कागजी बुर्ज - मीरा कांत Kagzi Burj - Hindi book by - Mira Kant
लोगों की राय

कहानी संग्रह >> कागजी बुर्ज

कागजी बुर्ज

मीरा कांत

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :151
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5861
आईएसबीएन :978-81-263-1464

Like this Hindi book 4 पाठकों को प्रिय

46 पाठक हैं

मीरा कांत की कहानियाँ....

Kagzi Burj - A Hindi Story Book By Meera Kant

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘कागज़ बुर्ज’ की कहानियाँ स्थापित मूल्यों के गिरते बुर्जों पर चिपके कागज़ी पैबन्दों के सुराग खोजती हैं। वो बुर्ज चाहे स्त्री को महिमामंडित करनेवाली खोखली परम्पराओं की आड़ हों या जीवन-सम्बन्धों की जीर्णशीर्ण दन्तकथाएँ।

मीरा कांत के इस दूसरे संग्रह की ये कहानियाँ वस्तुतः स्त्री और किसी न किसी रूप में मात खाये हुए मानव मन की उबड़-खाबड़ संरचना की अनवरत यात्रा है। चाहे भीतरी ज़मी स्मृतियों के किनारे बसा डायस्पोरा का दर्द हो, इतिहास के गर्त में दबी-घुटी दूर से आती कोई आर्त पुकार हो अथवा जीवन-संघर्ष में सामान्य-असमान्य को जुदा रखनेवाली लकीर पर चलते हुए लगभग सन्धिप्रदेश की दुनिया में जा पहुँची किसी स्त्री की बेबस तन्हा ज़िन्दगी हो-ये सब सार्थक पड़ाव हैं उस रचनात्मक यात्रा के जो दुर्गम ऊँचाइयों और गहरी खाइयों के फासले तय करती है।

ये कहानियाँ आतंक पैदा करनेवाले उन प्राचीनों और बुर्जों के लिए कोई अकेली चुनौती न बनकर अनगिनत बन्द पलकों को खोलने का आह्वान हैं। इनका गोचर-अगोचर पाठ मजबूर ज़िन्दगियों के चेहरों पर लिखे शोकगीतों को मुखर करता है, इस हद तक कि उसका संघर्ष पाठकों के भीतर भी धड़क उठे।
मीरा कांत का गल्प गद्य और पद्य के बीच चले आ रहे सदियों पुराने मनमुटाव को भुलाने का एक सफल प्रयास है।

कागज़ी बुर्ज

किसी किताब का शीरज़ा जब बिखरता है तो उसकी सिलाई खुलने के साथ-साथ उसके सफे भी आगे-पीछे या उल्टे-सीधे हो जाते हैं। वो किताब एक बेतरतीब पुलिन्दा बन जाती है। अपनी ज़िन्दगी का एक ऐसा ही पुलिन्दा लिये गोपा आज फिर हैदराबाद के लगभग ग्यारह किलोमीटर दूर गोलकोंडा के किले में आयी है। सामने है ‘फतह दरवाज़ा’ यानी किले का मुख्य द्वार। औंरगज़ेब ने इसे फतह करने के बाद यह नाम दिया तथा। इसका पहले भी तो कोई नाम रहा होगा। सोचा गोपा ने। अब इसे कोई उस नाम से नहीं पुकारता। जैसे विवाह के बाद स्त्री की पहचान बदल जाए और उसे नाम मिले ‘स्वामी’ का। गोपा ने ‘फतह दरवाज़े’ को छिपाने के लिए बनायी गयी पत्थर की दीवार का स्पर्श किया तो मन ही मन बुदबुदाया, ‘‘पर्दा’’। इस दीवार का यही नाम है क्योंकि इसे ‘फतह दरवाज़े’ की ऊँचाई और चौड़ाई में सिर्फ उतना ही बनाया गया था कि द्वार पर शत्रु की सीधी नज़र न पड़ने पाए। पत्थर का पर्दा !

इस फतह दरवाज़े से जब-जब गोपा किले के अन्दर गयी है, यहाँ गाइडों की तरह खड़े किस्से-कहानियाँ उसके साथ हो लेते हैं। आज वह गाइडों की उपेक्षा कर तेज़ी से आगे बढ़ गयी। कुछ ही आगे पोर्टिको और बालाहिसार दरवाज़े को पार कर वह दायीं ओर हो ली। जब जीवन में तरतीब नहीं रही तो किला भी तरतीब से क्यों देखा जाए ! किले के चप्पे-चप्पे से वह वाकिफ थी। सोच रही थी कि किस ओर बढ़े कि सामने विशिष्ट व्यक्तियों का एक समूह दिखाई दिया, जिन्हें एक गाइड कुछ समझा रहा था। वह उसी ओर बढ़ गयी और उस समूह से थोड़ी दूरी बनाकर उनके साथ-साथ घिसटने लगी।

‘‘किले को ग्रेनाइट पत्थरों की तीन दीवारें घेरती हैं। बाहरी दीवार सत्रह से चौंतीस फीट मोटी है और इसमें आधी गोलाई वाले कुल सत्तासी बुर्ज थे। पचास से साठ फीट ऊँचे। इनमें से चार बुर्ज मशहूर हैं। तीन मैं आपको दिखाऊँगा और चौथे की सिर्फ बाताँ होंगी।’’
‘‘क्यों भाई ऐसा क्यों ?’’ मुस्कराते हुए समूह का एक व्यक्ति पूछ रहा था।

‘‘क्योंकि वो अब है ईच नई। हाँ साब। तब यहाँ का सुल्तान था अबुल हसन तानाशाह औरंगजेब की आँखों में वो कंकंड़ की तरह चुभता था। किले पर कब्जा करने के लिए औरंगज़ेब आठ महीने गोलकोंडा के बाहर ठहरा रहा पर किले का बाल भी बाँका भी नहीं कर पाया। एक रोज़ मुगल सिपाही तोप के गोले बरसा-बरसा कर किले के एक बुर्ज और उसकी दीवार को उड़ाने में कामयाब हो गये। सुल्तान तानाशाह समझ गया कि अब खैर नहीं क्योंकि रातोंरात तो पत्थर की दीवार खड़ी की नहीं जा सकती थी। तो साहब उसने एक तरकीब सोची। उसने अपने दस्तकारों को बुलाया और उसने कागज और कपड़े का हूबहू वैसा ही बुर्ज और दीवार तैयार करने को कहा। एक ही रात में ऐसा फर्जी बुर्ज खड़ा किया गया कि सुबह को मुगल सिपाही सकते में आ गये। उन्हें इस बुर्ज से पत्थर के बुर्ज और दीवार का धोखा हुआ। औरंगज़ेब ने सुना तो चेहरा पीला पड़ गया। बस उसे ही कहा गया काग़जी बुर्ज।’’

‘‘कागजी बुर्ज !’’ एक महिला ने दोहराया मानों कहानी से आगे जाकर कुछ समझने की कोशिश कर रही हो।
‘‘हाँ साहब काग़जी बुर्ज ! कागज़ी था, खत्म हो गया। अब कहाँ !’’
‘‘बहुत अक्ल मन्द था सुल्तान। पर उसके बाप ने उसका ऐसा अजब नाम रखा ? तानाशाह !’’ कोई पूछ रहा था।
‘नहीं साहब नाम नहीं था यह उसका। यह तो उसकी रियाया उसे प्यार से कहती थी-तानाशाह। कभी-कभी मनमानी करता था....ज़रा सनकी था बस।’’ गाइड ने जवाब दिया।

ज़रा नहीं बहुत ! सोचा गोपा ने और उसे याद आया वो किस्सा कि एक बार किसी घर के भेदी ने किले का दरवाजा रात को अक्रान्ताओं के लिए खोल दिया। इस पर एक आवारा कुत्ते ने भौंक-भौंक कर सबको सचेत कर दिया उस दिन कुत्ते की सूझ-बूझ और वफादारी की वजह से किला बच गया। सो तानाशाह ने कई रोज़ तक उस आवारा कुत्ते को सोने का पट्टा पहनाकर अपने साथ सुल्तान के तख्त पर बैठाया।

नृत्य का तो दीवाना था तानाशाह। तभी उस नर्तकी तारामती से प्रेम कर बैठा जो नर्तकी होने के साथ-साथ सम्भवताः नटी भी थी। एक किलोमीटर दूर अपने महल कलामंदिर से तानाशाह के लिए वह किले तक एक तार पर नाचती हुई आती थी। उसका नाम किले का एक महत्त्वपूर्ण पत्थर है क्योंकि तानाशाह ने उसके नाम एक मस्जिद बनवायी थी- तारामती मस्जिद। गोपा ने समूह का साथ छोड़ा और पलटकर तारामती मस्जिद की ओर रुख किया।

उसे याद आया कि एक बार तानाशाह ‘कुचीपुड़ी’ गाँव का मुआयना करने गया तो उसने पाया कि गाँव में पानी की बहुत कमी है। उसके हुक्म पर फौरन एक कुआँ वहाँ खोदा गया। गांववासियों ने अपनी ओर से आभार-प्रदर्शन के लिए तानाशाह के समक्ष जो स्थानीय नृत्य प्रस्तुत किया उसे तानाशाह ने नाम पर नाम दिया ‘कुचीपुड़ी’। किले के पत्थरों की तरह आज वह नृत्य अपने अतीत की गरिमा थामे मौजूद है, पर नाम देने वाला तानाशाह कहीं नहीं है। गोलकोंडा के पास बने कुतुबशाही के खानदानी कब्रिस्तान में भी नहीं !

किले का निचला हिस्सा तेज़ी से पार कर गोपा भीतर पहुँची। उसने नज़र उठाकर देखा। नज़र तारामती मस्जिद से टकराती हुई सबसे ऊपर बालाहिसार बारादरी तक पहुँची। पहाड़ी की चोटी पर बनी नीले आसमान से सटी बारादरी। उस कोण से बारादरी की छत की दो मीनारें दिखाई दे रही थीं आकाश की ओर जाती हुई। बारादरी का खयाल आते ही जाने उसके ज़ेहन में दरबारे-आम और दरबारे-खास न रहकर से नगीनाबाग के रास्ते में पड़ने वाले दो गहरे कुएं क्यों आ जाते हैं ? वे गहरे कुएँ जो अपनी गहराई तक सूख चुके हैं और भी कुएँ कहलाते हैं।
मीनारों से नज़र सीधे नीचे फिसली तो बड़े-बड़े पत्थरों ने थाम ली। नज़र फिसल ही कहाँ पायी फिर। एक नज़र क्या, इन पत्थरों ने तो पूरे किले को थाम रखा है। गड़रियों की पहाड़ी यानी तेलगू के ‘गोल्ल कोंडा’ पर बने गोलकोंडा के इस पूरे किले को। शताब्दियों का समय इन पत्थरों कोंडा’ पर बने गोलकोंडा के इस पूरे किले को। शताब्दियों का समय इन पत्थरों पर पुता है। उन तत्थरों पर जो बूढ़े समय की हथेलियाँ हैं।

गोपा जब पहली बार यहां आयी थी तो गाइड निज़ामुद्दीन ने बताया था कि पहाड़ पर बने इस किले की खासियत यह है कि इसकी कोई नींव नहीं है। इसे इन्हीं हथेलियों का सहारा है।

‘‘ये देखने का चीज़ मैडम.....इस किले का नीव नईं...ये इतना बड़ा-बड़ा पत्थर कीले को सैकड़ों सालों से सँभाला है....कीला ऊपर से नीचे को बनाया गया था..नीचे से ऊपर को नई।’’

अपने खास हैदराबादी अन्दाज़ में वो बता रहा था और गोपा सिर ऊपर किये आँखों पर बायें हाथ का छज्जा बनाये चौंध को रोकते हुए उन पत्थरों को एक टक देख रही थी। जहाँ तहस-नहस किया गया किला वहां टूटा बाकी आज स्थिर खड़ा है अपने स्थान पर अपना अतीत थामे।

दिल्ली में सीरी के किले की नीव में अनेक आलिम दानिशवरों यानी विद्वानों के सिर कलम करके दफनाये गये थे और दिल्ली के लाल किले की नींव में सैकड़ों बन्दियों को सशरीर चीरकर दफन किया गया था। गोपा ने सुकून की लम्बी साँस खींची कि कोई किला तो है जिसकी तामीर शायद ऐसी क्रूर अमानवीय नींव पर नहीं हुई।

अचानक उसने सिर को झटका। काश उसका विषय-क्षेत्र इतिहास न होता। तब वह भी अन्य लोगों की तरह बिना नींव और नींव की तामीरों के बारे में सोचते हुए इन क्रूर बीभत्स बिम्बों से अलग रह पाती। कितने अत्याचार सहे हैं मानव जाति ने अपनों के ही हाथों और यह क्रम किसी न किसी रूप में चलता चला आ रहा है। कहीं न कहीं भीतर आज भी हम वही हैं। तभी आने वाले कल के लिए हम छोड़ रहे हैं आज हम ऐतिहासिक रूप में कहीं अधिक अमानवीय घटनाओं की मिसालें, जो बस रही हैं अवचेतन में खौफनाक भावी किलों की नीव बनकर।

आधा किला गोपा पार कर चुकी थी पर आज पहाड़ी के ऊपर जाने का मन न था। सोचा वापस जाए और एक बार फिर इतने ही हिस्से का मुआयना करे। वह दिन सुबह यहाँ आ जाती है, पूरे किले को कम से कम दो बार तो बाहर से अन्दर और नीचे से ऊपर देख ही लेती है। वैसे भी हैदराबाद आने का मकसद ही मिशन गोलकोंडा था। प्रोफेसर आस्थाना गोलकोंडा पर एक शोधपरक पुस्तक लिख रहे हैं। अपने पी. एच. डी. के दौरान दिल्ली में टिकने के लिए गोपा को आर्थिक मदद की ज़रूरत थी। सो उसने प्रो. अस्थाना के यहाँ प्रोजक्ट फैलो के पूप में काम शुरू किया। इधर प्रोफेसर अस्थाना की टाँग में फ्रैक्चर होने के कारण उनका काम लटक गया था, सो उन्होंने गोपा को कुछ पुरानी नायाब सामग्री इकट्ठा करने के लिए उस्मानिया विश्वविद्यालय भेजा। अन्धा क्या चाहे दो आँखें ! गोपा ने झट हाँ कर दी क्योंकि दिल्ली और मेरठ के उदास माहौल से निकलने का यह मुँहमाँगा मौका था। पर यहाँ आकर जब उसने गोलकोंडा देखा तो उस्मानिया विश्वविद्यालय से अधिक समय वह किले और उससे सटे पुरातत्व विभाग के दफ्तर में बिताने लगी थी। गोलकोंडा के किले में जाना उसे पसन्द था क्योंकि यह शहर से दूर बसे एक वीराने का अहसास देता था।

किले में प्रवेश करते ही एक पोर्टिको जिसके बीचोंबीच एक खास स्थान पर खड़े होकर ताली बजाने से ऊँचे गुम्बद डायमंड कट में बनी चौबीस पत्तियों की तकनीक के जरिये यह आवाज़ लगभग तीन सौ अस्सी ऊबड़-खाबड़ सीढ़ियाँ चढ़कर लगभग चार सौ फीट ऊपर पहाड़ी पर बनी बालासिहार बारादरी तक पहुँचती है। वहां के लोगों को खबरदार करने के लिए कि नीचे दरवाजे़ पर कोई है। ऐसी ही तकनीक का इस्तेमाल उस स्थान पर भी किया गया है जहाँ कुतुबशाही का कोई सुल्तान मुजलिमों के गुनाह व फरियाद सुन अपना फैसला सुनाता था। सुल्तान पहली मंजिल पर इस कोण से बने कमरे में होता है कि मुलजिम को देख सकता था पर वह खुद उस मुलज़िम को ठीक से दिखाई नहीं देता था। अगर मुलज़िम सुल्तान पर वार करने का इरादा रखता तो उसके अपने कपड़ों को किये गये हल्के-से स्पर्श से भी कमरे में ज़ोरदार आवाज़ गूँज उठती थी। ठीक यादों की तरह कि कोई ज़रा-सी जुम्बिश हुई नहीं कि अन्तर्मन के गहन सुनसान में थरथरी-सी दौड़ जाती है। देश और काल की दूरी पल भर में सिमटकर रह जाती है। कमरे में गूँजी ज़ोरदार आवाज़ सुलतान व उनके सिपाहियों को आगाह करने के लिए और मुलज़िम को गिरफ्त में लेने के लिए काफी होती थी। आपने अपने को बचाया इनसान की फितरत है पर जीतता वही है जो समृद्ध होता है या ताकतवर होता है। न्याय-अन्याय तो कहने-सुनने की बातें भर हैं !


गोपा के चेहरे पर व्यंग्य की कूची से मुस्कान की एक तिरछी लकीर-सी खिंच गयी। सहसम्बन्ध शायद कहीं भी पूरी तरह नहीं होता हमेशा। मुस्कान की लकीर के समान्तर एक और लकीर खिंच गयी थी ‘हमेशा’ कहते ही। इस निर्जीव शब्द से कहीं बेहतर वे ध्वन्यार्थक –शब्द होते हैं जो सन्दर्भ से अर्थ ग्रहण करते हैं। फरियाद चोट खाया मन ही किया करता है पर तब रिश्तों के बीच एक ऐसी दीवार आ चुकी होती है कि आपके गिले-शिकवे अदृश्य सत्ता को ही सम्बोधित होते रहते हैं। क्योंकि रिश्ते कहीं दूर-छूट गये होते हैं। उधर क्या हो रहा है आप नहीं जानते जबकि इधर आपकी एक आह भी आपके लिए बवाल हो जाती है।

प्रथम पृष्ठ

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book