सफलता चूमेगी कदम आपके बच्चों के भी - सुदर्शन भाटिया Saphalta Chumegi Kadam Aapke Bachchon Ke Bhi - Hindi book by - Sudarshan Bhatia
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सफलता चूमेगी कदम आपके बच्चों के भी

सुदर्शन भाटिया

प्रकाशक : शाश्वत प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :184
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5802
आईएसबीएन :81-86509-20-8

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समाज और राष्ट्र के लिए...

Saphalta Choomegi Kadam Bachchon Ke Bhi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हर माता-पिता की यह इच्छा रहती है कि उनके बच्चे योग्य बनें, पढ़ाई में अच्छे हों, किसी अच्छी लाइन में जाएँ। वे ऊँची शिक्षा पाकर ठीक-से स्थापित हों। उनका आचार-विचार तथा आचरण अच्छा हो। लोग उनकी सराहना करें। कोई उनको बुरा न कहे। वे समाज तथा राष्ट्र के लिए उपयोगी हों और साथ ही अपने परिवार के प्रति दायित्वों को भली प्रकार समझें तथा उनका सही निर्वाह करें...आदि। कोई माता-पिता यह नहीं चाहता कि उनके बच्चे नालायक हों; पढ़ाई में पिछड़े रहें; स्कूल से भागे रहें और बुरे मित्रों या बुरी संगत में रहकर बुरी आदतें सीखें। उनकी बातचीत अशोभनीय हो। वे गाली-गलौट तथा अभद्र आचरण सीखें। माता-पिता, गुरु व बड़ों का सम्मान न करें। जब तब माँ-बाप को आँखे दिखाएँ। चोरी झूठ, मारपीट का सहारा लें। घर से पलायन कर किसी असामाजिक तत्व के करीब जाएँ। हर वह काम भी करें जो आतंकी लोग करते हैं। अच्छे नागरिक न बनें। उनका नाम नगर के पुलिस थाने में बदमाशों में गिना जाए। उनपर भान्ति-भान्ति के आरोप हों। वे अपने ग़लत कारनामों के कारण छिपते फिरें, अपने कर्तव्यों से विमुख रहें....आदि।

श्री सुदर्शन भाटिया की यह पुस्तक व्यावहारिक दिशा में एक अच्छा प्रयास है। माता-पिता अपने बच्चों को जैसा बनाना चाहते हैं, इस पुस्तक में उसे ही भली प्रकार दिया गया है। माता-पिता अपने बच्चों को जिस ओर से हटाना चाहते हैं, वह सब भी इस किताब से संभव है। अब तक ऐसा एक सौ से अधिक पुस्तकें लिख चुके श्री भाटिया का यह अनूठा प्रयास सराहनीय है। माता-पिता जिव समस्याओं से वंचित रहा करते हैं, उन सबका समाधान बहुत ही सरल तथा व्यावहारिक तरीके से देकर लेखक ने जैसे एक पुनीत कार्य कर दिखाया है। यदि यह कहा जाए कि ‘बिहेयवियर साईंस’ पर यह एक बहुत बढ़िया पुस्तक बन पढ़ी है तो गलत नहीं होगा। जिस परिवार में यह पुस्तक रहेगी, वह परिवार ‘एक सुखी तथा सन्तुष्ट परिवार’ बनकर अपने पारिवारिक तथा सामाजिक कर्तव्यों का ठीक-से निर्वाह कर सकेगा और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को भी ठीक प्रकार से निभा सकेगा।
मेरी शुभकामनाएँ।

पूर्व प्रिंसिपल एवं शिक्षाविद्
शिक्षा विभाग, हिमाचल प्रदेश।

गिरधारी लाल बतरा



* आप बड़े हैं, अपने कर्त्तव्यों से विमुख न हों
इस आयु में बड़े हैं। आप माता-पिता हैं या भाई अथवा बहन, आप अपने से छोटे के प्रति अपने कर्त्तव्य को ठीक प्रकार से निभाएँ। यदि आप अपने तथा अपने बच्चों के प्रति सचेत रहें तो कोई वजह नहीं, आपके नन्हें-मुन्ने अच्छी प्रकार संस्कारित न हो सकें। वे अपने लिए तरक्की का रास्ता ना पा सकें। वे जीवन में ठीक प्रकार से स्थापित न हो सकें। वे अवश्य सफल होंगे और अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे। आपका दिशा-निर्देश और मार्ग-दर्शन उन्हें मिलता रहे तो असफलता उनके करीब भी नहीं फटक पाएगी। वे अच्छे बच्चे, अच्छे युवा बनकर समाज के लिए भी कुछ अच्छा ही कर सकेंगे, इस बात का हम आपको विश्वास दिलाते हैं। आपका आशीर्वाद होगा तो वे अपने लक्ष्य को अवश्य पा लेंगे। यहाँ कुछ बाते की जा रही हैं, जिन्हें आप ‘टिप्स’ भी कह सकते हैं। इन्हें याद रखने, जीवन में धारण करने, इनके अनुसार चलने से आप बच्चों के जीवन को अत्युत्तम बना सकते हैं, यह निश्चित मानें। यहीं हर माता-पिता की आकांक्षा होती है।


* हम आर्थिक रूप से कमज़ोर हो या मज़बूत....समाज में हमारा रुतबा ऊँचा है या सामान्य....इन बातों को एक किनारे रखकर अपनी अन्तरात्मा की आवाज़ को अवश्य सुना करें। कुछ भी करने से पहले आपको अन्दर से जो पहली आवाज़ आएगी, वह ठीक ही होगी, बाद के विचार तो लोभ, लालच या इच्छा पूर्ति की दिशा में मलिन भी हो सकते हैं, मगर अन्तरात्मा की पहली आवाज़ को ठीक-से सुनें तथा उसी के अनुसार चलें। आपसे परिवार को, आपके बच्चों को आप पर गर्व होगा। वे भी आपकी कार्य-शैली को आदर्श मानकर उसी पर चलेंगे।

* यदि आप सुखद और शान्त जीवन जीकर अपने बच्चों के लिए सीधी राह
ढूँढ़ने के इच्छुक बने रहते हैं तो कोई वजह नहीं कि आपको आशातीत सफलता न मिले। हाँ, इसके लिए जरूरी है कि आप अपनी जीवन-पद्धति को, विचारों को उत्तम बनाकर रखें। इसके लिए भी सहजता, सरलता, सादगी को भी न छोड़ें। अधिक ऊँची उड़ान भरना, ऊँची हाँकना, हाई-फ़ाई बनकर अपने को किसी से कम न समझना आपके रास्ते को कठिन कर देंगे। समस्याएँ पैदा होती रहेगी। आशा बनाए रखें। निराशा को पास न आने दें। परेशानियाँ आएगी ही नहीं। जब आपकी जीवन-शैली सादा एवं पवित्र होगी तो आपके बच्चे भी सुख का आनन्द ले सकेंगे।

* आपकी कथनी तथा करनी में अन्तर नहीं होना चाहिए। जब आप बच्चों को सच बोलने की शिक्षा दे रहे हैं, तो पहले आपको झूठ से किनारा कर अपनाना होगा। आप चाहते है कि आपके बच्चे क्रोधित न हुआ करें, तब तो आपको स्वयं शान्त रहने का अच्छा अभ्यास कर लेना चाहिए। यदि आप चाहते हैं कि आपके बच्चे प्रात: जल्दी उठें, देर तक न सोया करें तो आप स्वयं भी जल्दी ही, बच्चों के पहले, उठने की कोशिश करे। ऐसे में आपके कहे का बच्चों पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा तथा वे जीवन को आपकी तरह ढालने में सफल हो सकेंगे।

* यदि आपका बच्चा बड़ी सफलता, बड़ी उपलब्धि पाने का इच्छुक है तो उसे समझाएँ, ‘‘पहले छोटी-छोटी उपलब्धियों को हासिल करते रहो। अवसर आने पर बड़ी सफलता भी मिल जाएगी।’’ कहीं ऐसा न हो कि बड़ी सफलता को छोटा मानकर ध्यान न दें। छोटी प्राप्तियों की खुशी भी मनानी चाहिए, जिसमें बड़े सदस्य जरूर भाग लें। उस समय बच्चों को उत्साहित करें। पुरस्कार दें। शाबासी दें। इससे उसे कुछ और, कुछ अच्छा, कुछ बड़ा करने की चाह होगी।

* यदि जीवन में कुछ अभाव हैं, तो रोएँ मत, परेशान न हों। थोड़े में निर्वाह कर लें। जो नहीं है, उनकी चिन्ता करते हुए दु:खी न हों। हर अँधेरी रात के बाद प्रकाशमान दिन होता है। उसी की प्रतीक्षा करें। समय लगता है तो लगने दें, अधीर न हों। जब आपके अच्छे दिन आ जाएँगे तो सब-कुछ ठीक हो जाएगा। इससे आपके बच्चे भी प्रसन्नता का अनुभव करेंगे। घर में खुशहाली आ जाएगी।

* बच्चा पढ़ता है तो उसे ध्यान लगाकर पढ़ने की सलाह दें। वह मन लगाकर पढ़े। जो नहीं आता उसे सीखे। भविष्य में क्या होगा या परिणाम कैसा आएगा, इसकी वह चिन्ता न करे। आप भी बिना मतलब उसपर दबाव न डालें। कहीं ऐसा न हो कि वह अत्यधिक दबाव और फिर परिणाम के भय से घबराकर जितना पाना है, उतना भी न पा सके। आपकी अपनी सोच अच्छी हो, सकारात्मक हो। बच्चा भी ऐसा ही सोचने लगा। उसे लक्ष्य की प्राप्ति हो सकना सम्भव हो जाएगा।

* यदि आपके हाथ में कोई काम है, जिसे आज निपटाया जा सकता है तो इसे आप ही कर डालें। आज का काम आज करने की एक बहुत-बड़ी खूबी होती है। इस खूबी को बनाए रखें। जब आप नियमित और अनुशासित होंगे तो आपके बच्चे भी उन्हीं पदचिह्नों पर चलेंगे और आपका अनुसरण कर सुखी होंगे।

* आप घर पर अकेले हैं या परिवार है। कोई मित्र अथवा संबंधी मिलने आया तो उससे अच्छी-अच्छी बातें करें। व्यर्थ के विषय चुनकर उनपर बहस न करें। अपनी शक्तियों को सँभालकर रखें, यों ही बेकार न जाने दें। जिस चर्चा का कोई लाभ नहीं, उसे करना ही क्यों ? ऐसा वातावरण बनाएँ कि बच्चा भी इसकी उपयोगिता का लाभ उठा सके।

* बच्चों में यदि कोई विशेष गुण है, खूबी है, हुनर है तो उसे हतोत्साहित न करें। उसे इस गुण को निखारने का मौका दें। यादि उसे किसी प्रशिक्षण की जरूरत है तो उसे इसके लिए दिलाने का काम करें। उसकी प्रतिभा में और अधिक निखार आ सके, इसका प्रबन्धन करें।

* मान लिया आपका बेटा, किसी भी कारण से, निराश चल रहा है या उसकी सोच ही नकारात्मक है। उसे समझाएँ इस स्थिति में उबारें। उसे प्रोत्साहित करें। उसे कुण्ठा से बचाए। देखते-ही-देखते वह भी एक सफल व्यक्ति बन जाएगा और दूसरों को अपने अनुभव बताकर, उसे भी आशावादी बना देगा।

* थोड़ी कठोरता की जाए तो ठीक, यदि आप बच्चे की हर समय प्रताड़ना करने लगें, उसे मारने-पीटने तथा अन्य दण्ड देने लगें तो बच्चा सुधरेगा नहीं। वह पहले से भी अधिक बिगड़ सकता है। वह अपने आपको अपमानित पाकर कोई भी कदम उठा सकता है। वह अवज्ञाकारी बन सकता है। आतंकी गति-विधियों से भी जुड़ सकता है। ऐसे बच्चों को अच्छा बना पाना बहुत ही कठिन हो जाएगा। अत: अधिक प्रताड़ना करने की आदत बदलें।

* यदि बच्चे में कोई ग़लत आदत आ जाए और आपको भी इसका पता चल जाए तो उसे पास बैठाकर समझाएँ। उसे अधिक बिगड़ने का अवसर न दें। आप कर्कश आवाज़ में बात न करें। स्वयं सहनशील, धीर और गंभीर बनकर उसे सही रास्ते पर चलने, बुराई से दूर रहने का उपदेश दें। आपकों इस प्रकार शान्त पाकर उसे स्वयं शर्म आने लगेगी तथा वह बुरी और ग़लत आदत को त्याग देगा।

* यदि आप अपनी सूझ-बूझ से बिगड़ चुके या बिगड़ रहे बच्चों को सीधी राह पर लाने में सफल हो जाते हैं तो ऐसा बच्चा प्रलोभन मिलने पर दोबारा बुरी राह पर नहीं चलेगा।

* यदि आपमें प्रतिशोध की भावना है तो इसे त्याग दें। यह मन को अशान्त कर तनाव देनेवाली बात है जो तनाव को बढ़ाती जाएगी। ऐसी भावना सफलता में बाधा पैदा करती है, अनिष्ट ही देती है। इसके बदले लेने की बजाय क्षमा कर देने या उसका ध्यान ही न करने में भलाई है। इस तरह स्वयं भी अच्छे बनें और बच्चों को भी अच्छा बनाएँ।

* जब-तब अपने बच्चों की तुलना दूसरे लड़कों से न किया करें। हर एक बच्चे की योग्यता का स्तर अपना-अपना होता है। किसी में कोई गुण हो सकता है तो किसी में कोई और। यदि एक बच्चे में काफी गुण हों तथा दूसरे में भी कोई भी न हों तो भी उसे प्रताड़ित या अपमानित कर, उसे ढीठ, जिद्दी, आतंकी न बनाएँ, बल्कि उसमें जो भी छोटी-बड़ी खूबी हो, उसी को विकसित करने का अवसर दें।

* अपने व्यवहार से बच्चे को तनावग्रस्त न करें। निश्चित जाने कि इस प्रकार से बच्चा सुधरेगा तो नहीं, बल्कि और अधिक बिगड़कर आपके लिए मुसीबत पैदा कर देगा। उसके विद्रोही तेवर आपके मन की शान्ति भी हरने लगेंगे। अत: सोचकर, सँभलकर, प्यार और दुलार से उसमें आशा की किरण जगाएँ। उसे अपने करीब लाएँ, अपना बनाएँ। बच्चों की नब्ज़ देखकर ही व्यवहार करना, उसे सुधारने के लिए एकमात्र रास्ता है।



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