सोना - वृंदावनलाल वर्मा Sona - Hindi book by - Vrindavanlal Verma
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उपन्यास >> सोना

सोना

वृंदावनलाल वर्मा

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :186
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5813
आईएसबीएन :8173151326

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बुंदेलखण्ड की लोककथाओं पर आधारित उपन्यास....

Sona

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

गाँव में अथाई (अगिहाने) के पास बैठकर रात-रात-भर चलने वाले किस्से-कहानियाँ उपदेश और रोचकता में पंचतंत्र और हितोपदेश से कम नहीं हैं। वर्माजी ने अथाई कथा को लेकर उपन्यास-क्षेत्र में सफल प्रयोग किए। ‘सोना’ उनका इसी तरह का प्रसिद्ध उपन्यास है।

परिचय

इस उपन्यास के पहले परिच्छेद में कथक्कड़ ने कहानी का कुछ परिचय दिया है। कथक्कड़ हमारे वर्ग का ही व्यक्ति है, इसलिए उसकी सहायता के लिए सोचता हूँ कि, मैं कुछ कह दूँ।

सन् 1950 में लखनऊ रेडियो से मैंने दो बुंदेलखंडी लोक-कथाएँ प्रसारित की थीं। ये कथाएँ हिंदी के कुछ पत्रों में भी उद्धृत की गईं। कुछ मित्रों को बहुत पसंद आईं और उन्होंने आग्रह किया कि मैं इन्हें उपन्यास का रूप दे दूँ। लोक-कथाओं में जो सम्मोहन है वह उनके पुरानेपन, व्यापकता और जनमन के मर्म को प्रभावित करने की रुढ़ि के कारण होता है। जहां किसी ने कहा- ‘एक कहानी सुनो’- कि श्रोता की आलोचक वृत्ति नशा-सा पीकर रह जाती है और वह संभव-असंभव सब प्रकार की बातों को मानने के लिए तैयार हो जाता है। शायद कहानी के सार में से कोई उपदेश भी ले बैठता हो। जैसे एक कहानी है-

गाय का एक बछड़ा जंगल में चरता फिर रहा था। उसे एक चीते ने देख लिया। बछड़े को मारकर खाने के लिए तेंदुए ने घात लगाई और पीछे पड़ गया। बछड़े ने भाँप लिया। पास ही महुए का एक पेड़ था, जिसकी एक मोटी-लंबी जड़ के नीचे की धरती बरसात के पानी के मारे घुलकर बह गई थी। प्राण बचाने के लिए बछड़ा इस जड़ के नीचे जा पहुँचा। चीता पीछे से आ गया। बछड़ा आगे बढ़ गया, चीता उसी जड़ के नीचे से बछड़े की ओर लपका। बछड़ा निकल भागा, परंतु चीता अपने मुटापे के कारण जड़ के नीचे फँस गया। बहुत कोशिश की पर न निकल सका। बछड़ा भाग गया।
थोड़ी देर बाद एक बढ़ई बैलगाड़ी पर बैठा, वहाँ होकर निकला। वह अपने औजार लिए हुए किसी काम से कहीं जा रहा था। चीते ने गुहार लगाई-‘भैया बढ़ई, जरा मेरी भी सुनते जाओ।’
बढ़ई ने गाड़ी रोक ली। पूछा-‘क्या बात है जी ?’
चीते ने अपना दुखड़ा रोया -‘यहाँ फँस गया हूँ। मेरा उद्धार करो। तुम्हारे पास औजार-हथियार हैं, इस जड़ को काटकर मुझे छुड़ा लो। बहुत अहसान मानूँगा।’

बढ़ई को दया आ गई। उसने अपनी पैनी कुल्हाड़ी से जड़ काट दी। चीते को छुटकारा मिल गया। चीते ने जमुहाई-अँगड़ाई ली, रग-पुट्ठों को सँभाला और उछाल मारकर बढ़ई की गाड़ी पर बेधड़क आ बैठा। बेतकल्लुफी के साथ बोला ‘कुछ दूर तुम्हारी गाड़ी पर बैठा चलूँगा।’
बढ़ई सकपकाया, परंतु विवश था। थोड़ी दूर चलकर चीते ने कहा-‘मुझे भूख लग रही है। गाड़ी रोको तुम्हारे एक बैल को खाना पड़ेगा।’
बढ़ई के काटो तो खून नहीं, बहुत घिघियाया-पतियाया; परंतु चीते ने एक न सुनी। बढ़ई ने अनुरोध किया-‘पंचायत कर लीजिए, बड़ी-बड़ी उलझनें पंचायत में सुलझ जाती हैं।’
‘किसकी पंचायत ?’ चीते ने चुनौती दी।
बढ़ई ने विनती की-‘इसी महुए की यह जो सामने खड़ा है।’

महुए के पेड़ से पंचायत के लिए प्रार्थना की गई। महुए ने निर्णय दिया- ‘मैं बुड्ढ़ा हो गया हूँ। जब तक समर्थ था। तब छाया, फूल, फल सब देता रहता था; अब मेरा तन, शाखें सब काटी जाएँगी; जो कुछ बचेगा उसका ईधन बना डाला जाएगा। संसार में नेकी का बदला बदी होता है। जाओ यहाँ से।’

बढ़ई चीते से घिघियाया -‘महुए की मैंने जड़ काटी, इसलिए इसने उलटा फैसला दिया। जरा आगे चलकर और भी किसी से पंचायत करवाने की कृपा कीजिए, आगे चलें।’ एक बहुत बुड्ढी दुर्बल गाय मिली। गाय ने पंचायत की ‘जब तक मैं जवान थी, मनुष्यों ने मेरा दूध पिया, मेरे बछड़े लिए। अब जब बुड्ढी हो गई हूँ तो छोड़ दिया। मारी-मारी फिरती हूँ। मरने वाली ही हूँ। नेकी का बदला बदी होता है।

चीते ने देखा बन पड़ी। वह एक बैल को समाप्त करने वाला था कि थोड़ी दूर पर एक सियार दिखलाई पड़ा।
बढ़ई ने चीते की मनुहार की-‘स्वामी कृपा करके एक पंचायत और करवा लो। चीते ने देखा कोई हानि नहीं। गाड़ी सियार के निकट पहुँची। सिआर चौकन्ना होकर एक ओर खड़ा हो गया। बढ़ई ने उसे अपनी बात सुनाई। सिआर हँसा और बोला -‘मुझे तुमने झूठ समझा है ? ये चीते साहब हमारे जंगल के राजा, एक सड़े-से महुए की जड़ में फँस गए। इस झूठी बात को आदमी मान ले तो मान ले, हम लोग तो नहीं मानेंगे।’
बढ़ई ने प्रतीति कराने का प्रयास किया।

सिआर ने कहा -‘मैं ऐसी वाहियात बात नहीं मानता। एक लक्कड़ काटो। जिस तरह महुए की जड़ में इन राजा साहब को फँसा हुआ पाया था वैसे ही उनको लक्कड़ की चिमीट में भूमि से सटा हुआ कर दो, तब विचार करूँगा।’
चीते ने मान लिया। बढ़ई ने एक बड़ा लक्कड़ काटा और चीते को लक्क्ड़ की दाब में फँसाकर दबोच दिया।
सिआर से बढ़ई बोला -‘ये ऐसी ही स्थति में पाए गये थे। अब करिए न्याय।’
‘अबे मूर्ख,’- सियार ने निर्णय दिया- ‘चीते जैसे निर्मम दुष्टों के साथ कहीं नेकी की जाती है ! पकड़ अपना मार्ग और जा!!’
बढ़ई चला गया।

यह कहानी गाँवों में लगभग इसी रूप में प्रचलित है। जनता इसे आनंद के साथ सुनाती है और बिना किसी आलोचना के उसके सार को ग्रहण कर लेती है। परंतु इसको तर्क युक्ति और स्वाभाविकता की संगति नहीं मिल सकती। यदि दी जाए तो शायद ही कोई ग्रहण करे। उपन्यास तो इस कहानी पर लिखना असंभव प्रयत्न-सा दीखता है।
रेडियो पर मैंने जो दो कहानियाँ प्रसारित की थीं पहले तो, उपन्यास के लिए इसी वर्ग की जान पड़ीं, फिर उनमें मानवीय तत्त्व अधिक दिखलाई पड़े और मुझे ऐसा भान हुआ कि उन कथाओं की अनेक कड़ियों को तर्क, युक्ति और स्वाभाविकता की संगति में बिठलाया जा सकता है। उन कड़ियों को जोड़ने के लिए बहुत-सी कथा-सामग्री कल्पना ने प्रस्तुत कर दी, कुछ जीवन के अनुभवों ने।

परंतु मेरा यह प्रयत्न बराबर रहा कि मूल कथाओं का ग्राह्य रूप बिगड़ने न पाए। और कथक्कड़ की राय में यह उपन्यास उसका फल है।

उपन्यास रचना में यह प्रयोग नया है। यदि पाठकों को रुचा तो इस प्रकार का उपन्यास और भी लिखूँगा आगे की बात कथक्कड़ के श्रोताओं के हाथ में है जो गाँव की अथाई पर प्रायः इकट्ठे हो जाते हैं।

वृंदावनलाल वर्मा

सोना

साँझ हो गई थी। लोगों ने खाना खाया, और कुछ दिन-भर के श्रम की थकावट के मारे जा सोए, कुछ अथाई पर आ बैठे। इधर तमाखू की चिलम सुलगी, उधर सुरा-बेसुरा गाता हुआ गाँव का कथक्कड़ आ पहुँचा। उसके आते ही लोगों में उल्लास छा गया। वह जब कभी संध्या के उपरांत अथाई पर आता था। लोगों को एकाध कहानी सुना जाता था।


उसकी ओर तम्बाकू की चिलम बढ़ाई गई और एक ने कहानी के लिए आग्रह किया। कहानी कहने तो वह आया ही था। थोड़ा-सा नखरा किए बिना न माना।

बोला -‘क्या कहानी सुनाएँ ? कितने लोग अपने गाँव में आते हैं और शिक्षा-सफाई इत्यादि बातों पर जोर लगाकर चले जाते हैं, यहाँ कुछ रुपया गाँठ में आते ही लोग चाँदी खरीदने लगते हैं; तड़क-भड़कदार कपडे, दिखाऊ साफे, दुपट्टे पहनने लगते हैं ! शिक्षा और सफाई पर कुछ खर्च नहीं करते।’
एक ने कहा-‘सफाई, शिक्षा और मसहरीवालों को भी तो बुखार आ घेरता है। शहरवालों को न देखो।’
कथक्कड़ बोला-‘मूर्खों के मुहल्ले अलग थोड़े ही बसते हैं। शहर हो चाहे गाँव, जहाँ लक्ष्मीजी ने एकाएक कृपा की, वहीं सब उलटा-पुलटा हो जाता है। लोग मेहनत-मजदूरी से जी चुराने लगते हैं, बढ़िया कपडों और कीमती गहनों की प्यास दिन-रात बढ़ती रहती है, कभी भी नहीं बुझती; नजाकत और नखरों की बाढ़ आ जाती है; वे श्रम के गौरव की कल्पना तक नहीं कर सकते; अपने को बड़ा समझने लगते हैं और मुँह के बल गिर जाते हैं; न इस लोक के काम के और न उस लोक के काम के। जीवन का असली चमत्कार उसको दिखलाई ही नहीं पड़ता अंधे हो जाते हैं और सोना-चाँदी, रेशमी और जरतारी कपड़ों की टटोला-टटोली में जनम गवाँ देते हैं।’

एक ने टोका-‘अरे, आज तुम व्याख्यान देने आए हो या कहानी सुनाने ?’ कथक्कड़ ने डांटा- चुप रे ! पूरी बात सुन। ऐसे लोग ऊपर-ऊपर तो गरीबों पर दया का पाखंड दिखलाते हैं, भीतर-भीतर उनसे जलते हैं। सोचते हैं, इनको कितना भोजन पच जाता है ! कैसे बेभाव सोते हैं ये लोग और हमको मखमली गद्दे-तकियों में भी नींद नहीं आती !!’
कथक्कड़ तमाखू पीने लगा।

एक गाँव वाला उमंग के साथ बोला-‘अरे हम समझ गए। आज की कहानी कुछ इसी तरह की बात पर है। सुनाओ, सुनाओ, पुरानी है न ?’
‘हाँ-हाँ, पुरानी है।’
‘तो अपनी तरफ से ज्यादा गपशप न मिलाना।’
‘सुनोगे भी या लगे मीन-मेख निकालने।’
‘जरूर, जरूर देर मत लगाओ।’
‘सुनो....’ कथक्कड़ तमाखू के कश खींचने लगा। अथाई पर बैठे लोग कहानी की बाट जोहने लगे।

कथक्कड़ ने चिलम दूसरे को देकर कहा-‘एक राजा था’
एक श्रोता ने टोका- ‘यह है वह पुरानी कथा ! एक राजा था !! कहाँ का था वह राजा ? गरीबों की भी कोई कहानियाँ हैं ?’’
‘सुनो भी जरा धीरज के साथ। कहाँ का था यह भी मालूम हो जाएगा। जब राजा था तो कहीं का तो होना ही चाहिए और उसका कुछ-न-कुछ नाम भी रहा होगा। बतलाऊँगा थोड़ी देर में। वह देवगढ़ का राजा था। राज्य बड़ा नहीं था, तो भी उसमें बहुत-से गाँव थे। इनमें से एक दूधई नाम का गाँव भी था।’

अब की बार एक लड़के ने बात काटी-‘वही देवगढ़ होगा जो दक्षिण हैदराबाद में है, जिसको दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद ने दौलताबाद नाम देकर बसाना चाहा था।’
‘पढ़ लीं दो-एक पोथियाँ और लगे धूल में मूसल पटकने। यह वह देवगढ़ नहीं है। यह झाँसी जिले का देवगढ़, जिसमें एक-से-एक बढ़कर सुंदर मंदिर और मूर्तियाँ हैं।

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