वानप्रस्थ - श्रीराम शर्मा आचार्य Vanprasth - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya
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आचार्य श्रीराम शर्मा >> वानप्रस्थ

वानप्रस्थ

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :120
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5880
आईएसबीएन: 00000

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प्रस्तुत है देव संस्कृति का मेरुदण्ड वानप्रस्थ.

Dev Sanskriti Ka Merudand Vanprasth

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

जीवन सम्पदा का दुरुपयोग

अन्य जीव-जन्तुओं का लक्ष्य और पुरुषार्थ मात्र शरीर रक्षा एवं सुविधा तक सीमित रहता है। उन्हें न तो चेतना के स्वरूप का ज्ञान होता है और न उसके प्रति किन्हीं कर्त्तव्यों के पालन का दायित्व अनुभव होता है, पर मनुष्य के सम्बन्ध में ऐसी बात नहीं है। उसकी संरचना स्रष्टा की सर्वोत्तम कलाकृति के रूप में हुई है। शारीरिक और मानसिक ढाँचा इस स्तर का विनिर्मित हुआ है कि वह स्वल्प श्रम और समय में शरीर मात्र की उचित आवश्यकताओं को सरलतापूर्वक पूरी कर सके और बची हुई क्षमता को उन प्रयोजनों में लगा सके, जिसके लिए वह जीवन सम्पदा उपलब्ध हुई है।

विश्व वाटिका को अधिक सुरम्य, सुव्यवस्थित, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाना स्रष्टा ने अपने श्रेष्ठ पुत्र युवराज मनुष्य को सौंपा है और कहा है कि वह जीवन सम्पदा का सदुपयोग इसी प्रयोजन के लिए प्रधान रूप से करे। शरीर निर्वाह यदि बुद्धिमत्ता पूर्वक किया जाय, तो उसके लिए स्वल्प शक्ति का नियोजन ही पर्याप्त होता रहेगा। शेष बचत से वे सभी प्रयोजन पूरे होते रहेंगे, जिनसे व्यक्तिगत अपूर्णताओं को पूरा करते हुए पूर्णता का लक्ष्य पूरा किया जा सके और साथ ही लोकमंगल के लिए बढ़े-चढ़े अनुदान प्रस्तुत कर सकना भी संभव हो सके। इस प्रकार स्वार्थ और परमार्थ के दोनों लक्ष्य साथ-साथ सरलतापूर्वक होते रह सकेंगे। यही है वह राह जिसे मानवी गरिमा को अनुभव करने वाले व्यक्ति को अपनाना उचित है।

इसे अज्ञान, अनौचित्य या भटकाव ही कहना चाहिए कि विचारशील होते हुए भी मनुष्य अविवेकी प्राणियों की तरह जीता है और अपनी सारी क्षमतायें, ललक एवं लिप्साओं में ही खपा देता है। सीमित वस्तुओं से निर्वाह भली प्रकार बन पड़ने पर भी उसे विलास, वैभव एवं संग्रह के लिए इतना पाने की अभिलाषा रहती है, जिसकी न आवश्यकता है और न उपयोगिता। इसी को लोभ कहते हैं। परिवार को स्वालंबी एवं सुसंस्कृत बनाने की जिम्मेदारियाँ उस परिकर में रहते हुए सहज निभती रहती हैं, पर सोचा यह जाता है कि कुटुम्बियों के ऊपर सुविधा-सम्पदाओं का अम्बार लाद दिया जाय। उत्तराधिकार में इतना छोड़ मरा जाय, जिसे पीछे वाले बिना हाथ-पैर हिलाये सात पुश्त तक बैठे खाते रहें। उसी कुचक्र में अपने उदाहरण और परामर्थ से परिजनों को भी हेय जीवन जीने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। इसी प्रक्रिया को मोह कहते हैं। लोभ और मोह की खाई समुद्र जितनी गहरी है। उसे पाटने के लिए इन्द्र जैसी प्रतिभा और कुबेर जितनी सम्पदा भी कम ही पड़ती रहती है। ललक लिप्सा की आंशिक पूर्ति भी न बन पड़ने पर असंतोष ही छाया रहता है और उस उद्विग्नता में अनाचार पर उतारू होकर तृष्णायें पूरी करने में निरत होना पड़ता है। इन्हीं दोनों को भव बन्धन कहते हैं।

लोभ को हथकड़ी और मोह को बेड़ी कहा गया है। इनसे बँधा हुआ प्राणी बेचैनी के अतिरिक्त और कुछ हस्तगत नहीं कर पाता। स्रष्टा के दरबार में पापों की पोटली बाँध कर उपस्थित होना पड़ता है। उस प्रश्न का उत्तर बन नहीं पड़ता, जिसमें पूछा जाता है कि जिस निमित्त मनुष्य जन्म की धरोहर सौंपी गई थी, उसका उपयोग किस प्रकार हुआ ? समुचित उत्तर न बन पड़ने पर उस दुर्गति का भाजन बनना पड़ता है, जिसे ‘‘अमानत में खयानत’’ करने वालों को कठोर प्रताड़ना दिये जाने का विधान है। भविष्य के लिए यह विश्वास भी उठ जाता है कि यदि फिर ऐसा ही अवसर दिया गया, तो अप्राणाणिकता की मनःस्थिति संयोजे हुए व्यक्ति फिर अपनी सदाशयता का परिचय दे सकेगा। साधन रहते हुए जो कुछ नहीं कर सका, वह मरणोत्तर जीवन की साधनहीन परिस्थितियों में क्या कर सकेगा ? यही वह स्थिति है, जिसमें पश्चात्ताप के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं रहता।

तीसरी एक मूर्खता है, जिसे कहते हैं-अहंकार। किराये के घर में रहने वाला, धरोहर के रूप में मिली हुई बौद्धिक क्षमता को जो स्व उपार्जित मान बैठता है वह अपनी हर भली-बुरी कृति पर सभी के मुँह से प्रशंसा के शब्द सुनने के लिए आतुर रहता है। हर किसी पर अपनी सम्पन्नता और समर्थता का रौब गाँठना चाहता है। इसी ओछी मनोवृत्ति का नाम है ‘‘अहंता’’। इसे भी लोभ और मोह की तरह घातक एषणाओं में गिना गया है और अनर्थों के लिए प्रेरित करती रहने वाली विडम्बना कहा गया है।

तुच्छ होते हुए भी रावण जैसा अहंकारी बना फिरने वाला इसी व्यामोह में प्रायः ऐसे प्रपंच रचता रहता है, जिनका औचित्य किसी भी प्रकार विचारशीलता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। शरीर को सजाकर सुन्दर और बलिष्ठ दिखाने लिए कितना समय, श्रम खर्च करना पड़ता है, कितना आडम्बर बनाना पड़ता है, इसे सहज ही सर्वत्र देखा जा सकता है। अमीरी दिखाने के लिए गरीबों को भी इतनी आतुरता होती है कि प्रहसनों में स्वांग भरने वाले अभिनेताओं को भी प्रायः पीछे छोड़ दिया जाता है। ठाट-बाट जमाकर दूसरों को अपनी विशेषता से चमत्कृत करने के लिए लोग इतने आडम्बर खड़े करते हैं, जिन्हें देखकर प्रतीत होता है कि उनके लिए अमीरी प्रदर्शन करने के अतिरिक्त और कुछ भी महत्वपूर्ण हो सकता है—यह सूझता ही नहीं। अपव्यय के अगणित स्वांग इसीलिए खड़े किये जाते हैं कि लोग इस भ्रम में पड़ सकें कि इनके पास अपार सम्पदा है। विवाह शादियों में घर फूँककर तमाशा देखने वाले प्रायः इसी निमित्त पैसे की होली जलाते हैं कि बिरादरी वालों में उनकी नाक कछुए से भी अधिक लम्बी दीख पड़े। मुखिया बनने, ऊँची पदवीपाने, साधारण जनों की तुलना में अपने को अधिक बड़ा सिद्धि करने के लिए जो प्रपंच रचने पड़ते हैं, उन्हें देखकर लगता है कि अहंकार की वितृष्णा लोभ और मोह से भी बढ़ी-चढ़ी है। उन दो में कुछ थोड़ा बहुत हाथ तो लगता है पर अहंकारी तो आदि से अन्त तक मूर्खता से घिरा और अपव्यय से बँधा रहता है। चाटुकार उसे बुरी तरह निचोड़ते हैं। शेखी बघारने वाला विचारशील वर्ग में ओछा, बचकाना, और भ्रमित स्तर का गिना जाता है। स्वयं को भी इस प्रपंच में इतना अधिक खटाता रहता है कि उस हानि की तुलना नहीं की जा सकती। अहंकार की पूर्ति के लिए जितना कुछ करना पड़ता है, वह अपव्यय खाते तो जाता ही है, साथ ही मन को मलीन बनाने और ईष्यालुओं, विद्वेषियों, विरोधियों की संख्या बढ़ाने की हानि भी सहन करता रहता है।

जिस सुर दुर्लभ मनुष्य शरीर को स्वयं पार होने और दूसरों को पार करने वाले प्रयोजनों में लगाकर इसी जीवन में स्वर्णोपम दृष्टिकोण आनन्द लेने और जीवन मुक्त जैसी निर्द्वन्दता प्राप्त करने का लाभ लिया जा सकता था, उसे लोभ, मोह और अहंकार के लिए बेहतर खर्च कर दिया जाता है। नुकसान में तो आलसी और प्रमादी भी रहते हैं, पर उन्हें अपंग, अनगढ़ों की श्रेणी में गिनकर दया का पात्र भी समझा जा सकता है; किन्तु उन्हें क्या कहा जाय, जो समझदार होते हुए भी नासमझी के तीन-तीन लबादे ओढ़ते हैं और उस भारी-भरकम वजन को ठीक तरह वहन न कर पाने पर रोते, कलपते और दुर्भाग्य को कोसते रहते हैं।

विपत्ति कहीं बाहर से आई हो, तो उसके लिए किसी को सहायता के लिए भी पुकारा जा सकता है, पर उस मूर्खता के लिए क्या कहा जाय, जिसने स्वयं ही सड़े कीचड़ के दलदल में घुसते-घुसते दुर्गति की चरम सीमा तक जा पहुंचने की ठान ठानी है। सही आवश्यकता की पूर्ति के लिए हर किसी को सुविधायें प्राप्त हैं। शरीर यात्रा के लिए वायु, जल और आहार की आवश्यकता पड़ती है। हवा सहज ही उपलब्ध रहती है। पानी थोड़े हाथ-पैर हिला कर प्राप्त किया जा सकता है। पेट भरने के लिए जितने आहार की आवश्यकता है, उतना औसत मनुष्य एक घण्टे के श्रम में कमा सकता है। तीन आवश्यकताओं की आम चर्चा होती रहती है-रोटी कपड़ा और मकान। इन सभी को यदि औचित्य की सीमा में उपलब्ध करना पर्याप्त समझा जाय, तो अपने और अपने सीमित कुटिम्बियों के लिए इतना पुरुषार्थ पर्याप्त हो सकता है जिसके उपरान्त शक्तियों का विपुल भण्डार बच सके और मानवी गरिमा के अनुरूप प्रयोजनों में लगाने वाले महामानवों की पंक्ति में बैठ सकने में सफल हो सके। साधनों की कमी रहने पर भी ऋषि कल्प आप्तजनों ने इतना कुछ एक ही जीवन में पूरा कर दिखाया, जिसका लेखा-जोखा लेने पर प्रतीत होता है कि उनने आत्म-संतोष, जन सम्मान और दैवी अनुग्रह के तीनों वरदान प्रचुर परिणाम में उपलब्ध कर दिखाये।

दुरुपयोग से अमृत भी विष बन जाता है। सदुपयोग से मल मूत्र भी सोना उपजाने वाली खाद के रूप में श्रेय अर्जित करते हैं। जीवन का सदुपयोग बन पड़े तो वह जीने वाले को धन्य बना सकता है और उसके सम्पर्क में आने वाले भी चन्दन वृक्ष के समीप उगे अन्य पौंधों की तरह गौरवान्वित हो सकते हैं, पर जहाँ दुरुपयोग के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं, वहां कोयले की दलाली में काले हाथ होने के अतिरिक्त और क्या कुछ पल्ले पड़ने वाला है।

भोग योनि वाले अन्य जीव-जन्तु अपना प्रारब्ध भोग कर जहाँ से आये थे, वहाँ चले जाते हैं। साथ में नई पाप पिटारी लाद कर नहीं ले जाते। जितने दिन जीते हैं, प्रकृति की गोद में स्वच्छन्दतापूर्वक दिन बिताते हैं, पर मनुष्य है, जो निरन्तर चिन्तित क्षुब्ध अशान्त और आकुल व्याकुल पाया जाता है। इसे आश्चर्य भी कहा जाना चाहिए और दुर्भाग्य भी, कि इतनी विपुल साधन सम्पदा से भरा-पूरा मनुष्य जन्म पाने वाला प्राणी उपलब्ध हीरक हार को कौड़ी मोल बेचकर खाली हाथ विदा होता और भविष्य के लिए पश्चात्ताप भरी प्रताड़ना और दुर्गति ही साथ लिए जाता है। ऐसा अनर्थ क्यों होता है कि सृष्टि के समस्त प्राणियों में मुकुटमणि समझा जाने वाला प्राणी दिव्य उपलब्धियों का दुरुपयोग करके मात्र घाटा और संकट ही उठाये, जबकि सामान्य क्षमताओं वाले प्राणी प्रकृति के अनुरूप रहकर इस समस्त संसार में कीड़ा कल्लोल करते और दिन बिताते हैं। इस विपर्यय के मूल में उपलब्धियों का दुरुपयोग ही एक मात्र कारण है।

वैभव को सुयोग कहना भूल है। सौभाग्य का सीधा अर्थ है-सदुपयोग का निर्धारण और उसे पूरा कर दिखाने का कौशल। इसके लिए आवश्यक समझदारी हर विचारशील में होनी चाहिए अन्यथा धन, सन्तान जैसी मनोकामनाओं को पूरी करने वाले अपेक्षाकृत अधिक त्रास सहते देखे गये हैं। धन का अभाव या अपव्यय अपने अपने ढंग की विपत्तियाँ उत्पन्न करता रहता है। धनी दुर्व्यसनों से, अहंकार से चाटुकारों से ईर्ष्यालुओं से घिरते और विलाप करते देखे गये हैं।


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