कालिंदी - ताराशंकर वन्द्योपाध्याय kalindi - Hindi book by - Tarashankar Vandyopadhyaya
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कालिंदी

ताराशंकर वन्द्योपाध्याय

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :446
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5853
आईएसबीएन :00000

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बंगाल के सामान्य जीवन पर आधारित रोचक उपन्यास...

Kalindi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कालिंदी

नदी के उस पार एक चंवर निकल आया है। रायहाट गाँव के किनारे ही ‘‘ब्रह्मणी’’ नदी बहती है –इसका स्थानीय नाम है कालिन्दी; जिसे लोग काली नदी के नाम से पुकारते हैं। इसी काली नदी के उस पार चंवर निकला है।

अभी जहाँ चंवर निकल आया है, काली नदी की गर्भभूमि पहले वहीं पर थी। अब यह नदी गाँव के एक हिस्से को निगलकर रायहाट से बिलकुल सटकर बहने लगी हैं। गाँव वालों को अब नदी में पहुँचने के लिए बीस हाथ की उतराई उतरनी पड़ती है उस चंबर के लिए टंटा खड़ा हो गया। रायहाट बड़ा पुराना गाँव है। यहाँ पुराने जमींदार रायवंश के लोग बहुतेरी साखा-प्रशाखाओं में बँट गए हैं। उस बेहद बँटे राय-परिवार के लगभग सभी फरीक उस चंवर के हकूक के लिए एक हाथ में लाठी और दूसरे में कागज़ात लिए मुस्तैद हो गए। उन्हीं में दो महाजन और कुछेक खेतिहार रैयतों ने भी अपनी आवाज उठाई। कुल मिला-कर हक की लड़ाई लड़नेवालों की तादाद एक सौ पन्द्रह हो गई। सभी एक-दूसरे के विरोधी। जमींदारों में से प्रत्येक का कहना था, चंवर मेरी चौहद्दी में निकला है लिहाजा वह मेरे खास दखल की चीज़ है । दोनों महाजनों का दावा था, जो ज़मीन मेरे पास बंधक है। चंवर उसी से लगा-लगा निकला है। इसलिए उसे बन्धक जमीन का ही अंश माना जाना चाहिए, बल्कि यही होना पड़ेगा। रैयतों का उज्र था, हमारी इस पार की जमीन काली के पेट में चली गई है, फलस्वरूप क्षतिपूर्ति के रूप में नदी ने उस पार में दिया है, वह हमारा होना चाहिए।

जमींदार राय परिवार के फिलहाल एक सौ पाँच हिस्सेदार हैं। बाकी लगान के लिए नालिश करते समय जमींदार के नाम लिखने में कागज़ के तीन पूरे पन्ने लग जाते हैं। इन सबों में एक सौ दो ने तो साथ दिया है। बाकी तीन में से एक पक्ष का मालिक तो निरा नाबालिग और असमर्थ है। दूसरा और तीसरा पक्ष लेकिन यहां के बहुत दिनों के परस्पर विरोधी पक्ष है। एक राय वंश का ही दौहित्र वंश है और दूसरा है राय वंश का सबसे धुरंधर कूट बुद्धि वाला व्यक्ति इन्द्रराय। इन्द्रराय की हथेली कहीं गरुण के पैंने नाखूनों की तरह फैली तो फिर खाली मुट्ठी हरगिज नहीं लौट सकती। उस मुट्ठी में जमीन ही नुच-कर चली आएगी। इसी इन्द्रराय के आसरे सभी विरोधियों के उठे हुए हाथ स्तब्ध हैं। वरना अब तक कोई विपर्पय घट गया होता।

दूसरी ओर हैं-इन्द्रराय के वंशानुक्रमिक प्रतिपक्षी रामेश्वर चक्रवर्ती, ये भी का भी इन्द्रराय की बराबरी के आदमी थे। कूट बुद्धि के बजाए उनका व्यक्तित्व बड़ा था। दाँभिकता की प्रतिमूर्ति। इन्द्रराय से लड़ने में इन्द्रराय को ही हथियार की तरह व्यवहार में लाते थे। हर मामले में इन्द्रराय को ही गवाह मानते थे। इन्द्रराय झूठ कहते तो वे हँसकर उनके दावें को उड़ा देते है। कहते, तुम्हारी गवाही की यह मैंने फीस दी इन्द्र। नाटक ही पैसे खर्च करके तुमने गवाहों को जूते खरीद दिए!’’ घर लौटाकर जाते तो गाँव में जोरो की दावत देते।

लेकिन जिस काल की गति से यदुपति गए, उनकी मथुरापुरी भी गौरवहीन हुई। उसी के प्रभाव से ही शायद वह रामेश्वर भी आज नहीं है। उनकी आँखों की जोत जाती रही है और धराशायी जीर्ण विजय-स्तम्भ की नाई वे अंधेरे कमरे में बिस्तर पर पड़े हैं। आँखों को रोशनी बिलकुल बरदाश्ता ही नहीं होती और दिमाग भी शायद खराब हो गया है। जायदाद की देखभाल पुराने योगेश मजुमदार करते है। और योगेश मजुमदार की ओट में विषाद की प्रतिमा जैसी एक नारी-मूर्ति है-रामेश्र्वर की दूसरी स्त्री सुनीति देवी। दो लड़के-बड़े की उम्र अठ्टारह की, छोटे ने अभी-अभी पन्द्रह पर कदम रक्खा है। मजुमदार ने बहुत कह-सुनकर बड़े की पढ़ाई छुड़वाई है और उसे जमीदारी के काम-काज में लगाया है। अवश्य पढ़ने-लिखने में भी उनमें अनुराग नाम की कोई चीज़ नहीं थी। चंबर का यह टंटा खड़ा होने के पहले से ही मजुमदार और रामेश्वर का बड़ा लड़का महीन्द्र यहाँ नहीं है। वे दोंनों देख-रेख के सिलसिले में अपने किसी दूर के महाल में गए हुए है। लोगों ने समझा, इन्द्रराय या तो अपने प्रतिद्वन्द्वी के इन्द्रजार में हैं या फिर मौके की ताक में हैं। ऐन-मौके पर टूट पड़ेंगे।
बेचारों खेतिहर रैयतो ने इतना नहीं समझा। उस दिन वे लोग इन्द्रराय के ही पास आ धमके, ‘‘हजूर, आप इसका फैसला कर दीजिए।’’
बहुत ही हल्की हँसी के साथ भौंहों को जरा सिकोड़कर उन्होंने कहा, ‘‘किस बात का फैसला रे ?’’ गोया उन्हें कुछ मालूम ही नहीं-किनसे झगड़ा-टंटा हुआ है ?

उत्साहित होकर रैयतों ने कहा, ‘‘जी, नदी के उस पार के चंबर की कह रहे हैं। नदीं ने हमारी इस पार की जमीन निगली जभी तो उस पार उगली है, हमारी जो जमीन गई, उसके लगान की छूट तो हमें नहीं मिली। हम तो हर साल नुकसान भर ही रहे हैं।’’
बाये हाथ से मूछों पर ताव देते हुए राय ने कहा, ‘‘ठीक तो है। नुकसान भरने की जरूरत क्या है ? नुकसान वाले जमा से इस्तफा दे सकते हो।’’
बायें हाथ से मूछों को ताव देना राय की आदत है। लोगों का कहना हैं उसी के साथ-साथ वे मन ही मन उमेठा अक्ल करते हैं।
हक्के-बक्के-से हो रैयत लोग कुछ देर तक राय की ओर ताकते रह गए। फिर बोले, ‘‘जी, तो फिर आपने फैसला क्या किया है?’’

हँसकर इन्द्रराय बोले, ‘‘तुम लोग जो कहो, उसी में हामी भरूँ आखिर यही तो फैसला नहीं है न ! फैसले का तो कोई कानून है, जज को तो कानून के मुताबिक राय देनी पड़ती है।’’
रैयत लोग हताशा होकर उठकर चले गए। रास्ते में उन्होंने राय-सलाह की और रामेश्रर बाबू के यहाँ जा पहुँचे। कचहरी में कोई मालिक नहीं थे। नौकर ने बताया, ‘‘बड़े बाबू भी नहीं हैं, नायब बाबू भी नहीं हैं और मालिक से तो भेंट होगी नहीं।’’
रैयत सभी गाँव के ही है। उन्हें हर बात की खबर है। उन्हें पता था कि इस समय इस घर के हर काम की आड़ में एक अदृश्य शक्ति काम करती है, परम शक्ति की तरह वह भी नारी-रूप है। सो उन लोगों ने कहा, ‘‘हम लोग माँ जी से भेंट करेंगे।’’
नौकर अवाक् रह गया। इस ढंग की बात उसने कभी सुनी नहीं।
वह बोला, ‘‘तुम लोग पागल हो गए हो क्या ?’’

रामेश्वर बाबू का छोटा लड़का अहीन्द्र पास ही के एक कमरे में पढ़ रहा था। वह इतने में बाहर निकल आया। म्यान से खुली तलवार जैसा रूप, कुछ लम्बा-पतला शरीर, देह का अंग तीखा गोरा, आँखें भूरी, सर के बाल तक भूरे। उसे देखकर रैयत लोगों को उत्साह हुआ। इस परिवार के बड़े लड़के महेन्द्र को देखकर उन्हें डर लगता है, वह दस बात सुनकर तब एक जवाब देता है, उनकी ओर देखकर भी वह कभी बात नहीं करता। लेकिन इस छोटे बाबू का रूप देखकर घोली-सी मीठी बात उन्हें किसी से नहीं मिलती। किस्से-कहानियों के लिए ही उन लोगों से उसके मिलने का एक सूत्र मिल गया है। पुरनिए लोगों से वह संताल-विद्रोह की कहानियाँ सुनने जाया करता, वह आप देश-विदेश की कितनी कहानियाँ सुनाया करता। समंदर के किनारे सोमनाथ के मन्दिर की लूट, अमरीकी साहबों से विलायत के साहबों की लड़ाई। वे लोग मंत्रमुग्ध होकर सुना करते हैं। अहीन्द्र को देखकर वे लोग उत्साह से बोले, ‘‘छोटे बाबू कब आए?’’
अहीन्द्र यहाँ से दस मील दूर शहर के स्कूल में पढ़ता है। वह हँसकर बोला, ‘‘कल शाम को आया हूँ। चार दिन कि छुट्टी है। तो तुम लोग किधर चले हो, भैया भी घर पर नहीं है. नायब चाचा भी नही हैं।’’
वे बोले, ‘‘आप तो हैं भैया जी, आप हमारा फैसला कर दीजिए।’’

अहीन्द्र खिलखिल करके हँस पड़ा। बोला, ‘‘मैं फैसला कर सकता हूँ भला दुर दुर।
वे अड गए, ‘‘नहीं-नहीं भैयाजी, हमारी दुःख-कहानी आपको सुननी ही पड़ेगी। आप न सुने तो हम जाएँ किसके पास ? न हो तो ओष हम सबों को माँ जी के पास ले चलें। हम लोग भूखे-प्यासे यहीं पड़े रहेगे।’’
अहीन्द्र अपनी माँ के पास गया। सुनीति देवी पति के लिए भोजन तैयार कर रही थीं। अहीन्द्र के जाकर खड़ा होते ही बोली, ‘‘क्यों रे अही, क्या बात हैं ?’’
मां और बेटे का हो एक ही रूप। फर्क क्वल बाल और आँख का चेहर, रंग और देह के गठन में वह मानो मां का प्रतिबिंब हो भूरे बाल और आँखें ही पैतृक विशिष्टता है। सुनीति की आँखें बड़ी-बड़ी और काली हैं बाल भी घने काले। अपने बड़े बेटे मही से उनकी ज़रा भी समानता नहीं-मही ए़ड़ी-चोटी अपने बाप का अनुरूप है।
अही ने सारी बातें सुनाकर कहा, ‘‘वे लोग तुमसे एक बार मिलना चाहते है माँ। उनसे क्या कहूँ ?’’
बेटे की ओर ताककर भँवें सिकोड़कर माँ ने कहा, ‘‘यह भी सम्भव है बेटे ? मैं उनसे क्यों मिलूँ ? तुम मुझसे यह कहने ही कैसे आए?’’

सुनते ही अही मुड़ गया, माँ ने हँसकर पीछे से आवाज़ दी, ‘चल दिए जो ?’’
अही पलटकर खड़ा हो गया, ‘‘उनमें जाकर यह कह दूं।
‘‘ला, तेरी शकल तो देखूं।’’
अही खड़ा रह गया। मां ने उसकी ठोड़ी छूकर कहा, ‘‘ऐसा सुकुमार लड़का तो मैंने नहीं देखा। बिलकुल फूल की चोटी से भी गुस्सा हो जाता है।’’

बात सही है। माँ की मामूली- सी बात से ही अही रूठ-सा जाता है। इस दुनिया में महज माँ पर ही सारा लाड़ है उसे। बचपन से ही वह बाप के पास ज्यादा नहीं फटकत, उसका बड़ा भाई महीन्द्र बल्कि बाप के पास-पास डोलता रहता है। स्वभाव में दोनों जैसे विपरीत हैं। महीन्द्र को रूठना मान करना नहीं आता, वह गुस्से से अपने आपको भूलकर चोट करना जानता है, बलपूपर्वक अपनी मुराद की चीज़ को अदा करना जानता है। इस्पात की तरह वह टूट सकता है, झुक नहीं सकता। अही खाँटी सोने जैसा है, चोट से टूटता नहीं मान से टेढा हो जाता है।
माँ ने फिर पूछा, ‘‘नाहक ही गुस्सा हो गया न?’’
‘‘नहीं। ’’

‘‘नहीं कैसे ? साफ तो देख रहीं हूँ मैं। तूने शायद उन लोगों से कहा है कि मां से मिला दूँगा ?’’
अही बोला, ‘‘कहा नहीं है, पर भेंट कर लेने में हर्ज क्या है ?’’
‘‘हर्ज नहीं है ? कह क्या रहा है ? राय बाबू वगैरह हँसेगे। कहेंगे, घर की बहूँ होकर खेतिहर रैयतों से बात की !’’
‘‘बला से कहें इसके लिए तुम उन बेचारों की फरियाद नहीं सुनोगी ? और मुसलमान नवाबों के यहाँ जैसे रदे की भी क्या पड़ी है ? पड़ी है ? आजकल स्त्रियां दुनिया-भर का काम करती है! यूरोप में इस लड़ाई में -’’

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