह्मा जी भी इस भ्रम में रह गये कि उनके सामने मंदिर प्रांगण में स्वयं विठोबा अपनी गोपियों के साथ रास रचा रहे हैं या कोई और। उधर मंदिर के मुख्य द्वार पर रखी संगमरमर की चौकी पर बैठा बुआ शास्त्री पुजारी रमाकांत, उन कन्याओं को देखकर एकाएक चिंता में डूब गया कि इस वर्ष तो उनकी यह फसल कच्ची है, कोई खरीददार सेठ-साहूकार तो आएगा ही नहीं, अतः मंदिर पर बढ़ते खर्च पर पाबंदी लगा दी जाय, वरना वर्ष पूरा होते ही मंदिर को धन-धान्य का खजाना रीता हो जाएगा और तब इन स्वेत हसीनाओं का पोषण कैसे होगा।

प्रांगण में खेलती अलमस्त कन्याओं का विवाह तो विठोबा से हो गया था और अब तो ये कन्याएं भगवान पर चढ़े प्रसाद मात्र ही हैं, जिनका प्रयोग पुजारी के हाथों कोई भी कर सकता है। सेठ-साहूकार कितना चढ़ावा विठोबा के मंदिर हेतु लाते हैं, यह सब उस पर निर्भर करता है कि इस वर्ष कौन-सा प्रसाद भोगने योग्य हो गया है और उसको भोगने वाला कितना बड़ा साहूकार है, यही तथ्य सर्वोपरि है। एकाएक पुजारी रमाकांत के मन को एक अनोखा झटका-सा लगा, जब सामने ही उन्होंने मंदिर में ऐसी सैकड़ों कन्याएं आईं, भगवान विठोबा को अर्पित हुई और उन्हीं के साथ इनको चार फेरों के साथ बांध दिया गया। इसके बाद तो ये कन्याएं राधा बनने की आशा में देवदासियां बन गईं। भला दासियों की अपनी क्या बिसात, उनका अपना क्या ? वे तो अब एक प्रसाद बनकर, मंदिर में आने वाले सेठ-साहूकार, भक्तों की भोग्या बनकर अपने जीवन की मानसिक जीवन की टूटी डोर को जोड़ने का असफल प्रयास करती हुई बस अपनी अभिशप्त नारी जीवन को घसीट रही हैं। कभी-कभी उन कन्याओं का मन विद्रोह कर बैठतै हैं-‘‘भला यह प्रथा किसने बनाई, क्यों उन कन्याओं के माँ-बापों को अपने कोमल फूलों को मंदिर के प्रांगण में रौंदने के लिए मजबूर कर दिया। ऐसा क्यों और कब हुआ तथा इस प्रथा का कोई अंत है या नहीं। क्या किसी देवदासी ने इस प्रथा का विरोध नहीं किया और अगर किसी ने ऐसा किया भी था तो उसका हश्र क्या हुआ होगा।’’

पास बैठे रमाकांत पंडित के बेटे की बहू शामली तो दसवीं कक्षा पास कर शशिकांत से ब्याह दी गई, लेकिन उसके मन के प्रश्नों का बवाल खड़ा हुआ और उसने अपने बाबा से पूछ ही लिया-‘‘बाबा, यह देवदासी कौन होती है, इस प्रथा का चलन कैसे हुआ और यह पाप कब से चलता आया है। है कोई इसका ओर-छोर।’’ पंडित रमाकांत के पास इतने निडर सवालों का जवाब नहीं था फिर भी, जो कुछ वह जानता था, या उसने बाबा से जाना, वह सब उसने अपनी बहू की जिज्ञासा को शांत करने हेतु कहना आरंभ कर दिया-‘‘बहूरानी, यह देवदासी क्रम तो करीब दो या तीन शताब्दियों से चलता आया है। यह किसी एक परिवार की कथा नहीं है, लाखों संतप्त परिवार के लोग अपने और लोगों को किसी अनहोने पाप से बचाने हेतु अपनी कोख में जन्मी एक कन्या को विठोबा में ब्याहनें का ढोंग रचाया करते हैं।

यह कारस्तानी किसी मनचले सेठ-साहूकार या मंदिर पुजारी के दिग्भ्रांत मन की उपज हो सकती है। और जब से देवदासी बनाने की उपज को आम लोगों ने धर्म का रूप दिया, तब से आज तक यहाँ कितनी ही देवदासियाँ बनी, कितनी ही मर-खप गईं और जिस किसी ने विद्रोह किया वह किसी चकले में जा बैठी।’’ वही दासी आज किसी चकले की ठकुराइन है और उसके पास ऐसी कितनी ही कन्याएँ आईं और रम गईं उस पेशे में। हाँ, कितनी ही सरकारें आईं और इस कुप्रथा पर पाबंदी लगाने का प्रयास भी किया गया तो वहाँ लोगों का मानना है कि वह सरकार विठोबा की कृपा से विफल हो गई। किसी राजा ने धर्मभीरु लोगों की भावनाओं पर रोक नहीं लगाई। वे रोक लगाते भी कैसे। किसी एक-आध देवदासी पर उनकी भी नजर इनायत हो जाया करती थी। तो बेटी, इस प्रथा के बारे में जितना जान पाया हूँ वह तुम्हें बता दिया और आगे तुम खुद ढूँढ लो।’’

बाबा द्वारा दिये गये विवेचन से शशिकांत की बहू को तसल्ली नहीं हुई और उसका विद्रोही मन कोई और जानकारी टटोलने में लग गया।



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