हास परिहास - अरुण Has Parihas - Hindi book by - Arun
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हास परिहास

अरुण

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :120
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5806
आईएसबीएन :978-7043-705-5

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हास-परिहास से भरपूर लेखों का संग्रह है यह पुस्तक....

Has Parihas

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

नींबू निचोड़

मोहन के घर गये। खाना था। वहाँ एक टिफिनदान देखा। इतना बड़ा था कि पूछ ही लिया-क्या मौहल्ले वालों का खाना साथ जाता है। पता चला कि वह कुकर है। स्वयं खाना पकाने वाला। रसोई में रॉबोट। नारी का पति से भी बढ़ कर मित्र।
बस, उस कुकर ने हृदय को हुक कर (फाँस कर) मन को बुक कर लिया।
अगले दिन ही मैं और नमिता प्रसिद्ध दुकान छज्जूमल पारसमल पर पहुँचे, जो सेकिण्ड हैण्ड को नई कर बेचती थी और नई तो खैर नई थी ही। वह दुकान सचमुच पारस थी जहाँ पहुँचते ही मेरठ में बनी चीजें हैज़लीन स्नो, ओटीन, क्रीम पार्कर क्विंक आदि बन जाती थीं।
किन्तु उसका मालिक जान-पहचान का था। हमारा हमदर्द था, क्योंकि हम उसकी दुकान से सामान खरीद कर उसकी दुकान चला रहे थे।
‘‘नमस्ते जी ! आइये जी।’’
‘‘नमस्ते।’’

‘‘आज तो बहुत दिनों बाद दर्शन दिये जी। सेवा जी !’’
मैंने नमिता की ओर देखा और नमिता ने मेरी ओर। फिर मैंने उनकी ओर रुख करके कहा, ‘‘हमें एक कुकर चाहिए था।’’
वह बड़ी गरमाई से बोला, ‘‘वाह जी वाह, आपकी चॉयस की दाद देनी पड़ती है। मैं खुद सोच रहा था कि अब तक आपके यहाँ कुकर गया क्यों नहीं।’’
उसने अन्दर की ओर मुख किया और नौकर को घुड़का क्यों रामू, भोलू कहाँ ? गया ? सामान बाँध रहा है। और चैन क्या कर रहा है ? बनियान दिखा रहा है। शाबाश, बेटा तो तू ही आ। देख, एक कुकर लाना। फटाफट।’’
और इस बातचीत में मैं नमिता के मुख की ओर देखे जा रहा था। वह भी मुझे घुड़क रही थी। किन्तु इस स्टेन गन की बौछार के सामने मेरे साहस ने जवाब दे रखा था।
मालिक मेरी ओर मुड़ा, ‘‘चीज़ एक ही है जी। एक साल बाद नौकर की तन्खा बचाने लगे...’’
मेरा माथा ठनका। नमिता से नहीं रहा गया। बोली, ‘‘देखिये कोई सेकिण्ड हैण्ड दिखाइये।’’

वह मुक्त निर्बन्ध हँसी हँसा, ‘‘सुनी आपने बहन जी की बात। सच्ची बात है, हम लोग तो घर उजाड़ कर फेंक दें। पर बहन जी, मैं तो स्वयं आपको एक फर्स्ट क्लास चीज़ दिखा रहा हूँ। सेकिण्ड हैण्ड के दामों में नई चीज़, रामू, शाबाश बेटा, वह ले आओ जो मेजर साहब दे गये थे। मैं तो बहन जी आपको वही दिखा रहा था। नये में आने जाने में दाग लग सकते हैं, किन्तु वह तो मेजर साहब फैक्ट्री से खरीद कर लाये थे। बिल्कुल अछूता है। धीरे से बात यह है उनके नौकर था और वह उस नायाब चीज़ को ऐरे-गैरे के हाथ में देना नहीं चाहते थे। ताज्जुब की बात है। कि उनका नौकर नहीं भागा। यहाँ तक कि गरमी आई और चली गई। झख मार कर वह उसे बेच गये। फैक्ट्री पैकिंग में...’’
चीज़ सामने आ गई। उसने बड़े प्यार से हाथ में उठाई सहलाई।

हम न हों तो उसकी दुकान कैसे चले। कुकर के मालिक हम हो गये। अगले सवेरे नमिता ने सबसे नीचे आग जलाई। ऊपर पानी भरा। फिर चावल, फिर दाल। चावल में कनी रह गई थी। दाल कच्ची थी। नमिता पर झाड़ पड़ी। उसने दफ्तर जाने से आधा घण्टा पहले कुकर सैट नहीं किया होगा। बेचारे रॉबोट को समय कम मिला होगा। दुकानदार ने पहले समझा दिया था कि भोजन पकाने में यह आधा घण्टे का समय लेता है।
अगले दिन नमिता ने पाँच मिनट का समय बढ़ा दिया। खाना फिर भी कच्चा था। मैंने नमिता को डाँटा-उसे घड़ी देखनी नहीं आती। नमिता ने मुझे डाँटा-आज जल्दी क्यों तैयार हो गये ?
यह तो हल्के-फुल्के आक्रमण थे। मुख्य वार तीसरे दिन हुए। नमिता ने कहा, ‘‘आज उसने एक घण्टा दिया है। उस पर विश्वास न हो तो मैं खुद पकाकर देख सकता हूँ।’’
और नमिता ने हथियार टेक दिये।

मैंने चैलेंज स्वीकार किया। नीचे दाल और ऊपर गोभी डिब्बे में रखकर चढ़ा दी। इतवार था। खाना चढ़ाते- चढ़ाते दिमाग में भाव भी चढ़ गये और कहानी लिखने बैठ गया। उठा तो एक घण्टा चालीस मिनट बीत गया था। कुकर खोला। दाल के लड्डू बँध गये थे। गोभी नीचे से जल गई थी और ऊपर के, बीच के फूल कच्चे थे। जले की खुशबू पास पड़ौसी भी सूँघ रहे होंगे।
पीछे फिर कर देखा, नमिता खड़ी मुस्करा रही थी। बारूद में आग लग गई, ‘‘तुम्हें क्या सुँघाई नहीं दिया ?’’
वह बोली, ‘‘मौहल्ले में भगदड़ पड़ी हुई है। सारी औरतें रसोई में जाकर देख रही हैं और मुण्डरों से चिल्ला-चिल्लाकर सहेलियों को साग देखने को कह रही हैं।’’
काश ! पुराने ज़माने का रिवाज नहीं रहा। फिर भी सुनाने में बाज नहीं आया।
वह मुस्कराती रही। मुझे जानती थी, पहचानती थी। मैं भी जल गया था। जलन से व्याकुल था। जले टुकड़े जल्दी-जल्दी मुख से बाहर फेंक रहा था।

दस मिनट बीत गये। आखिर उससे नहीं रहा गया। नमिता खिलखिला उठी। मैं झपट कर उठा। वह भागी। पर मैं क्रिकेट में कवर का फील्डर हूँ। खट से पकड़ लिया।
सच कहता हूँ उसके हँसने पर गाल के गड्ढे जम्बुक की डिबिया बन गये। फिर हम दोनों ने बड़े प्यार से नींबू के अचार से रोटी खाई।
प्रयोग करते-करते पूरा मास बीत गया। हाथ कुछ साफ हुआ था, पर साथ ही तबीयत भी साफ हो गई थी। कुकर को देखकर जी करता था कि इस बार दशहरे पर घर में रावण जलाऊँ।
लेकिन नमिता गृहिणी थी। मुझे साथ लेकर छज्जूमल पारसमल के पास पहुँची। शुभागमन पर वही स्वागत, वही अभ्यर्थना।

हम दोनों अन्दर पहुँचे। मैंने झेंपते-झेंपते अपना मन्तव्य सुनाया। मालिक पहले से भी अधिक गरमाई से बोला, ‘‘आपने बड़ा अच्छा किया मुझे बता दिया।
मैं इनका ध्यान रखूँगा। मैं तो पहले सोचता था कि आप दो जने हैं। कुकर के बनाये खाने में क्या मजा आ सकता है जो बहन जी के हाथ के खान में हैं। अरे भोलू, देखकर आ हमारे यहाँ कितने कुकर हैं। क्या कहा, आठ। आपने सुना, छः नये और दो पुराने। (कुकर को हाथ में घुमा फिरा कर) आपका तो बिल्कुल नया रखा है। (मुस्करा कर) चीजें बरतनी तो कोई बहन जी से सीखे।’’
मालिक ने एक साँस ली, ‘‘रामू, एक नया कुकर ला। आपको दिखाऊँगा कि नया भी आपके पुराने कुकर के सामने पुराना लगता है।’’
मेरे और नमिता दोनों के मुख से एक साथ निकला, नहीं जी रहने दें। क्यों तकलीफ करते हैं ?’’
मालिक बोला, ‘‘क्यों, तकलीफ कैसी जी ! आपने कैसे प्यार से रखा है।’’ रामू ने नया कुकर लाकर रख दिया। मालिक दोनों दोनों को पास रख कर सहलाया और विजय गर्व से हमारी ओर देखा। मानो हमारे सँभाल कर रखने पर पुरस्कार उसे मिला हो।

उसने कुकर हमें वापिस लौटा दिया, ‘‘आप इसे घर पर रखिये। इसमें क्या बीच में मैं कुछ खाऊँगा। कोई समझदार आदमी आया तो आपका पता बता दूँगा।’’
मैंने प्रतिवाद किया, ‘नहीं नहीं, आप अपना कमीशन क्यों न लेंगे ? क्या ? आप पर कोई टैक्स लगा है ?’’
आप कैसी बातें करते हैं जी। आपसे हम पैसे लेंगे।’’
नमिता बीच में बोल उठी, ‘‘अच्छा पैसे मत लीजिये। इसे दुकान पर रख लीजिये।’’
आप भी कैसी बातें करती हैं जी। अगर इस पुराने को मैंने यहाँ रख लिया तो मेरे पुरानों के दाम तो आधे रह जाऐंगे।’’
मेरे मुँह से निकल पड़ा, ‘‘क्यों ?’
‘‘आपने इसे कितने में खरीदा था ?’’
‘‘चालीस में।’’

‘‘चालीस में ?’’ आपको बड़ा सस्ता मिल गया। मुझे तो पचास ध्यान था। (हँसते हुए) पर आप मुझे पैसे अधिक कब दे सकते हैं ? अब आप सोचिये कि यदि इसके चालीस रुपये बताऊँगा तो पुरानों के बीस रुपये से अधिक कौन देगा।’’
नमिता ने सलाह दी, ‘‘तो आप दोनों को साथ न दिखायें।’’
नमिता की बात अनसुनी करके मालिक बोलता रहा, और आपके घर तो वह अच्छा रखा रहेगा। हमारी दुकान पर ! भगवान बचाये इन नौकरों से। एक दिन में इसे भी बीस रुपये वाला बना देंगे।’’
मैंने नमिता की ओर देखा, उसने मेरी ओर। आँखों के कोड ने कहा और सुनाया, ‘‘इस कुकर की दाल यहाँ नहीं पकने की। कहीं और चलो।’’
दोनों दिल और कुकर लटकाये बाहर निकले। बाहर निकलते ही मैं बोला, ‘‘देखा आखिर में खुला। इसके बीस रुपये देना चाहता था। सौ प्रतिशत लाभ।’’
नमिता ने सुझाया, ‘‘तो क्या बात है। दुकानें तो बहुत हैं।’’
हम दोनों बाजार में साइन बोर्ड देखते चले जा रहे थे। ‘हमदर्द दुकान पुरानी चीजों को बेचते-खरीदते हैं।’ नाम पढ़कर ही बड़ी सान्त्वना मिली।

नमिता बोली, ‘‘तुम जाकर इसे बेच आओ। मैं सामने कपड़े की दुकान पर मिलूँगी।’’
मैं धड़कते दिल से अन्दर घुसा। काउण्टर पर खड़े आदमी ने पूछा, ‘‘कहिये ?’’
जैसे पुलिस स्टेशन पर रपट लिखवाने वाले से पूछा जाता है।
मैंने कुकर काउण्टर पर रख दिया। बोला, ‘‘यह कुकर है।’’
‘‘अच्छा।’’
‘‘बिल्कुल नया सा है।’’
‘‘फिर।’’
‘‘मैं इसे बेचना चाहता हूँ।’’
उसने अन्दर आवाज लगाई-‘‘रफीक मियाँ।’’
चश्मा पहने एक सज्जन बाहर निकले। उन्होंने चश्मा जो आँख की बजाय नथनों पर लगा रखा था नाक पर ठीक बिठाया, क्या है साहब ?’’
‘‘यह बाबू जी हैं।’’

उन्होंने चश्मे में से मुझे घूरा।
‘‘यह कुकर है।’’
रफीक मियाँ ने कुकर को उठाया और उलट-पुलट कर देखने लगे। मुझे खुद शक होने लगा कि यह कुकर है भी या नहीं।
रफीक मियाँ ने सीधे मुझ से सवाल किया, ‘‘क्या आप इसे बेचना चाहते हैं ?’’
जी मैं आया कह दूँ, ‘‘नहीं जी मैं चलती-फिरती नुमाइश दिखाता फिरता हूँ।’’ किन्तु जब्त कर सिर हिला दिया।
रफीक मियाँ ने फिर कुकर को ठोक बजाकर देखना आरम्भ किया। ‘‘यह आपका है ?’’
मुझे क्रोध आ गया ‘‘मतलब ?’’
मेरी लाल आँखों की ओर ध्यान दिये बिना रफीक मियाँ ने बोलन जारी रखा, ‘‘साहब यह वह कुकर है जिसे मेजर साहब पाँच मास पहले लाये थे।’’

खाँ साहब ने भी मेरी ओर दयार्द्र नेत्रों से देखा।
मेरा दिल धक् से रह गया, ‘‘क्यों ?’’
‘‘यह केवल नाम का कुकर है।’’
और मुझे आशाओं की मृत्यु पर मातम करते छोड़ उन दोनों ने घुसड़-पुसड़ करनी आरम्भ कर दी। मैं भी अन्तिम डाक्टरी फरमान सुनने को खड़ा रहा।




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