हास्य व्यंग्य का गुलदस्ता - शीतांशु भारद्वाज Hasya Vyangya Ka Guldasta - Hindi book by - Sheetanshu Bhardwaj
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हास्य व्यंग्य का गुलदस्ता

शीतांशु भारद्वाज

प्रकाशक : सहयोग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :228
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5808
आईएसबीएन :81-8070-050-x

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प्रस्तुत है हास्य व्यंग्य...

Hasya Vyangya ka Guldasta

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

बरात के स्वागत के बाद मध्यान्तर समाप्त हो गया और लिफाफों का थमा हुआ साँस्कृतिक कार्यक्रम, पुनः प्रारम्भ हो गया।

एक सर्वेक्षण से सिद्ध हुआ है कि हिन्दी लेखकों की खास, पुरानी पीढ़ी की पत्नियाँ खूबसूरत नहीं होतीं।

मंहगाई तो मेरे यहाँ पानी भरती है। मेरी नौकरानी के घर तक घुसने में डरती है।

और भी अनेक आदर्श नागरिक के गुण हैं मुझमें तुम्हारी समिति का पुरस्कार प्राप्त करने के लिए इतना ही पर्याप्त है।

जी.के.साहब की कथा-‘‘हरि अनंत हरिकथा अनंता’’ है।

स्वदेशी प्रसाद हल्के-बक्के रह गए। उन्हें ऐसी आशा नहीं थी कि फॉरेनसिंह उन्हीं की जूती उन्हीं का सिर वाली कहावत चरितार्थ करेगा। फिर भी, पता नहीं क्यों उसे देखकर मुझे फुटबाल की याद आ जाती है और जब कभी फुटबाल को देखता हूँ, तब वह याद आ जाता है।

बात की बात


प्रिय पाठक !

साहित्य में सदैव ही सहित की भावना निहित हुआ करती है। हास्य-व्यंग्य विधा का हमारे जीवन में सर्वाधिक महत्त्व रहा है। हमारे जीवन को स्वस्थ बनाये रखने में यह अहम् भूमिका का निर्वाह किया करती है। उत्तम स्वास्थ्य के लिए हँसना भी उतना ही आवश्यक होता है जितना कि प्राण-वायु का सेवन करना। हास्य कवि सम्मेलनों की सफलता के मूल में यही हँसी के ठहाके हुआ करते हैं। अपने दैनन्दित जीवन में हम सभी तो परस्पर हास-परिहास करते रहते हैं। हँसी-ठिठोली, नोंक-झोंक की हमारे समाज में एक सुदीर्घ परम्परा रहती रही है। इसी प्रकार कटाक्ष भी तो तलवार की धार का काम किया करता है।

आज हमारे जीवन की व्यस्ततायें जटिल से जटिलतर होती जा रही हैं। ऐसे में हम एक प्रकार का यंत्र चालित जीवन जी रहे हैं। मनोरंजन के लिए हम समय ही नहीं निकाल पाते। फिर भी, ऐसे पाठकों की कमी नहीं है जो हास्य-व्यंग्य की रचनाओं के माध्यम से अपना मनोरंजन किया करते हैं। हम खुलकर हँसी के ठहाके नहीं लगा सकते लेकिन मन-ही-मन मुस्करा तो सकते ही हैं।

‘फाल्गुनी फीचर्स’ की यह छठी प्रस्तुति पाठकों के स्वस्थ मनोरंजन के लिए उपादेय होगी। इसमें पारिवारिक सामाजिक व राजनीतिक सरोकारों को लेकर हमारे रचनाकारों ने अनेक प्रकार के पैने व्यंग्य प्रहार किए हैं। हास्य व्यंग्य की ये विविधावर्णी रचनाएं पाठकों के मनोरंजन का पूरा दम-खम रखती हैं। मंगल कामनाओं के साथ !

डॉ. शीतांशु भारद्वाज

हमारा स्कूल


बटुक चतुर्वेदी

कल घर के लिए महीने भर का सामान बाजार से खरीदकर लाया। दुकानदारबहुत भला आदमी है। सामान को मुफ्त कागज के लिफाफों या पुड़ियों में बाँधकर देता है मेरी आदतें बचपन से ही कुछ खराब हैं। उदाहरण के लिए, हाथ लगे हर कागज को पढ़ना। हालाँकि इस आदत पर कई बार मार भी खा चुका हूँ। बड़ों से। सबसे पहले पिताजी की पुरानी होम वर्क कॉपी हाथ लग गई थी, जिसमें मास्टर साहब ने उन्हें सौ में से दो नम्बर दिये थे। मुझे उन्होंने वह कॉपी पढ़ते देख, एक झापड़ रसीद किया और कॉपी छीनकर पेटी में डालकर ताला जड़ दिया। दूसरी बार मार मुहल्ले के एक भाई साहब से खानी पड़ी थी। हुआ यह था कि उन भाई साहब का मुहल्ले की एक लड़की से कथित रूप से सच्चा प्रेम चल रहा था जिसका लड़की के माँ बाप को पता चल गया और लड़की का घर से बाहर निकलना बन्द कर दिया गया था। मेरा उस घर में आना जाना था। उन भाई साहब ने मुझे अठन्नी देकर एक पत्र अपनी प्रेमिका को देने को थमाया। जवाब में प्रेमिका ने भी पत्र दिया, मगर अठन्नी नहीं दी। मैंने लड़की का प्रेम पत्र रास्ते में पढ़ा और उन भाई साहब ने देख लिया। बस फिर क्या था, दो चपत खाने पड़े उनके हाथ से। मगर उस पत्र को पढ़कर मुझको भी प्रेम पत्र लिखने का अभ्यास करने की इच्छा जागी थी। और प्रेम पत्र लिखने के अपराध में अपने पिताश्री और लड़की के पिताश्री से मुझे मार खानी पड़ी थी।

दुकानदार ने सामान जिन कागजों में बाँधा था, आदत के मुताबिक मैंने वे कागज पढ़े। उन कागजों में किसी स्कूल के लड़के का निबन्ध भी था, जिसका शीर्षक था। ‘हमारा स्कूल’। मुझे वह निबन्ध बहुत पसन्द आया। आजकल इम्तिहानों के दिन हैं, मैं चाहता हूँ कि विद्यार्थियों के लाभ के लिए इसे छपा दूँ, क्योंकि जिन मास्टर साहब ने इसे जाँचा है, उन्होंने उस पर लाल स्याही से 9/10 नम्बर दिये हैं। 10 में से नम्बर मिलने का अर्थ होता है बहुत ही बढ़िया निबन्ध। यदि अन्य विद्यार्थी भी इस निबन्ध को रट लेंगे तो निश्चित ही उनका उद्धार हो जायेगा ! लीजिए प्रस्तुत है वह निबन्ध-

हमारा स्कूल बहुत अच्छा है। हमारे प्रधान अध्यापक व अध्यापक भी बहुत अच्छे हैं। यह हमारा सौभाग्य है कि हमें ऐसा स्कूल मिला। हमारा स्कूल शहर के बीच सड़क के किनारे है। सड़क से गुजरने वाले जुलूसों, एलानों से लेकर शव यात्राओं तक का लाभ हम लोगों को मिलता है जिससे हमारी तबीयत पढ़ने-लिखने में लगी रहती है। कभी-कभी कोई बारात बाजे-गाजे के साथ निकलती है तो हमारा मनोरंजन भी हो जाता है। मास्टर साहब कक्षा की छुट्टी कर स्वयं भी हमारे साथ बारातों का आनंद लेते हैं। कितने अच्छे हैं। हमारे स्कूल के मास्टर साहबान। ऐसे गुरुजन सबको मिलें।

वैसे हमारे स्कूल का समय सुबह सात बजे से बारह बजे तक है, मगर लड़कों और मास्टरों को छूट है कि वे जब चाहें, तब आयें मगर एक दूसरे की शिकायत न करें। इस समझौते के मुताबिक स्कूल भगवान् की कृपा से बहुत तरक्की पर है। इस तरक्की में स्कूल के चपरासी का भी हाथ है क्योंकि वह भी जब चाहे छुट्टी की घण्टी बजा देता है और जब चाहे पढ़ाई का घण्टा। हमारे स्कूल में लड़कों को बैठने के लिए टाट-पट्टी घर से लानी पड़ती है, जो नहीं लाते वह जमीन पर बैठकर विद्याध्ययन करते हैं। मास्टर साहब बहुत ही भले हैं। वे कभी किसी विद्यार्थी को किसी बात पर सजा नहीं देते। अगर कोई लड़का किसी दिन स्कूल नहीं आता तो दूसरे दिन एक रुपया मास्टर साहब को चुपचाप दे देता है। यदि होम वर्क करके नहीं लाये तो भी एक रुपया देकर छुट्टी पा जाता है। कितने अच्छे हैं हमारे स्कूल के मास्टर साहब। हम लोगों का सदा ख्याल रखते हैं।

हमारे स्कूल में कभी कोई लड़का फेल नहीं होता। इस स्कूल का रिकार्ड देखकर सभी खुश हैं। इसका कारण हमारे जागरुक व लगनशील अध्यापक हैं। वे परीक्षा से 6 महीने पहले ही लड़कों को आगाह कर देते हैं कि वे पढ़ने में कमजोर हैं, अतः उन्हें उनके घर पढ़ने आना चाहिये। कभी-कभी वे माता-पिता से भी लड़कों को घर भेजने का आग्रह कर देते हैं। सभी लोग खुशी-खुशी मान जाते हैं। मास्टर साहब के घर, मास्टर साहब कभी-कभी ही मिलते हैं। उनकी पत्नी व लड़के बच्चों से गप्पे लड़ाकर या घर का सामान बाजार से मँगाकर छुट्टी कर देते हैं। मगर गुरुजी के घर की देहरी पर माथा टेकने का फल हर लड़के को मिलता है। वह परीक्षा में पास, हो जाता है। परीक्षाफल निकलने पर सब लड़के गुरुजी के चरणों में दक्षिणा के रूप में नोट और उनके परिवार को मिठाई के डिब्बे भेंट करते हैं। गुरुजी दिल खोलकर आशीर्वाद देते हैं। इस तरह विद्यार्थियों की नैया पार लगाने वाला हमारा यह स्कूल धन्य है !

हमारे स्कूल में खेल का मैदान और खेल का सामान भी है। किन्तु साल में एकाध बार ही हम स्कूल के मैदान पर खेलते हैं। कारण कि हमारे गुरुजनों का विश्वास है कि खेलकूद से पढ़ाई को हानि होती है और हाथ पैर टूटने का भी डर रहता है। हाँ, हमारे गुरुजन अवश्य शाम को फील्ड पर खेलते हैं, ताकि हम लोगों की पढ़ाई का नुकासान न हो। जब कभी कोई बड़ा आदमी स्कूल में आता है, हम लोग उससे कह देते हैं कि हम कबड्डी, खो-खो, बॉली-बॉल वगैरह खेलते हैं। वह खुशी-खुशी दावत ग्रहण कर अपना रास्ता पकड़ता है।

हमारे स्कूल में 15 अगस्त, 26 जनवरी बाल दिवस वगैरह बड़े धूमधाम से मनाये जाते हैं। उस दिन मास्टर साहबों के प्रिय शिष्य कविता, कहानी, चुटकुले या भाषण सुनाते हैं और हम लोग तालियाँ बजाते हैं। कभी-कभी इन कार्यक्रमों में जब कोई बड़ा आदमी आता है तो हम लोगों को संतरे की गोलियाँ वगैरह बाँटी जाती हैं जिसे पाकर सभी लड़के खुश होते हैं। हमारे मास्टर साहब का कहना है कि वे स्कूल में मिठाई इसलिए नहीं बाँटते हैं कि उनमें मिलावट होती है जिससे लड़कों के बीमार होने का खतरा रहता है। बड़ा ध्यान रखते हैं, मास्टर साहब, हम लोगों का।


हमारे स्कूल में हर साल सालाना जलसा भी होता है, जिसमें हमारे साथ ही पढ़ने वाले किसी लड़के का बड़े पद व रोबदार शक्ल वाला पिता अध्यक्ष बनता है। उसकी प्रशंसा में हेड मास्टर साहब मान पत्र पढ़ते हैं। वह बड़ा आदमी हमें बड़ा बनने का उपदेश देता है और हम तालियाँ बजाकर उसे धन्यवाद देते हैं। जलसा समाप्त होने पर बड़ा आदमी सभी मास्टरों के साथ हॉल में चला जाता है, जहाँ चाय नाश्ता का प्रबन्ध होता है। हम लोगों को छुट्टी दे दी जाती है और हम खुशी-खुशी घर चले आते हैं।

हमारे स्कूल का इतना अच्छा रिजल्ट रहता है कि सभी लोग इससे खुश हैं। हमारे मास्टर साहबानों की इसीलिए कभी बदली नहीं होती। कई तो यहीं भर्ती होकर यहीं रिटायर हुए हैं। कई लड़कों के पिता इन्हीं मास्टर साहबों से पढ़े हैं।

इस प्रकार कहाँ तक प्रशंसा की जाय हमारे स्कूल की। बस यही कहना है कि हमारे जैसा स्कूल शायद ही दूसरा हो। ईश्वर करे ऐसा अच्छा स्कूल हेड मास्टर साहब, मास्टर साहबान और घण्टी बजाने वाला चपरासी सभी स्कूलों में हो जावें तो देश का कल्याण हो जायेगा। सियावर रामचन्द्र की जय !

इस विद्वतापूर्ण निबन्ध को पढ़कर मेरी उत्सुकता जागी और मैंने अन्य कागजों को भी पढ़ना शुरू कर दिया। मेरी पत्नी, बच्चे मेरे इस मूर्खतापूर्ण कृत्य पर मुस्कुरा रहे थे, मगर मैं था कि मजे ले लेकर उस स्कूल की महान् कथा का आनंद ले रहा था। मैंने फिर एक कागज उठाया। उस पर प्रश्नोत्तर इस प्रकार अंकित थे-
प्रश्न : हमारे देश के पहले राष्ट्रपति कौन थे ?
उत्तर :यह पाठ गुरुजी ने नहीं पढ़ाया था, फिर भी बताये देता हूँ, कि महात्मा गाँधी हमारे देश के पहले राष्ट्रपति थे। जब से वे स्वर्ग सिधारे हैं, वे राष्ट्रपिता हो गये हैं।

प्रश्न : राम ने रावण को क्यों मारा ?
उत्तर : मैं लड़ाई-झगड़ों से दूर रहता हूँ, न झगड़ालू लड़कों से मेरी दोस्ती है और न मैं उन्हें पहचानता हूँ। राम ने रावण को क्यों और कैसे मारा मुझे पता नहीं।



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